उत्तराखंड यूसीसी और प्रस्तावित महाराष्ट्र यूसीसी क्या समान हैं? अंतर आस्था में उत्पन्न बच्चों की आस्था कैसे तय होगी?

जी। सबसे पहले एक महत्वपूर्ण सावधानी: अगस्त 2026 तक उत्तराखंड का UCC लागू कानून है, जबकि महाराष्ट्र का UCC अभी प्रस्ताव/मसौदा-निर्माण के चरण में है। इसलिए दोनों के बीच आज की तारीख में “कानूनी प्रावधानों” का पूर्ण तुलनात्मक अंतर बताना संभव नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2026 में पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में सात-सदस्यीय समिति बनाई है, जिसे छह महीने में मसौदा/सिफारिशें देनी हैं। �
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मुख्य अंतर
विषय
उत्तराखंड UCC
महाराष्ट्र का प्रस्तावित UCC
स्थिति
कानून बन चुका और 27 जनवरी 2025 से लागू
अभी मसौदा तैयार हो रहा है
मसौदे का आधार
जस्टिस रंजना देसाई समिति की सिफारिशों पर आधारित
विडंबना यह कि वही जस्टिस रंजना देसाई महाराष्ट्र समिति की अध्यक्ष हैं
विवाह
सभी समुदायों के लिए समान नियम और विवाह पंजीकरण
विवाह संबंधी समान नियम प्रस्तावित, लेकिन अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं
बहुविवाह
प्रतिबंधित
सरकार की ओर से इस पर स्पष्ट संकेत/चर्चा हुई है, लेकिन अंतिम प्रावधान अभी सामने नहीं
तलाक
सभी समुदायों के लिए समान आधार और न्यायिक प्रक्रिया
समान व्यवस्था की संभावना, पर अंतिम मसौदा लंबित
उत्तराधिकार
धर्म-आधारित अलग-अलग उत्तराधिकार व्यवस्था को हटाकर समान व्यवस्था
समान उत्तराधिकार प्रस्तावित होने की संभावना, पर अभी कोई अंतिम प्रावधान नहीं
हिंदू संयुक्त परिवार/पैतृक संपत्ति
Coparcenary व्यवस्था समाप्त की गई; उत्तराधिकार को समान ढांचे में लाया गया
महाराष्ट्र में ऐसा प्रावधान होगा या नहीं, अभी स्पष्ट नहीं
लिव-इन संबंध
विशेष और विस्तृत व्यवस्था; पंजीकरण अनिवार्य
महाराष्ट्र के प्रस्ताव में इसका स्वरूप अभी अज्ञात
लिव-इन से जन्मे बच्चे
वैधता और उत्तराधिकार संबंधी संरक्षण
अंतिम प्रावधान अभी नहीं
दत्तक ग्रहण
UCC के दायरे में व्यवस्था
महाराष्ट्र में क्या अलग व्यवस्था होगी, मसौदे के बाद स्पष्ट होगा
पंजीकरण का डिजिटल ढांचा
विवाह, तलाक, लिव-इन, उत्तराधिकार, वसीयत आदि के लिए सरकारी पोर्टल
अभी ऐसा लागू ढांचा नहीं
दंडात्मक प्रावधान
कुछ उल्लंघनों, जैसे लिव-इन पंजीकरण न कराने आदि पर दंड
अंतिम दंड व्यवस्था अभी अज्ञात
उत्तराखंड के UCC में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और succession को एक समान ढांचे में रखा गया है। सरकारी पोर्टल पर विवाह, तलाक, लिव-इन, legal-heir declaration और Will registration की सेवाएँ भी संचालित हैं। �
UCC Uttarakhand +1
सबसे बड़ा वास्तविक अंतर: लिव-इन संबंध
यह उत्तराखंड मॉडल की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है। उत्तराखंड में लिव-इन संबंध का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है और उसके लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था बनाई गई है। सरकारी पोर्टल पर इसके लिए आवेदन, termination और संबंधित प्रक्रियाएँ उपलब्ध हैं। �
UCC Uttarakhand +1
महाराष्ट्र में अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उत्तराखंड जैसी अनिवार्यता होगी। समिति को ही इसका स्वरूप तय करना है।
दूसरा बड़ा अंतर: हिंदू Coparcenary
उत्तराखंड UCC ने हिंदू कानून की पारंपरिक coparcenary/संयुक्त पैतृक संपत्ति व्यवस्था को समाप्त करके सभी व्यक्तियों के लिए समान succession व्यवस्था अपनाई है। यह उत्तराखंड मॉडल का काफी महत्वपूर्ण और कम चर्चित परिवर्तन है। �
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महाराष्ट्र का प्रस्तावित कानून इस व्यवस्था को जस का तस रखेगा, बदलेगा या कोई नया मॉडल बनाएगा—अभी पता नहीं है।
एक दिलचस्प तथ्य
महाराष्ट्र का UCC उत्तराखंड की नकल मात्र होगा, ऐसा अभी कहना उचित नहीं होगा। हालांकि महाराष्ट्र समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई वही हैं जिन्होंने उत्तराखंड UCC तैयार करने वाली समिति का नेतृत्व किया था, इसलिए उत्तराखंड मॉडल का प्रभाव निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। �
The Indian Express
अतः आज की तारीख में सबसे सटीक निष्कर्ष यह है:
उत्तराखंड = लागू और विस्तृत UCC; महाराष्ट्र = उसी दिशा में बढ़ता हुआ, लेकिन अभी अंतिम मसौदा भी सामने नहीं आया। इसलिए वास्तविक “महाराष्ट्र बनाम उत्तराखंड” प्रावधानगत तुलना महाराष्ट्र का ड्राफ्ट आने के बाद ही निर्णायक रूप से की जा सकेगी।
यदि आप चाहें तो मैं अगला चरण और उपयोगी बना सकता हूँ—�⁠उत्तराखंड UCC के 20–25 सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान निकालकर, उनके सामने “महाराष्ट्र में क्या हो सकता है/क्या बदल सकता है” की एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका बना दूँ।

