शाइरों का अडानी सेठ है राष्ट्रीय नाज़िम नदीम फ़र्रूख़, किसी को भी बना दे स्टार

 

*♦️एक हज़ार करोड़ की मुशाइरा इंडस्ट्री पर मुशाइरा माफ़ियाओं का क़ब्ज़ा-*
*♦️ सीनियर IAS, IPS और IRS अधिकारियों से कहीं ज़ियादा कमा रहे हैं अनपढ़- फ़र्ज़ी शाइर-शाइरात, जमकर कर रहे हैं टैक्स चोरी-*
*♦️ इन्कमटैक्स और लोकल पुलिस की विजिलेंस टीम को रखना चाहिए मुशाइरों में होने वाले पेमेंट पर नज़र‌-*
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(हमारे मुशाइरे भाग-52
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दोस्तो!
आपने आज तक ज़मीन माफ़िया, शराब माफ़िया, कोयला माफ़िया, शिक्षा माफ़िया, ड्रग माफ़िया, रेत-बालू माफ़िया, साईबर माफ़िया जैसे लफ़्ज़ बहुत सुने होंगे। ये माफ़िया इन श्रेत्रों में इसलिए आए क्योंकि इनमें बहुत ज़ियादा पैसा मिलने लगा था और ये पैसा कमाने का सबसे आसान और शार्ट कट तरीक़ा था। ऐसा ही कुछ मुशाइरों की दुनिया में भी हुआ है जिसकी अंदेशा मुज़फ़्फ़र हनफ़ी साहब को तीस साल क़ब्ल ही हो गया था और उन्होंने अपने एक आर्टिकल में आगाह किया था कि हिंदुस्तानी शाइरी को अगर बचाना है तो उसे उसके कमर्शियलाइज़ेशन से बचा कर रखना होगा। लेकिन उस वक़्त उनकी इस बात की बहुत मुख़ालिफ़त हुई और फिर वो शाइरी जो कभी अदब की ख़िदमत के नाम पर की जा रही थी उसमें धीरे-धीरे पैसे की बाढ़ आने लगी। नतीजा ये हुआ कि ओरिजनल शु’अरा आहिस्ता-आहिस्ता मुशाइरे के स्टेज से ग़ाइब होते चले गए और उनकी जगह परफ़ार्मर लेते चले गए। पाकिस्तानियों ने जब दुबई में इंडो-पाक मुशाइरों का आग़ाज़ किया तो वहीं से मुशाइरों ने एक कमर्शियल इंडस्ट्री का रूप लेना शुरू कर दिया था। स्पांसर्स का जो कांसेप्ट दुबई और दूसरे खाड़ी देशों में अपनाया जा रहा था, वही कांसेप्ट हिंदुस्तान के कन्वीनर्स ने भी काॅपी करना शुरू कर दिया। इसके बाद ये हुआ कि जो अदबी तंज़ीमें आम लोगों के चंदे से कम बजट में मुशाइरे करवाया करती थीं, उनकी जगह बड़े इवेंट ग्रुप बनने लगे या अदबी फाउंडेशन्स वजूद में आने लगे। फिर मुशाइरे धीरे-धीरे मंहगे होते चले गए और कामयाब परफ़ार्मर्स के रेट आसमान छूने लगे।

