अंकुरित अन्न Sprouts को घातक क्यों बताता है आयुर्वेद?

#अंकुरित_अनाज असभ्य और घातक आहार !!

विदेशी आक्रान्ताओं विशेष रूप से अंग्रेजों के भारत में आने के बाद कुछ हम भारत वासियों की ऐसी मनोभूमि तैयार हुयी कि हम विदेशी खान पान, संस्कृति और आचार-व्यवहार को अपनाने लगे, जबकि हम जो विपरीत आचार, व्यवहार, आहार अपना रहे थे उसके सम्बन्ध में हमारे आर्ष वाङ्मय में बड़ी जोरदारी के साथ, वैज्ञानिकता के साथ और होने वाले हानियों के साथ सचेत किया गया है। किन्तु जिस प्रकार कुहरा सूर्य के प्रकाश को तिरोहित करता है उसी प्रकार आधुनिकता के नाम वाला अज्ञानता का अन्धेरा हमारे अनुपम ज्ञान के प्रकाश को ढक चुका होता है। जब दुष्परिणाम आते हैं तब तक हम लोग बहुत हानि उठा चुके होते हैं और ऐसी हानि कि जिसकी शायद क्षतिपूर्ति न हो। उन्हीं में से एक आहार है अंकुरित अन्न।

आधुनिकों ने अंकुरित अनाज में विटामिन, खनिज, एंजाइम और एमीनो एसिड का स्त्रोत बताया तो विटामिन ए, बी, सी, ई और कैल्शियम, आयरन, #मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम, जिंक, कैरोटीन, क्लोरोफिल, अमीनो एसिड और ट्रेंस तत्व बताया है। यह भी बताया कि अंकुरित अनाज सुपाच्य होने के साथ ऊर्जा एवं साइटोकेमिकल्स से भरपूर होते हैं।

यद्यपि कुछ शोधकर्ता कहते हैं कि अंकुरित अनाज का औषधि और भोजन के रूप में प्रयोग प्राचीन चीन में 5000 साल पुराना इतिहास है।

जब आधुनिक चिकित्सकों ने धुँआधार लाभ बताना प्रारम्भ किया तो इसके सेवन करने वालों की बाढ़ आ गयी। यद्यपि हमारी बुद्धि इसे स्वास्थ्यवर्धक आहार के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर पा रही थी, इसीलिए हमने इसे ‘आयुष ग्राम’ में या खान-पान आहार के रूप में नहीं चलाया वह इसलिए कि #आचार्य_चरक जैसा चिकित्सा जगत का महावैज्ञानिक अंकुरित अन्न को असभ्य, गँवारू, अशिष्ट और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही घातक और मारक आहार बताता है-

‘सर्वे शारीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहारात्’. विरूढनवशूकशमीधान्यभोजिनां..

स एवंभूतो ग्लाययति सीदति, निद्रातन्द्रालस्यसमन्वितो निरुत्साहः श्वसिति, असमर्थश्चेष्टानां शारीरमानसीनां

नष्टस्मृतिबुद्धिच्छायो रोगाणामधिष्ठानभूतो न सर्वमायुरवाप्नोति ।।

(च.चि. 1/2/33)

अर्थात् असभ्य, अशिष्ट, गँवारू खान-पान सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग पैदा करता है। उन्हीं आहारों में से एक आहार है अंकुरित अन्न, नया जौ, गेंहूँ, नया मूँग, मटर, उड़द आदि।। ऐसा आहार करने वाला व्यक्ति अनेक शारीरिक विकारों से तो युक्त हो ही जाता है इसके अलावा उसके मज्जा, शुक्र, धातु भी प्रभावित होने लगते हैं, जब मज्जा और शुक्र धातु प्रभावित होंगे तो ओज धातु जो शरीर की सार धातु है वह प्रभावित हुये बिना कैसे रह सकती है परिणामतः ग्लानि उत्पन्न होती है, हर्षक्षय होता है, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य जैसी प्रवृत्तियाँ जन्म ले लेती हैं, उत्साहहीनता आ जाती है। जैसे-जैसे शारीरिक और मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है वैसे-वैसे व्यक्ति की स्मृति, बुद्धि में विकार आने लगता है, शरीर की कान्ति बिगड़ने लगती है और वह पूर्ण आयु नहीं प्राप्त कर पाता।