 

 

 

 

 

 

 

जी। मैंने वर्तमान आधिकारिक दस्तावेजों को देखकर इसे थोड़ा अधिक सटीक रूप में तैयार किया है। एक महत्वपूर्ण सुधार भी है: उत्तराखंड UCC में “दत्तक ग्रहण” को अलग से substantive chapter के रूप में नियंत्रित नहीं किया गया है; आधिकारिक अधिनियम का मुख्य दायरा विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंध है।

उत्तराखंड UCC बनाम प्रस्तावित महाराष्ट्र UCC — 25 महत्वपूर्ण बिंदु

क्र. विषय उत्तराखंड UCC में स्थिति महाराष्ट्र में स्थिति

1 कानूनी स्थिति UCC Act 2024 + Rules 2025 लागू अभी समिति/मसौदा चरण
2 लागू क्षेत्र उत्तराखंड और कुछ परिस्थितियों में राज्य के बाहर रहने वाले उत्तराखंड निवासी अभी तय होना बाकी
3 विवाह सभी लागू समुदायों के लिए समान वैधानिक ढांचा समान व्यवस्था प्रस्तावित, अंतिम रूप बाकी
4 एक से अधिक विवाह UCC के बाद वैध नहीं अंतिम प्रावधान अभी अज्ञात
5 विवाह की न्यूनतम आयु पुरुष 21, महिला 18 अंतिम नियम बाकी
6 विवाह पंजीकरण व्यापक अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था महाराष्ट्र में स्वरूप अभी तय नहीं
7 विवाह की पुरानी तारीखें पुराने विवाहों के लिए भी अलग registration/acknowledgement व्यवस्था अभी अज्ञात
8 तलाक समान वैधानिक आधार/प्रक्रिया मसौदा आने पर स्पष्ट
9 तलाक की धार्मिक व्यक्तिगत व्यवस्था UCC के दायरे में समान नियम अभी तय नहीं
10 उत्तराधिकार धर्म-आधारित अलग-अलग succession व्यवस्था को समान ढांचे में लाया गया अंतिम मॉडल अज्ञात
11 पैतृक संपत्ति उत्तराधिकार में समानता पर जोर क्या उत्तराखंड जैसा मॉडल होगा, अज्ञात
12 वसीयत Registration की विस्तृत व्यवस्था अभी अज्ञात
13 बिना वसीयत मृत्यु Legal-heir declaration की व्यवस्था अभी अज्ञात
14 महिला का उत्तराधिकार पुत्र और पुत्री के बीच समानता का ढांचा अंतिम प्रावधान बाकी
15 विधवा/विधुर उत्तराधिकार व्यवस्था में समान सिद्धांत अभी अज्ञात
16 लिव-इन रिलेशनशिप विशेष रूप से विनियमित महाराष्ट्र में सबसे महत्वपूर्ण संभावित विवादित विषयों में से एक
17 लिव-इन registration अनिवार्य व्यवस्था अभी पता नहीं कि अनिवार्य होगा या नहीं
18 लिव-इन समाप्त करना Termination registration की व्यवस्था अभी अज्ञात
19 लिव-इन से जन्मा बच्चा बच्चे को वैधानिक संरक्षण महाराष्ट्र का अंतिम मॉडल अज्ञात
20 लिव-इन में maintenance/custody Rules में संबंधित अधिकारों की व्यवस्था अभी अज्ञात
21 माता-पिता को सूचना कुछ परिस्थितियों में सूचना संबंधी व्यवस्था महाराष्ट्र में अंतिम प्रावधान बाकी
22 पुलिस की भूमिका Registration प्रक्रिया में सामान्यतः पुलिस की अनुमति आवश्यक नहीं अभी अज्ञात
23 निजी कानूनों का प्रभाव UCC के विषयों में overriding effect महाराष्ट्र में अंतिम कानून बताएगा
24 Scheduled Tribes संविधान के तहत ST समुदायों को UCC से बाहर रखा गया है महाराष्ट्र में भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण होगा
25 Digital administration Marriage, divorce, live-in, legal heirs, Will आदि के लिए ऑनलाइन सरकारी प्रणाली महाराष्ट्र में भविष्य में समान/अलग मॉडल संभव

उत्तराखंड के आधिकारिक पोर्टल पर आज विवाह, तलाक/नलिटी, लिव-इन, legal-heir declaration और Will जैसी अलग-अलग सेवाएँ उपलब्ध हैं।

तीन सबसे महत्वपूर्ण संभावित अंतर

1. महाराष्ट्र “उत्तराखंड मॉडल” को कितना अपनाएगा?
महाराष्ट्र के लिए यह सबसे बड़ा प्रश्न है। विशेषकर लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण, जो उत्तराखंड UCC की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में है। उत्तराखंड के Rules में इसके लिए पूरा प्रशासनिक ढांचा है।

