भाद्रपद शुक्ल तृतीया को है वराह जयंती,गुर्जर प्रतिहार राजा मिहिरभोज को मिली थी आदिवराह उपाधि
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती का पर्व मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने इस दिन वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध किया था।
आदिकाल से ही सनातन धर्म में श्री हरि विष्णु के वराह अवतार मुख्य रूप से पूज्य रहे है…देश के अलग-अलग भागों में भी अति प्राचीन वराह अवतार के मंदिर, मूर्तियाँ है..!
आदिवराह एक प्रसिद्ध उपाधि भी थी, जिसे कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार राजा मिहिर भोज (840-890 ई.) ने धारण किया था। मिहिर भोज के चाँदी के सिक्कों पर यह नाम अंकित मिलता है..!
प्रस्तर पर उत्कीर्ण माता पृथ्वी को उठाये हुए..और विष्णुपद,शँख, सुदर्शन चक्र धारण किये वाराही अवतार की यह तस्वीर रानी की वाव से है… रानी की वाव को रानी उदयामती ने अपने पति राजा भीमदेव की स्मृति में सन् 1063 में बनवाया था। राजा भीमदेव गुजरात के सोलंकी राजवंश संस्थापक थे।
भारत के गुजरात राज्य के पाटण ज़िले में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। 23 जून, 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया। बावड़ी में बनी बहुत-सी कलाकृतियों की मूर्तियों में ज्यादातर भगवान विष्णु से संबंधित हैं। भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही बावड़ी में मूर्तियों का निर्माण किया गया है, जिनमे मुख्य रूप से, श्री राम, कृष्णा, नरसिम्हा, वामन, वाराही, कल्कि और दुसरे मुख्य अवतार भी शामिल हैं।
जलौघमग्ना सचराचराधरा
विषाणकोट्याऽखिल विश्वमूर्तिना।
समुद्धृता येन वराहरूपिणा
स मे स्वयं भूर्भगवान् प्रसीदतु।।
एक है हिरण्याक्ष,
हिरण्य का शाब्दिक अर्थ होगा – स्वर्ण-सोना,
हिरण्य शब्द का भाव पकड़ा जाय तो होगा – चल-सम्पत्ति,
और, अक्ष माने आँख !
जिसकी आँख आपकी चल- सम्पत्ति पर लगी हो – वह हुआ हिरण्याक्ष !
चैन-स्नैचर्स का रिकार्ड निकलवायें- देखें कौन लोग हैं,
एक बार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी चुरा ली,
मने चल सम्पत्ति के साथ-साथ अचल सम्पत्ति भी !
लूट-पाट, घर-जमीन कब्जियाना चाहे कैराना हो या कश्मीर.
ऐसी सामाजिक गन्दगी को दूर करने के लिये – शक्तिमान को गन्दगी में उतरना पड़ा – वराह रूप में !
दीपावली की सफाई करते समय कुछ देर की गन्दगी सब सहन करते हैं –
कालान्तर में वही वाराह-पृथ्वी सज-धज कमला-ईश, लक्ष्मी-पति हो पूजित होते हैं
पृथिवि रक्षा !
पर्यावरण रक्षा !!
पर्यावरण प्रदूषण के सम्बन्ध में वाराह से अधिक और कौन जानेगा ?
भारत के महान राजा आदिवराह ” मिहिर भोज”

सम्राट मिहिरभोज भारत के महान सम्राटों मे से जाने जाते हैंI इन्होने लगभग पचास सालों तक इस देश को सुशासन दिया देश की विदेशियों से रक्षा की लेकिन खेद कि इतने बड़े महान सम्राट का नाम भी बहुत सारे भारतीय लोगों को मालूम नही हैं। सम्राट मिहिर भोज का जन्म सम्राट रामभद्र की महारानी अप्पा देवी के सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ मानते हैं। सम्राटमिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था ठीक की। प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोरता से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
मिहिर भोज परम देश भक्त था-उसने प्रण किया था कि उसके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसको उन्होने सबसे पहले राजपूताने पर आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय मिहिर भोज को है।
सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि भोज अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है। सुलेमान यह भी लिखता है कि हिन्दोस्तान की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें आठ लाख से ज्यादा पैदल सेना, हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर बिखरा रहता था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।
मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो गये। इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उन्होने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या अपराधी पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया।
जैसे भगवान विष्णु ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष आदि दुष्ट राक्षसों से पृथ्वी का उद्धार किया था, उसी प्रकार विष्णु वंशज मिहिर भोज ने देशी आतताइयों, यवन तथा तुर्क राक्षसों को मार भगा भारत भूमि संरक्षित की- उन्हे इसीलिए युग ने आदि वाराह महाराजाधिराज उपाधि से विभूषित किया था। वस्तुतः मिहिर भोज सिर्फ प्रतिहार वंश का ही नहीं वरन हर्षवर्धन के बाद और भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के पूर्व पूरे राजपूत काल के सर्वाधिक प्रतिभाशाली सम्राट और चमकदार सितारा थे। सुलेमान ने लिखा है-इस राजा के पास बहुत बडी सेना है । किसी दूसरे राजा के पास वैसी घुड़सवार सेना नहीं है। भारतवर्ष के राजाओं में उससे बढ़कर अरबों का कोई शत्रु नहीं है। उसके आदिवाराह विरूद से ही प्रतीत होता है कि वाराहवतार की मातृभूमि को अरबों से मुक्त कराना अपना कर्तव्य समझते थे।
