छात्रसंघ चुनावों ने उड़ाया कांग्रेस के “छात्रों की गूंज” का रंग

ABVP के जयघोष में खाेई राहुल की ‘छात्रों की गूंज’, राज्य में छात्र संघ की 85 प्रतिशत सीटों पर लहरा भगवा

उत्तराखंड छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी ने 85% सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस की ‘छात्रों की गूंज’ पहल फीकी कर दी।

देहरादून 30 सितंबर 2026 । उत्तराखंड में युवाओं को अपने साथ लाने की राजनीतिक जंग अब कैंपस तक पहुंच गई है। ‘छात्रों की गूंज’ के जरिये युवा मुद्दों को राजनीतिक रंग देने में जुटी कांग्रेस को छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी ने संगठन की ताकत से जवाब दिया है।

राज्य में 85 प्रतिशत सीटों पर जीत का दावा कर एबीवीपी ने बता दिया कि युवा किसी एक दल का पेटेंट नहीं और उच्च शिक्षण संस्थानों में एबीवीपी की सांगठनिक और राष्ट्रवादी विचारों की जड़ें अभी काफी गहरी हैं। युवा मतदाताओं को लेकर राजनीतिक रस्साकशी पिछले कुछ महीनों में तेज हुई है।

राहुल गांधी ने देहरादून में ‘छात्रों की गूंज’ के जरिये युवाओं के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश की। कई सवाल उठाकर कांग्रेस ने युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी ने अपने प्रदर्शन से कांग्रेस का नैरेटिव बेरंग कर दिया।

छात्रसंघ चुनाव ने युवाओं के बीच कांग्रेस के दावों की जमीनी तस्वीर सामने रख दी है। कई मुद्दे उठाकर कांग्रेस ने युवाओं को राजनीतिक रूप से जोड़ने की कोशिश भले ही की हो, लेकिन प्रदेश में कैंपस के अंदर संगठन की ताकत एबीवीपी के पक्ष में दिखी।

डीएवी, एमकेपी, एसजीआरआर समेत 38 अध्यक्ष पद कब्जाकर एबीवीपी ने अपनी सांगठनिक ताकत का लोहा मनवा दिया। नतीजों ने कांग्रेस के नैरेटिव की जमीन तक पहुंच को चुनौती दी और संदेश दिया कि युवा नैरेटिव से नहीं बल्कि कार्यकर्ता, नेतृत्व और मजबूत संगठन से जुड़ते हैं।

उत्तराखंड से भाजपा के लिए सुखद संकेत

भाजपा लंबे समय से युवाओं के बीच संवाद और संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे में जब राष्ट्रीय राजनीति में युवा नैरेटिव को लेकर विपक्ष सक्रिय है, उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनावों के परिणाम भाजपा के लिए संगठनात्मक दृष्टि से उत्साह बढ़ाने वाले हैं।

युवाओं के मध्य राजनीतिक जमीन तैयार करने में लगी कांग्रेस को उत्तराखंड के नतीजों ने संदेश दिया कि युवाओं के बीच एबीवीपी के संगठनात्मक ढांचे को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

वर्जन

छात्रसंघ चुनाव के नतीजों से भाजपा में उत्साह है। युवाओं के बीच भ्रम फैलाने की राजनीति करने वालों को छात्रसंघ चुनाव परिणामों ने आईना दिखा दिया है। युवाओं की हुंकार ने स्पष्ट किया कि देवभूमि की युवाशक्ति राष्ट्रवादी विचारधारा और छात्रहित के प्रति समर्पित संगठन के साथ है ना कि ‘झूठ की गूंज’ से युवाओं को भ्रमित करने वाली सोच के साथ।

पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री

 

गढ़वाल में लहराया भगवा, कुमाऊं में निर्दलीयों ने मारी बाजी

उत्तराखंड छात्र संघ चुनाव में किसका रहा दबदबा? किसके गढ़ में किस संगठन ने मारी बाजी? क्या कहता है जेन-जी का मूड़
उत्तराखंड छात्रसंघ चुनाव नतीजों के क्या इशारे?

दिल्ली में जेन-जी आंदोलन के बाद उत्तराखंड में हुए छात्रसंघ चुनावों के नतीजों पर राजनीतिक दलों और संगठनों की नजरें टिकी थीं. वजह सिर्फ छात्र राजनीति नहीं बल्कि, यह भी थी कि कॉलेज परिसरों में युवाओं का रुझान किस दिशा में जाता दिखाई दे रहा है? प्रदेश के अलग-अलग महाविद्यालयों में आए परिणामों ने तस्वीर को एकतरफा नहीं रहने दिया. गढ़वाल मंडल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने 55 डिग्री कॉलेजों में से 23 में अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर अपनी मौजूदगी मजबूत रखी.

