फैक्ट चैक:अत्याधुनिक देश रहे लेबनान के पतन में मुस्लिम घुसपैठियों की क्या भूमिका है?
लेबनान के इतिहास और वर्तमान स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर यह विमर्श अक्सर साझा किया जाता है। एक पत्रकार के रूप में आप जानते होंगे कि ऐतिहासिक घटनाओं के कई पहलू होते हैं। यहाँ इस दावे का तथ्यात्मक विश्लेषण और संदर्भ दिया गया है:
1. क्या लेबनान ‘अरब का पेरिस’ था?
तथ्य: यह पूरी तरह सत्य है। 1950 और 60 के दशक में लेबनान अपनी उदार संस्कृति, मजबूत बैंकिंग क्षेत्र और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध था। बेरूत को वास्तव में ‘पेरिस ऑफ द मिडिल ईस्ट’ कहा जाता था। लेबनान की अर्थव्यवस्था तेल पर नहीं, बल्कि सेवा क्षेत्र (Services) और व्यापार पर टिकी थी।
2. फिल्म ‘An Evening in Paris’ का संदर्भ
तथ्य: यह दावा भ्रामक है। 1967 की प्रसिद्ध फिल्म An Evening in Paris का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में पेरिस (फ्रांस) में ही फिल्माया गया था। हालांकि, उस दौर की कई अन्य भारतीय फिल्मों की शूटिंग लेबनान में हुई थी और वहां का दृश्य काफी हद तक यूरोपीय शहरों जैसा लगता था।
3. फिलिस्तीनी शरणार्थी और गृहयुद्ध (1975-1990)
तथ्य: लेबनान के पतन का मुख्य कारण 15 साल लंबा गृहयुद्ध था। इसके पीछे कई जटिल कारण थे:
जनसांख्यिकीय असंतुलन: लेबनान में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच सत्ता की साझेदारी का एक नाजुक फॉर्मूला (National Pact) था। शरणार्थियों के आने और स्थानीय आबादी के बदलाव से यह संतुलन बिगड़ गया।
PLO (Palestine Liberation Organization): 1970 में जॉर्डन से निकाले जाने के बाद PLO ने लेबनान को अपना आधार बनाया, जिससे इजरायल के साथ संघर्ष बढ़ा और लेबनान के भीतर भी गुटबाजी शुरू हुई।
बाहरी हस्तक्षेप: सीरिया, इजरायल और ईरान जैसे देशों के हस्तक्षेप ने इस आग में घी डालने का काम किया।
4. ईसाई आबादी का नरसंहार और पलायन
तथ्य: गृहयुद्ध के दौरान दोनों पक्षों (ईसाई मिलिशिया और मुस्लिम/फिलिस्तीनी गुटों) ने एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा की थी।
यह कहना कि सिर्फ एक पक्ष मारा गया, अधूरा सच है। ‘दामौर नरसंहार’ (1976) में ईसाइयों को निशाना बनाया गया, तो वहीं ‘सबरा और शतीला’ (1982) में फिलिस्तीनी शरणार्थियों का कत्लेआम हुआ।
युद्ध के कारण लेबनान की बड़ी ईसाई आबादी यूरोप और अमेरिका चली गई, जिससे वहां का डेमोग्राफिक प्रोफाइल पूरी तरह बदल गया।
5. वर्तमान स्थिति
आज का लेबनान आर्थिक कंगाली और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। वहां की मुद्रा का मूल्य लगभग समाप्त है और भ्रष्टाचार ने देश खोखला कर दिया है।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर प्रसारित यह संदेश ऐतिहासिक रूप से आंशिक रूप से सत्य है, लेकिन यह एक अत्यंत जटिल गृहयुद्ध को केवल एक धार्मिक चश्मे से देखता है। लेबनान का पतन केवल “उदारता” के कारण नहीं, बल्कि कमजोर राज्य व्यवस्था, हथियारबंद गुटों की समानांतर सत्ता और विदेशी ताकतों के दखल का परिणाम था।
