विशेषज्ञ मत: महाभियोग भी नही ला सकता विपक्ष CEC चीफ ज्ञानेश के खिलाफ
Cec Gyanesh Kumar Opposition Impeachment Hope Ex Ag Mukul Rohatgi Answer Is An Emphatic No
‘..महाभियोग ला ही नहीं सकते’: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की मुहिम पर बोले पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी
सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के विपक्ष की मुहिम की धार को पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कुंद कर दी है। उन्होंने कहा है कि असहमति और मतभेद मजबूत लोकतंत्र का आधार है और इस केस में महाभियोग का संवैधानिक आधार नहीं बनता।
नई दिल्ली 26 सितंबर 2026 : अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। लेकिन, देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का कहना है कि विपक्ष जिन दावों के आधार में इस सोच में पड़ा हुआ है, वह पूरा होना संभव ही नहीं है।
पूर्व अटॉर्नी जनरल ने बताया क्यों नहीं लाया जा सकता सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग
‘महाभियोग प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता’
भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल और देश के जाने-माने वकील मुकुल रोहतगी ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद और उन्हें पद से हटाने के लिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की मुहिम पर एक खास इंटरव्यू दिया है। इसमें उनका साफ कहना है कि विपक्ष के संभावित महाभियोग प्रस्ताव का कोई संवैधानिक आधार नहीं बनता और तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर मतभेद, असल में निर्णय लेने की स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान है। उन्होंने इस संबंध में एनडीटीवी में दिए इंटरव्यू में कहा-
सीईसी को लेकर न्यूज रिपोर्ट पर हो रहा विवाद
सीईसी ज्ञानेश कुमार को लेकर सारा विवाद इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट को लेकर हो रहा है, जिसमें दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने सीईसी और कैबिनेट सक्रेटरी को चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं और फैसलों को लेकर 14 बार आपत्तियां जताते हुए अपने नोट लिखे थे।
‘सर्वसम्मति से फैसले का मतलब मतभेद दूर’
रोहतगी का कहना है कि ऐसे नोट आंतरिक होते हैं और क्योंकि चुनाव आयोग बहुमत से फैसला करता है, इसलिए यह सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का आधार नहीं बन सकता। उनका कहना है, ‘अंत में अगर चुनाव आयोग सर्वसम्मति से आदेश जारी करता है, तो इसका मतलब हुआ कि मतभेद दूर हो चुके हैं और उनमें तालमेल बिठा लिया गया।’
मुकुल रोहतगी का यह भी कहना है कि सीईसी के पास अन्य दोनों सदस्यों से ज्यादा अधिकार नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘सीईसी तीनों (आयुक्तों) में से सिर्फ एक है।’ चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा कि उसके सारे फैसले अंत में सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
पूर्व अटॉर्नी जनरल ने दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से आंतरिक मतभेदों को लेकर लिखी गई कथित चिट्ठी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, ‘यह चुनाव आयुक्तों की अपनी संवैधानिक स्थिति को लेकर गलतफहमी है। वे संवैधानिक संस्था हैं।’ ‘कैबिनेट सेक्रेटरी कार्यपालिका और नौकरशाही के प्रमुख होते हैं। उनकी क्या भूमिका है? यह बिल्कुल गलत है।’
‘भारत के चीफ जस्टिस से अलग फैसला भी देते हैं जज’
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कई जजों वाली बेंच से भी चुनाव आयोग की मौजूदा स्थिति को लेकर तुलना की। उन्होंने कहा कि अक्सर जजों में मतभेद होते हैं, लेकिन फैसला सर्वसम्मति से देते हैं।

‘मतभेद और असहमति लोकतंत्र की नींव हैं’
मुकुल रोहतगी ने आपातकाल से संबंधित एक उदाहरण भी सामने रखा। उन्होंने बताया कि कई बार अल्पमत का नजरिया बाद में सही ठहराया जाता है।
उन्होंने कहा कि 1976 में मौलिक अधिकार से जुड़े एक केस में पांच सदस्यीय बेंच में जस्टिस एचआर खन्ना ने अल्पमत वाला फैसला दिया था। जबकि, बहुमत का फैसला ये था कि आपातकाल (इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 के बीच देश में लगाया था) में नागरिक ‘जीने के अधिकार’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ की मांग को लेकर कोर्ट में नहीं जा सकते। जिसे 2017 में 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने पलट दिया।