*♦️ अमेरिका-कनाडा के मुशाइरों जमकर बढ़ाए शाइरों के भाव-*
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दोस्तो!
ये बात ध्यान रखने वाली है कि दुबई और दूसरे खाड़ी देशों में जो मुशाइरे शुरू हुए थे, वो एक मजबूरी के तहत शुरू किए गए थे। हुआ यूं था कि सन् 1992 के बाद भारत-पाक के रिश्तों में बहुत कड़वाहटें पैदा हो गई थीं और उसके बाद दोनों देशों के लोगों को वीज़ा मिलने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। इसका असर दोनों देशों में होने वाले मुशाइरों पर भी पड़ा और तब पाकिस्तानियों की तरफ़ से सबसे पहले दुबई में इंडो-पाक मुशाइरे का कांसेप्ट सामने आया जहां का वीज़ा मिलने में दोनों मुल्कों के शु’अरा को कोई परेशानी नहीं थी।
इसी कांसेप्ट पर फिर अमेरिका में भी, जहां बड़ी तादाद में हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी रहते हैं, वहां भी इंडो-पाक मुशाइरों का बड़ा सिलसिला शुरू हुआ। उसके बाद कनाडा, आस्ट्रेलिया समेत बहुत सारे देशों ने इस कांसेप्ट को फालो करना शुरू किया। उस वक़्त आज़ादी से कुछ पहले और उसके बाद वाली जो पीढ़ी मौजूद थी और मद’ऊ शु’अरा में से 95% शाइर जेन्युइन थे।‌ लेकिन जैसे-जैसे वो पुरानी पीढ़ी रुख़सत होती गई, इन बैरूनी मुल्कों के मुशाइरों में और देश के मुशाइरों में फ़र्ज़ी शु’अरा और गवैयों की तादाद बढ़ती गई। अब हालत ये है कि इन मुशाइरों की फ़ेहरिस्त में हिंदुस्तान से मद’ऊ शु’अरा में से 90 % फ़र्ज़ी, नौटंकी बाज़ और गवैये शाइर होते हैं। ऊपर से सितम ये है कि ये हिंदुस्तान में इन्हें स्टार शाइर समझा जाता है और ये जमकर पैसा लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ़ हिंदुस्तान में आज ये मुशाइरा इंडस्ट्री एक हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की हो चुकी है और इस इंडस्ट्री के एक बड़े हिस्से पर मुशाइरा माफ़ियाओं का क़ब्ज़ा है। ख़ासकर हिंदुस्तान के ज़ियादातर बड़े मुशाइरे इसी माफ़िया के हाथ में हैं जिनमें सबसे ज़्यादा पैसा मिलता है। देश की कई उर्दू अकादमियां, बड़ी इंवेंट कंपनियां, बड़े कन्वीनर्स, बड़े स्पांसर्स, यहां तक कि वो नेता जो अपने सियासी फ़ायदे के लिए मुशाइरे करवाते हैं, उनमें से ज़ियादातर लोग इस मुशाइरा माफ़िया के असर में हैं। यही वजह है कि इन बड़े मंचों पर जेन्युइन शाइर की मौजूदगी नहीं के बराबर है।

*♦️ सीनियर IAS, IPS, IRS से कहीं ज़ियादा कमा रहे हैं मुशाइरों के अनपढ़ फ़र्ज़ी शाइर-शाइरात-*
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दोस्तो!
अगर आप हिंदुस्तान के एक ग्रेड और बी ग्रेड के मुशाइरों में शिरकत करने वालों की लिस्ट बनाएं या यूट्यूब पर कुछ मुशाइरे सुनें तो आपको पता चल जाएगा कि इस वक़्त इन मुशाइरा बाज़ स्टार शु’अरा की तादाद ब-मुश्किल 40-50 के आसपास होगी। आप अगर इन स्टार शाइरों में से किसी को भी फ़ोन करके पूछेंगे कि हम पहली बार अपने शह्र में मुशाइरा कर रहे हैं और हम आपको बुलाना चाहते हैं तो आप कितना पैसा लेंगे? आपको इन स्टार शाइरों में से कोई भी चालीस-पचास हज़ार रुपए से कम नहीं बताएगा। कुछ तो सत्तर हज़ार से एक लाख तक की डिमांड करेंगे। इसके अलावा वो आपसे फ्लाइट का टिकट भी मांगेंगा। एयरपोर्ट तक लेने-छोड़ने के लिए गाड़ी और अच्छा होटल भी उसकी शर्तों में होगा। अगर आप सोशल मीडिया के ज़रिए इन मुशाइरे बाज़ अनपढ़ और फ़र्ज़ी शाइरों के एक साल में पढ़े गए मुशाइरों के पोस्टर जमा कर, कुल पढ़े गए मुशाइरों से हुई एक एवरेज कमाई निकालेंगे तो आपको ये जानकार हैरानी होगी कि इन अनपढ़ों की कमाई उन सीनियर IAS, IPS और IRS अधिकारियों से भी कहीं ज़ियादा है जो बरसों पढ़ाई-लिखाई कर देश की सबसे बड़ी नौकरियों तक पंहुचे हैं। लाखों रुपए महीना कमाने वाले इन अनपढ़ों के साथ कुछ शाइरात भी हैं जो उर्दू तो छोड़िए, वो ठीक से हिंदी भी नहीं लिख सकती हैं लेकिन वो भी मुशाइरों के ज़रिए न सिर्फ़ लाखों रुपए महीना कमा रही हैं बल्कि एक सेलेब्रिटी की ज़िंदगी भी जी रही हैं।
सिर्फ़ सरकारी मुशाइरों को छोड़ दिया जाए तो इनकी लाखों की कमाई पर ये लोग सरकार को देने वाला GST भी हज़म कर जाते हैं। कुछ मिला कर इन स्टार शाइरों के लिए ये मुशाइरा कमाई का एक ऐसा ज़रिया है जिसमें इनका इन्वेस्टमेंट ज़ीरो है और कमाई अंधाधुंध है।

