कुलदीप सिंह सेंगर को सुको से झटका,जमानत पर हाई कोर्ट फैसला स्थगित
Kuldeep Singh Sengar Supreme Court Judgement Unnao Rape Case Cbi Plea
कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से झटका,जमानत पर हाई कोर्ट के फैसले पर स्थगनादेश
कुलदीप सिंह सेंगर की उन्नाव रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में विचार के लिए महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं। चार सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल किया जाए।
नई दिल्ली 29 दिसंबर 2025 : सुप्रीम कोर्ट ने CBI की याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार कुलदीप सिंह सेंगर के मामले में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। कुलदीप सिंह सेंगर की उन्नाव रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई की।
चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रारंभिक रूप से, हम इस आदेश पर रोक लगाने के पक्ष में हैं। सामान्यतः सिद्धांत यह होता है कि यदि कोई व्यक्ति बाहर आ चुका हो,तो अदालत उसकी स्वतंत्रता वापस नहीं लेती। लेकिन यहां स्थिति विशेष है,क्योंकि वह किसी अन्य मामले में पहले से ही जेल में बंद है। सुप्रीम कोर्ट ने CBI की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कुलदीप सिंह सेंगर की ओर से पेश अधिवक्ताओं को सुना।
चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें यह प्रतीत होता है कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण विधिक सवाल उठे हैं। हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी दोषी या विचाराधीन कैदी को छोड़ा गया हो, तो इस न्यायालय से संबंधित व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेशों पर रोक नहीं लगाई जाती। लेकिन मामले के विशिष्ट तथ्य देखते हुए कि जहां दोषी एक अलग अपराध में भी सजा काट रहा है हम दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर 2025 के आदेश के संचालन पर रोक लगाते हैं।
हाई कोर्ट ने उन्नाव रेप मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे सेंगर की आजीवन कारावास की सजा 23 दिसंबर को निलंबित कर दी थी। उन्नाव के 2017 के दुष्कर्म मामले की पीड़िता,उसके परिवार और कार्यकर्ताओं ने भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित किए जाने का लगातार विरोध कर रहा था।
Yogita Bhayana Who Supported The Unnao Rape Victim Made Several Revelations About Kuldeep Singh Sengar
उसने रोते-रोते फोन कर कहा कि… उन्नाव रेप केस की पीड़िता का साथ देने वाली योगिता भयाना के कई अनावरण
उन्नाव रेप केस की पीड़िता को न्याय दिलाने वाली योगिता भयानाने कहा कि सच की जीत हुई है, लेकिन असली जीत तब होगी जब हर महिला को न्याय मिलेगा। भयाना ने न्याय व्यवस्था में कमियों और आरोपियों को बचाने की कोशिशों पर भी प्रकाश डाला।
उन्नाव रेप केस की पीड़िता को न्याय दिलाने को आवाज उठाने वाली योगिता भयाना ने आज पीड़िता से जुड़े एक-एक सवाल का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि कैसे सिस्टम पूरी तरह से आरोपितों को बचाने में लगा रहता है। न्याय व्यवस्था में बहुत कमियां है, निर्भया केस के बाद बहुत चीजें ठीक करने की कोशिश की गई थी, लेकिन वो कागजों पर ही रह गई।
उन्नाव रेप पीड़िता केस में आवाज उठाने वाली योगिता भयाना
आप उन्नाव रेप केस की पीड़िता के साथ लगातार एकजुटता दिखाती रही हैं, सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को कैसे देखती हैं ?
