‘हलाला,तीन तलाक की आड़ में दुष्कर्म नहीं’, इलाहाबाद HC शरियत के तर्क पर आगबबूला
‘हलाला, तीन तलाक की आड़ में यौन शोषण की अनुमति नहीं’, इलाहाबाद HC की तीखी टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने पीड़िता के पूर्व पति, चाचा, मौलाना समेत अन्य आरोपियों की याचिकाएं खारिज कर दीं. हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में अपराधों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता.
HC ने कहा है कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में अपराध को संरक्षण नहीं दिया जा सकता.
प्रयागराज,03 जुलाई 2026, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह, हलाला और तीन तलाक जैसी प्रथाओं पर तीखी टिप्पणी की है. अदालत ने कहा है कि इन प्रथाओं की आड़ में महिलाओं के यौन शोषण की अनुमति नहीं दी जा सकती है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी प्रथाएं समाज का “काला पन्ना” हैं, जो संवैधानिक मूल्यों, समानता और मानवीय गरिमा के विरुद्ध हैं. न्यायालय ने कहा कि ऐसे कृत्य न केवल कानूनन अपराध हैं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरने वाले हैं.
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने पीड़िता के पूर्व पति, चाचा, मौलाना समेत अन्य आरोपितों की याचिकाएं निरस्त कर दीं. हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में अपराधों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता. अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को अवयस्क से सुनियोजित सामूहिक दुष्कर्म का मामला मानते हुए गहन जांच की आवश्यकता बताई.
HC Refuses To Quash Fir In Nikah Halala Double Halala Gang Rape Allegationspersonal Law Cannot Shield Sexual Crimes, Says Allahabad Hc
‘हलाला’ के बहाने सामूहिक यौन शोषण पर बौखलाया इलाहाबाद हाईकोर्ट, कहा काला धब्बा हैं ऐसे रिवाज, POCSO के कड़े कानूनों में चलेगा केस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में टिप्पणी में कहा है कि निकाह, तलाक, हलाला, और डबल हलाला जैसी मजहबी प्रथाओं की आड़ में दुष्कृत्य और अपराध, मजहब या व्यक्तिगत कानून के नाम पर नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।
मुस्लिम परिवार में क्या तलाक, हलाला, और डबल हलाला जैसे परंपराएं मनमाने यौन शोषण का साधन बन गई हैं? हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है इन मजहबी प्रथाओं की आड़ में दुष्कृत्य और अपराध, मजहब या व्यक्तिगत कानून के नाम पर नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। हाईकोर्ट ने 2016 के कथित निकाह, हलाला और डबल हलाला में नाबालिग से दुष्कर्म और गैंगरेप के आरोपों से जुड़े मामले में दर्ज F.I.R. हटाने से मना कर दिया। कोर्ट ने साफ दोहराया कि मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में अपराध होता है, तो ऐसे में POCSO Act और आपराधिक कानून सबसे उपर हैं।
बच्ची से परिवार में ही दुष्कर्म और ‘डबल हलाला’ और गैंग रेप
मामला उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम परिवार का है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में मुकदमे के अनुसार, पीड़िता की 2015 में 15 वर्ष अल्पायु में मुख्य आरोपित से निकाह कराया गया। 2016 में ट्रिपल तलाक बाद ‘हलाला’ में उससे दुष्कर्म हुआ। बाद में 2025 में दोबारा विवाह को ‘डबल हलाला’ के बहाने आरोपित के भाइयों और अन्य लोगों ने उससे सामूहिक दुष्कर्म किया। इस संबंध में नौ पर मुकदमा हुआ। आरोपितों ने हाईकोर्ट में याचिका दे अपने खिलाफ F.I.R. निरस्तीकरण की मांग की थी।
हाईकोर्ट में मामला और सुनवाई और फैसला
मामले की सुनवाई जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की।
विवाद मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा है और निकाह, हलाला, डबल हलाला जैसे रिवाज, मजहबी रिवाजों का हिस्सा है। अदालत ने इन दलीलों को प्रथम दृष्टया स्वीकार नहीं किया और जांच जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।