*♦️ इन्कमटैक्स और स्थानीय पुलिस की विजिलेंस टीम को मुशाइरों के पेमेंट पर रखना चाहिए ध्यान-*
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दोस्तो!
करोड़ों की इस मुशाइरा इंडस्ट्री पर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं है। मेरी कुछ ऐसे शु’अरा से इस सिलसिले में बात हुई जो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में या प्रशासनिक क्षेत्र में बड़े ओहदों पर रहे हैं। मैंने उनसे यही सवाल किया कि क्या मुशाइरा में शाइरों को मिलने वाले पेमेंट पर सरकार को निगरानी नहीं रखनी चाहिए जबकि इसमें करोड़ों रुपए का GST चुराया जा रहा है। इस पर कुछ अधिकारियों ने कहा कि आपका कहना बिलकुल दुरुस्त है। इसके लिए सरकार को कुछ नियम बनाना चाहिए और इन मुशाइरों के आर्थिक मामलों में इनकम टैक्स या लोकल पुलिस की विजिलेंस टीम को नज़र रखना चाहिए ताकि इन शु’अरा से मौक़े पर टैक्स वसूला जा सके।
दोस्तो!
हमारे देश में यूं तो पूरे साल ही मुशाइरे चलते रहते हैं लेकिन अक्टूबर-नवंबर से मुशाइरों का तीन-चार महीने का एक बड़ा सीज़न शुरू होता है। इस सीज़न पर अगर आप ग़ौर करेंगे तो पाएंगे कि ये स्टार महीने में 18-20 बार मुशाइरों के लिए हवाई सफ़र में रहते हैं। इस सीज़न में तो इनका रेट और बढ़ जाता है। ऐसे में आप ख़ुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इनकी कमाई कितनी बढ़ जाया करती होगी।
कुछ मिला कर हमारी मुशाइरा इंडस्ट्री जहां एक तरफ़ हमारे अदब को नुक्सान पंहुचा रही वहीं ये सरकारी टैक्स चोरी का भी एक बड़ा ज़रिया बन चुकी है।
बहुत शुक्रिया।
🙏🙏

नोट – मुशाइरों के आर्थिक और उसके मैनेजमेंट पर पढ़ें अगला भाग।
*✍️ अखिल राज*
*पत्रकार,लेखक,शाइर*
What’s app No.
8108365922

 

*♦️मुशाइरों की दुनिया का अडानी सेठ है राष्ट्रीय नाज़िम नदीम फ़र्रूख़, किसी को भी बना सकता है स्टार-*
*♦️ अपनी शोहरत के दम पर नये-नये तरीक़ों से पैसा कमा रहे हैं कुछ शाइर, पुलिस को रखनी चाहिए नज़र-*
*♦️जो कभी प्रोफेसर ही नहीं रहा वो पचास से अपने नाम के आगे लिख रहा है प्रोफेसर-*
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(हमारे मुशाइरे भाग-53)
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‘अज़हर’ मुशाइरा तो अदबगाह था मगर
हमने तमाशागाह इसे ख़ुद बना दिया
-अज़हर इनायती
अदब तो बेच दिया तालियों-लिफ़ाफ़े में
बनोगे और भला तुम भी नामवर कितना
-लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’

दोस्तो!
जिस तरह से आज हिंदुस्तान में कारोबार के मामले में अडानी सेठ को राष्ट्रीय सेठ कहा जाने लगा है, वैसे ही पिछले दस-बारह सालों में नदीम फ़र्रूख़ ने जिस तरह से देश-विदेश के बेशतर बड़े मुशाइरों पर क़ब्ज़ा कर एक तरफ़ा अपनी तूती बुलवाई है, उसके मद्द-ए-नज़र उसे मुशाइरों की दुनिया का अडानी सेठ कहना क़तई ग़लत नहीं होगा।‌ आज बहुत से लोग तो उसे मुशाइरा इंडस्ट्री का वो ख़ुदा मान बैठे हैं जो किसी भी गुमनाम और बुरे से बुरे शाइर को शोहरतों के शिखर पर बैठाने की कुव्वत रखता है। हिंदुस्तान में अल्लाह ने ये ताक़त इसके अलावा सिर्फ़ रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई को अता की है। ये दोनों भी किसी बुरे से बुरे शाइर को स्टार बनाने का माद्दा रखते हैं। उनके पास वो सारा सिस्टम और मैनेजमेंट मौजूद है जिसका स्विच दबाते ही गुमनाम शाइर शोहरत के आसमान पर चढ़ने नहीं बल्कि उड़ने लगता है। हिमांशी बाबरा उन ख़ुशनसीबों में से जिसे नदीम फ़र्रूख़ और रेहान सिद्दीक़ी- शाज़िया क़िदवई इन दोनों अज़ीम हस्तियों का ऐसा साथ मिला कि चंद सालों में ही वो देश-विदेश के मुशाइरों की स्टार शाइरा बन चुकी है। इसी के जैसा एक और ख़ुशनसीब शाइर इब्राहीम अली ज़ीशान है जो इनकी बदौलत मुशाइरों के आसमान पर एक रौशन सितारा बन कर चमक रहा है।