सच की जीत हुई है। लेकिन सच ये भी है कि हर केस में इतना दबाव और मीडिया का समर्थन नहीं मिलता लेकिन इसके बावजूद हर महिला न्याय की हकदार है। इस जीत को असल जीत तब तक नहीं माना जा सकता जब तक देश की हर महिला को न्याय नहीं मिल जाता।
बीते दिनों हमने ऐसे कई केस देखे हैं, जहां न्यायालयों में न्याय की लड़ाई लड़ रही बच्चियों को जीत नहीं मिली। लेकिन हां इस जीत से एक बात तो हुई है कि दूसरे पीड़ितों में भी न्याय की उम्मीद जगी है। कन्विक्शन रेट कम है, अपराध और अपराधियों का मनोबल बढ़ रहा है।
न्याय प्रणाली से हतोत्साहित होकर महिलाओं का विश्वास टूट रहा था । मनोबल टूट रहा था। ऐसे सिस्टम में जहां न्याय प्रणाली उनका साथ नहीं देती, इस आदेश ने न्याय की उम्मीद छोड़ देने वाली महिलाओं में नई हिम्मत आएगी है कि अगर इस सर्वाइवर को न्याय मिल सकता है तो हमें क्यों नहीं ?
देश में विक्टिम प्रोटेक्शन को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं, इस उस लिहाज से ये केस क्या एक उदाहरण की तरह सामने आया है ? पीड़िता की बहन सुरक्षा की चिंता जता चुकी है।
इस केस में हमने खुद देखा है कि किस तरह से पीड़िता के परिवार के सदस्यों का मर्डर कर दिया गया। ऐसे केसों में विक्टिम खुद एक गवाह होती है और उसकी सुरक्षा सर्वोपरि होती है । इस पीड़िता को भले ही सुरक्षा दी गई, लेकिन इसके परिवार की सुरक्षा हटा ली गई थी।
इस विक्टिम को तो सुरक्षा मिली भी,लेकिन सबको कहां मिलती है, ऐसे में ये जरूरी,ऐसा माहौल बने कि इन सब चीजों की जरूरत ही ना पड़े क्योंकि इस तरह की स्थिति का ही लाभ आरोपित पक्ष उठाता है। उन्हें लगता है कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। देश में विटनेस प्रोटेक्शन व्यवस्था ही नहीं है। इसी डर से बड़ संख्या में महिलाएं अपनी न्याय की लड़ाई छोड़ देती हैं या शुरू भी नहीं करती।
बिल्किस बानो केस हो या फिर उन्नाव केस, दोषियों के समर्थन में नारे और उनके स्वागत जैसी घटनाएं न्याय में कैसी रुकावट पैदा करती हैं ?
न्याय की लड़ाई बहुत ज्यादा मुश्किल है। आरोपितों का फूलमालाओं और लड्डुओं से स्वागत होता है। एक तो न्यायिक प्रक्रिया में खुद ही संघर्षमय है, ऐसे में जब विक्टिम आरोपितों के प्रति व्यवहार देखती हैं, तो उनका मनोबल टूट जाता है। ऐसे में कोर्ट सुनिश्चित करे कि ऐसा ना हो। गुरमीत राम रहीम और आसाराम बाहर आये तो उनके भक्तों ने समर्थन में जुलूस निकाला । क्या सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर स्यू मोटो नहीं ले सकता क्योंकि इससे बहुत गलत मैसेज जाता है, पीड़िताओं का मनोबल टूटता है।
समाज, कानून और पुलिस…इन सब व्यवस्थाओं में ऐसे केसों को लेकर किस तरह की सरंचनात्मक कमियां हैं ?
न्याय व्यवस्था में बहुत कमियां है, निर्भया केस के बाद बहुत चीजें ठीक किए जाने की कोशिश हुई, लेकिन वो कागजों पर ही रह गई। किसी ने इस ओर ध्यान देना उचित नहीं समझा। सरकार और सिस्टम के पास कोई ब्लूप्रिंट ही नहीं है।
पूरा सिस्टम महिलाओं को सपोर्ट करने की बजाय आरोपितों को बचाने की ही कोशिश में लगा रहता है। पीड़िताओं को पता ही नहीं चलता कि उनके केस में चल क्या रहा है।
छोटा सा उदाहरण लें, इस केस में विक्टिम ने मुझसे कहा कि दीदी अगर मुझे अंग्रेजी आती तो मैं अपना केस खुद ही लड़ लेती, वकीलों की जरूरत ही नहीं थी। हाईकोर्ट में इससे जुड़ा ऑर्डर आया तो वो नहीं जानती थी कि इस केस में हुआ क्या है ? उसने रोते-रोते फोन करके कहा कि कुछ गलत हुआ है।
किसी भी सुनवाई में उसे कभी समझाया ही नहीं जाता था कि सुनवाई में क्या हुआ है ? भाषा बड़ी बाधा है। पब्लिक प्रोसिक्यूटर (सरकारी वकील) और पीड़ित में कम्युनिकेशन को लेकर बहुत गैप है। विक्टिम के साथ कैसा बर्ताव हो, इसे लेकर इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर की ट्रेनिंग भी सही नहीं है। वकील समेत पूरी न्यायिक व्यवस्था में पीड़ित को लेकर संवेदनशीलता नहीं है। प्रक्रियागत कमियां बहुत ज्यादा हैं। कानून को छोड़कर बाकी सारी चीजें खराब हैं।
ऑनलाइन स्पेस में एक नरेटिव ये भी था कि इस मसले का राजनीतिक लाभ लिए जाने की कोशिश की जा रही है,ऐसे आरोपों पर आप क्या कहेंगी ?