2. उत्तराधिकार में कितना बदलाव होगा?
उत्तराखंड ने succession को UCC का केंद्रीय हिस्सा बनाया है। इसलिए महाराष्ट्र का मसौदा यदि उत्तराखंड से अलग होगा, तो पैतृक संपत्ति, पुत्र-पुत्री के अधिकार, विधवा/विधुर तथा Will के बाद संपत्ति वितरण इसके प्रमुख क्षेत्र होंगे।

3. पुराने विवाह और पुराने उत्तराधिकार मामलों का क्या होगा?
उत्तराखंड ने transitional व्यवस्था बनाई है। उदाहरण के लिए पुराने विवाहों के registration/acknowledgement और पुराने customary divorce/nullity के लिए भी प्रक्रियाएँ हैं। महाराष्ट्र में ऐसी retrospective/transitional व्यवस्था होगी या नहीं, यह बहुत महत्वपूर्ण होगा।

एक और महत्वपूर्ण बात

उत्तराखंड UCC पूरी तरह “सभी निजी कानूनों को खत्म” नहीं करता। अधिनियम का घोषित दायरा मुख्यतः marriage, divorce, succession और live-in relationships तथा उनसे संबंधित विषयों तक है; साथ ही Scheduled Tribes को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।

और उत्तराखंड का मॉडल स्थिर भी नहीं है—2025 और 2026 में इसमें संशोधन/अध्यादेश हुए हैं। आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड में 2026 का Amendment Act भी दर्ज है।

मेरी राय में अगला सबसे उपयोगी कदम होगा: मैं उत्तराखंड UCC की धारा-दर-धारा (Section-wise) 15–20 प्रमुख धाराएँ निकालकर बताऊँ कि महाराष्ट्र समिति के सामने इनमें से कौन-कौन से मुद्दे सबसे बड़ा कानूनी/सामाजिक विवाद पैदा कर सकते हैं—विशेषकर बहुविवाह, मुस्लिम तलाक, मेहर, इद्दत, हलाला, उत्तराधिकार, संयुक्त हिंदू परिवार और लिव-इन के संदर्भ में।

