SIR पर जज-पूर्व जज भी गुत्थमगुत्था,
‘इसमें कुछ भी गलत नहीं’, SIR पर दो खेमों में बंटी जुडिशरी? जस्टिस भुइयां के समर्थन में आएं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज
नई दिल्ली 08 अक्टूबर। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चला रहा विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। एक तरफ गुरुवार को जहां 42 पूर्व जजों ने खुला पत्र लिखकर SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का समर्थन किया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस भुइयां ने हाल ही में SIR की आलोचना की थी।
इस आलोचना पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई ने नाराजगी भी जाहिर की थी। इन सबके बीच सुप्रीम कोर्ट के एक और रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एस. ओका ने जस्टिस भुइयां का समर्थन करते हुए साफ कहा है कि बड़े पैमाने पर वोटरों से मताधिकार छिनने के खिलाफ जस्टिस भुइयां की टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं है।
इसमें कुछ भी गलत नहीं: जस्टिस ओका
जस्टिस ओका की राय थी कि जज भी एक नागरिक होता है और राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। पद पर रहते हुए जज को संयम बरतना चाहिए; यानी वे किसी खास राष्ट्रीय मुद्दे पर मीडिया में नहीं जा सकते या उस पर लिख नहीं सकते जिस पर उनकी अपनी राय हो।
लेकिन अगर वे किसी लॉ कॉलेज में जाते हैं जहां किसी कानूनी मुद्दे पर बहस हो रही हो, तो जज कानून के एक छात्र के तौर पर अपनी राय रख सकते हैं, बशर्ते वे कोर्ट के किसी आदेश या किसी लंबित मामले पर कोई टिप्पणी न करें।
जस्टिस ओका ने जस्टिस भुइयां का किया समर्थन
उन्हीने आगे कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि उन्होंने (जस्टिस भुइयां) ने कोई सीमा पार की है। बल्कि, मुझे लगता है कि उन्होंने युवा छात्रों को वयस्क मताधिकार और लोकतंत्र में इसके महत्व के बारे में बताया है। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता।
असल में, व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि अगर जज एक नागरिक के तौर पर इस प्रक्रिया के बारे में बात करते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहूंगा, बेशक, कोई भी मौजूदा जज अपनी अदालत या किसी अन्य संवैधानिक अदालत या समकक्ष बेंच में लंबित मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं कर सकता, इसमें कोई शक नहीं है।
लेकिन हो सकता है कि कानून के छात्र के तौर पर छात्रों के साथ कानून पर चर्चा करते समय, वह यह कह दें कि सुप्रीम कोर्ट के किसी खास फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक पक्ष में भी वह वही राय रखेंगे।
कहां कही गई ये बातें?
जस्टिस ओका में ये बातें ‘लेक्स कॉन्सिलियम फाउंडेशन’ के फाउंडर-डायरेक्टर और पूर्व जज एडवोकेट जनरल नीलेन्द्र कुमार के साथ बातचीत के दौरान कही।
चर्चा की शुरुआत में जस्टिस ओका ने कहा कि उन्होंने जस्टिस भुइयां के भाषण को ध्यान से पढ़ा है और उन्हें सुप्रीम कोर्ट में लंबित किसी मामले के गुण-दोष या SIR के संबंध में कोर्ट द्वारा पारित किसी आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं मिली।
जस्टिस भुइयां ने क्या कहा था?
यह बात जस्टिस भुइयां के उस बयान के एक दिन बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को ‘वोट देने के अधिकार से वंचित’ करती है, वह मूल रूप से मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था को ‘नकारने’ जैसा है।
बीते रविवार को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता है एक जिन्हें वोट देने का अधिकार है और दूसरा जिन्हें नहीं और किसी भी तरह की ‘क्या-क्या-बारे-में’ वाली दलीलें ऐसी प्रक्रिया को सही नहीं ठहरा सकतीं।
‘उन्हें हजार बार सोचना चाहिए था…’, जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर पूर्व CJI गवई और रिटायर्ड जजों ने की आलोचना
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और अन्य रिटायर्ड जजों ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की चुनाव आयोग पर की गई टिप्पणियों की आलोचना की है।
पूर्व CJI गवई ने जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को न्यायिक मर्यादा के खिलाफ बताया
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और अन्य रिटायर्ड जजों ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की चुनाव आयोग पर की गई टिप्पणियों की आलोचना की।
गवई ने कहा कि एक मौजूदा जज को वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) पर चल रहे विवाद पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर नाराज हुए पूर्व CJI
गवई ने समाचार एजेंसी PTI से कहा, ‘न्यायिक मर्यादा उन्हें ऐसे मामले पर कोई टिप्पणी करने की इजाजत नहीं देती जो कोर्ट में विचाराधीन है।’
दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी भुइयां की टिप्पणियों पर सवाल उठाए। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि भुइयां का बयान सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज की सीमाओं से कहीं आगे था और ऐसे कमेंट्स किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं किए जाने चाहिए, जब वही मुद्दा उसी कोर्ट में लंबित हो।
ढींगरा ने कहा, ‘उन्हें ऐसा बयान देने से पहले हजार बार सोचना चाहिए था और साथ ही कहा कि जस्टिस भुइयां को इस मुद्दे की पूरी जानकारी नहीं थी।
SC के पूर्व जजों ने भी की आलोचना
जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने भी SIR प्रक्रिया को ‘वोट के अधिकार से वंचित करना’ कहने के लिए जस्टिस भुइयां की आलोचना की और कहा कि वोट का अधिकार कानूनी ढांचे से तय होता है। आपके पास वोट है या नहीं, यह कानून पर निर्भर करता है। अगर आप कानून के दायरे में आते हैं, तो आपके पास वोट है।
जस्टिस सोढ़ी ने कहा, ‘अगर आप कानून के दायरे में नहीं आते हैं, तो आपको वोट देने का अधिकार नहीं है।’ उन्होंने कहा, ‘मेरा मतलब है कि ऐसी कट्टर सोच और ऐसे कट्टर बयान, मेरे हिसाब से किसी चीज को देखने का बहुत समझदारी भरा तरीका नहीं है, खासकर तब जब आप ऐसे क्षेत्र में हों जहां तर्कसंगत सोच की उम्मीद की जाती है।’
जस्टिस भुइयां ने क्या कहा था?
यह बात जस्टिस भुइयां के उस बयान के एक दिन बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को ‘वोट देने के अधिकार से वंचित’ करती है, वह मूल रूप से मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था को ‘नकारने’ जैसा है।
रविवार को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता है एक जिन्हें वोट देने का अधिकार है और दूसरा जिन्हें नहीं और किसी भी तरह की “क्या-क्या-बारे-में” वाली दलीलें ऐसी प्रक्रिया को सही नहीं ठहरा सकतीं।