#आचार्य_वाग्भट ने भी सूत्रस्थान 8/40-41 में कुछ आहारीय पदार्थों को अपनाने के लिए स्पष्ट मना किया है, उसी में विरुढान्त्र (अंकुरित अनाज) का भी उल्लेख है। यहीं पर वाग्भट ने दही को भी नित्य और निरन्तर आहार में न लेने की बात कही है।

इस पर विस्तार से चर्चा हम अवश्य करेंगे। इधर हम चिकित्सा सेवा काल में उदर रोग, ब्लडप्रेशर, अवसाद, अम्लपित्त, गठिया, #कोलेस्ट्राल वृद्धि, गुर्दा के रोग, मूत्र रोग से लोगों को घिरे देखा। वे कहते कि हमारा कोई गलत खान-पान भी नहीं है, फिर भी इन घातक बीमारियों से घिर गये।

वे बेचारे बड़े गर्व से, बड़ी आधुनिकता से बताते कि हम नाश्ते में अंकुरित अन्न (Sprouts) लेते हैं।

तब हमें समझ में आता है कि यह आधुनिकता ही इन्हें रोग का घर बना चुकी है। हम मुस्करा देते और परदुःखकातरता का भाव भी मन में आ जाता कि ये बेचारे आधुनिकता के अज्ञान में फँसकर अशास्त्रीय आचरण कर इस दशा में प्राप्त हो गये। यह सब चलता रहा और एक दिन अमेरिकी हेल्थ एजेंसी ‘सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एण्ड प्रिवेंशन (#CDC)’ ने स्त्रॉउट्स को हाई रिस्क फूड घोषित कर दिया। जिसे खाने से बीमार होने का खतरा सर्वाधिक बता दिया।

एक दिन इण्डियन जर्नल ऑफ एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी की रिपोर्ट आ गयी कि स्प्रॉउट्स (अंकुरित अन्न) में साल्मोनेला, लिस्टेरिया, मोनोसाइटोजेनस, स्टैफिलोकोकस, बैसिलस सेरेस, एरोमोनस हाइड्रोफिला, शिगेला, येसर्सीनिया, एंटेरोकोलाइटिस और ई. कोलाई जैसे बैक्टेरिया पनप जाते हैं। इस रिपोर्ट में एक बहुत बड़ी बात यह कह दी कि क्लोरिन, एल्कोहल और केमिकल्स से साफ करने के बावजूद भी ये बैक्टेरिया पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाते।

इण्डियन जर्नल ऑफ एप्लाइड माइक्रोबायलॉजी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चना समेत किसी भी अनाज या बीज को अंकुरित करने के लिए पहले उसे पानी में भिगोकर फिर कपड़े में लपेटकर रखा जाता है ऐसे नमी वाले माहौल में बैक्टेरिया तेजी से पैदा होते हैं।

एकेडमी ऑफ न्यूट्रिशन एण्ड डायटेटिक्स की एक रिसर्च के अनुसार #Sprouts अंकुरित करते समय इसमें रहने वाली नमी से साल्मोनेला, ई-कोलाई और लिस्टेरिया जैसे बैक्टेरिया पैदा हो सकते हैं जो बीमारियों को पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

आपको बताते चलें कि लिस्टेरिया मोनोसाइटोजेनस नामक बैक्टेरिया से लिस्टेरियोसिस नामक बीमारी होती है इसमें बुखार, सिर दर्द, मांसपेशी, शरीर में दर्द, पेट खराब रहना, गर्दन में अकड़न होता है। यदि रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, तो नवजात बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवतियों को इस बीमारी से खतरा सर्वाधिक होता है।