जी। अब इसे धारा-दर-धारा और विवादित मुद्दों के हिसाब से देखना ज्यादा उपयोगी होगा। एक बात पहले स्पष्ट कर दूँ: महाराष्ट्र का अंतिम UCC अभी बना नहीं है। 9 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति बनाई है और उसे छह महीने में रिपोर्ट/मसौदा तैयार करना है; सरकार ने शीतकालीन सत्र में विधेयक लाने का लक्ष्य बताया है। इसलिए नीचे महाराष्ट्र के सामने “संभावित विकल्प” हैं, अंतिम कानूनी प्रावधान नहीं। �
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1. बहुविवाह — सबसे बड़ा परीक्षण
उत्तराखंड: UCC के विवाह संबंधी प्रावधानों में विवाह के लिए एक-पति/एक-पत्नी वाला समान ढांचा बनाया गया है। यानी धार्मिक व्यक्तिगत कानून के आधार पर बहुविवाह की अलग अनुमति नहीं रहती। UCC का मूल उद्देश्य ही विवाह और तलाक के लिए समान कानून बनाना है। �
UCC Uttarakhand
महाराष्ट्र: सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या वह उत्तराखंड की तरह स्पष्ट निषेध अपनाता है। महाराष्ट्र समिति में जस्टिस रंजना देसाई होने के कारण उत्तराखंड मॉडल का प्रभाव पड़ने की संभावना स्वाभाविक है, लेकिन इसे अभी अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। �
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2. मुस्लिम तलाक, इद्दत, मेहर और हलाला
यह वह क्षेत्र है जहां UCC का वास्तविक अर्थ सबसे ज्यादा दिखाई देगा।
उत्तराखंड ने अलग-अलग धार्मिक personal laws के स्थान पर विवाह और तलाक का समान statutory framework बनाया है। इसका अर्थ है कि मुस्लिम विवाह अब केवल मुस्लिम Personal Law के आधार पर संचालित नहीं होगा, बल्कि UCC के विवाह-विच्छेद संबंधी नियम लागू होंगे। �
UCC Uttarakhand
इसलिए महाराष्ट्र में महत्वपूर्ण सवाल होंगे:
क्या मेहर को वैवाहिक अधिकार के रूप में अलग रखा जाएगा?
क्या इद्दत की अलग कानूनी अवधि रहेगी?
क्या हलाला की कोई भूमिका रहेगी?
क्या तलाक के लिए मुस्लिम Personal Law के अलग आधार समाप्त होंगे?
अभी महाराष्ट्र के बारे में इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर उपलब्ध नहीं है।
3. उत्तराधिकार — शायद सबसे बड़ा कानूनी बदलाव
उत्तराखंड UCC का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा intestate succession यानी बिना वसीयत मृत्यु के बाद संपत्ति का वितरण है। Act में succession को धर्म-विशेष के अलग-अलग personal laws से हटाकर एक समान statutory framework में रखा गया है। �
UCC Uttarakhand
सरकारी पोर्टल पर इसके लिए बाकायदा “Intestate Succession—Declaration of Legal Heirs” सेवा है। �
UCC Uttarakhand
इससे महाराष्ट्र में ये प्रश्न निर्णायक होंगे:
क्या पुत्र और पुत्री को समान हिस्सा मिलेगा?
क्या पति और पत्नी के अधिकार समान होंगे?
क्या मुस्लिम उत्तराधिकार के अलग हिस्से समाप्त होंगे?
क्या Christian/Parsi succession के अलग नियम समाप्त होंगे?
महाराष्ट्र का अंतिम उत्तर इन्हीं बिंदुओं पर UCC की वास्तविक प्रकृति तय करेगा।
4. हिन्दू संयुक्त परिवार और Coparcenary
यह विषय विशेष ध्यान देने योग्य है।
UCC लागू करने का अर्थ केवल मुस्लिम Personal Law में परिवर्तन नहीं है। यदि महाराष्ट्र वास्तव में uniform succession law बनाता है, तो उसे यह भी तय करना पड़ेगा कि पारंपरिक Hindu coparcenary/संयुक्त परिवार की संपत्ति को किस रूप में रखा जाए।
अर्थात महाराष्ट्र के लिए बड़ा प्रश्न होगा:
क्या Mitakshara आधारित coparcenary व्यवस्था बनी रहेगी, या सभी नागरिकों के लिए एक समान succession/property-share व्यवस्था होगी?
उत्तराखंड मॉडल से महाराष्ट्र के लिए यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न है।
5. लिव-इन रिलेशनशिप — उत्तराखंड की सबसे विशिष्ट व्यवस्था
यह शायद दोनों राज्यों के संभावित UCC में सबसे बड़ा अंतर पैदा कर सकता है।
उत्तराखंड UCC में live-in relationship को बाकायदा कानून में शामिल किया गया है। Registration, termination और उससे जुड़े अधिकारों के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था है। �
UCC Uttarakhand +1
यहां तक कि उत्तराखंड के Rules में:
registration,
termination,
maintenance/custody,
बच्चे की legitimacy,
कुछ परिस्थितियों में parents को सूचना,
false information और non-compliance पर consequences
जैसे प्रश्नों को संबोधित किया गया है। �
UCC Uttarakhand
महाराष्ट्र के लिए सबसे बड़ा सवाल:
क्या वह भी उत्तराखंड की तरह live-in registration को अनिवार्य करेगा?
इसका उत्तर अभी नहीं आया है।
6. लिव-इन से पैदा बच्चे
उत्तराखंड UCC में “child” की परिभाषा में biological child के साथ adopted child, illegitimate child और surrogacy/assisted reproductive technology से जन्मे बच्चे को भी शामिल किया गया है। �
UCC Uttarakhand
इसका सामाजिक महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि UCC केवल दंपती के अधिकार नहीं देखता, बल्कि बच्चे के वैधानिक संरक्षण और उत्तराधिकार को भी प्रभावित करता है।
महाराष्ट्र को भी इसी प्रश्न पर स्पष्ट कानून बनाना पड़ेगा।
7. वसीयत — उत्तराखंड का अलग प्रशासनिक मॉडल
उत्तराखंड में Will registration, Codicil, Will revocation आदि के लिए अलग व्यवस्था है। सरकारी पोर्टल पर इन सेवाओं के लिए अलग-अलग आवेदन उपलब्ध हैं। �
UCC Uttarakhand +1
महाराष्ट्र चाहे तो:
A. उत्तराखंड मॉडल अपना सकता है, या
B. केवल substantive succession law बनाए रखकर Will registration को मौजूदा Registration framework पर छोड़ सकता है।
यह भी अंतिम मसौदे का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
8. सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अपवाद — Scheduled Tribes
उत्तराखंड UCC की धारा 2 स्पष्ट करती है कि यह Code Scheduled Tribes पर लागू नहीं होता तथा संविधान के Part XXI द्वारा संरक्षित कुछ customary rights को भी संरक्षण मिलता है। �
UCC Uttarakhand
महाराष्ट्र में यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो सकता है क्योंकि राज्य में पर्याप्त आदिवासी आबादी और विभिन्न customary practices हैं।
इसलिए महाराष्ट्र UCC में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि:
क्या ST को उत्तराखंड की तरह blanket exemption मिलेगा, या महाराष्ट्र कोई अलग मॉडल बनाएगा?
9. पुराने विवाह और पुराने मामले
उत्तराखंड ने केवल नए विवाहों पर कानून नहीं छोड़ा है। Rules में पुराने विवाहों के registration/acknowledgement तथा UCC लागू होने से पहले के divorce/nullity orders के registration की भी व्यवस्था है। �
UCC Uttarakhand
महाराष्ट्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण transitional question होगा:
UCC लागू होने से पहले हुए लाखों विवाहों पर नया कानून किस सीमा तक लागू होगा?
10. प्रशासनिक ढांचा
उत्तराखंड में UCC केवल एक कानून नहीं बल्कि एक digital administrative system भी है।
वर्तमान सरकारी पोर्टल पर विवाह registration, divorce/nullity, live-in registration/termination, legal-heir declaration, Will और appeals जैसी सेवाएँ उपलब्ध हैं। �
UCC Uttarakhand
इसलिए महाराष्ट्र को केवल Bill पास करना पर्याप्त नहीं होगा; उसे:
Registrar व्यवस्था,
digital records,
appeals,
verification,
privacy/data protection,
penalties
का पूरा ढांचा बनाना होगा।
निष्कर्ष: असली तुलना इन 7 मुद्दों पर होगी
अगर महाराष्ट्र का मसौदा सामने आता है तो मैं सबसे पहले इन 7 बिंदुओं पर उसे उत्तराखंड से मिलाऊँगा:
प्राथमिकता
मुद्दा
महत्व
1
बहुविवाह
⭐⭐⭐⭐⭐
2
मुस्लिम तलाक/इद्दत/मेहर/हलाला
⭐⭐⭐⭐⭐
3
उत्तराधिकार में धार्मिक हिस्सों का अंत
⭐⭐⭐⭐⭐
4
Hindu coparcenary/संयुक्त परिवार
⭐⭐⭐⭐⭐
5
Live-in registration
⭐⭐⭐⭐⭐
6
ST/customary law exemption
⭐⭐⭐⭐
7
पुराने विवाह/पुराने उत्तराधिकार मामलों पर प्रभाव
⭐⭐⭐⭐
और एक खास बात: महाराष्ट्र समिति की अध्यक्ष वही जस्टिस रंजना देसाई हैं जिन्होंने उत्तराखंड UCC समिति का नेतृत्व किया था। इसलिए महाराष्ट्र के अंतिम मसौदे में उत्तराखंड की संरचना के कितने हिस्से आते हैं, यह देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा। �
The Indian Express +1
यदि आप चाहें तो अगला चरण मैं और भी उपयोगी बना सकता हूँ: �⁠उत्तराखंड UCC में मुस्लिम Personal Law के कौन-कौन से प्रचलित अधिकार/प्रथाएँ समाप्त या परिवर्तित हुईं—मेहर, इद्दत, तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह और विरासत—इन सभी की “पहले क्या था → UCC में क्या हुआ” वाली तालिका।