वहीं, एनएसयूआई यानी नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के प्रत्याशी 17 कॉलेजों में अध्यक्ष बने और 15 कॉलेजों में निर्दलीय या अन्य संगठनों के प्रत्याशियों ने बाजी मारी. कुमाऊं में तस्वीर कुछ अलग रही. जहां कई बड़े कॉलेजों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने एबीवीपी और एनएसयूआई दोनों को चुनौती दी है. यानी ऐसे में छात्रसंघ चुनाव का संदेश केवल संगठन बनाम संगठन तक सीमित नहीं दिखा. बल्कि, कैंपस राजनीति में निर्दलीय उम्मीदवारों की मजबूत मौजूदगी भी सामने आई.

गढ़वाल में एबीवीपी का दबदबा, लेकिन हर जिले की कहानी अलग: गढ़वाल मंडल के 7 जिलों के आंकड़े देखें, तो अध्यक्ष पद के चुनाव में एबीवीपी 23 सीटों के साथ सबसे आगे रही. देहरादून में एबीवीपी ने 6, एनएसयूआई ने 4 और अन्य प्रत्याशियों ने 3 अध्यक्ष पद जीते. टिहरी में एबीवीपी के खाते में 7, एनएसयूआई के 4 और अन्य के हिस्से में 3 सीटें आईं. जबकि, पौड़ी में एबीवीपी 4, एनएसयूआई 3 और अन्य 5 सीटों पर रहे.

उत्तरकाशी में एनएसयूआई और अन्य संगठनों ने 2-2 सीटें जीतीं. जबकि, एबीवीपी को 1 सीट मिली. रुद्रप्रयाग में एनएसयूआई ने 2 और एबीवीपी ने 1 अध्यक्ष पद जीता. हरिद्वार में एबीवीपी ने 3 और अन्य ने 1 सीट हासिल की. जबकि, चमोली में एनएसयूआई ने 2, एबीवीपी और अन्य ने 1-1 सीट जीती. यानी गढ़वाल की पूरी तस्वीर में एबीवीपी सबसे आगे जरूर रही, लेकिन कई जिलों में मुकाबला बराबरी और त्रिकोणीय संघर्ष वाला रहा।

गढ़वाल में एबीवीपी का दबदबा
देहरादून में एबीवीपी की पकड़, डीएवी में लगातार दूसरी बार जीत: डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून का परिणाम छात्रसंघ चुनाव की सबसे चर्चित तस्वीरों में रहा. यहां एबीवीपी के नवदीप राणा ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज करते हुए एनएसयूआई के सौरभ सेमवाल को 94 वोटों से हराया. नवदीप राणा को 1,759 वोट मिले. जबकि, सौरभ सेमवाल को 1,665 वोट मिले.

डीएवी में यह लगातार दूसरी बार है. जब अध्यक्ष पद पर एबीवीपी प्रत्याशी ने जीत दर्ज की. खास बात ये रही कि यहां मुकाबला बेहद करीबी रहा और निर्दलीय समेत अन्य प्रत्याशियों की मौजूदगी ने चुनाव को बहुकोणीय बना दिया. डीएवी का परिणाम संगठन की जीत के साथ-साथ यह भी दिखाता है कि राजधानी के बड़े कैंपस में छात्र राजनीति का मुकाबला अभी भी काफी प्रतिस्पर्धी है.

टिहरी में एबीवीपी की बढ़त, उत्तरकाशी में मुकाबला बदला हुआ आया नजर: टिहरी जिले के 13 महाविद्यालयों में एबीवीपी ने 6 अध्यक्ष पद अपने नाम किए. जबकि, एनएसयूआई को 4 और निर्दलीय प्रत्याशियों को 3 कॉलेजों में जीत मिली. टिहरी का परिणाम एबीवीपी के लिए गढ़वाल में सबसे मजबूत जिलों में से एक रहा.

इसके उलट उत्तरकाशी में तस्वीर अलग रही. यहां 6 महाविद्यालयों में एनएसयूआई और ओम-आर्यन ग्रुप ने 2-2 अध्यक्ष पद जीते. जबकि, एबीवीपी और निर्दलीय प्रत्याशियों को 1-1 सीट मिली. यानी गढ़वाल में भी एक समान राजनीतिक रुझान नहीं रहा और स्थानीय समीकरणों ने परिणामों को प्रभावित किया.

एनएसयूआई ने कई जगहों पर जमाया कब्जा
कुमाऊं में संगठन से ज्यादा उम्मीदवार का असर: कुमाऊं में छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने छात्र राजनीति की तस्वीर बदल दी है. कुमाऊं मंडल में 51 कॉलेजों के आंकड़े कुछ ओर ही कहानी कह रहे हैं. यहां 25 कॉलेजों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की. जबकि, एबीवीपी के प्रत्याशियों ने 16 और एनएसयूआई ने 7 कॉलेजों में जीत हासिल की.