निश्चित रूप से, लेबनान का इतिहास यह सिखाता है कि सामाजिक सद्भाव और कानून का शासन (Rule of Law) किसी भी लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।
लेबनान गणराज्य
الْجُمْهُورِيَّة الْلُّبْنَانِيَّة
लेबनान का ध्वजलेबनान की अवस्थिति
राजधानी एवं सबसे बड़ा शहर-बेरूत
राजभाषा(एँ) अरबी
बोली जाने वाली भाषआ अरबी (लेबनानी भाषा), फ्रांसिसी, अंग्रेजी, आर्मेनियन
नृजातीय समूह 95% Arab
2, 4% Armenian, 1% other
निवासी नाम लेबनानी
सरकार कन्फेशनलिस्ट, लोकतांत्रिक, संसदीय गणराज्य
• राष्ट्रपति -मिशेल सुलेमान
• प्रधानमंत्री-साद हरीरी
• संसद के अध्यक्ष-नबी बेरी
स्वतंत्रता फ्रांस से
• घोषणा २६ नवम्बर १९४१
• मान्यता २२ नंवबर १९४३
क्षेत्रफल
• कुल [] १६६ वां)
• जल क्षेत्र (%) १.६
जनसंख्या • २००९ आकलन ४,२२४,००० (१२४ वां)
GDP (PPP) २००९ प्राक्कलन
• कुल $५१.४७४ बिलियन (-)
• प्रति व्यक्ति $१३,३७४ (-)
मुद्रा लेबनानी पाउंड (LBP)
समय मंडल UTC+२ (EET)
• ग्रीष्मकालीन (DST)
UTC+३ (EEST)
दूरभाष कोड ९६१
इंटरनेट TLD .lb
^ Article 11 of the Constitution of Lebanon states that “a law shall determine the cases in which the French language is to be used.”
^ Many Christian Lebanese do not identify as Arab, and prefer to be called Phoenician.
लेबनान (अरबी: لُبْنَان),आधिकारिक रूप से लेबनान गणराज्य, पश्चिमी एशिया में भूमध्य सागर के पूर्वी तट स्थित देश है। इसके उत्तर और पूर्व में सीरिया और दक्षिण में इसराइल है। भूमध्य बेसिन और अरब के भीतरी भाग के बीच में सेतु बने इस देश का इतिहास समृद्ध और मिश्रित है। यह भूमि फ़ीनिसियनों की अति-प्राचीन (2500 ईसा पूर्व – 539 ईसा पूर्व) संस्कृति का स्थल थी जहाँ से लेखन कला के विकास की कड़ी जुड़ी है। इसके बाद फ़ारसी, यूनानी, रोमन, अरब और उस्मानी तुर्कों के कब्जे में रहने के बाद यह फ्रांसिसी शासन में भी रहा। इसी ऐतिहासिकता से देश की पंथिक और जातीय विविधता अलग सांस्कृतिक पहचान बनाती है।
यहाँ 60 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं ( शिया और सुन्नी का लगभग बराबर) और लगभग 38 प्रतिशत ईसाई। 1943 में फ्रांस से स्वतंत्र्योपरांत यहाँ गृहयुद्ध चला और 2006 में इसराइल के साथ एक युद्ध। यहाँ एक विशेष प्रकार का गणतांत्रिक शासन है जिसमें राष्ट्रपति एक ईसाई होता है, प्रधान मंत्री एक सुन्नी मुस्लिम, निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा का अध्यक्ष एक शिया मुस्लिम और उप प्रधान मंत्री एक ग्रीक परंपरावादी धर्म का होता है। अरबी यहाँ की सबसे बोले जाने वाली और सांवैधानिक भाषा है।
शब्द-व्युत्पत्ति
