कितनी ‘फास्ट’ हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट? जानें पेपर लीक के मामलों में अब कितनी जल्दी होगा न्याय?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को बताया कि पेपर लीक से जुड़े मामलों में दोषियों को जल्द सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट्स बनाई जाएंगी. लेकिन क्या वाकई फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ‘फास्ट’ होती हैं? जानते हैं.
देश में 880 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं.
नई दिल्ली 26 जुलाई 2026। पेपर लीक से जुड़े मामलों का निपटारा अब फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगा.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को स्वयं यह घोषणा की. उन्होंने कहा कि पेपर लीक मामलों में शामिल लोगों को जल्दी और कठोर सजा देने को फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने का फैसला लिया है.उन्होंने बताया कि इसे लेकर निर्देश जारी कर दिए हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने X पर पोस्ट करते हुए बताया कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सरकार की प्राथमिकता है.उन्होंने साफ कर दिया कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई होगी और उन्हें किसी भी कीमत पर क्षमा नहीं किया जाएगा.
फास्ट ट्रैक कोर्ट्स को बनाने का उद्देश्य मर्डर,किडनैपिंग और रेप जैसे जघन्य अपराधों के ट्रायल को शुरू किया गया था, लेकिन अब पेपर लीक से जुड़े मामलों का ट्रायल भी ऐसी अदालतों में चलेगा.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द कठोर दंड देने और केस के जल्द निपटारे को फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा.
क्या होती हैं फास्ट ट्रैक अदालतें?
केंद्र सरकार के अनुसार,मजबूत कानून के बावजूद देश भर की अलग-अलग अदालतों में रेप और POCSO एक्ट के कई मामले पेंडिंग हैं.कड़ी सजा का उद्देश्य लोगों में डर पैदा करना है लेकिन यह तभी हो सकता है जब ट्रायल तय समय पर पूरा हो और पीड़ितों को जल्द न्याय मिले.
सबसे पहले 11वें वित्त आयोग ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश की थी.पहली बार साल 2000 में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनी थी.
इसके बाद 14वें वित्त आयोग ने 2015-2020 में देशभर में 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स (FTC) बनाने की सिफारिश की.इनका उद्देश्य गंभीर अपराधों,महिलाओं,बच्चों,वृद्धों, दिव्यांगों और 5 साल से ज्यादा पेंडिंग संपत्ति से जुड़े मामलों की तेजी से सुनवाई करना था.वित्त आयोग ने राज्य सरकारों से अनुरोध किया था कि वे टैक्स से मिलने वाले ज्यादा फंड का इस्तेमाल इस काम में करें.
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO से जुड़े मामलों के जल्द से जल्द निपटारे करने का निर्देश दिया. इसके बाद केंद्र सरकार फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) बनाने की स्कीम शुरू की, जिसमें रेप और POCSO से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे को देशभर में स्पेशल कोर्ट्स बनाए गए.
इस स्कीम में ऐसे मामलों के ट्रायल के लिए FTSC बनाने को केंद्र सरकार राज्यों की मदद करती है. स्कीम में FTSC बनाने के लिए केंद्र सरकार 60% पैसा देती है,जबकि बाकी का 40% राज्यों को लगाना होता है.
तो कितनी अदालतें हैं ऐसी?
देश भर में कितनी FTC और FTSC हैं? इसे लेकर केंद्र सरकार ने संसद में कुछ आंकड़े दिए थे.27 मार्च 2026 को लोकसभा में कानून मंत्रालय ने बताया था कि 31 जनवरी 2026 तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 862 फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं.सबसे ज्यादा 373 FTC उत्तर प्रदेश में हैं.दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है, जहां 105 ऐसी अदालतें हैं.
कानून मंत्रालय ने यह भी साफ किया था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई वित्तीय मदद नहीं दी जाती है. सिर्फ FTSC को ही केंद्र सरकार मदद करती है.
लोकसभा में दिए जवाब के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 774 FTSC हैं. इनमें से 398 सिर्फ POCSO केस के ट्रायल को हैं. सबसे ज्यादा 218 FTSC उत्तर प्रदेश में हैं. दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां 67 FTSC हैं.
क्या वाकई ‘फास्ट’ हैं यें कोर्ट्स?
आमतौर पर सामान्य अदालतों में ट्रायल खत्म होने और सजा मिलने में सालों लग जाते हैं. लेकिन FTC और FTSC को बनाने का उद्देश्य यही था कि शीघ्रातिशीघ्र ट्रायल हो और दोषियों को सजा मिले.ऐसी अदालतों में केस आने पर 6 महीने से 1 साल तक फैसला सुना दिया जाता है.
5 फरवरी 2026 को कानून मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि 2023, 2024 और 2025 यानी तीन साल में FTC में 40.26 लाख मामले निपटाये गये.इन्हीं तीन सालों में FTSC में 2.28 लाख से ज्यादा केस निपटाए गए.
इन अदालतों में काफी जल्दी मामलों का निपटारा होता है. केंद्र सरकार के मुताबिक, 2024 में रेप और POCSO से जुड़े मामलों के लिए बनी FTSC में डिस्पोजल रेट 96% से ज्यादा है.सरकार के अनुसार, अकेले 2024 में FTSC में 88,902 नए मामले सामने आए थे,जिनमें से 85,595 मामलों का निपटारा कर दिया गया.इसका मतलब हुआ कि FTSC में सालभर में जितने केस आते हैं,उनमें से 96% का ट्रायल सालभर में समाप्त किया गया.
केंद्र सरकार के अनुसार,FTSC में रेप और POCSO से जुड़े मामलों के निपटारे की औसत दर सामान्य अदालतों की तुलना में 3 गुना ज्यादा है.एक सामान्य अदालत में हर माह औसतन 3.3 मामलों का ही निपटारा हो पाता है तो वहीं हर FTSC में हर महीने 9.51 केस निपटते हैं.
हालांकि,इसके बावजूद कई बार कुछ मामलों के निपटारे में काफी वक्त भी लग जाता है.केंद्र सरकार ने संसद में माना था कि केस के निपटारे में देरी के कई कारण हैं. इनमें फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी,केस का अधिक उलझाव,पुलिस की जांच सही से न होना,फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी और केस से जुड़े लोगों का सहयोग न मिल पाना शामिल है.
सरकार को हर FTSC से हर तिमाही में 41 से 42 मामलों और वार्षिक कम से कम 165 मामलों का निपटारे की उम्मीद है.