एक अन्य उपलब्ध आंकड़े में 46 कॉलेजों के परिणामों में एबीवीपी को 21 निर्दलीयों को 19 और एनएसयूआई को 6 अध्यक्ष पद मिले. अलग-अलग आंकड़ा सीमा के कारण कुल संख्या में अंतर दिखाई देता है. इतनी ज्यादा सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी का चुनाव जीतना छात्र राजनीति में ये बताता है कि ज्यादातर छात्र किसी संगठन की विचारधारा से अलग सोच रहे हैं.

जश्न मनातीं एबीवीपी से जुड़ी छात्राएं
हल्द्वानी के एमबीपीजी और डीएसबी में निर्दलीयों का जोर: कुमाऊं के कई प्रमुख परिसरों में एबीवीपी के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की, लेकिन बड़े कॉलेजों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी मजबूत चुनौती पेश की. कुमाऊं की सबसे बड़े कॉलेज हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज में एबीवीपी के बागी आर्यन बेलवाल ने निर्दलीय मैदान में उतरकर अध्यक्ष पद जीत दर्ज की है. जबकि, एबीवीपी प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे. वहीं, डीएसबी नैनीताल में भी निर्दलीय भानु प्रताप चौहान ने एबीवीपी प्रत्याशी को हराया.

कुमाऊं में छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने छात्र राजनीति में अलग-अलग तस्वीर पेश की है. एक तरफ अल्मोड़ा और बागेश्वर के प्रमुख परिसरों में एबीवीपी समर्थित प्रत्याशियों ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की, तो दूसरी ओर कुमाऊं की सबसे बडे महाविद्यालय हल्द्वानी और नैनीताल में निर्दलीय प्रत्याशियों ने मुकाबले का रुख बदल दिया.

बागी प्रत्याशियों की जीत
हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज में बागी ने पलटा गेम: सबसे बड़ा नतीजा हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज से सामने आया. करीब 12,800 मतदाताओं वाले इस कॉलेज में अध्यक्ष पद पर त्रिकोणीय मुकाबला हुआ. एबीवीपी के बागी आर्यन बेलवाल निर्दलीय मैदान में उतरे और 1,723 वोट लेकर अध्यक्ष निर्वाचित हुए. एनएसयूआई के मेहुल साह को 1,257 और एबीवीपी के धीरज बिष्ट को 988 वोट मिले. यानी एबीवीपी प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा.

हालांकि, इस दौरान कॉलेज गेट के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा भी किया. हंगामा देख पुलिस ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठियां भी भांजी. नैनीताल के डीएसबी परिसर में भी अध्यक्ष पद पर निर्दलीय भानु प्रताप चौहान ने जीत दर्ज की. उन्हें 1,355 वोट मिले. जबकि, एबीवीपी प्रत्याशी शुभम कुमार को 873 वोट मिले। यहां जीत का अंतर 482 वोट रहा.

एबीवीपी से जुड़े छात्र
इसके उलट अल्मोड़ा के एसएसजे परिसर में एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर वापसी की. रोहित कुमल्टा ने एनएसयूआई प्रत्याशी अमित बिष्ट को 294 वोट से हराया. रोहित को 1,148 वोट तो अमित को 854 वोट मिले. बागेश्वर के पंडित बद्रीदत्त पांडे परिसर में एबीवीपी के उमेश शाही अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए.

वहीं, चंपावत कैंपस में अध्यक्ष पद पर निर्दलीय भानु तड़ागी ने 754 वोट लेकर एबीवीपी के सागर मौनी को हराया, जिन्हें 218 वोट मिले. पिथौरागढ़ के एलएसएम परिसर में भी अध्यक्ष पद पर निर्दलीय लवराज वर्मा ने एबीवीपी प्रत्याशी बृजू चौधरी को 161 वोट से हराया. उधर, गंगोलीहाट में भी निर्दलीय हिमांशु जरमाल ने एबीवीपी के आधिकारिक प्रत्याशी को पीछे छोड़ा.

दूसरी ओर लोहाघाट में अध्यक्ष समेत कई पद एबीवीपी के खाते में गए और मुनस्यारी में एनएसयूआई के भूपेश बिष्ट निर्विरोध अध्यक्ष बने. हल्दूचौड़ के एलबीएस कॉलेज बेतालघाट महाविद्यालय और महिला कॉलेज हल्द्वानी में भी निर्दलीय प्रत्याशियों ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का बयान
जेन जी के मूड को लेकर बढ़ी राजनीतिक दिलचस्पी: वरिष्ट पत्रकार और छात्र राजनीति के जानकार किरण कुमार कहते हैं कि छात्रसंघ चुनाव ऐसे समय हुए हैं, जब देशभर में युवाओं की राजनीति और उनकी प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा तेज है. दिल्ली में जेन-जी (Gen Z) आंदोलन के बाद उत्तराखंड के कैंपस चुनावों के परिणामों को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है.