लेबनान पर्वत (Mount Lebanon) का नाम फ़ोनीशियाई सामी मूल शब्द ‘lbn’ (𐤋𐤁𐤍) से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है “सफेद”। मान्यता है कि यह नाम यहाँ की बर्फ से ढकी चोटियों से पड़ा है। इस नाम के प्रमाण कांस्य युग के उन ग्रंथों में मिलते हैं जो एबला (Ebla) के पुस्तकालय से मिले थे। इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध महाकाव्य ‘गिल्गामेश’ की 12 में से तीन पट्टिकाओं पर भी इस नाम का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन मिस्र के अभिलेखों में इस नाम को ‘rmnn’ (𓂋𓏠𓈖𓈖𓈉) लिखा गया था (चूंकि प्राचीन मिस्र की लिपि में ‘l’ के संगत कोई अक्षर नहीं था)। हिब्रू बाइबिल में भी ‘लेबनान’ शब्द का प्रयोग लगभग 70 बार ‘Ləḇānon’ (לְבָנוֹן) के रूप में हुआ है।
पहाड़ी श्रृंखला के बजाय एक प्रशासनिक इकाई के रूप में ‘लेबनान’ नाम का प्रयोग 1861 के ओटोमन सुधारों के साथ शुरू हुआ, जब ‘माउंट लेबनान मुतसर्रिफ़त’ (अरबी: متصرفية جبل لبنان) की स्थापना की गई। बाद में 1920 में इसका विस्तार ‘ग्रेटर लेबनान’ (अरबी: دولة لبنان الكبير) के रूप में हुआ। अंततः, 1943 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद इसे संप्रभु ‘लेबनान गणराज्य’ (अरबी: الجمهورية اللبنانية) का आधिकारिक नाम दिया गया।
इतिहास
लेबनॉन की भूमि का इतिहास ईसा पूर्व 2500 इस्वी के आसपास की फ़ीनिक संस्कृति से शुरु होता है जो सामुद्रिक शक्ति थे। इन्होंने भूमध्य सागर में स्पेन और अफ़्रीक़ा के तटों पर अपने उपनिवेश बनाए थे जिसमें आधुनिक लीबिया का कार्थेज सबसे प्रसिद्ध है। इन जगहों पर फ़ीनिसियन अपने व्यापार के सिलसिले में बसते भी गए। इन्होंने एक 24 अक्षरों की वर्णमाला बनाई जो आधुनिक कई एशियाई और यूरोपीय वर्णमालाओं की पूर्वज मानी जाती है। असीरिया तथा बेबीलोन के साम्राज्यों के ये सहायक भी रहे पर इनका रिश्ता उतना सामंजस्यपूर्ण नहीं था।
ईसा के 539 वर्ष पहले जब दक्षिणी ईरान के फ़ार्स प्रांत के एक साम्राज्य के राजकुमार कुरोश (सायसस) असीरिया के साम्राज्य को हराकर इस प्रदेश को जीतने के अभियान पर निकला तो फ़ीनिशिया को जीतने के बाद इसे एक क्षत्रप (राज्य) बना दिया । इसके बाद इस पर फ़ारसियों का शासन 200 सालों तक रहा। पर पश्चिम में शक्तिशाली हो रहे मेसीडोन के सिकंदर ने 331 ईसापूर्व में इसे जीत लिया। उसके बाद यह सेल्युकस के प्रदेश का हिस्सा बना। रोमनों ने यूनानियों को सन् 24 ईसापूर्व में हरा दिया जिसके बाद यह रोमनों के शासन काल में आ गया और अगले 6 सदियों तक रहा। इसी समय यहाँ ईसाईयत का प्रसार हुआ।
मुस्लिम शासन