मतभेद और असहमति लोकतंत्र की नींव हैं। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र है।
मुकुल रोहतगी, पूर्व अटॉर्नी जनरल
सीईसी को पद से कैसे हटाया जा सकता है
संविधान के आर्टिकल 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह से और उन्हीं आधारों पर उसके पद से हटाया जा सकता है, जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटा जा सकता है।
संसद में इस तरह का महाभियोग प्रस्ताव साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर ही लाया जा सकता है।
इसके बाद इस प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों के बहुमत और सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत से पास होना जरूरी है।

जून 2025 में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में सुधार के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) शुरू किया। सुधार के बाद आई पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से देशभर में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। विपक्ष आरोप लगाता रहा कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए आयोग ने मनमाने ढंग से वोट काटे हैं।
23 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी पड़ताल के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR को लेकर बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक आपत्तियां दर्ज करवाईं।
कई मौकों पर दोनों आयुक्तों को आयोग के नाम पर हुए फैसलों की जानकारी तक नहीं थी। रिपोर्ट के मुताबिक संधू ने कहा कि चुनाव आयोग ने उनके और जोशी की लिखित सलाह के खिलाफ ‘गैरकानूनी’ काम किया।
SIR प्रक्रिया में 5 गड़बड़ियां के आरोप लग रहे हैं…
1. फॉर्म-6 में गैरकानूनी तरीके से नया सवाल जोड़ा गया
18 साल से ऊपर के व्यक्ति को वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करने के लिए फॉर्म-6 भरना होता है। इनमें कई जानकारियां देनी होती हैं। यह भी पूछा जाने लगा- ‘क्या वोटर के माता-पिता या दादा-दादी इससे पहले हुए SIR की वोटर लिस्ट में मौजूद थे?’
फॉर्म भरने में इस सवाल का जवाब देना जरूरी था। मई में विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म-6 को इस तरह बदला नहीं जा सकता। इसके लिए सरकार को नियम बदलना पड़ेगा। संधू ने भी उनकी इस बात पर सहमति जताई थी।
13 अगात को संधू ने आधिकारिक तौर पर कहा कि इस अनाधिकृत और गैरकानूनी तरीके से जोड़े गए सवाल को तुरंत हटाया जाना चाहिए, लेकिन 21 सितंबर तक ये सवाल मौजूद था।
2. चुनावी अधिकारियों का वोट लिस्ट में एक्सेस सीमित किया गया
चुनावी इलाकों की लोकल वोटर लिस्ट वहां के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर, ERO तैयार करते हैं। आम तौर पर SDM ही उस इलाके के ERO होते हैं।
ये वोटर लिस्ट आयोग के सॉफ्टवेयर ECINet (इसकी जगह पहले ERONet था) पर होती है। अगस्त में संधू ने कहा कि राज्यों के कई इलेक्शन ऑफिसर्स ने बताया कि उन्हें ERONet पोर्टल तक पूरी एक्सेस नहीं मिल रही।
संधू ने कहा कि चुनाव आयोग की IT डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि वो अधिकारियों को कानून से मिली’ काम करने की आजादी और उनको अधिकार नहीं है कि वो अधिकारियों को कानून से मिली काम करने की आजादी और उनकी एक्सेस को कम करें।
3. पश्चिम बंगाल में वोटर्स के खिलाफ 16.10 लाख ‘गुमनाम अपीलें’
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान 60 लाख वोटर्स के नाम में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’, यानी उनकी डिटेल्स के मिलान में कमी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को इस पर फैसला करने का काम दिया। इनमें से 27 लाख वोटर्स के नाम बाद में चुनाव आयोग ने हटा दिए थे। फिर सुप्रीम कोर्ट ने इन वोटर्स की अपील सुनने का काम हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के ट्रिब्यूनल को सौंपा।
पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें पेंडिंग थीं। इनमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटर्स की थीं, जो अपना नाम शामिल करना चाहते थे।
थीं, जिनको न्यायिक अधिकारी पहले ही लिस्ट