गैर राजनीतिक कुछ नहीं होता। हम सब वोट देते हैं। एक सरकार को चुनते हैं। अगर राजनेता इसमें दखल नहीं देते हैं तो वो गलत है। हालांकि इसका राजनीतिक फायदा नहीं लेना चाहिए। राजनीति में मुद्दों की पॉलिटिक्स होनी ही चाहिए। अगर विपक्ष और राजनीति
अपना काम करे तो हमारे एक्टिविज्म की जरूरत ही ना पड़े। हम तो केवल गैप भर रहे हैं। इस अवधारणा से बाहर निकलना होगा कि पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए , मु्द्दों पर पॉलिटिक्स क्यों ना हो?
‘किसी ने नहीं सुना क्योंकि हमारा सच असुविधाजनक था’: क्या है उन्नाव रेप केस जिसमें कुलदीप सेंगर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, क्यों एक बेटी ने लिखा- थकी हूँ, डरी हूँ
उन्नाव रेप केस का टाइमलाइन ( फोटो साभार- Dall E)
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के उन्नाव रेप केस में उत्तर प्रदेश के पूर्व MLA कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी। 29 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए यह रोक लगाई।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने देखा कि प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंस (POCSO) एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ शब्द का दिल्ली हाई कोर्ट का मतलब गलत हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट के नियमों के तहत जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि उसे जेल से रिहा न किया जाए। बेंच ने कहा, “हमें पता है कि जब किसी दोषी को रिहा किया जाता है, तो ऐसे ऑर्डर पर आमतौर पर रोक नहीं लगाई जाती है। लेकिन खास बातों के मद्देनजर हम 23 दिसंबर के हाई कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाते हैं।” खास बात यह है कि सेंगर को बेल तो मिल गई, लेकिन दूसरे मामलों में शामिल होने की वजह से वह जेल में ही रहा।
CBI की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि सेंगर पब्लिक सर्वेंट नहीं था। उन्होंने बताया कि सेंगर MLA के तौर पर पब्लिक ट्रस्ट की पोजीशन पर था और उसे पीड़िता के पिता की मौत के लिए पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था। SG मेहता ने POCSO एक्ट के सेक्शन 42A का भी जिक्र किया।
सेंगर की तरफ से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे और एन हरिहरन ने हाई कोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें पब्लिक सर्वेंट के तौर पर वर्गीकृत किया था। और ऐसा वर्णीकरण कानूनी तौर पर शक के दायरे में आता है।
सेंगर के परिवार ने कोर्ट के आदेश पर निराशा जताई
मीडिया से बात करते हुए, सेंगर की बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने कहा कि वे “केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर सकते”। उन्होंने बताया कि केस में विक्टिम ने कई बार अपना बयान बदला था और तीन मौकों पर कहे गए क्राइम का समय बदला था।
उन्होंने कहा, “आज हम केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर पाए, कि उसने कई बार अपना बयान बदला है, तीन बार टाइम बदला है, दोपहर 2 बजे से शुरू करके, शाम 6 बजे और फिर आखिर में रात 8 बजे। AIIMS मेडिकल बोर्ड ने कहा है कि वह 18 साल से ज्यादा की थी… मैं पिछले 8 सालों से इंसाफ़ के लिए लड़ रही हूँ, लेकिन शायद मेरे और मेरे परिवार के दुखों का कोई मतलब नहीं है। हमसे हमारी इज्जत, हमारी शांति और यहाँ तक कि सुने जाने का हमारा बुनियादी हक भी छीन लिया गया है। अभी भी इंसाफ की उम्मीद है। मैं मीडिया से आग्रह करती हूँ कि कोई गलत जानकारी न फैलाए।”
