महात्मा लटूरी सिंह: नाटक से समाजसेवा तक जिनका कोई जवाब नही

इतिहास के पन्नों से गायब ‘महात्मा लटूरी सिंह’

सनातन धर्म में चतुर्मास व्रत चार महीने को होता है। सामान्य रुप से आषाढ़ मास में देवशयन एकादशी से शुरु होता है और कार्तिक माह में देव प्रबोधिनी एकादशी तक चलता है। ये महीने सनातन पौराणिक कथाओं में सबसे पवित्र माने जाते हैं। इस अवधि में अधिकांश धार्मिक व्रत या महत्व की प्रासंगिकता के व्रत देखे जाते हैं। इस समय में श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में लीन रहते हैं इसलिए कोई भी मंगल की मनाही होती है।

पूर्व के समय में लोग इस समय पर खाली रहते थे, विवाह आदि शुभ व मांगलिक कार्य नहीं होते थे, अतः इस समय नाट्य कलाकार नाटकों का मंचन करते थे। मेरठ में एक जमींदार थे चौधरी लटूरी सिंह । भरा-पूरा परिवार, बेटे, बहुएँ थी। परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। उन्हे अभिनय का बड़ा शौक था। हर चौमास वो नाटक मंडली गांव में बुलवाते और नाट्य कलाकारों के साथ खुद भी मंच पर अभिनय करते थे। एक बार उन्होंने नाट्य मंडली बुलवाई और राजा भर्तृहरि का नौ दिन का नाट्य मंचन शुरू हुआ। राजा भर्तृहरि का अभिनय खुद चौधरी लटूरी सिंह कर रहे थे। उनके परिजन भी रोज नाटक देखने जाते थे। आठ दिन का नाट्य समाप्त हो चुका था। आठवें दिन भोजन करते लटूरी सिंह ने अपनी पत्नी से कहा कि कल नाट्य का अंतिम दिन है, तुम नाट्य देखने मत आना। पत्नी ने पूछा कि केवल हमें ही नहीं जाना है कि परिवार का कोई सदस्य नहीं जाएगा। लटूरी सिंह ने कहा, नहीं, और जो लोग जाना चाहे जा सकते हैं परंतु तुम मत आना।

नौवें दिन मंच पर नाट्य शुरू हुआ। लटूरी सिंह के बेटे-बेटियाँ, बहुएँ सभी नाट्य देखने जा चुके थे। पत्नी घर पर अकेली रह गई। रह रह कर सोचती, मन भ्रम में पड़ा हुआ था कि जाएं या न जाएं। कई बार जाने के लिए उठती परंतु मन के किसी कोने से आवाज आती कि पति भी परमेश्वर होता है, आखिर उन्होंने कुछ सोच कर ही मना किया होगा, फिर बैठ जाती। फिर दूसरा मन बोलता अरे नहीं, हमने ऐसा कौन सा पाप किया है। घर के सभी लोग नाटक देखने गए हैं। हमी में ऐसी कौन सी कमी है जो हमको मना कर दिया गया। ग्रामीण कहावत है कि पति की मानने वाली महिलाए तो सतयुग में भी नही थी.   आखिरकार चौधराइन से भी नहीं रहा गया, सोचा, कोई तो बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। फिर क्या था,  चौथराइन ने दरवाजे में कुंडी लगाई और मंच के सामने न जाकर रिश्ते में जेठानी  के घर की छत पर जाकर नाटक देखने लगी।

उधर मंच पर राजा भर्तृहरि के सन्यास लेने का दृश्य चल रहा था। भर्तृहरि बने लट्री सिंह ने राजवस्त्र उतार कर भगवा धारण किया और बोलने लगे कि मैं अपने हृदय में बैठे भगवान शंकर, अग्नि और जल को साक्षी मानकर ये सौगंध लेता हूँ कि इसी वक्त से हर तरह की संपत्ति, राज्य सिंहासन आदि से त्याग करता हूँ। मेरी कोई संपत्ति नहीं है, मेरा कोई बेटा नहीं है, मेरी कोई बेटी नहीं है, मेरी कोई पत्नी नहीं है। यहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ मेरी मां हैं। तभी लटूरी सिंह की भाभी छत से चिल्लाई, ओय लट्री तेरी लुगाई इधर बैठी है। सब लोग हसने लगे। नाट्य की समाप्ति के बाद सभी कलाकारों ने अपने वस्त्र बदले लेकिन लटूरी सिंह भगवा वस्त्र ही धारण किए रहे। उन्होंने अभिनय के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला भिक्षा पात्र उठाया और सीधा अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे। आवाज़ लगाई भिक्षा दो माता। भीतर से पत्नी निकल कर आई, ओ आपने वस्त्र नहीं बदले। भीतर आइए, वस्त्र बदलिए, तबतक मैं भोजन लगा देती हूँ।