अपनी महान राजनीतिक तथा सैनिक योजनाओं से उन्होने सदैव इस साम्राज्य की रक्षा की। भोज का शासनकाल पूरे मध्य युग में अद्धितीय माना जाता है। इस अवधि में देश का चतुर्मुखी विकास हुआ। साहित्य सृजन, शांति व्यवस्था स्थापत्य, शिल्प, व्यापार और शासन प्रबंध की दृष्टि से यह श्रेष्ठतम माना गया है। भयानक युद्धों के बीच किसान मस्त अपना खेत जोतता था, और वणिक अपनी व्यापार यात्रा पर निश्चिंत चला जाता था। मिहिर भोज को गणतंत्र शासन पद्धति का जनक भी माना जाता है। उन्होने अपने साम्राज्य को आठ गणराज्यों में विभक्त कर दिया था। प्रत्येक राज्य का अधिपति राजा कहलाता था, जिसे आज के मुख्यमंत्री की तरह आंतरिक शासन व्यवस्था में पूरा अधिकार था। परिषद का प्रधान सम्राट होता था और शेष राजा मंत्री के रूप में कार्य करते थे। वे जितने वीर थे, उतने ही दयालु भी थे, घोर अपराधकर्ताओं को भी उन्होने कभी मृत्यदण्ड नहीं दिया, किन्तु दस्युओं, डकैतों, तुर्कों अरबों को देश का शत्रु मानने की उसकी धारणा स्पष्ट थी । इन्हे क्षमा करने की भूल कभी नहीं की और न ही इन्हें देश में घुसने ही दिया। उन्होंने मध्य भारत को चंबल के डाकुओं से और उत्तर, पश्चिमी भारत को विदेशियों से मुक्त कराया। सच यही है कि जब तक परिहार साम्राज्य मजबूत रहा, देश की स्वतंत्रता पर आंँच नहीं आई।
जहाँ अकबर जैसे क्रूर राजाओ को महान बताया जाता हैं जिसे लिखना तक नहीं आता था वहीँ महान राजा मिहिर भोज न केवल एक योद्धा प्रशासक थे बल्कि एक पराक्रमी शासक होने के साथ ही विद्वान एवं विद्या तथा कला के उदार संरक्षक थे। अपनी विद्वता से ही उन्होने ‘कविराज’ की उपाधि धारण की थी। उन्होने कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ, जैसे- ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘सिद्धान्त संग्रह’, ‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’, ‘विद्या विनोद’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘चारु चर्चा’, ‘आदित्य प्रताप सिद्धान्त’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व शृंगार प्रकाश’, ‘प्राकृत व्याकरण’, ‘कूर्मशतक’, ‘शृंगार मंजरी’, ‘भोजचम्पू’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘शब्दानुशासन’, ‘राज्मृडाड’ आदि की रचना की। ‘आइना-ए-अकबरी’ के वर्णन के आधार पर माना जाता है कि, उसके राजदरबार में लगभग 500 विद्वान थे।
भोज प्रथम के दरबारी कवियों में ‘भास्करभट्ट’, ‘दामोदर मिश्र’, ‘धनपाल’ आदि प्रमुख थे। उसके बार में अनुश्रति थी कि वह हर एक कवि को प्रत्येक श्लोक पर एक लाख मुद्रायें प्रदान करते थे। उसकी मृत्यु पर पण्डितों को हार्दिक दुखः हुआ था, तभी एक प्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार- उसकी मृत्यु से विद्या एवं विद्वान, दोनों निराश्रित हो गये।
मिहिर भोज ने अपनी राजधानी धार को विद्या एवं कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया था। यहां पर भोज ने अनेक महल एवं मन्दिरों निर्मित करवाये, जिनमें ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके अन्य निर्माण कार्य ‘केदारेश्वर’, ‘रामेश्वर’, ‘सोमनाथ सुडार’ आदि मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त भोज प्रथम ने भोजपुर नगर एवं भोजसेन नामक तालाब भी निर्मित करवाये थे।
कितनी अजीब बात हैं जहाँ गौरी, बाबर, ग़ज़नवी, औरंगज़ेब, अकबर, ख़िलजी, लोदी जैसे लुटेरों को इतिहास की पुस्तकों में चार- चार पन्ने दिए जाते हैं पर महान देशभक्त महाराज को चार लाइन भी नहीं….
मिहिरभोज प्रतिहार, प्रतिहार राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते हैं। इन्होने लगभग ५० वर्ष राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे क्षेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों हैं।
मिहिरभोज विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे ‘आदिवराह’ बताया गया है। दिल्ली में महरोली जगह इनके नाम पर ही है।
सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक राज किया। मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव के भी परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति को वन में चले गए। अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण में लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया, साथ ही मिहिरभोज प्रतिहार की महान सेना का वर्णन किया है, साथ ही मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है।
915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिरभोज प्रतिहार की 36 लाख सेनिकों की पराक्रमी सेना पर लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इतना भय था कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिरभोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगों ने राष्ट्र रक्षा को हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।
सम्राट मिहिरभोज के मित्र काबुल के ललिया शाही राजा, कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन तथा नेपाल के राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिरभोज के शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था, जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोधवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे। सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पराजित कर समस्त सिन्ध राजपूत प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय प्रतिहार सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने को अनमहफूज गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।
सम्राट मिहिरभोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रर आगे संकट का कारण बने। इसलिए उन्होने कई बड़े सैनिक अभियानों में इमरान बिन मूसा की अनमहफूज जगह जीत कर प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी । उन्होने भारत को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।

