बूढों का गाँव चंदनकी,जहां घरों में नही बनता भोजन

यह है देश का अनोखा गांव, यहां किसी भी घर में नहीं बनता खाना; जानिए 500 लोग कैसे करते हैं गुजारा?
पूरे गांव का खाना एक ही रसोई में बने ऐसा उदाहरण बहुत कम मिलता है। मगर गुजरात के एक गांव ने ऐसा ही कर दिखाया है। यहां किसी भी घर में खाना नहीं बनता है। सभी लोगों का खाना गांव के सामुदायिक रसोई में बनता है। ग्रामीण खाना खाने के बहाने एक जगह पर जुटते हैं। न केवल खाना खाते हैं बल्कि अपना दुख-सुख भी बांटते हैं।

गांव के किसी भी घर में नहीं बनता खाना। (सांकेतिक फोटो)
मुख्य बिंदू
सामुदायिक रसोई पर बनता है गांव का खाना।
हर महीने 2000 रुपये करना पड़ता है भुगतान।
खाने के बहाने वृद्धों में अकेलापन हो रहा दूर।

मेहसाणा(गुजरात) 12 अगस्त 2025। गुजरात में देश का एक अनोखा गांव है। इस गांव में किसी घर में खाना नहीं बनता है। खास बात यह है कि इस गांव में बुजुर्गों की संख्या भी काफी है। पहले इस गांव में 1100 लोगों की आबादी थी। मगर नौकरी पेशा के चक्कर में लोगों ने पलायन किया। अब यहां महज 500 लोग रहते हैं। मगर पूरे देश में यह गांव एक अद्भुत उदाहरण बना है। आइए जानते हैं गुजरात के इस गांव की कहानी।

गुजरात के मेहसाणा जिले में पड़ता है अनोखा गांव चंदनकी। इस गांव के किसी भी घर में खाना नहीं बनाया जाता है। गांव में एक सामुदायिक रसोई है। यहीं पर पूरे गांव का खाना बनता है। खाने के बहाने गांव के लोग यही पर जुटते हैं। एक-दूसरे से मिलते और बातें करते हैं। इस सामुदायिक रसोई की वजह से बुजुर्गों में अकेलापन दूर करने में काफी हद तक मदद मिली है।

जानिए कैसे गुजरात का चंदनकी गाँव सामूहिक भोजन की एक अनूठी परंपरा के माध्यम से सामुदायिक बंधन को बढ़ावा देता है। पेशेवर रसोइयों से तैयार दैनिक भोजन में ग्रामीणों के योगदान  के साथ, यह पहल एकजुटता को बढ़ावा देते हुए वृद्धों के अनुकूल है।

गुजरात के चंदनकी गांव के लोग घर पर खाना क्यों नहीं बनाते: अनोखी परंपरा
तेज़-तर्रार महानगरीय जीवनशैली के विपरीत, जहाँ एकल परिवार और अविवाहित जीवन का बोलबाला है, कई भारतीय गाँवों में अभी भी सामुदायिक भावना प्रबल है। हालाँकि, ग्रामीण आबादी लगातार घट रही है क्योंकि बेहतर स्वास्थ्य सेवा और बेहतर जीवन स्थितियों की तलाश में बुज़ुर्ग माता-पिता भी शहरों का रुख कर रहे हैं।

इस जनसांख्यिकीय बदलाव के बीच, गुजरात के चंदनकी गाँव ने एक अनोखी परंपरा को अपनाया है जो उनके सांप्रदायिक बंधनों को और मज़बूत करती है। चंदनकी में, अब लोग घर पर खाना नहीं पकाते—यह प्रथा तब शुरू हुई जब गाँव में वृद्ध आबादी बहुसंख्यक हो गई।

गाँव के सरपंच पूनमभाई पटेल ने इस पहल की शुरुआत की। न्यूयॉर्क में 20 साल बिताने के बाद, पटेल जब लौटे तो उन्होंने पाया कि चंदनकी के बुज़ुर्गों को रोज़मर्रा के कामों में, खासकर युवा पीढ़ी की अनुपस्थिति में, काफी दिक्कत हो रही थी। गाँव की आबादी 1,100 से घटकर सिर्फ़ 500 रह गई थी क्योंकि कई युवा शहरों की ओर चले गए थे।

प्रतिक्रियास्वरूप, सामुदायिक भोजन की अवधारणा शुरू की गई। प्रत्येक ग्रामीण ₹2,000 प्रति माह का योगदान देता है, जिसमें पेशेवर रसोइयों से तैयार दिन में दो पौष्टिक भोजन शामिल हैं। ये भोजन गांव के सामुदायिक हॉल में एक साथ आनंद लिया जाता है, जो सामाजिक समारोहों और उत्सवों के लिए एक स्थान के रूप में भी कार्य करता है। मुख्य रसोइया ₹11,000 प्रति माह कमाता है और पारंपरिक गुजराती व्यंजन तैयार करता है, यह सुनिश्चित करता है कि भोजन पौष्टिक और सांस्कृतिक रूप से निहित हो।

 प्रतिव्यक्ति 2000 रुपये महीना  सहयोग 
सौर ऊर्जा संचालित रसोई में  खाना किराये के रसोइया तैयार करते हैं। इन्हें हर महीने 11 हजार रुपये का वेतन मिलता है। वहीं खाने के बदले ग्रामीण दो हजार रुपये मासिक भुगतान करते हैं। ग्रामीणों को खाना वातानुकूलित हॉल में परोसा जाता है। सामुदायिक रसोई बनाने में गांव के सरपंच पूनमभाई पटेल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज इस गांव की सामुदायिक रसोई को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।

खाने में क्या-क्या मिलता है?
समुदाय रसोई के एसी हॉल में एक साथ 35-40 लोगों के भोजन करने की व्यवस्था है। दोपहर के भोजन में दाल, चावल, चपाती, सब्जी और मिठाई दी जाती है। रात में खिचड़ी-कढ़ी, भाकरी-रोटी-सब्जी, मेथी गोटा, ढोकला और इडली-सांभर की व्यवस्था होती है। चंदनकी गांव के करीब 300 परिवार अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बसे हैं।

 

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