जाति का मूल क्या है?:इतिहास,अर्थव्यवस्था और सत्ता तक जाती हैं खोज
मात्र ‘धार्मिक’ या सांस्कृतिक पुस्तकें मिटाकर जातीय शोषण और अन्याय से मुक्त नहीं हुआ जा सकता.अन्याय और शोषण के बीज ‘पारंपरिक’ किताबों की कुछ पंक्तियों में संदर्भित करना एक अतिशय धारणा हो सकती है. भारतीय समाज में जाति को केवल जन्म से संबंधित समूह कहना पर्याप्त नहीं है. यह सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का संयोजन है. इसी से प्राचीन काल में इसका अस्तित्व सशक्त बना रहा, कई रूपों में यह सामाजिक आवश्यकतायें भी पूरा करता रहा.
जाति को हम अक्सर मात्र राजनीतिक दृष्टि से विचारते हैं, जबकि जरूरत इसे समाज वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की है. जाति उत्पत्ति के संबंध में इन सरल और सामान्यीकृत धारणाओं से बचना चाहिए कि जाति हजारों सालों से अपरिवर्तनीय सामाजिक संस्था है.
भारत में जाति कैसे समझें
प्रश्न यह है कि किस ऐतिहासिक परिस्थिति में जाति की कौन सी विशेषता अधिक सक्रिय हुई और राज्य, धर्म, अर्थतंत्र और स्थानीय समुदायों ने उसके रूपांतरण में क्या भूमिका निभाई! जातिगत श्रम विभाजन और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण और उसका भी क्षेत्रीय स्वरूप भिन्न-भिन्न होना दर्शाता है कि जाति को समझने में सामान्यतः भूमि, श्रम, सत्ता, राज्य और राजनीतिक संघर्ष के प्रश्न पीछे छूट जाते हैं, इसलिए जाति समझने को ‘रिचुअल हाईरार्की’ और ‘मटेरियल पावर’ को अर्थपूर्ण संदर्भों के साथ प्रक्रियागत समझ के साथ विचारा जाना चाहिए.
जाति समझने को उसे केवल ‘कास्ट’ का भारतीय पर्याय मानना पर्याप्त नहीं है. जाति का संबंध स्थानीयता, पेशा, वंश, विवाह, भोजन, अनुष्ठान, सामाजिक स्थिति से भी रहा है. इसे अगर हिंदू ग्रंथों में वर्णित ‘वर्ण’ से समझा जाए तो इसमें केवल वर्ण- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आते हैं, जबकि वास्तविक सामाजिक संसार में हजारों की संख्या में यह सामाजिक विभाजन उपस्थित है. ये हमेशा ‘वर्ण’ की योजना में स्पष्ट तरीके से नहीं बैठती. विचारधारा और सामाजिक वास्तविकता में भी अंतर दिखता है. ऐतिहासिक रूप से वर्ण जहां समाज का सांस्कृतिक और आर्थिक मानचित्र बनाता है, वहीं जाति स्थानीय सामाजिक जीवन की अधिक ठोस इकाई के रूप में उपस्थित है. किसी समूह की स्थिति मात्र धार्मिक शास्त्र से निर्धारित नहीं होती; भूमि, राजनीति, आर्थिक संसाधन, सैन्य भूमिका और स्थानीय प्रतिष्ठा भी उसकी स्थिति प्रभावित करती है. इस अर्थ में जाति एक संबंधपरक श्रेणी है. व्यक्ति की पहचान केवल ‘मैं कौन हूं?’ से नहीं बनती, बल्कि ‘मैं किससे संबंधित हूं’ से तय होती है.
इस्लामिक शासन में जाति
फ्रेंच विद्वान लुईस ड्यूमा ने जाति को केवल असमानता की एक सांस्कृतिक और नैतिक तंत्र के रूप में देखा, लेकिन जाति को केवल केवल ‘शुद्धता’ और ‘अशुद्धता’ से भी नहीं समझा जा सकता जैसा कि उन्होंने देखने का प्रयास किया, क्योंकि इससे भूमि, श्रम, सत्ता, राज्य और राजनीतिक संघर्ष के महत्व पीछे छूट जाते हैं. जाति की ऐतिहासिक प्रकृति समझने में मध्यकालीन राज्य-निर्माण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. राज्य जब विस्तृत होते थे तो केवल राजनीतिक सीमाएं ही नहीं बनाते थे, बल्कि वे भूमि, राजस्व, सैन्य और धर्म संस्थाओं से भी नए संबंध बनाते थे. इससे स्थानीय समुदायों की सामाजिक स्थिति भी बदलती थी. उदाहरण को मध्यकाल में इस्लामिक शासकों के समय ऐसी अनगिनत जातियां मुस्लिम समाज में ही जन्मी , जो उनसे पहले अस्तित्व में नहीं थी.राज्य और जाति का संबंध कभी एकतरफा नहीं रहा है. राज्य सामाजिक समूह बनाता भी रहा और नई पहचान के साथ संरक्षण भी देता रहा है. इसके प्रत्युतर में जातीय समूह राजस्व, श्रम, सैन्य, आदि से अपनी उपयोगिता सिद्ध करता रहा. राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने वाले समूह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा भी पुनर्गठित कर सकते थे. इस प्रक्रिया को सामाजिक-गतिशीलता के साथ-साथ प्रस्थिति-सौदेबाजी भी कहा जा सकता है. इसमें कोई समूह अपनी वंशावली नए तरीके से बता सकता है, किसी उच्चतर सामाजिक स्थिति का दावा कर सकता है. इसलिए मध्य और प्राचीन भारत में भी जाति कोई जमी हुई अवधारणा नहीं थी, बल्कि एक रूपांतरण हमेशा से रहा था.