अरबों ने इस प्रदेश के ऊपर सातवीं सदी के उत्तरार्ध में ध्यान दिया जब उमय्यदों की राजधानी पूर्व में दमिश्क़ में बनी। मध्य काल में लेबनॉन क्रूसेड युध्दों में लिप्त रहा। सलाउद्दीन अय्युबी ने इसे ईसाई क्रूसदारों से मुक्त करवाया और मिस्र के मामलुक शासकों ने लेबनान कब्ज़ा लिया।उस्मानी तुर्कों ने जब 16वीं सदी में भूमध्यसागर का पूर्वी तट कब्जाया तो लेबनान भी सिसली से लेकर कैस्पियन सागर तर फैले औटोमन उस्मानी साम्राज्य का अंग बना। प्रथम विश्वयुद्ध बाद यह फ्रांस शासन में आया। सन 1975 से 1990 तक यहाँ गृहयुद्ध चला जिसका मुख्य कारण – फिलिस्तीन से आए शरणार्थी, अरब-इसरायल युद्ध, ईरान की इस्लामिक क्रांति और धार्मिक टकराव थे।
फ़्रांस से स्वतंत्रता
यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, फ़्रांसीसी शासनादेश को राष्ट्र संघ (League of Nations) या उसके उत्तराधिकारी संयुक्त राष्ट्र से किसी औपचारिक कार्रवाई के बिना ही समाप्त माना जा सकता था। शासनादेश समाप्ति स्वयं अनिवार्य शक्ति और नए राज्यों के अपनी स्वतंत्रता की घोषणा के साथ हुई। इसके बाद अन्य वैश्विक शक्तियों ने बिना किसी शर्त उन्हें धीरे-धीरे मान्यता दी गई, जिसका समापन संयुक्त राष्ट्र में उनकी औपचारिक सदस्यता के साथ हुआ।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 78 किसी भी सदस्य राज्य के लिए संरक्षण की स्थिति समाप्त करता है: “न्यास पद्धति उन क्षेत्रों पर लागू नहीं होगी जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बन गए हैं, जिनके बीच संबंध संप्रभु समानता के सिद्धांत के सम्मान पर आधारित होंगे।”
अतः जब 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आया, तो सीरिया और लेबनान दोनों इसके संस्थापक सदस्य राज्य थे। इस तिथि को दोनों के लिए फ़्रांसीसी शासनादेश विधिवत समाप्त हो गया और पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हुई। अंतिम फ़्रांसीसी सैनिक दिसंबर 1946 में लेबनान से वापस बुला लिए गये थे।
राष्ट्रीय समझौता
1943 के लेबनान के अलिखित राष्ट्रीय समझौते (National Pact) के अनुसार सत्ता के बँटवारे के लिए एक सांप्रदायिक ढांचा तैयार किया गया, जिसमें अनिवार्य था कि:
राष्ट्रपति: मारोनाइट ईसाई हो।
संसद अध्यक्ष: एक शिया मुस्लिम हो।
प्रधानमंत्री: एक सुन्नी मुस्लिम हो।
उप संसद अध्यक्ष और उप प्रधानमंत्री: ग्रीक रूढ़िवादी (Greek Orthodox) ईसाई हों।
सन्दर्भ
“2014 Human Development Report Summary” (PDF). संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम. २०१४. pp. २१–२५. 29 जुलाई 2016
“लेबनान: इसराइली हवाई कार्रवाई के बाद, यूएन शान्तिरक्षा मिशन ने किया आगाह”. यूएन समाचार. 5 December 2025. अभिगमन तिथि: 20 December 2025.
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“History of the United Nations”. United Nations.
Harb, Imad. “Lebanon’s Confessionalism: Problems and Prospects”. United States Institute of Peace.
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ईरान युद्ध के बीच ‘ग्रेटर इजरायल’ पर काम शुरू? IDF का लेबनान में ‘कब्जे’ का प्लान , सऊदी पर अगली नजर?