न्यायाधीशों ने पाया कि कि पहली नजर में यह एक बच्ची के यौन शोषण और बाद में गैंगरेप का गंभीर मामला है, जिसकी विस्तृत पुलिस जांच आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में संज्ञेय अपराध के आरोप हों, तब मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानूनों की आड़ लेकर कार्रवाई से बचने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि विवाह या मजहबी रिवाजों का सवाल अपनी जगह है, लेकिन यदि उसी के दौरान कोई आपराधिक कृत्य होता है तो भारतीय आपराधिक कानून लागू होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि मजहबी रिवाज किसी व्यक्ति को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध से संरक्षण नहीं दे सकतीं। इसलिए एफआईआर को शुरुआती चरण में रद्द करना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी तो POCSO Act पूरी तरह लागू होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्तिगत कानून या मजहबी रिवाज के कारण POCSO के प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि नाबालिगों के यौन शोषण के मामलों में कानून बेहद स्पष्ट है। यदि हलाला या किसी अन्य मजहबी रिवाजों की आड़ में नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं तो वह आपराधिक अपराध होगा।
आखिर में हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका ठुकराते हुए दर्ज FIR रद्द करने से इंकार कर दिया और जांच एजेंसी को आपराधिक और पॉक्सों के प्रावधानों के तहत निष्पक्ष जांच जारी रखने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार सर्वोच्च हैं।
मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में कुछ भी नहीं चलेगा
हर तरह से इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्वागत योग्य है। मजहबी रिवाजों या व्यक्तिगत कानून की आड़ में किसी भी व्यक्ति को दुष्कर्म, गैंगरेप या बाल यौन शोषण जैसे अपराधों से छूट नहीं दे सकते। यह फैसला महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को और मजबूत करता है। भविष्य में ऐसे ही समान मामलों के लिए यह फैसला मिसाल बन सकता है।
कहां का है मामला
मामला अमरोहा के सैदनागली थाना क्षेत्र का है, जहां पीड़िता ने कम उम्र में निकाह,तीन तलाक, हलाला और फिर से निकाह के नाम पर लगातार यौन शोषण के आरोप लगाए हैं. आरोपियों ने मुकदमा निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया.
अदालत ने कहा कि अब तक के तथ्य बेहद गंभीर हैं और प्रथम दृष्टया सभी आरोपितों की भूमिका गैरकानूनी दिखती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के इस प्रारंभिक चरण में एफआईआर निरस्तीकरण का कोई आधार नहीं बनता और विवेचना जारी रहेगी.
कोर्ट ने कहा कि आरोपों से पहली नजर में पता चलता है कि जब पीड़िता नाबालिग थी, तब उसके साथ रेप हुआ था और बाद में एक घटना के दौरान गैंग रेप हुआ था, जिसे कथित तौर पर दूसरे हलाला के नाम पर छिपाया गया था.
कोर्ट ने कहा, “जब क्रिमिनल लॉ की बात है, तो जब तक कानून खुद कोई छूट न दे, जो बहुत कम होता है, शादी वगैरह के नियंत्रक पर्सनल लॉ के तर्क की कोई जगह नहीं है.”
कोर्ट ने कहा कि आरोपों की पूरी जांच की ज़रूरत है और रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करके उन्हें शुरू में ही खत्म नहीं किया जा सकता.
पीड़िता के साथ दो बार हलाला
FIR के अनुसार अप्रैल 2015 में पीड़िता को मुख्य आरोपी अजहर नवाज के साथ निकाह करने को मजबूर किया गया था. तब उसकी उम्र मात्र 15 साल थी. आरोपित ने जनवरी 2016 में उसे तीन तलाक दे दिया.
कुछ महीने बाद नवाज ने फिर से शादी करने की इच्छा जताई. नवंबर 2016 में उसने सह आरोपित मौलाना कयूम के साथ निकाह हलाला रचाई.
हलाला के समय उसकी उम्र 16 साल थी. पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने कहा कि तब उसे हलाला का मतलब भी नहीं पता था. उसने कहा कि उसके साथ रेप किया गया था. 2017 में नवाज के साथ उसका फिर से निकाह हुआ. लेकिन 4 साल बाद नवाज ने उसे फिर से तलाक दे दिया और दूसरी महिला से शादी कर ली.
बाद में चूंकि नवाज की नई पत्नी बच्चे पैदा करने में असमर्थ थी. नवाज और उसके भाइयों ने पीड़िता को कहा कि वो वापस आ जाए और फिर से परिवार में रहे. उन्होंने पीड़िता से कहा कि चूंकि उसका निकाह दो बार टूटा है इसलिए उसे दो बार हलाला करना पड़ेगा.
इसके बाद डबल हलाला के नाम पर मुख्य आरोपित के भाई और भतीजों ने 19 फरवरी 2025 को उसके साथ गैंग रेप किया. फिर उसी शाम उसके साथ झूठा निकाह किया गया.