सेंगर की दूसरी बेटी, इशिता ने भी एक पब्लिक स्टेटमेंट जारी करके पिछले आठ सालों में केस पर कोर्ट और पब्लिक के रिस्पॉन्स से अपनी परेशानी और निराशा जाहिर की। उन्होंने कहा कि उनका परिवार चुप रहा, इंस्टीट्यूशन और सही प्रोसेस पर भरोसा किया, लेकिन उसे लगातार धमकियाँ मिली। सोशल मीडिया पर मौत और रेप तक की धमकियाँ दी गई।
उन्होंने अपने परिवार पर पड़े आर्थिक, सामाजिक और इमोशनल असर के बारे में बताया। उसके मुताबिक पब्लिक प्रेशर में सबूतों और कानूनी प्रक्रिया को दबा दिया गया। उन्होंने अधिकारियों से बगैर किसी दबाव के कानून के मुताबिक काम करने की अपील करते हुए अपनी बात खत्म की। साथ ही कोर्ट पर अपना भरोसा जताया।
हाई कोर्ट ने गंभीर अपराध न होने का हवाला देते हुए जमानत दी
इससे पहले 23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी थी और अपील पेंडिंग रहने तक उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि सेंगर POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में नहीं आते, जो पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के अपराध को बढ़ाता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि POCSO एक्ट के सेक्शन 2(2) के अनुसार, डेफिनिशन इंडियन पीनल कोड (IPC), CrPC, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट या IT एक्ट से ली जानी चाहिए और IPC के सेक्शन 21 के तहत, एक MLA को पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जाता है।
इस आधार पर कोर्ट ने माना कि सेक्शन 5 के तहत गंभीर अपराध लागू नहीं होता है। इसके अलावा, कुलदीप सिंह सेंगर पहले ही 7 साल और 5 महीने से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका है, जो सेक्शन 4 POCSO के तहत बेस अपराध के लिए कम से कम 7 साल की सज़ा से ज़्यादा है, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल दिया जा सकता है।
गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बेल तो दे दी, लेकिन किसी भी अपराध से बरी नहीं किया। उसे केस की टेक्निकैलिटी के आधार पर बेल दी गई थी, मेरिट के आधार पर नहीं।
सोशल मीडिया पर आरोप और गड़बड़ियों के दावे
कई सोशल मीडिया यूजर्स और कमेंट करने वालों ने उन्नाव रेप केस में कथित गड़बड़ियों को लेकर चिंता जताई है, और दावा किया है कि कुलदीप सिंह सेंगर को शायद गलत तरीके से फँसाया गया है। इन दावों में कोर्ट के रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स से लिए गए कई पॉइंट्स का हवाला दिया गया है।
एक बात जो उठाई गई है, वह है घटना के कथित समय में अंतर। कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में बताई गई समरी के अनुसार, पीड़िता ने घटना के तीन अलग-अलग समय बताए हैं, 17 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री को लिखे लेटर में दोपहर 2:00 बजे, 12 सितंबर 2017 को मीडिया इंटरव्यू में शाम 6:00 बजे, और प्रॉसिक्यूशन की थ्योरी में रात 8:00 बजे से 8:30 बजे के बीच।
एक और मुद्दा पीड़िता की उम्र को लेकर है। स्कूल एडमिशन रजिस्टर और मेडिकल राय सहित अलग-अलग सोर्स से जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स में उसकी जन्मतिथि 17 अगस्त 2001, 5 जुलाई 1998 और अगस्त 2002 दर्ज है। RML हॉस्पिटल, CMO उन्नाव और AIIMS के मेडिकल असेसमेंट से पता चलता है कि कथित अपराध के समय उसकी उम्र 18 साल से ज़्यादा थी, जबकि स्कूल रिकॉर्ड और कोर्ट की गवाही से पता चलता है कि वह नाबालिग थी।
यूज़र्स ने सर्वाइवर की रिपोर्टिंग की टाइमलाइन के आधार पर आरोपों की क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठाए हैं। यह देखा गया है कि उसने कथित घटना की तुरंत रिपोर्ट नहीं की और बाद में अपनी कंप्लेंट में नए नाम जोड़े, जिनमें से कुछ को बाद में यह कहकर हटा दिया गया कि उसे वकीलों ने ‘गुमराह’ किया था।
