हिंदू छात्राओं को जबरन हिजाब और नमाज में 4 की FIR हटाने से हाको की “न”
MP हाईकोर्ट ने दमोह के गंगा जमुना स्कूल में हिंदू छात्राओं को हिजाब पहनने और नमाज के लिए मजबूर करने के मामले में 4 आरोपितों की FIR निरस्तीकरण से इनकार किया. जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा “धमकी-दबाव के आरोप प्रथम दृष्टया निराधार नहीं हैं”.

छात्राओं को हिजाब पहनने और नमाज के लिए किया मजबूर, स्कूल के 4 आरोपियों के खिलाफ FIR रद्द करने से HC का
=”5″>मध्य प्रदेश के दमोह जिले में स्थित गंगा जमुना उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जुड़े विवादित हिजाब मामले में हाईकोर्ट ने आरोपियों को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने स्कूल के चार पूर्व पदाधिकारियों और कर्मचारियों की तरफ से प्राथमिकी (FIR) निरस्तीकरण याचिका निरस्त कर दी है. इस मामले में आरोपित स्कूल के पूर्व पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार जैन, अब्दुल वसीम बारी, शिक्षक अनस अथर और कार्यालय सहायक रुस्तम अली हैं, जिन्होंने प्राथमिकी निरस्त करने के याचिकाएं दाखिल की थीं.
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने शुक्रवार को कहा कि छात्राओं को धमकी देकर मजबूर किए जाने संबंधी विशिष्ट आरोपों को निराधार नहीं कहा जा सकता और इनकी सत्यता साक्ष्यों के आधार पर तय की जाएगी.
हिंदू छात्राओं को हिजाब को किया मजबूर
मामला दमोह स्थित गंगा जमुना उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का है. मई 2023 में हिंदू छात्राओं के हिजाब पहने हुए एक पोस्टर सामने आने पर राज्य सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए थे. छात्राओं की शिकायतों के बाद जिलाधिकारी ने जांच समिति गठित की थी.
4 धाराओं में दर्ज हुआ था मामला
समिति की रिपोर्ट के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्वक किया गया कृत्य), 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 506 (आपराधिक धमकी) तथा किशोर न्याय अधिनियम और मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया था.
स्कूल में हिजाब और नमाज किया अनिवार्य
आरोप है कि स्कूल में हिजाब पहनने, नमाज पढ़ने और उर्दू भाषा के अध्ययन को अनिवार्य कर दिया गया, जबकि तिलक और कलावा पहनने पर रोक थी.
छात्राओं को मजहबी प्रथाओं का पालन कराने का आरोप
कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी में छात्राओं को उनकी इच्छा के खिलाफ एक विशेष पहनावे और धार्मिक प्रथाओं का पालन करने के लिए धमकी और दबाव डालने के विशिष्ट आरोप हैं. पीठ ने कहा कि ऐसे में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया निराधार नहीं कहा जा सकता. आरोपों की सत्यता साक्ष्यों के आधार पर तय होगी. पुलिस इस मामले में पहले ही आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है.