*♦️मुशाइरों की दुनिया का सबसे कमज़ोर नाज़िम नदीम फ़र्रूख़ अपने सियासी और प्रशासनिक रसूख़ से बना सबसे सबसे महंगा नाज़िम-*
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दोस्तो!
मुशाइरों की दुनिया में एक से बढ़कर एक नाज़िम आए हैं, जिनकी निज़ामत का एक मैयार हुआ करता था। वो किसी शाइर को पेश करते वक़्त उतनी ही तारीफ़ करते थे, जितनी तारीफ़ का वो हक़दार होता था। आज भी ऐसी मैयारी निज़ामत करने वाले Mansoor Usmani साहब हमारे बीच मौजूद हैं। उनकी निज़ामत में बोले गये अदबी जुमले याद और कोट करने लायक़ होते हैं लेकिन इस समय मुशाइरों की दुनिया में बतौर नाज़िम अब तक के सबसे कमज़ोर नदीम फ़र्रूख़ का एक तरफ़ा बोलबाला है जो निज़ामत के नाम पर सिर्फ़ चापलूसी की भाषा इस्तेमाल करता है। अपने रसूख़ की वजह से आज उसके और उसकी टीम के पास ज़ियादातर बड़े- मझले मुशाइरे होते हैं।
इस वक़्त जो शु’अरा सबसे ज़ियादा मुशाइरों में नज़र आते हैं, पहले उन नामों को जान लेते हैं और फिर नदीम फ़र्रूख़ की उस कोर टीम की बात करते हैं। इस वक़्त देश में सबसे ज़ियादा बड़े मुशाइरे पढ़ने वालों में वसीम बरेलवी, इक़बाल अशहर,शकील आज़मी, पापुलर मेरठी,महशर आफ़रीदी,अबरार काशिफ़,अज़्म शाकरी, हिमांशी बाबरा, जौहर कानपुरी, शबीना अदीब, अल्ताफ़ ज़िया, हाशिम फ़िरोज़ाबादी, नवाज़ देवबन्दी, माजिद देवबन्दी, आदिल रशीद, सलीम सिद्दीक़ी, ख़ुर्शीद हैदर, इब्राहीम अली ज़ीशान, मनिका दुबे, राजेश रेड्डी, मनमोहन दानिश,नुसरत मेहदी,
नईम अख़्तर ख़ादमी, नदीम शाद मुईन शादाब समेत चंद नाम और जोड़े जा सकते हैं।
इनके अलावा बड़े मुशाइरों में कुछ लोकल या इलाक़ाई शाइर भी शामिल कर लिए जाते हैं।
इन शु’अरा में से नदीम फ़र्रूख़ की कोर टीम में शकील आज़मी, महशर आफ़रीदी, हिमांशी बाबरा, इब्राहिम अली ज़ीशान, आदिल रशीद, सलीम सिद्दीक़ी के नाम लिए जा सकते हैं। इनके अलावा जो बाक़ी शाइर हैं, उनमें से दो-चार शाइर कन्वीनर्स की डिमांड के मुताबिक भी शामिल कर लिए जाते हैं।
नदीम फ़र्रूख़ के अलावा देश में एक दूसरा बड़ा ग्रुप इक़बाल अशहर का है। इसकी कोर टीम में इक़बाल अशहर, वसीम बरेलवी, पापुलर मेरठी, अज़्म शाकरी, नदीम शाद, हाशिम फ़िरोज़ाबादी, महशर आफ़रीदी और शकील आज़मी, हिमांशी बाबरा भी शामिल हैं। इस ग्रुप में निज़ामत की ज़िम्मेदारी अबरार काशिफ़ संभालता है।
एक तीसरा ग्रुप है रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई का जो ‘अंदाज़-ए-बयां और’ के बैनर तले देश में शाइरों की खोज करके हमारे अदब पर बड़ा अहसान करता है। फिर खोजे गए शाइरों को मुशाइरा पढ़वाने दुबई ले जाता है। ये दो देशों में अलग-अलग नामों से रजिस्टर्ड कंपनी है जिसके बारे में हम आगे डिटेल में बात करेंगे। अभी मेरा मक़सद आपको ये बताना है कि सैकड़ों करोड़ की इस मुशाइरा इंडस्ट्री पर कितने ग्रुप का क़ब्ज़ा है और इसमें से सबसे बड़ा ग्रुप नदीम फ़र्रूख़ का है।
ये तीनों ग्रुप ही हिंदुस्तान से लेकर खाड़ी देशों तक के मुशाइरों में अपना दख़्ल रखते हैं।