स्टैफिलोकोकस से निमोनिया, फूड प्वाइजनिंग से लेकर खून और हड्डियों तक का संक्रमण होता है, बैसिलस सेरेस बैक्टेरिया से एक तरह शरीर में जहर पैदा होता है जो डायरिया दस्त, उल्टी और पेट से जुड़ी गंभीर समस्यायें, एरोमोनस हाइड्रोफिला से खूनी डायरिया समेत आंतों की घातक बीमारी, ई-कोलाई से पेट की गंभीर बीमारी और किडनी फेल होने से लेकर कोमा तक का खतरा रहता है। येर्सीनिया एंटेराकोलाइटिस से दुनियाभर में हर साल लाखों लोग संक्रमित होकर जान गंवाते हैं, शिमोला बैक्टेरिया से होने वाली फूड प्वाइजनिंग बहुत खतरनाक होती है, यदि इसका संक्रमण खून तक पहुँच गया तो जानलेवा हो सकता है।

इन्हीं सब कारणों से अब अमेरिका के फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन #FDA ने अंकुरित अन्न (स्प्राउट्स) के लिए कड़े नियम बना दिए हैं कि स्प्राउट्स (अंकुरित) अन्न तैयार करने हेतु पानी से लेकर भिगोने तक फिर अंकुरण क्रिया और परोसने तक सावधानी बरतनी होगी।

बीमारी के इलाज हेतु जब लोग आते हैं तो अधिकांश यही कहते पाए जाते हैं कि हमने तो कोई गल्ती की नहीं पर यह बीमारी कैसे हो गयी?

भारतीय पोषण वैज्ञानिकों के अनुसार कच्चा स्प्राउट्स गैस, पेट दर्द, ऐंठन, #गैस्ट्रिक_अल्सर का शिकार बनाता है इसलिए ईमानदार चिकित्सीय सलाह पर ही अंकुरित अन्न खाना चाहिए।

इतने अध्ययन के बाद तो अब एक बात अवश्य दुनिया को समझ लेनी चाहिए कि भारत का वैदिक चिकित्सा विज्ञान कितना दूरदर्शी, शोधपूर्ण और विज्ञान सम्मत है कि उसने अंकुरित अन्न को न जाने कब हानिप्रद कह दिया था। दुनिया नहीं भारत में इसकी उपेक्षा हुयी इसलिए आज अनेकों मानसिक और शारीरिक परेशानी आ खड़ी हुयी हैं।

इसलिए हम सबका कर्त्तव्य बनता है कि अब हम सब जागरूकता फैलायें, इन बातों की चर्चा अवश्य करें, यह लोक मंगल का कार्य होगा।

जब आयुर्वेदीय विश्लेषण किया जाता है तो अंकुरित अन्न गुण में गुरु (गरिष्ठ), नमी के कारण भारी, स्निग्ध, #अभिष्यन्दी, मनस्थिर, सान्द्र और स्थूल है जो उपचय, संघात, गौरव, स्थैर्य, बल और अधोगमन कर्म करता है। इसलिए जब इसे सेवन किया जाता है तो धीरे-धीरे यह पाचक अग्नि को मन्द और असंतुलित करने लगता है। ‘आम’ ‘या ‘आमविष’ जैसे जहरीले तत्वों का उत्पादन पेट में करने लगता है फलतः अनेकों रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इतनी गहराई और विश्लेषण तक अभी तक नहीं पहुँच पाया है, उन्होंने केवल विटामिन आदि की विवेचना कर अंकुरित अन्न को खाद्य पदार्थ के रूप में दुनिया के सामने परोस दिया जिसका नुकसान जब असंख्य लोग भोग चुके तो फिर इन्हीं वैज्ञानिकों ने इसे हानिप्रद बताना शुरू किया। जबकि वैदिक चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद इसे प्रारम्भ से ही घोर हानिप्रद बता रहा है जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा।