मैंने तुम्हें वहाँ आने से मना किया था क्योंकि जब मैं अभिनय करता हूँ तो मेरे स्वयं उपस्थित होते हैं। आज से तुम मेरी माता समान हो और मैंने सन्यास ले लिया है।

 

#उज्जैन के हमारे महान राजा हुए हैं भर्तृहरि जी , उन्होंने गुरु गोरखनाथ जी के सानिध्य में राज्य और संपत्ति त्याग कर सन्यास धारण किया। उन्होंने संस्कृत में कई उपदेश कहानियां लिखी और #भर्तृहरि के नाम से प्रसिद्ध हुए। नीतिशतक, श्रृंगारशतक, वैराग्यशतक उनकी ही लिखी हुई संस्कृत कृतियाँ हैं। पहले गांवों में उनके जीवन पर कई सारे नाट्य किए जाते थे , सांग पिंगला भरथरी तो बहुत प्रसिद्ध है !

मेरठ में एक जमींदार हुए हैं, चौधरी लटूरी सिंह। उनको अभिनय का बड़ा शौक था। हर चौमास वो नाटक मंडली गांव में बुलवाते और नाट्य #कलाकारों के साथ खुद भी मंच पर अभिनय करते। एक बार उन्होने नाट्य मंडली बुलवाई और राजा भर्तृहरी का नौ दिन का नाट्य मंचन शुरु हुआ।
राजा भर्तृहरि का अभिनय खुद #चौधरी लटूरी सिंह कर रहे थे। आठ दिन का नाट्य समाप्त हो चुका था। आठवें दिन घर पर भोजन करते हुए लटूरी सिंह ने अपनी पत्नी से कहा कि कल नाट्य का अंतिम दिन है, तुम नाट्य देखने मत आना।

नौंवें दिन मंच पर नाट्य शुरू हुआ। लटूरी सिंह के बेटे बेटिंयाँ बहुएं सभी नाट्य देखने जा चुके थे। पत्नी घर पर अकेली रह गई। रह रह कर मन में संदेह के बादल घुमड़ने लगते। आखिर मुझे मंच पर आने से क्यों रोका, कोई तो बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है।
पति मना करे और पत्नी मान जाए ऐसी पत्नियाँ तो #रामायण काल में भी न थी तो चौधराइन ने दरवाजे में कुंडी लगाई और मंच के सामने न जाकर रिश्ते में जेठानी लगने वाली महिला के घर की छत पर जाकर नाट्य देखने लगी। उधर मंच पर राजा भरथरी के सन्यास लेने का दृश्य चल रहा था।

#भरथरी बने लटूरी सिंह ने राज वस्त्र उतार कर भगवा धारण किया और डॉयलॉग बोलने लगे, ” मैं अपने हृदय में बसे भगवान #शंकर, अग्नि और जल को साक्षी मानकर ये सौगंध लेता हूँ कि इसी वक्त से हर तरह की संपत्ति, राज्य, सिंहासन आदि का त्याग करता हूँ। मेरी कोई सम्पत्ति नहीं है, मेरा कोई बेटा नहीं, मेरी कोई बेटी नहीं है, मेरी कोई पत्नी नहीं है। यहां उपस्थित सभी स्त्रियाँ मेरी मां है।

तभी लटूरी सिंह की भाभी छत से चिल्लाई, ओए लटूरी तेरी लुगाई इधर बैठी है। सब लोग हंसने लगे। नाट्य की समाप्ति के बाद सभी कलाकारों ने अपने वस्त्र चेंज किए लेकिन लटूरी सिंह #भगवा ही धारण किए रहे। उन्होने अभिनय के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला भिक्षा पात्र उठाया औऱ सीधा अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे। आवाज़ लगाई, #भिक्षा दो माता। भीतर से पत्नी निकल कर आई, अरे अभी तक आपने वस्त्र नही बदले। भीतर आइए, वस्त्र बदलिए तब तक मैं भोजन लगा देती हूँ।
लटूरी सिंह बोले, *मैंने तुम्हें वहाँ आने से मना किया था क्योंकि जब मैं अभिनय करता हूँ तो मेरे भीतर शंकर स्वयं उपस्थित होते हैं।* आज से तुम मेरी माता समान हो और मैंने संन्यास ले लिया है।
पत्नी रोने लगी , बच्चों ने मनाने का प्रयास किया मगर वो असफल रहे। चौधरी लटूरी सिंह ने गृहस्थ का त्याग कर दिया औऱ #महात्मा लटूरी सिंह के नाम से जाने गए। उनका नाम आर्य समाज के बड़े और अग्रणी प्रवाचकों में लिया जाता है।

#मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाज़ियाबाद, बुलंदशहर में चालीस से ज्यादा इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज, आईटीआई कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल उनके बनवाये हुए हैं।
वहाँ प्रवेश द्वार पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है, इस कॉलेज का निर्माण #महात्मा लटूरी सिंह जी ने करवाया है। महात्मा लटूरी सिंह हिन्दू थे, योगी थे, सन्यासी थे और वो जीवन भर स्कूल बनवाते रहे। उन्होंने कभी किसी #मंदिर के सामने बैठकर ये नहीं किया कि इस मंदिर के बजाय स्कूल बनना चाहिए था। उन्होंने सरकार को नहीं कोसा बल्कि वो उठे और उन्होंने अपनी संपत्ति से भिक्षा से दान से स्कूल बनवाये। है कोई एक उदाहरण जिसमे दिन रात स्कूल का रोना रोने वाले किसी ढपलीबाज़ वामपंथी या किसी स्यूडो फेमिनिस्ट ने अपनी सम्पत्ति बेचकर या चंदे से एक प्राईमरी स्कूल भी बनवाया हो…??

उधर मंच पर राजा भर्तृहरि के सन्यास लेने का दृश्य चल रहा था। भर्तृहरि बने लटूरी सिंह ने राजवस्त्र उतार कर भगवा धारण किया और बोलने लगे कि मैं अपने हृदय में बैठे भगवान शंकर, अग्नि और जल को साक्षी मानकर ये सौगंध लेता हूँ कि इसी वक्त से हर तरह की संपति, राज्य सिंहासन आदि से त्याग करता हूँ। मेरी कोई संपत्ति नहीं है, मेरा कोई बेटा नहीं है, मेरी कोई बेटी नहीं है, मेरी कोई पत्नी नहीं है। यहाँ उपस्थित सभी स्त्रियों मेरी मां हैं। तभी लटूरी सिंह की भाभी छत से चिल्लाई, ओय लटूरी तेरी लुगाई इधर बैठी है। सब लोग हसने लगे। नाट्य की समाप्ति के बाद सभी कलाकारों ने अपने वस्त्र बदले लेकिन लटूरी सिंह भगवा वस्त्र ही धारण किए रहे। उन्होंने अभिनय के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला भिक्षा पात्र उठाया और सीधा अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे। आवाज़ लगाई भिक्षा दो माता। भीतर से पत्नी निकल कर आई, अरे अभई तक आपने वस्त्र नहीं बदले। भीतर आइए, वस्त्र बदलिए, तबतक मैं भोजन लगा देती हूँ।

मैंने तुम्हें वहाँ आने से मना किया था क्योंकि जब मैं अभिनय करता हूँ तो मेरे भीतर शंकर स्वयं उपस्थित होते हैं। आज से तुम मेरी माता समान हो और मैंने सन्यास ले लिया है। पत्नी रोने लगी, बच्चों ने मनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वो असफल रहे। चौधरी लटूरी सिंह ने गृहस्थ का त्याग कर दिया और महात्मा लटूरी सिंह के नाम से जाने गए। उनका नाम आर्य समाज के बड़े और अग्रणी प्रचारकों में लिया जाता है।

मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाज़ियाबाद, बुलंदशहर में चालीस से ज्यादा इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज, आईटीआई कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कालेज चौधरी लटूरी सिंह जी द्वारा बनवाये हुए हैं। वहाँ प्रवेश ‌द्वार पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है, इस कॉलेज का निर्माण महात्मा लटूरी सिंह जी ने करवाया है।

महात्मा लटूरी सिंह हिन्दू थे, योगी थे, सन्यासी थे और वो जीवन भर स्कूल बनवाते रहे। उन्होंने सरकार को नही कोसा बल्कि वो उठे और उन्होंने अपनी संपत्ति से, भिक्षा से, दान से स्कूल बनवाये। बाबा गोस्वामी जी महाराज दशरथ के लिए लिखते है कि रघुकुल रीत सदा चल आई, प्राण जाय पर वचन न जाई। परंतु नाट्य मंचन के दौरान दिये गए वचन का भी पालन करने वाले महात्मा लटूरी सिंह जी को शत शत नमन, वंदन।

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