*♦️मुशाइरों और शाइरों पर इन्कमटैक्स और पुलिस को रखना चाहिए ख़ुफ़िया निगरानी-*
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दोस्तो!
ज़ियादातर मुशाइरों में शु’अरा का पेमेंट सिस्टम आज भी लिफ़ाफ़े वाला है। यही वजह है कि ये पैसा पूरी तरह एक नंबर में शो नहीं हो पाता है और बहुत से शाइर टैक्स में सरकार को चूना लगाते हैं। इसके अलावा कुछ शाइर अपनी शोहरत का ना-जाइज़ फ़ाइदा उठा कर ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से भी पैसा बनाने का काम करते हैं। यूपी एक बड़े शाइर और नाज़िम का नाम एक बड़े घोटालेबाज़ के साथ किए एक प्रोग्राम को लेकर आया था। दरअस्ल उस प्रोग्राम की आड़ में एक बड़ा आर्थिक घोटाला अंजाम दिया गया था। उस मामले में जब मुख्य आरोपी के साथ उस शाइर का नाम भी पुलिस फाइल में आ गया तो वो कई हफ़्तों अंडरग्राउंड रहा। उसने अपना भेस तक बदल लिया और फिर अपने सियासी और प्रशासनिक रिश्तों का इस्तेमाल कर बड़ी मुश्किल से उसने अपना नाम आरोपियों की लिस्ट से हटवाया।
ऐसे ही एक शाइर, जो फिल्मी गीतकार भी है, वो भी फिल्म फायनेंस करवाने के लिए मोटा कमीशन लेता है और इसकी सरकार को कोई ख़बर नहीं है। दरअस्ल अपनी शोहरत के दम पर इस शाइर के खाड़ी देशों और हिंदुस्तान के कई बड़े बिजनेसमैन और उद्योगपतियों से संबंध बन गये हैं। ऐसे में किसी भी पैसे वाले से फिल्म में फायनेंस करवाने का भी धंधा उसके शुरू कर दिया क्योंकि इसमें मोटा कमीशन मिलता है। इसी साल की शुरुआत में एक प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की एक फिल्म रिलीज हुई है। उस प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को इस शाइर ने दुबई के एक आदमी से दस करोड़ का फायनेंस दिलवाया था। पैसा मिलने के बाद ये शाइर तयशुदा कमीशन से भी ज़ियादा पैसा मांगने लगा। इस बात पर इसका उस प्रोड्यूसर-डायरेक्टर से झगड़ा हो गया। हालांकि उसने इसकी डिमांड के मुताबिक कमीशन तो दे दिया लेकिन अपनी उस फिल्म से इसके गाने निकाल दिए। इसी शाइर ने देश के बड़े शहरों में कई बिल्डरों से अपने शाइर होने का फ़ाइदा इस रूप में उठाया कि उनसे सस्ते दामों में प्लाट ले रखे हैं। अगर सरकार मुशाइरों की आड़ में चल रहे ऐसे धंधों की भी जानकारी निकाले तो पता चलेगा कि कुछ शाइर कैसे अपनी शोहरत का ना-जाइज़ फ़ाइदा उठा कर पैसा बनाने में लगे हुए हैं और सरकारी टैक्स की चोरी कर रहे हैं।

*♦️जो कभी प्रोफेसर ही नहीं रहा वो पचास साल से ख़ुद को बता रहा है प्रोफेसर-*
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दोस्तो!
हमारे अदब की दुनिया भी बड़ी अजीब है। यहां कभी-कभी शाइर बरसों तक झूठ बोलता रहता है और लोग उस पर आंख मूंद कर यक़ीन भी करते रहते हैं। आज मैं आपको एक ऐसे सीनियर शाइर के बारे में बता रहा हूं जो अपनी ज़िन्दगी में कभी प्रोफेसर रहा ही नहीं लेकिन आज तक वो अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगाकर लोगों को बेवकूफ़ बना रहा है। मुशाइरों की दुनिया में पिछले 60-62 साल से मौजूद ये शख़्स पिछले पचास सालों से ख़ुद को प्रोफेसर लिखता आ रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि ये जिस कालेज में पढ़ाता था, वहां सरकारी तौर पर प्रोफेसर का पद ही स्वीकृत नहीं था। दरअस्ल तब उत्तर प्रदेश सरकार में ये नियम था कि प्रोफेसर का पद सिर्फ़ उन्हीं कालेजों में होगा जहां पोस्ट ग्रेजुएशन है और जिस कालेज में ये शाइर पढ़ाता था वो जूनियर कालेज था लिहाज़ा वहां प्रोफेसर के पद के बजाय रीडर का पद था। जब तक ये शाइर रिटायर हुआ तब तक उस कालेज में रीडर के पद ही रहा लेकिन ये हमेशा अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगाता रहा। चूंकि कम पढ़े-लिखे मुसलमानों में प्रोफेसर शब्द का बड़ा रौब पड़ता है तो इसने रीडर के बजाय प्रोफेसर जोड़ लिया और आज तक ख़ूब इज़्ज़त कमाई।
🙏🙏