जी। इस तुलना में एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी है: “तीन तलाक” को उत्तराखंड UCC ने समाप्त किया कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के बाद भारत में instant triple talaq पहले ही अवैध था। उत्तराखंड UCC ने उससे व्यापक समान विवाह-विच्छेद व्यवस्था अपनाई है।
मुद्दा
UCC से पहले मुस्लिम Personal Law/कानूनी स्थिति
उत्तराखंड UCC के बाद
बहुविवाह
मुस्लिम पुरुष को मुस्लिम Personal Law के तहत एक समय में चार पत्नियों तक विवाह की अनुमति मानी जाती थी
बहुविवाह निषिद्ध; विवाह के लिए एकल-विवाह व्यवस्था
तलाक
मुस्लिम Personal Law में अलग-अलग प्रकार के तलाक की व्यवस्था
सभी समुदायों के लिए समान statutory grounds और procedure
Instant Triple Talaq
2017 में Supreme Court ने Shayara Bano मामले में इसे invalid किया; 2019 Act ने इसे punishable बनाया
UCC में अलग मुस्लिम तलाक व्यवस्था नहीं; समान divorce framework
मेहर (Mahr)
मुस्लिम विवाह में पत्नी का वैधानिक/धार्मिक आर्थिक अधिकार
UCC में मुस्लिम विवाह के लिए अलग “मेहर-केंद्रित” व्यवस्था नहीं; विवाह के आर्थिक अधिकार समान कानून के अधीन
इद्दत
तलाक/पति की मृत्यु के बाद मुस्लिम Personal Law में निर्धारित प्रतीक्षा अवधि
UCC में धर्म-विशेष की इद्दत व्यवस्था नहीं; समान divorce/succession framework
हलाला
कुछ परिस्थितियों में पुनर्विवाह से जुड़ी धार्मिक अवधारणा
UCC में ऐसी धर्म-विशेष शर्त का कोई स्थान नहीं
मुस्लिम विवाह
Muslim Personal Law के अनुसार निकाह
UCC के समान विवाह प्रावधानों के अधीन
विवाह पंजीकरण
पहले से बने विभिन्न कानूनों/राज्य नियमों के अनुसार
समान और व्यापक registration व्यवस्था
उत्तराधिकार
मुस्लिम Personal Law में निश्चित shares—जैसे बेटे/बेटी, पति/पत्नी आदि के लिए अलग हिस्से
धर्म-निरपेक्ष समान succession framework
पुत्र-पुत्री का हिस्सा
मुस्लिम inheritance में सामान्यतः बेटे और बेटी के हिस्से समान नहीं
UCC में धर्म के आधार पर अलग inheritance formula नहीं
पति-पत्नी का inheritance
Muslim Personal Law के अनुसार अलग निर्धारित हिस्से
UCC की समान succession व्यवस्था
विधवा
मुस्लिम Personal Law में निर्धारित हिस्सा
समान statutory succession framework
वसीयत
Muslim Personal Law में testamentary succession पर विशेष सीमाएँ
UCC में Will के लिए समान वैधानिक व्यवस्था
लिव-इन
मुस्लिम Personal Law का विवाह जैसा कोई समान statutory live-in regime नहीं
Live-in relationship को पहली बार UCC के भीतर विस्तृत रूप से regulate किया गया
लिव-इन registration
ऐसी सामान्य अनिवार्य UCC व्यवस्था नहीं
Registration आवश्यक
लिव-इन से बच्चा
अलग-अलग factual/legal circumstances पर निर्भर
बच्चे के अधिकारों को स्पष्ट वैधानिक संरक्षण
धर्म परिवर्तन के बाद विवाह
व्यक्तिगत कानूनों और परिस्थितियों के अनुसार अलग प्रश्न
UCC में विवाह की समान statutory conditions लागू
तीन बातों को विशेष रूप से समझना जरूरी है
1. मेहर खत्म नहीं हुआ, ऐसा सीधे कहना भी सही नहीं है।
UCC में “मुस्लिम पत्नी का मेहर” नाम से अलग धार्मिक personal-law institution को बनाए रखने के बजाय विवाह के आर्थिक अधिकारों को समान कानून के भीतर देखा जाता है। इसलिए मेहर की धार्मिक अवधारणा और वैवाहिक आर्थिक अधिकार—दो अलग प्रश्न हैं।
2. इद्दत और हलाला का मामला और स्पष्ट है।
UCC में मुस्लिम Personal Law के आधार पर कोई अलग इद्दत-आधारित divorce/re-marriage regime नहीं रखा गया। इसी कारण हलाला जैसी धार्मिक अवधारणा को भी UCC के तहत वैधानिक विवाह की पूर्वशर्त नहीं माना जाता।
3. उत्तराधिकार सबसे गहरा परिवर्तन है।
यह परिवर्तन केवल मुस्लिम कानून तक सीमित नहीं है। UCC का उद्देश्य ही है कि हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी आदि के अलग-अलग succession rules के स्थान पर एक समान statutory framework हो।
लेकिन “मुस्लिम Personal Law समाप्त” कहना भी अतिशयोक्ति होगा
उत्तराखंड UCC ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक विश्वास या धार्मिक आचरण को समाप्त नहीं किया है। इसका प्रभाव उन क्षेत्रों पर है जिन्हें राज्य ने civil law के रूप में regulate किया है—मुख्यतः विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships।
इसलिए अधिक सटीक वाक्य होगा:
उत्तराखंड UCC ने मुस्लिम Personal Law के उन हिस्सों को, जो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के नागरिक/कानूनी अधिकारों को नियंत्रित करते थे, अलग धार्मिक कानून के बजाय एक समान नागरिक कानून के अधीन कर दिया है।
और यही वह बिंदु है जिस पर महाराष्ट्र का आगामी UCC सबसे दिलचस्प होगा—क्या वह बिल्कुल यही मॉडल अपनाता है, या मेहर, उत्तराधिकार, live-in और customary practices के लिए कुछ अलग प्रावधान करता है।