एक अलग वायरल दावे से पता चलता है कि एक महिला आरोपी का नाम बाद में बयान में डाला गया था, जिसमें कैरेट मार्क का इस्तेमाल करके ‘बराबर’ शब्द शामिल किया गया था। इसका मतलब है कि मुख्य आरोपी से मेल खाने के लिए उसकी भूमिका को बदला गया था। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की एडिटिंग से आरोप तय करने के तरीके पर सवाल उठते हैं।
जमानत आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
23 दिसंबर 2025 को कुलदीप सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। उन्नाव पीड़िता की माँ और ऑल-इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन (AIDWA) के सदस्यों सहित लगभग 30 कार्यकर्ताओं ने हाई कोर्ट के बाहर 26 दिसंबर को प्रदर्शन किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं और वे ‘बलात्कारियों को बचाना बंद करो’ जैसे नारे लगा रहे थे।
इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस (IYC) ने जमानत आदेश की निंदा करते हुए एक कैंडललाइट मार्च निकाला। 27 दिसंबर को एक्टिविस्ट योगिता भयाना और कांग्रेस लीडर मुमताज पटेल ने पार्लियामेंट के पास एक धरना दिया। उन्हें पुलिस हिरासत में भी लिया गया। अधिकारियों ने उस इलाके को नॉन-परमिटेड प्रोटेस्ट जोन घोषित कर दिया है।
सेंटर फॉर स्ट्रगलिंग वीमेन, प्रगतिशील महिला संगठन, और ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन समेत कई महिला अधिकार संगठनों ने 28 दिसंबर को स्टूडेंट ग्रुप्स के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्नाव पीड़िता और उसकी माँ भी इसमें शामिल हुईं।
उन्नाव केस टाइम लाइन
2017 – शुरुआती आरोप और FIR
4 जून 2017 को, माखी गाँव की एक 17 साल की लड़की ने दावा किया कि सेंगर ने नौकरी दिलाने के बहाने उसे अपने घर पर बुलाकर उसके साथ रेप किया। उसने दावा किया कि सेंगर ने उसे मुंह न खोलने की धमकी दी। 11 से 20 जून 2017 के बीच, कथित तौर पर पीड़िता को अगवा कर लिया गया और स्थानीय लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। 20 जून को IPC की धारा 363, 366 और 376 के तहत आरोपितों पर FIR दर्ज की गई। FIR में सेंगर का नाम नहीं था।
अगस्त 2017 में पीड़िता ने सेंगर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की कोशिश की। पुलिस ने कथित तौर पर उसका नाम शामिल करने से इनकार कर दिया। फरवरी 2018 में उसने सेंगर का नाम आरोपित के तौर पर शामिल करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
2018 – कस्टोडियल डेथ और CBI जांच
3 अप्रैल 2018 को, पीड़िता के पिता को सेंगर के भाई अतुल और दूसरों ने पीटा। 5 अप्रैल को, पिता को आर्म्स एक्ट के झूठे आरोपों में जेल भेज दिया गया। जाँच के दौरान पता चला कि पीड़िता के पिता के पास मिली देसी पिस्तौल प्लांट की हुई थी। 8 अप्रैल को पीड़िता ने विरोध में मुख्यमंत्री के घर के बाहर खुद को आग लगाने की कोशिश की।
9 अप्रैल को, उसके पिता की ज्यूडिशियल कस्टडी में मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम में चोट के 14 निशान मिले। 10 अप्रैल को, अतुल सेंगर को गिरफ्तार किया गया और इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा। 12 अप्रैल को ये मामला CBI को सौंप दिया गया, जिसने कुलदीप सेंगर के खिलाफ FIR दर्ज की।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देरी की आलोचना की और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 13 अप्रैल को सेंगर को CBI ने गिरफ्तार कर लिया। 15 अप्रैल को लड़की को सेंगर के घर ले जाने के आरोप में शशि सिंह को गिरफ्तार किया गया। 18 अप्रैल को, पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया; पीड़िता की उम्र विवाद का मुद्दा बन गई।