यद्यपि अंकुरित अन्न को खाने के शौकीनों के लिए आधुनिक आहार शास्त्रियों ने उबालकर या हल्का पकाकर खाने की सलाह दी है पर यह कितना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होगा, यह बाद में समझ में आएगा। जो भी हो शास्त्रीय मर्यादा का पालन करते हुए हमें अच्छे सेहत के सन्दर्भ में आज से ही अंकुरित अन्न का त्याग करना चाहिए और इसकी गंभीरता से चर्चा कर अपनों को भी जागरूक करना चाहिए।

(साभार – चिकित्सा पल्लव)

प्रस्तुति सहयोग : श्री रामेश्वर मिश्र पंकज एवं डाक्टर ओम प्रकाश पांडे
✍🏻साभार भारतीय धरोहर

Google AI की जानकारी

अंकुरित अन्न (स्प्राउट्स) स्वास्थ्य को बहुत लाभकारी माना जाता है, लेकिन अगर इनका सेवन सही तरीके से न किया जाए तो इनसे फूड पॉइजनिंग, पेट में गैस, ब्लोटिंग, और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, कच्चे स्प्राउट्स साल्मोनेला (Salmonella) और ई. कोलाई (E. coli) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया के पनपने का मुख्य केंद्र बन सकते हैं।अंकुरित अन्न से होने वाली प्रमुख हानियों और इनसे जुड़ी सावधानियों का विवरण नीचे दिया गया है:

⚠️ प्रमुख हानियां और जोखिम

बैक्टीरियल संक्रमण का खतरा: अंकुरण के लिए गर्म और नम वातावरण की आवश्यकता होती है, जो हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे ई. कोलाई और साल्मोनेला) के पनपने के लिए एकदम सही स्थिति है।

पाचन संबंधी समस्याएं: कच्चे स्प्राउट्स पचने में भारी होते हैं। कमजोर पाचन शक्ति (जठराग्नि) वाले लोगों में यह गैस, पेट फूलना (ब्लोटिंग), और पेट में ऐंठन का कारण बन सकते हैं।

गंभीर खाद्य विषाक्तता: संक्रमित स्प्राउट्स खाने से होने वाली फूड पॉइजनिंग के लक्षण 12 से 72 घंटे के भीतर दिख सकते हैं, जिससे उल्टी और दस्त जैसी समस्या हो सकती है।

कुछ लोगों को अधिक जोखिम: गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) वाले लोगों को कच्चे स्प्राउट्स से जानलेवा संक्रमण का खतरा हो सकता है।

💡 बचाव और सावधानियां

कच्चा खाने से बचें: स्प्राउट्स को कभी भी पूरी तरह से कच्चा नहीं खाना चाहिए। उन्हें हमेशा हल्का भाप में पकाकर (Steam) या सौते (Sauté) करके खाएं।मसालों का उपयोग: पाचन बेहतर बनाने को पकाते समय इसमें अदरक, काली मिर्च और सेंधा नमक जैसे पाचक मसालों को मिलाएं।

अच्छी तरह धोएं: स्प्राउट्स को खाने या पकाने से पहले बहते हुए ताजे पानी में अच्छी तरह धो लें।

सही रखरखाव: स्प्राउट्स को फ्रिज में स्टोर करें और अजीब गंध या चिपचिपे होने पर उनका सेवन बिल्कुल न करें।

CHATGPT  KNOWLEDGE 

Why Does Ayurveda Consider Sprouted Grains Potentially Harmful?
Ayurveda explains that when grains or pulses sprout, their qualities change significantly. According to traditional Ayurvedic principles, sprouted foods can be considered unsuitable for some people and situations because:
They may increase Vata dosha due to their light, dry, and rough qualities, potentially causing gas, bloating, or digestive discomfort.
They can be difficult to digest for individuals with weak digestive fire (Agni), especially when consumed raw.
Excessive consumption may lead to digestive imbalances, particularly in cold weather or in people prone to Vata-related disorders.
Ayurveda generally recommends cooking sprouts lightly with digestive spices such as ginger, cumin, or black pepper rather than eating them raw.
However, Ayurveda does not universally label sprouted grains as “deadly” or harmful. Their suitability depends on a person’s constitution (Prakriti), digestive strength, season, and method of preparation.

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