*♦️ रेहान सिद्दीक़ी-शाज़िया क़िदवई ने मुशाइरा कामयाब करने के लिए उस शे’र पर भी दाद दे दी जिसकी तस्दीक़ क़ुरआन नहीं करता है-*
*♦️नयी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर दाद के लिए सामे’ईन पर डाला जाता है मनोवैज्ञानिक प्रभाव-*
*♦️ पाकिस्तानी शाइरों के दम पर चल रही है‌ कई हिंदुस्तानी मुशाइरे बाज़ शु’अरा की गाड़ी-*
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(हमारे मुशाइरे भाग-54)
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SCENE NO. 1
LOCATION –
एक मुशाइरा गाह

मुशाइरा शुरू हुए काफ़ी देर हो चुकी है और वहां हर शाइर बड़ी दाद-ओ-तहसीन‌ से नवाज़ा जा रहा है। मुशाइरे के स्टेज के पीछे एक फुल साइज स्क्रीन लगी है जिस पर पढ़ने वाला शाइर और दाद देते सामे’ईन‌ को भी दिखाया जा रहा है।(अगर स्टेज के पीछे स्क्रीन लगाने में प्रोब्लम होती है तो कभी-कभी ये लार्ज साईज स्क्रीन स्टेज के एक कोने पर भी लगाई जाती है ताकि हाल में बैठे सभी लोगों को दिखाई पड़े।) मुशाइरा गाह में दो कैमरा मेन मौजूद हैं जो इस मुशाइरे की वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ उसे इस बिग स्क्रीन पर भी दिखा रहे हैं। एक कैमरा मेन सीधे स्टेज पर शाइर को कवर कर रहा है। दूसरा कैमरा मेन सामे’ईन की रिएक्शन और दाद को कवर कर रहा है। मुशाइरा गाह की पहली सफ़ में वो दो हस्तियां बैठी हैं जो हिंदुस्तान से लेकर खाड़ी देशों के तमाम शाइरी सुनने वालों में अव्वल नंबर की सुख़न-फ़हमी रखती है। इसलिए मैं उन हस्तियों को ‘राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दाद माहिरीन’ के नाम से पुकारता हूं।
दोस्तो!
अब नाज़िम ने उस बहादुर शाइर को दावत-ए-सुख़न दी है जो हिंदुस्तान से लेकर खाड़ी देशों में भी बेशर्मी से शाइर Mahesh Joshi (खरगोन) के अश’आर समेत कई शु’अरा के शे’र अपने नाम से सुना चुका है।‌ जो बड़े-बड़े शाइरों के कलाम का बे-ख़ौफ़ चर्बा और सर्क़ा करके मुशाइरों में हिट हो जाता है। इसका शुमार हमारे मुशाइरों के स्टार शाइरों में होता है और इसका नाम है- महशर आफ़रीदी।
महशर आफ़रीदी के माइक पर आते ही उस बड़ी स्क्रीन पर महशर आफ़रीदी दिखाई देने लगता है और इधर दोनों राष्ट्रीय दाद माहिरीन के चेहरे ताज़ा गुलाब की मानिंद खिल उठते हैं।अब महशर आफ़रीदी शे’र सुनाना शुरू करता है।‌
वो पढ़ता है –