सबसे महत्वपूर्ण मोड़ औपनिवेशिक काल में आता है, जिसमें जातीय गणना और वर्गीकरण के प्रयास हुए.’ओरिएन्टलिस्ट’ और ‘मिशनरी’ विमर्श ने जाति की छवि भयानक बनाई. यह दुहराना जरूरी है कि जातियों का संबंध यहां की अर्थव्यवस्था से भी था, जिसे जजमानी व्यवस्था में स्पष्टत: देखा जा सकता था, इसलिए औपनिवेशिक अर्थतंत्र का फलना-फूलना तब तक संभव नहीं था, जब तक यहां की पारंपरिक अर्थव्यवस्था ध्वस्त न की जाए. इस काल की जनगणना, नृवंशविज्ञान सर्वेक्षण, प्रशासनिक रिपोर्ट, शासकीय मानसिकता ने कानूनों से विभिन्न सामाजिक समूहों को नाम, श्रेणी और प्रशासनिक पहचान दी, जिसने जातीय विमर्श को अधिक संवेदनशील बनाया. इसने जाति को एक स्थिर पहचान देने का प्रयास किया. उसमें वे कमोबेश सफल भी रहे. यहां निकोलस डर्क की पुस्तक ‘कास्ट ऑफ़ माइंड’ का उल्लेख महत्वपूर्ण है, उनके अनुसार औपनिवेशिक शासन ने जातीय अविष्कार शून्य से नहीं किया, बल्कि उसने भारतीय विविधता को व्यापक जातिगत ढांचे में पुनर्गठित किया. इस तरह जाति स्थानीय सामाजिक पहचान न रहकर औपनिवेशिक ज्ञान और प्रशासन की स्थिर और केंद्रीय इकाई बन गई.
अंग्रेजी शासनकाल में जाति
औपनिवेशिक राज्य ने श्रेणियां बनाईं, लेकिन समुदायों ने भी उन श्रेणियों को अपनाया, चुनौती दी और अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया. जातियां अपनी संख्या, सामाजिक स्थिति और प्रशासनिक पहचान के आधार पर प्रतिनिधित्व और संसाधनों की मांग करने लगीं. जाति पहले स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों की इकाई थी, वह अब संख्या, प्रतिनिधित्व और अधिकार की राजनीतिक भाषा भी बनने लगी. औपनिवेशिक शासन ने इन विविधताओं को वर्गीकृत, संहिताबद्ध और प्रशासकीय श्रेणियों में व्यवस्थित किया, जबकि आधुनिक लोकतंत्र ने उन्हें प्रतिनिधित्व और राजनीतिक पहचान की नई भाषा दी. अतः जाति समझने को हमें धर्म और संस्कृति के साथ-साथ इतिहास, अर्थव्यवस्था, राज्य, सत्ता और सामाजिक संबंधों को एक साथ देखना होगा. जाति न तो केवल शास्त्र है, न केवल औपनिवेशिक जनगणना, न केवल आर्थिक वर्ग और न केवल सांस्कृतिक पहचान. वह एक ऐतिहासिक रूप से निर्मित और निरंतर परिवर्तित होती सामाजिक संस्था है. जाति का प्रश्न केवल अतीत का प्रश्न नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक संबंधों और सत्ता से जुड़ा प्रश्न है. इसे समझने को एक ऐसी मानवशास्त्रीय दृष्टि आवश्यक है जो निरंतरता और परिवर्तन, संरचना और प्रक्रिया, विचार और व्यवहार, संस्कृति और सत्ता इन सभी के अंतर्संबंध एक साथ समझ सके. जातीय इतिहास सीधी रेखा में नहीं चलता; वह अनेक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं, स्थानीय अनुभवों और राजनीतिक संघर्षों से निर्मित होता है.
(अस्वीकरण: लेख धीरज कुमार वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एमएमवी में समाजशास्त्र शिक्षक और केयूर पाठक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र शिक्षक हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखकों के हैं, उनसे हमारे सहमत या असहमत होना आवश्यक नहीं है.)