‘ग्रेटर इजरायल’ का विचार बाइबिल के वादों पर आधारित है लेकिन आधुनिक राजनीतिक संदर्भ में इस पर सबसे पहले थियोडोर हर्जल ने चर्चा की। बाइबिल की किताब ‘जेनेसिस’ के अध्याय 15:18–21 में दिए गए ईश्वर के वादे की याद दिलाता है।
ईरान के खिलाफ भले ही अमेरिका और इजरायली हमले जारी हों लेकिन इजरायल को लेकर कहा जा रहा है कि उसने ‘ग्रेटर इजरायल’ प्रोजेक्ट पर भी काम शुरू कर दिया है। इजरायल लेबनान में घुसकर हमला कर रहा है और उसका मकसद ईरान के प्रॉक्सी संगठन हिज्बुल्लाह खत्म करना है। इजरायल अब हिज्बुल्लाह के खिलाफ एक ‘बफर जोन’ बनाना चाहता है। इसके बाद ही सवाल उठने लगे हैं कि इजरायल ने अपने ‘ग्रेटर इजरायल’ प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है।
बेंजामिन नेतन्याहू का ‘ग्रेटर इजरायल’ प्रोजेक्ट क्या है
‘ग्रेटर इजरायल’ में एक ऐसे यहूदी देश बनाने की कल्पना है जो मिस्र में नील नदी से लेकर इराक में यूफ़्रेट्स नदी तक फैला हो और जिसमें फिलीस्तीन, लेबनान और जॉर्डन के साथ-साथ सीरिया, इराक, मिस्र और सऊदी अरब के भी बड़े हिस्से शामिल होंगे। 19वीं सदी में यहूदी विद्वान थियोडोर हर्जल ने पहली बार यह विचार रखा और इस विचार का आधार हिब्रू बाइबिल में दी गई यहूदी भूमि की परिभाषा के अनुसार है। इसमें मिस्र की सीमाओं से लेकर यूफ़्रेट्स नदी के किनारों तक फैले एक क्षेत्र का वर्णन है।
‘ग्रेटर इजरायल’ प्रोजेक्ट पर क्या काम शुरू हो गया है?
वेस्ट बैंक पर सख्त नियंत्रण और लेबनान में बफर जोन बनाने की कोशिश को ‘ग्रेटर इजरायल’ से ही जोड़ा जा रहा है। भारत में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह आरोप लगाया है कि ‘पश्चिम एशिया में चल रहा मौजूदा युद्ध इजरायल को अपने ‘ग्रेटर इजरायल’ के सपने को आगे बढ़ाने और साथ ही एक फिलीस्तीनी राष्ट्र की किसी भी उम्मीद को पूरी तरह खत्म करने को कवर दे रहा है।’
बाइबिल के वादों पर आधारित है ‘ग्रेटर इजरायल’
‘ग्रेटर इजरायल’ का विचार बाइबिल के वादों पर आधारित है लेकिन आधुनिक राजनीतिक संदर्भ में इस पर सबसे पहले थियोडोर हर्जल ने चर्चा की थी। बाइबिल की किताब ‘जेनेसिस’ के अध्याय 15:18–21 में दिए गए ईश्वर के वादे की याद दिलाता है। इसमें ईश्वर अब्राम से कहते हैं “मैं तुम्हारे वंशजों को यह जमीन देता हूं। मिस्र की नदी से लेकर उस महान नदी यूफ़्रेट्स तक, यह जमीन केनी, केनिज़ी, कद्मोनी, हित्ती, पेरिज़ी, रेफ़ाई, अमोरी, कनानी, गिर्गाशी और येबूसी लोगों की है।”
1967 के जंग में ग्रेटर इजरायल विचार काफी पसंद किया गया। इसमें इजरायल की एक साथ 6 अरब देशों, जिनमें मुख्य रूप से मिस्र, सीरिया और जॉर्डन शामिल थे, उनका जंग हुआ था। इस जीत के बाद इजरायल ने गाजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप, वेस्ट बैंक और गोलान हाइट्स पर कब्जा कर लिया।
ग्रेटर इजरायल की मौजूदा स्थिति क्या है?