*अशरफ़ हो इस जहां में तो मग़रूर मत रहो*
*फैंका गया है तुमको उतारा नहीं गया*

और जैसे ही ये शे’र पूरा होता है, बिग स्क्रीन पर वो शाट कट होता है और महशर आफ़रीदी की जगह पहली सफ़ में बैठे राष्ट्रीय दाद माहिरीन रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई दिखाई पड़ते हैं। उनमें से रेहान सिद्दीक़ी अपनी कुर्सी से थोड़ा उठकर अपने हाथ ऊपर करके महशर को दाद देते हुए पीछे सामे’ईन की तरफ़ नज़र डालते दिखाई पड़ते हैं। रेहान सिद्दीक़ी के साथ बैठी शाज़िया क़िदवई भी स्क्रीन पर दिखाई पड़ती हैं जिनका छोटा-सा मुंह महशर के उस शे’र को सुनकर अपनी पूरी ताक़त से इतना ज़ियादा खुल चुका है जितनी उस मुंह की हैसियत ही नहीं है। वो भी उसी बड़े-से खुले मुंह के साथ वाह-वाह करती हुई दाद देती दिखाई पड़ती हैं। स्क्रीन पर दोनों को दाद देते देखकर सामे’ईन समझता है कि वाक़ई महशर आफ़रीदी ने बड़ा क़ीमती शे’र पढ़ दिया और वो भी उन दोनों के देखा-देखी दाद देने लगते हैं।
दोस्तो!
‘अंदाज़ ए बयां और’ के तक़रीबन सभी मुशाइरों में इसी टेक्निक से नासमझ सामे’ईन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालकर दाद दिलवाई जाती है और मुशाइरे को हिट किया जाता है। आप ख़ुद यूट्यूब पर इनके मुशाइरे देखिए या इंस्टाग्राम रील देखेंगे तो आपको इनका ये मनोवैज्ञानिक खेल आसानी से समझ में आ जाएगा।
दरअस्ल रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई उर्दू अदब के लिए कोई चैरिटी नहीं कर रहे हैं, वे एक इवेंट कंपनी चला रहे हैं जिसका मक़सद प्रोफिट कमाना है। उर्दू अदब के फ़रोग़ से उनका कोई सरोकार नहीं है। इसलिए इवेंट को सक्सेस करने के लिए जो-जो हर्बा इस्तेमाल किया जा सकता है, वो सब किया जाता है। आपको इनके मुशाइरे में कभी-कभार ही कोई ऐसा शाइर नज़र आएगा जो वाक़ई शाइर हो और जिससे अच्छी शाइरी सुनने को मिले। चूंकि इनका काम ही कमर्शियल है तो मुशाइरे में कमर्शियल शाइर बुलाना इनकी मजबूरी है। वो ही इन्हें पैसा कमा कर देते हैं।
दोस्तो!
जो बड़े बजट के मुशाइरे होते हैं, उनमें कई कन्वीनर पूरे हाल में अलग-अलग जगह 5-5, 10-10 के ग्रुप में किराए के दाद देने वाले बैठा देते हैं। उनका काम हर शाइर को उसके दो-चार शे’र पर ऐसी दाद देने का होता है कि जिसे देखकर सामे’ईन ख़ुद ही दाद देने लग जाए। मुशाइरा कामयाब करने में इस तरीक़े का भी ख़ूब इस्तेमाल किया जा रहा है और इसके ज़रिए स्पांसर्स को ख़ुश कर दिया जाता है।

*♦️ क्या रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई ने कभी क़ुरआन नहीं पढ़ा?-*
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दोस्तो!
अब आते हैं दूसरे अहम मुद्दे पर। मैं इस बात को क़तई मानने को तैयार नहीं हूं कि रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई ने कभी क़ुरआन नहीं पढ़ा होगा। हर मुसलमान जानता है कि सिद्दीक़ी सरनेम कौन से मुसलमान लगाते हैं और इस सरनेम की क्या अहमियत है। वैसे ही उत्तर प्रदेश के बहुत से मुस्लिम जानते होंगे कि क़िदवई सरनेम वो लोग लगाते हैं अयोध्या में आठ सौ साल पहले आए क़ाज़ी क़ुदवा नामक सूफ़ी संत जिनके अन्य नाम क़ाज़ी क़दवतउद्दीन/ क़िदवतुल्लाह/ क़ाज़ी क़िदवत बताया जाता है,के अनुयाई हैं या उनके परिवार से हैं। चूंकि शाज़िया क़िदवई ऐसे सूफ़ी घराने से त’अल्लुक़ रखने वाली हैं तो ज़ाहिर है उन्होंने भी क़ुरआन को थोड़ा-बहुत पढ़ा होगा। मैं ये बात इसलिए कह रहा हूं कि महशर आफ़रीदी ने जो शे’र पढ़ा था और जिस पर इन दोनों ने ज़बरदस्त दाद देकर पब्लिक को भी दाद देने पर मजबूर किया, उस शे’र में कही गई बात “फेंका गया है तुमको उतारा नहीं गया” क़ुरआन में मौजूद वाक़ए से बिल्कुल बिल्कुल मेल नहीं खाती है। क़ुरआन में कहीं भी ये नहीं लिखा है कि अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम और मां हव्वा को जन्नत से फेंकने का हुक्म दिया। क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया है- “नीचे उतर जाओ”।
(देखें स्क्रीन शॉट)