Husband pronounced ‘triple talaq’; brother-in-law raped the woman under the guise of ‘Halala’
शौहर ने दिया तीन तलाक, हलाला की आड़ में जेठ ने किया दुष्कर्म,जबरन बनाता रहा संबंध,फिर बनाया बंधक
शेरकोट निवासी युवती की शादी एक साल पहले नहटौर के युवक से हुई थी। युवक ने मारपीट की और तलाक दे दिया। युवती थाने पहुंची तो उसने समझाकर ले आए और शौहर से फिर से निकाह कराने की बात कहते हुए जेठ से हलाला करा दिया। पुलिस ने रिपोर्ट लिख ली है।
Bijnor: Husband pronounced ‘triple talaq’; brother-in-law raped the woman under the guise of ‘Halala’
शौहर ने मारपीट करते हुए गुस्से में आकर पत्नी को तीन तलाक बोल दिया। फिर से निकाह के लिए हलाला की आड़ में जेठ ने दुष्कर्म किया। महिला को बंधक बनाया और मायके नहीं आने दिया गया। पुलिस ने एसपी के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज कर ली है।
शेरकोट की रहने वाली महिला ने पुलिस अधीक्षक को शिकायती पत्र दिया था, जिसकी जांच के बाद शेरकोट थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसमें पीड़िता ने कहा कि करीब एक साल पहले उसका निकाह नहटौर निवासी युवक से हुआ था। निकाह में परिजनों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दहेज दिया।
आरोप है कि निकाह के बाद से ही ससुराल वाले दहेज के लिए प्रताड़ित करने लगे। 19 मई की रात 11 बजे पति ने उसके साथ मारपीट की और गुस्से में आकर तीन तलाक बोल दिया। 20 मई की सुबह वह शिकायत करने के लिए थाने पहुंची तो ससुराल वाले भी आ गए। उन्होंने अपनी गलती मानी और भविष्य में ऐसा नहीं करने का वादा कर घर ले गए। घर ले जाने के बाद पति ने फिर से निकाह की बात कही।
पति से दोबारा निकाह के लिए जेठ से हलाला कराया गया। जेठ ने हलाला की आड़ में उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता ने विरोध करने पर बंधक बनाकर मारपीट करने का भी आरोप भी लगाया। मायके पक्ष से संपर्क होने पर वह किसी तरह ससुराल से बाहर निकल सकी।
पुलिस ने मामले में आरोपी पति, जेठ, जेठानी और ससुर के खिलाफ मारपीट, दहेज अधिनियम, दुष्कर्म और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम 2019 की धारा में प्राथमिकी दर्ज की है। सीओ अफजलगढ़ आलोक कुमार ने प्राथमिकी दर्ज होने की पुष्टि करते हुए बताया कि साक्ष्यों के आधार पर जांच करते हुए कार्रवाई की जाएगी।
तलाक-ए-बिद्दत भी गैरकानूनी
एक साथ तीन बार तलाक बोलकर वैवाहिक रिश्तों को खत्म करना भी पूरी तरह से अवैध और गैरकानूनी है। भारत सरकार ने साल 2018 में मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम लागू कर इसे गैरकानूनी बना दिया था। मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (एसएमएस, व्हाट्सएप या ईमेल) से दिया गया तीन तलाक पूरी तरह से अमान्य है। इसका उल्लंघन करने पर तीन साल की जेल हो सकती है।
देश में तीन तलाक की पहली प्राथमिकी जिले में दर्ज हुई थी
मुस्लिम महिलाओं को एक साथ तीन तलाक देने की प्रथा के खिलाफ 19 सितंबर 2018 को सरकार अध्यादेश लेकर आई थी। यह कानून लागू होने के बाद 27 सितंबर 2018 को बिजनौर के कोतवाली देहात थाने में बरुकी निवासी गुलफाम की पत्नी सल्तनत ने अपने पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। गुलफाम ने अपनी पत्नी को फोन पर तीन तलाक बोलकर प्रेमिका से निकाह कर लिया था। मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम के तहत देश की पहली प्राथमिकी दर्ज हुई थी।
‘UCC आने के बाद उत्तराखंड में नहीं रिपोर्ट हुआ हलाला-बहुविवाह का एक भी मामला’, धामी सरकार का दावा
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू हुए एक वर्ष पूरा हो गया है. उत्तराखंड बीजेपी के मुताबिक यूसीसी के बाद राज्य में हलाला और बहुविवाह का एक भी मामला सामने नहीं आया और विवाह पंजीकरण में उल्लेखनीय बढ़ोतरी आई है.
उत्तराखंड में यूसीसी कानून लागू होने के एक वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी. (Photo: X/@pushkardhami)
27 जनवरी 2026,
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू हुए एक वर्ष पूरा हो गया है. 27 जनवरी की तारीख राज्य के सामाजिक, संवैधानिक और प्रशासनिक इतिहास में एक अहम अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना, जिसने यूसीसी को प्रभावी रूप से लागू किया. बीजेपी के मुताबिक इस फैसले ने संविधान की भावना को धरातल पर उतारा और सामाजिक समानता से समरसता की दिशा में नई मिसाल पेश की.