2018 – चार्जशीट और ट्रायल
11 जुलाई 2018 को CBI ने सेंगर और शशि सिंह के खिलाफ रेप और किडनैपिंग के लिए चार्जशीट फाइल की। 13 जुलाई को पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ के मामले में दूसरी चार्जशीट फाइल की गई। इसमें अतुल सेंगर और दूसरों का नाम भी था।
2019 – सुप्रीम कोर्ट का दखल और सजा
28 जुलाई 2019 को पीड़िता और उसके परिजन कार दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए। दो रिश्तेदारों की मौत भी इस दुर्घटना में हो गई। पीड़िता और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए। 29 जुलाई को, सेंगर और दूसरों के खिलाफ मर्डर और साज़िश के लिए FIR दर्ज की गई।
31 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिए और पीड़िता और उसके परिवार के लिए CRPF प्रोटेक्शन का ऑर्डर दिया। 5 अगस्त 2019 को, दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में रेप का ट्रायल शुरू हुआ। 11 सितंबर को, पीड़िता ने AIIMS हॉस्पिटल में एक स्पेशल इन-कैमरा हियरिंग में गवाही दी।
16 दिसंबर 2019 को, सेंगर को IPC और POCSO के तहत नाबालिग से रेप का दोषी ठहराया गया। 20 दिसंबर 2019 को सैंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई और 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।
2020 – हिरासत में डेथ का दोषी
4 मार्च 2020 को सेंगर और दूसरों को कस्टोडियल डेथ केस में गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया। 13 मार्च 2020 को इस मामले में भी 10 साल जेल की सज़ा सुनाई गई।
2021-2024 – अपील और सुरक्षा
सेंगर इस दौरान जेल में ही रहा। कई जमानत अर्जी खारिज कर दी गईं। पीड़िता अपने परिवार के साथ CRPF प्रोटेक्शन में रहती रही। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के रिश्तेदारों की सिक्योरिटी कम करने की इजाजत दी, लेकिन निर्देश दिया कि पीड़ित की प्रोटेक्शन जारी रहनी चाहिए।
2025 – हाई कोर्ट बेल और सुप्रीम कोर्ट स्टे
23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी और उसे बेल दे दी। कोर्ट ने कहा कि वह POCSO एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट नहीं है और उसने काफी समय जेल में काटा है। कोर्ट ने तर्क दिया कि गंभीर जुर्म के प्रोविज़न उस पर लागू नहीं होते, और चूंकि वह पहले ही सात साल से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका था, जो एक्ट के सेक्शन 4 के तहत मिनिमम सज़ा से ज़्यादा था, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल सही थी।
29 दिसंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया और जेल से उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। बेंच ने POCSO के तहत लेजिस्लेटर को ‘पब्लिक सर्वेंट’ स्टेटस से बाहर रखने के कानूनी असर पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर को एग्रेवेटेड असॉल्ट के प्रोविज़न से छूट मिल सकती है और वह मामले की डिटेल में जाँच करने के लिए तैयार हो गया।
उन्नाव केस पर पूरे देश की नजर है। इसमें कानूनी कार्रवाई अभी भी चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को बेल दे दी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर पर रोक लगा दी है और मामले की डिटेल में सुनवाई करेगा। बेल ऑर्डर के बाद कई शहरों में प्रोटेस्ट हुए हैं। इस केस ने कानूनी और प्रोसेस से जुड़े सवाल खड़े किए हैं जो आगे कोर्ट के सामने आएँगे।
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