हालांकि इजरायल की ‘ग्रेटर इजरायल’ स्थापित करने की कोई आधिकारिक नीति नहीं है। लेकिन 2022 में ‘नेसेट’ (संसद) के चुनावों के बाद से ये एक आम विचार बन चुका है। इन चुनावों में लिकुड पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सत्ता पाई थी और बेंजामिन नेतन्याहू को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था। 2023 में Axios ने रिपोर्ट किया था कि इजरायल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने पेरिस में एक भाषण देते समय ‘ग्रेटर इजरायल’ का एक नक्शा दिखाया था जिसमें जॉर्डन और कब्जे वाले वेस्ट बैंक को इजरायल का हिस्सा बताया गया है।
Qatar Condemns Israel For Creating Buffer Zone And Demolishing Homes In Lebanon
हालात मुश्किल हो रहे हैं; दक्षिणी लेबनान में करीब डेढ़ लाख लोग देश से पूरी तरह कटे
लेबनान में इजरायली सैन्य घुसपैठ और बफर जोन बनाने की कोशिशों से 12 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं, जिससे क्षेत्र में गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है।
लेबनान में सैन्य घुसपैठ और बफर जोन बनाने की इजरायल की कोशिशों को कतर जैसे देशों की ओर से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया जा रहा है। हालांकि इजरायल की ओर से साफ तौर पर कहा जा चुका है कि लेबनान के दक्षिणी हिस्से में लितानी नदी तक एक बफर जोन बनाया जाएगा और इजराइली सेना सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखेगा।
Israel Litani River buffer zone
सीमा के पास गांवों में घरों को नष्ट किया जाएगा और जो लोग वहां से भागे हैं, उन्हें अभी वापस आने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
कितनी है लेबनान की जनसंख्या
दरअसल वहां 2 मार्च से जमीनी कार्रवाई शुरु हो गई है। लेबनान की जनसंख्या पांच मिलियन है और अनुमान है कि इस सैन्य कार्रवाई के बाद 1.2 मिलियन लेबनानी लोग विस्थापित हो गए हैं, इनमें से बड़ी संख्या में बच्चे हैं। लेबनान के बेरूत की निवासी और कार्यकर्ता रीवा घावी ने फोन पर हमसे बात करते बताया कि यूं तो फिलहाल बेरूत के उस हिस्से में मौजूद हैं।
लेबनानी नागरिकों ने हटने से किया इनकार
जो इजरायली हमलों का निशाना नहीं बन रहा है, लेकिन उन्होंने बताया कि किस तरह दक्षिण लेबनान में लोग जीवन की रोजमर्रा की जरूरतें पूरा नहीं कर पा रहे हैं और वो देश के दूसरे हिस्सों से पूरी तरह कट गए हैं। दक्षिणी लेबनन में भयंकर मानवीय संकट-घावी बताती हैं कि दक्षिणी लेबनान को बाकी देश सेजोडती लितानी नदी के दूसरे पार गांवों में रहने वाले लेबनानी नागरिकों ने वहां से हटने से इनकार कर दिया है।
विस्थापित होने के लिए राजी नहीं है इतने लोग
लेबनानी नागरिकों का कहना है कि ऐसे डेढ़ लाख लोग मौजूद हैं, जो वहां से विस्थापित होने के लिए राजी नहीं है, इस वजह से वो वहां फंस गए हैं। इजरायल वहां देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने वाले पुलों को निशाना बना रहा है। ऐसे में ये लोग पूरी तरह से कट गए हैं।
क्या है गांवों के लोगोंं का कहना
लेबनानी सेनाओं ने वहां से लोगों को हटाया है, लेकिन अब हालात मुश्किल हो रहे हैं। ऐसे में इन लोगों के सामने खाने पीने का और चिकित्सीय सुविधाओं का संकट आ गया है। इजरायल का कहना है कि ये हेजबुल्लाह के हमलों को रोकने के लिए हो रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इन गांवों में हिजबुल्लाह की मौजूदगी नहीं है।
इजरायल अपना रहा वहीं रुख
इन गांवों में देबेल, एन एबेल देर सेरयेन जैसे गांव हैं, जिन्हें बिना बात निशाने पर लिया जा रहा है। इजरायल का पैटर्न पुराना है दरअसल जानकार कहते हैं कि इजराइल इन इलाकों में वही रणनीति अपनाना दिख रहा है जो उसने राफा में अपनाई थी, उस दौरान बड़े पैमाने पर घरों को गिराया गया था।
लेबनान में कितने लोग विस्थापित हो चुके हैं?
लेबनान में पहले ही 12 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं और 1,200 से ज्यादा लोगों की जान जा हो चुकी। दरअसल जानकार साफ तौर पर मानते हैं कि बिना किसी ठोस सैन्य वजहों के घरों को गिराना अंतर्राष्ट्रीय कानून के पूरी के खिलाफ है, माना जा रहा है इजरायल की इस कार्रवाई से मध्य पूर्व में मानवीय संकट और गहरा सकता है।