दोस्तो!
तो अब सवाल ये उठता है कि महशर आफ़रीदी की ये हिम्मत कैसे हुई कि वो क़ुरआन में लिखा गये वाक़ए को,जिसमें अल्लाह ताला साफ़ कह रहे हैं कि “तुम सब नीचे उतर जाओ (शैतान को भी)” को बदल कर फेंकने वाली बात कह दी। उस पर शर्म की बात ये है कि सिद्दीक़ी ख़ानदान और क़िदवई ख़ानदान, जिसे मुस्लिम बड़ी इज़्ज़त और एहतमाम की नज़र से देखते हैं, वो महशर आफ़रीदी की इस बात पर मुंह फाड़ -फाड़कर और हाथ उठा-उठाकर ख़ुद भी दाद दे और सामे’ईन को भी दाद देने के लिए उकसाए। मुझे तो ये बात समझ नहीं आई कि किसी भी पढ़े-लिखे मुसलमान या आलिम ने इस पर आज तक महशर आफ़रीदी, रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई से कोई सवाल क्यों नहीं पूछा?
क्या मुशाइरों‌ के धंधे की ख़ातिर समाज रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई को ये इजाज़त दे सकता है कि कोई शाइर अगर क़ुरआन में कही गई बात के उलट बात करे तो उसे भी बढ़ावा दिया जाए। मैं दावे से ये कह सकता हूं कि अगर ये बात महशर आफ़रीदी के बजाए किसी हिन्दू शाइर ने कही होती तो अब तक हंगामा खड़ा हो गया होता।

*♦️ महशर आफ़रीदी ने इस अच्छे शे’र का कबाड़ा करके बनाया ये बुरा शे’र-*
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दोस्तो!
मैं पहले ही बता चुका हूं कि महशर आफ़रीदी शे’र चुराने, चर्बा-सर्क़ा करने में एक नंबर है। दरअस्ल इसने जो ये शे’र कहा है –

*अशरफ़ हो इस जहां में तो मग़रूर मत रहो*
*फेंका गया है तुमको उतारा नहीं गया*

ये शे’र उसने पाकिस्तान के एक बेहतरीन शाइर नदीम भाभा के शे’र को तोड़कर बनाया है। नदीम भाभा कहते हैं-

*अपनी गर्दन झुका के बात करो*
*तुम निकाले गए हो जन्नत से*

इस शे’र में उन्होंने “निकालने” वाली वही बात कही है, जो क़ुरआन में कही गई है। महशर आफ़रीदी ने इस शे’र से अपना शे’र बनाते हुए लफ़्ज़ “फेंका गया” इस्तेमाल कर, इस अच्छे-ख़ासे शे’र का कबाड़ा कर दिया। सितम तो ये है कि रेहान सिद्दीक़ी- शाज़िया क़िदवई ने इस ग़लत शे’र को हिट भी करवा दिया और किसी ने अब तक इस की मुख़ालिफ़त भी नहीं की। ये बात ज़ाहिर करती है कि मुशाइरा बाज़ शाइरों ने और कन्वीनर्स ने हमारे सामे’ईन के अदबी ज़ौक़ और अदबी शऊर को इतने निचले स्तर पर पहुंचा दिया है कि अब उनमें अच्छे-बुरे शे’र का फ़र्क करने की तमीज़ भी नहीं बची है। ये हमारे दौर का एक बड़ा अफ़सोसनाक सानेहा है जिसकी भरपाई दौर-ए-हाज़िर में तो ना-मुमकिन लगती है।

महशर आफ़रीदी के एक मुशाइरे का लिंक कमेंट बॉक्स में दे रहा हूं। वैसे आपको इंस्टाग्राम पर उसके इस शे’र की कई रील्स भी मिल जाएंगी।
बहुत शुक्रिया।
🙏🙏

नोट- आगे जानेंगे कि कैसे एक कमज़ोर और चापलूस नाज़िम नदीम फ़र्रूख़ अपनी निज़ामत में मुशाइरे को कामयाब बनाता है। उसकी स्ट्रेटजी क्या है? और ऐसे कौन-कौन शाइर हैं जो बिना किसी ग्रुप में शामिल हुए अपने कलाम के दम पर बा-इज़्ज़त मुशाइरों में बुलाए जाते हैं और वो इन मुशाइरे बाज़ों पर भारी पड़ते हैं।

(नोट – अगली कड़ी में पढ़ें कि कैसे बुरे शाइरों को हिट करके मुशाइरों को बनाया जाता है कामयाब।)

*✍️ अखिल राज*
*पत्रकार,लेखक,शाइर*
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8108365922

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