हालांकि, छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को सीधे पूरे युवा वर्ग या जेन-जी की राजनीतिक पसंद का प्रतिनिधि मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन कॉलेज परिसरों में निर्दलीय उम्मीदवारों का उभरना और कई जगह बड़े छात्र संगठनों को चुनौती मिलना, जरूर एक महत्वपूर्ण कैंपस ट्रेंड के तौर पर देखा जा सकता है. खासकर कुमाऊं के बड़े कॉलेजों में निर्दलीय प्रत्याशियों की जीत ने इस चर्चा को और हवा दी है कि छात्र के मन में क्या है और वो क्या सोच रहा है? ये राजनीतिक दलों के लिए भी एक फीडबैक है.

जश्न मनाते एनएसयूआई से जुड़े छात्र
छात्रसंघ चुनाव के परिणामों को अब राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिए से पढ़ेंगे. जिन विधानसभा क्षेत्रों और जिलों में राज्य सरकार के मंत्री सत्तारूढ़ दल के विधायक या कांग्रेस के विधायक प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे माने जाते हैं, वहां कॉलेजों के परिणाम स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की चर्चा को जरूर जन्म देंगे, लेकिन छात्रसंघ चुनाव का परिणाम सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं माना जा सकता.

कॉलेज स्तर पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता स्थानीय छात्र मुद्दे संगठन की सक्रियता और स्थानीय समीकरण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. इसलिए इन नतीजों को विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान मानने के बजाय युवा राजनीति के मौजूदा कैंपस रुझान के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा, लेकिन दूसरी ओर देखें तो यह अलार्मिंग स्टेज भी है कि आज का यूथ क्या सोच रहा है?

वहीं, कुमाऊं में निर्दलीयों का उभार यह सवाल खड़ा करता है कि क्या युवा मतदाता संगठन की पहचान से आगे बढ़कर स्थानीय चेहरे और मुद्दों को भी महत्व दे रहे हैं? आने वाले समय में यही रुझान छात्र राजनीति से बाहर व्यापक युवा राजनीति में कितना दिखाई देता है. यह विधानसभा चुनाव के दौरान ही स्पष्ट होगा.

सीएम धामी ने एबीवीपी के विजयी प्रत्याशियों को दी बधाई: छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी की जीत के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विजयी प्रत्याशियों को बधाई दी. उन्होंने परिणामों को युवाओं की राष्ट्रवादी विचारधारा और छात्रहित के प्रति समर्थन से जोड़ते हुए प्रतिक्रिया दी.

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान
वहीं, दूसरी ओर विपक्षी छात्र संगठनों और निर्दलीय प्रत्याशियों के परिणाम भी यह संकेत देते हैं कि प्रदेश के कैंपस में मुकाबला केवल दो संगठनों के बीच सीमित नहीं है. इस बार की सबसे बड़ी तस्वीर यही रही कि गढ़वाल में एबीवीपी का दबदबा दिखाई दिया. जबकि, कुमाऊं में निर्दलीय चेहरों ने छात्र राजनीति के समीकरणों को काफी हद तक बदल दिया.

कुल मिलाकर क्या कहते हैं परिणाम: छात्रसंघ चुनाव के नतीजे किसी एक संगठन की पूरे उत्तराखंड पर एकतरफा पकड़ की तस्वीर नहीं देते. गढ़वाल में एबीवीपी सबसे ज्यादा अध्यक्ष पद जीतकर आगे रही. जबकि, कुमाऊं में निर्दलीय प्रत्याशियों ने कई अहम कॉलेजों में अपनी ताकत दिखाई. एनएसयूआई भी कई कॉलेजों में जीत दर्ज कर मुकाबले में बनी रही.

शपथ लेते नवनिर्वाचित पदाधिकारी
लिहाजा, इन चुनावों से तीन तस्वीरें उभरती हैं. गढ़वाल में एबीवीपी की मजबूत मौजूदगी कुमाऊं में निर्दलीय चेहरों का उभार और युवाओं के बीच संगठन से इतर स्थानीय मुद्दों व उम्मीदवारों की भूमिका. यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले छात्रसंघ के ये परिणाम कैंपस की राजनीति से निकलकर प्रदेश की सियासी चर्चाओं तक पहुंच गए हैं.

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