वन पंचायतों में भी करें सी-बकथोर्न पौधरोपण: रमेश कुमार सुधांशु

ग्रीन इण्डिया मिशन में आजीविका संवर्धन एवं रोजगार सृजन पर विशेष जोर: प्रमुख सचिव

वर्ष 2031 तक की कार्ययोजना में स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़ी गतिविधियों को प्राथमिकता देने के निर्देश

देहरादून 22 अक्टूबर 2026। प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण  आर.के. सुधांशु की अध्यक्षता में बुधवार को सचिवालय में राज्य वन विकास अभिकरण की 7वीं राज्य स्तरीय कार्यकारी समिति की बैठक आयोजित की गई।

बैठक में राज्य में ग्रीन इण्डिया मिशन (GIM) योजना के अगले पांच वर्षों (वर्ष 2031 तक) के पर्सपेक्टिव प्लान की समीक्षा करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।

प्रमुख सचिव सुधांशु ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रदेश में रोजगार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराना है। उन्होंने ग्रीन इण्डिया मिशन में आजीविका संवर्धन से जुड़ी गतिविधियों को प्राथमिकता देने तथा इस संबंध में विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। उन्होंने वन पंचायतों में भी सी-बकथोर्न का पौधरोपण करने तथा आजीविका संवर्धन से संबंधित विषयों पर शीघ्र बैठक आयोजित करने को कहा।

बैठक में अवगत कराया गया कि राज्य वन विकास अभिकरण के अंतर्गत वर्तमान में ग्रीन इण्डिया मिशन, नगर वन योजना एवं स्कूल नर्सरी योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। राज्य वन विकास अभिकरण (SFDA) का अगले पांच वर्षों यानी वर्ष 2031 तक के लिए नवीनीकरण किया गया है।

बैठक में ग्रीन इण्डिया मिशन की परिप्रेक्ष्य योजना, राज्य वन विकास अभिकरण की कार्यकारिणी समिति तथा मिशन के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों एवं दस्तावेजों की जानकारी दी गई। बताया गया कि मिशन के अंतर्गत तीन सब-मिशन में कार्य किए जाने हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य योजना के क्रियान्वयन के लिए ₹559.16 करोड़ की वित्तीय आवश्यकता आकलित की गई है।

इससे पूर्व आयोजित छठी राज्य स्तरीय कार्यकारी समिति की बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा के दौरान बताया गया कि सभी जिलों में वन विकास अभिकरण की बैठकें आयोजित की जा रही हैं। ग्रीन इण्डिया मिशन एवं अन्य योजनाओं के अंतर्गत सफल पौधरोपण के संबंध में नोडल अधिकारी द्वारा दिए गए सुझाव सभी प्रभागीय वनाधिकारियों (DFO) को भेजे गए हैं।

बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि ग्रीन इण्डिया मिशन के नए कार्यों को छोड़कर जुलाई 2025 एवं मई 2026 में कुल ₹31.45 करोड़ की वार्षिक परिचालन योजना (APO) भारत सरकार को भेजी गई है। धनराशि स्वीकृत एवं अवमुक्त होने के बाद स्थानीय समुदायों की आजीविका के विकास के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किए जाएंगे।

बैठक में प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) कपिल लाल, पीसीसीएफ (वन्यजीव) श्रीमती नीना ग्रेवाल, एपीसीसीएफ (प्रोजेक्ट)  विवेक पांडेय, अपर प्रमुख वन संरक्षक एवं नोडल अधिकारी (वन संरक्षण) श्रीमती मीनाक्षी जोशी, अपर सचिव  नवनीत पांडेय,  विक्रम सिंह यादव सहित अन्य संबंधित अधिकारी भौतिक एवं वर्चुअल माध्यम से उपस्थित रहे।

सी-बकथोर्न (Sea Buckthorn) हिमालयी और अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक कांटेदार झाड़ीनुमा वनस्पति है। इसके छोटे, चमकीले नारंगी-पीले रंग के खट्टे फल होते हैं। उत्तराखंड में स्थानीय भाषा में इसे अमेश, वन चूक, अमलिच या चूक भी कहा जाता है, जबकि लद्दाख में इसे लेह बेरी या लद्दाख गोल्ड के नाम से जाना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ और पोषक तत्व:
* विटामिन C का खजाना: इसमें संतरे और आंवले की तुलना में कई गुना अधिक विटामिन C पाया जाता है।
* ओमेगा फैटी एसिड्स: यह उन दुर्लभ पौधों में से है जिसमें ओमेगा-3, 6, 9 के साथ-साथ दुर्लभ ओमेगा-7 फैटी एसिड भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
* एंटीऑक्सीडेंट्स और खनिज: इसमें विटामिन A, E, कैरोटीनॉयड और कई तरह के खनिज पाए जाते हैं, जिस कारण इसे “सुपरफूड” भी कहा जाता है।
प्रमुख उपयोग और लाभ:
* स्वास्थ्य व इम्युनिटी: यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखने में सहायक है और हृदय व पाचन स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
* त्वचा और बाल: इसके बीजों और गूदे का तेल (Sea Buckthorn Oil) एंटी-एजिंग, रूखी त्वचा को नमी देने और घाव भरने में अत्यधिक उपयोगी माना जाता है।
* पर्यावरणीय लाभ:
* इसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) का काम करती हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है।
* यह ढलानों पर मिट्टी के कटाव (भू-कटाव) को रोकने में बहुत प्रभावी है।
* यह -40°C तक की भीषण ठंड और शुष्क बंजर भूमि में भी आसानी से पनप सकता है।
* आजीविका: उत्तराखंड और लद्दाख के सीमावर्ती/पहाड़ी क्षेत्रों में इसके जूस, जैम, चाय, तेल और औषधीय उत्पादों के जरिए ग्रामीणों और वन पंचायतों की आर्थिकी सुधारने के लिए इसके रोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

 

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