जी। मैंने महाराष्ट्र सरकार की 9 जुलाई 2026 की समिति गठित करने वाली जानकारी और उपलब्ध विधायी दस्तावेजों को देखकर जाँच की है। इसका उत्तर थोड़ा महत्वपूर्ण है:
संक्षिप्त उत्तर
महाराष्ट्र के प्रस्तावित UCC के अभी तक उपलब्ध आधिकारिक Terms of Reference में अंतर-धार्मिक विवाह से सामान्यतः पैदा होने वाले बच्चे का धर्म तय करने का कोई प्रस्तावित प्रावधान नहीं दिखता। समिति को विवाह, तलाक, दत्तक, वारसा/उत्तराधिकार तथा अन्य personal laws का अध्ययन करके सिफारिशें देने को कहा गया है। �
eshala +1
लेकिन एक अलग महाराष्ट्र कानून में ऐसा स्पष्ट प्रावधान पहले से प्रस्तावित/विधायी रूप से सामने आया है, और यही आपके प्रश्न के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है।
महाराष्ट्र के धर्म-स्वातंत्र्य/Conversion Bill में क्या कहा गया है?
महाराष्ट्र के Dharma Swatantrya Bill, 2026 में एक विशेष स्थिति के लिए प्रावधान है:
यदि किसी विवाह या marriage-like relationship का कारण “unlawful conversion” हो, तो उससे पैदा बच्चे को उस धर्म का माना जाएगा जो उसकी माँ का उस विवाह/relationship से पहले था। �
PRS Legislative Research +1
अर्थात इसे इस तरह समझिए:
माँ — हिंदू → विवाह/relationship से पहले धर्म परिवर्तन → पिता दूसरे धर्म का → विवाह/relationship → बच्चा
यदि conversion कानून की दृष्टि में unlawful conversion पाया जाता है, तो उस विशेष मामले में बच्चे का धर्म माँ का विवाह से पहले वाला धर्म माना जाएगा। साथ ही बच्चे को माता-पिता दोनों की संपत्ति में prevailing succession laws के अनुसार अधिकार और maintenance का अधिकार दिया गया है। �
PRS Legislative Research
लेकिन यह UCC का प्रावधान नहीं है
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
स्थिति
महाराष्ट्र में अभी उपलब्ध प्रावधान
सामान्य अंतर-धार्मिक विवाह
बच्चे का धर्म क्या होगा—इसका कोई स्पष्ट UCC प्रावधान अभी उपलब्ध नहीं
विवाह के लिए कथित unlawful conversion
बच्चे को माँ के विवाह से पहले के धर्म का माना जाने वाला विशेष प्रावधान
UCC
अभी समिति मसौदा तैयार कर रही है
अंतिम UCC Bill
अभी उपलब्ध नहीं
महाराष्ट्र सरकार ने UCC के लिए जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति बनाई है और उसे छह महीने में अपनी रिपोर्ट/मसौदा देने को कहा गया है। इसलिए अंतर-धार्मिक विवाह में बच्चे के धर्म का प्रश्न UCC के अंतिम मसौदे में शामिल होगा या नहीं, अभी कहना संभव नहीं है। �
The Indian Express +1
यह प्रश्न इसलिए बेहद दिलचस्प है
क्योंकि महाराष्ट्र के सामने कम-से-कम तीन अलग मॉडल हो सकते हैं:
बच्चे का धर्म माता-पिता की पसंद से तय हो।
बच्चा बालिग होने तक किसी धर्म से कानूनी रूप से संबद्ध न माना जाए और बालिग होने पर स्वयं धर्म चुने।
माँ के धर्म को default माना जाए—जैसा कि महाराष्ट्र के प्रस्तावित conversion law में एक विशेष परिस्थिति में किया गया है।
इनमें से कौन-सा मॉडल UCC समिति अपनाती है, यह अभी खुला प्रश्न है।
और एक महत्वपूर्ण बात: उत्तराखंड UCC में भी मुझे ऐसा सामान्य प्रावधान नहीं मिलता कि हर अंतर-धार्मिक विवाह में पैदा बच्चा स्वतः माँ या पिता के धर्म का माना जाएगा। इसलिए महाराष्ट्र यदि ऐसा स्पष्ट नियम बनाता है, तो वह उत्तराखंड मॉडल से एक उल्लेखनीय अतिरिक्त प्रावधान हो सकता है।
अगर आप चाहें तो मैं अगला शोध और गहराई से करके यह पता कर सकता हूँ कि भारत के मौजूदा कानून—Special Marriage Act, Hindu Marriage Act, Muslim Personal Law और Supreme Court के फैसलों—में अंतर-धार्मिक विवाह के बच्चे के धर्म की कानूनी स्थिति वास्तव में क्या है और फिर �⁠उसकी तुलना महाराष्ट्र के इस प्रस्ताव से कर दूँ।

जी। इस विषय में मौजूदा भारतीय कानून को ध्यान से देखने पर तस्वीर काफी स्पष्ट होती है।

1. अंतर-धार्मिक विवाह में बच्चे का धर्म अपने-आप तय करने वाला कोई सामान्य केंद्रीय कानून नहीं

Special Marriage Act, 1954 (SMA) अलग-अलग धर्मों के दो व्यक्तियों को बिना धर्म परिवर्तन विवाह करने की अनुमति देता है। अधिनियम विवाह की वैधता और बच्चों की legitimacy आदि को नियंत्रित करता है, लेकिन यह नहीं कहता कि ऐसे विवाह से पैदा बच्चा स्वतः पिता या माता के धर्म का होगा।

इसलिए यह कहना कि “भारत में अंतर-धार्मिक विवाह का बच्चा अपने-आप पिता का धर्म लेता है” एक सामान्य कानूनी नियम के रूप में सही नहीं है।

2. बच्चे के धर्म और बच्चे के कानूनी अधिकार—दो अलग बातें हैं

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

अंतर-धार्मिक विवाह से पैदा बच्चा:

  • वैध संतान हो सकता है;
  • माता-पिता दोनों से संबंध और अधिकार रखता है;
  • उत्तराधिकार के अधिकार प्राप्त कर सकता है;
  • लेकिन केवल विवाह के कारण उसका धर्म स्वतः निर्धारित नहीं हो जाता।

विशेष रूप से SMA के तहत विवाह का आधार ही यह है कि दोनों व्यक्ति अपने-अपने धर्म को बदले बिना विवाह कर सकते हैं।

3. महाराष्ट्र का प्रस्तावित प्रावधान इसलिए असाधारण है

महाराष्ट्र के Dharma Swatantrya Bill, 2026 में एक विशेष परिस्थिति का प्रावधान है। यदि विवाह/विवाह-जैसे संबंध में “unlawful conversion” शामिल हो, तो उस संबंध से पैदा बच्चे को विवाह/relationship से पहले माँ जिस धर्म की थी, उसी धर्म का माना जाने का प्रावधान प्रस्तावित है।

इसे सामान्य interfaith marriage का नियम समझना गलत होगा।

अर्थात:

सामान्य interfaith marriage → ऐसा default rule नहीं।

लेकिन

unlawful conversion से जुड़ा marriage/relationship → proposed Maharashtra Freedom of Religion Bill में mother’s pre-marriage religion को आधार बनाने का विशेष प्रावधान।

4. अब असली सवाल: महाराष्ट्र UCC में क्या होना चाहिए?

यही वह जगह है जहाँ महाराष्ट्र की UCC समिति के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी रिक्तता सामने आती है।

यदि:

हिन्दू पिता + मुस्लिम माता → Special Marriage Act के तहत विवाह → बच्चा

तो वर्तमान केंद्रीय कानून के आधार पर यह स्वतः निर्धारित नहीं होता कि बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड या अन्य नागरिक दस्तावेजों में उसका धर्म हिन्दू होगा या मुस्लिम

इसी तरह:

मुस्लिम पिता + हिन्दू माता → बच्चा

के मामले में भी कोई सामान्य statutory rule नहीं है कि बच्चा अनिवार्य रूप से पिता का धर्म ग्रहण करेगा।

5. महाराष्ट्र UCC में तीन संभावित मॉडल

मेरे विचार से समिति के सामने कम-से-कम ये तीन मॉडल हो सकते हैं:

मॉडल व्यवस्था परिणाम
A. माता-पिता का विकल्प दोनों मिलकर बच्चे का धर्म घोषित करें सबसे सरल प्रशासनिक मॉडल
B. कोई स्वतः धर्म नहीं बालिग होने तक बच्चे को किसी धर्म का कानूनी सदस्य न माना जाए; बाद में स्वयं चयन करे धार्मिक स्वतंत्रता की दृष्टि से सबसे मजबूत मॉडल
C. Default धर्म किसी एक अभिभावक—जैसे माँ/पिता—का धर्म default माना जाए प्रशासनिक रूप से सरल, लेकिन समानता/स्वतंत्रता पर प्रश्न उठ सकते हैं

इसके अलावा D. संयुक्त घोषणा + बालिग होने पर विकल्प जैसा मिश्रित मॉडल भी बनाया जा सकता है।

6. उत्तराखंड UCC से तुलना

यहाँ भी एक दिलचस्प तथ्य है। उत्तराखंड UCC में विवाह, तलाक, succession और live-in relationships को समान नागरिक कानून में लाया गया है, लेकिन अंतर-धार्मिक विवाह से पैदा बच्चे का धर्म स्वतः पिता/माता का निर्धारित करने वाला कोई सामान्य नियम दिखाई नहीं देता।

इसलिए यदि महाराष्ट्र UCC में ऐसा स्पष्ट प्रावधान आता है तो वह उत्तराखंड UCC से आगे का नया प्रावधान होगा।

मेरी दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न

यदि महाराष्ट्र समिति ऐसा नियम बनाती है कि:

“अंतर-धार्मिक विवाह में बच्चा स्वतः पिता/माता के धर्म का माना जाएगा”

तो अगला सवाल होगा—माता-पिता को बच्चे का धर्म निर्धारित करने का अधिकार किस सीमा तक है और बच्चे के स्वयं धर्म चुनने के अधिकार का संरक्षण कैसे होगा?

यही प्रश्न अनुच्छेद 14 (समानता), 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और 25 (धर्म की स्वतंत्रता) के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है।

और यदि आप चाहें तो मैं अगला चरण से कर सकता हूँ—विशेषकर यह कि , और । यह इस पूरे प्रश्न की कानूनी जड़ तक पहुँचाएगा।

 

जी। मैंने सुप्रीम कोर्ट और संबंधित न्यायिक फैसलों को देखकर जाँच की। इस विषय में एक रोचक बात सामने आती है: भारतीय न्यायपालिका ने अलग-अलग संदर्भों में “पिता का धर्म” को कभी एक ऐतिहासिक presumption माना है, लेकिन आधुनिक संवैधानिक दृष्टिकोण बच्चे के पालन-पोषण और उसकी अपनी धार्मिक स्वतंत्रता को भी महत्व देता है।
1. 1988 का महत्वपूर्ण फैसला — Raj Kumar Gupta v. Barbara Gupta
यह मामला बिल्कुल आपके प्रश्न के करीब है: पति हिंदू था, पत्नी ईसाई थी और विवाह Special Marriage Act के तहत हुआ था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुराने न्यायिक सिद्धांतों की चर्चा करते हुए बताया कि Helen Skinner तथा सुप्रीम कोर्ट के CWT v. R. Sridharan में यह कहा गया था कि सामान्य परिस्थितियों में भारत में बच्चे के पिता का धर्म मानने की presumption रही है। �
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लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि उसी फैसले में अदालत ने इस पुराने सिद्धांत को अंतिम और अपरिवर्तनीय नियम की तरह नहीं माना। उसने बच्चे की वास्तविक परिस्थितियों और पालन-पोषण को महत्व दिया।
2. उससे भी महत्वपूर्ण — धर्म विवाह से स्वतः नहीं बदलता
Roopa Ravindra Kankanawadi v. Commissioner में कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अंतर-धार्मिक विवाह होने मात्र से पत्नी पति का धर्म नहीं अपना लेती और न पति पत्नी का। यदि कोई स्वैच्छिक conversion नहीं हुआ है, तो दोनों अपने-अपने धर्म में बने रह सकते हैं। अदालत ने बच्चों के संबंध में कहा कि उनका धार्मिक संबंध इस बात पर निर्भर कर सकता है कि उन्हें किस प्रकार पाला गया और बालिग होने पर वे स्वयं क्या चुनते हैं। �
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यह दृष्टिकोण आधुनिक संवैधानिक सोच के बहुत करीब है।
3. Supreme Court का बड़ा सिद्धांत — विवाह का चुनाव व्यक्तिगत स्वतंत्रता है
Shafin Jahan v. Asokan K.M. और बाद के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि अपना जीवनसाथी चुनना Article 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। परिवार, समाज या समुदाय किसी वयस्क व्यक्ति की पसंद को नियंत्रित नहीं कर सकते। �
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2023 के Supriyo v. Union of India फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने inter-faith marriage को इसी संवैधानिक autonomy के संदर्भ में देखा और Special Marriage Act को ऐसा कानून माना जो अलग-अलग धर्मों के लोगों को बिना अपना धर्म त्यागे विवाह करने की अनुमति देता है। �
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4. लेकिन Hindu law में एक महत्वपूर्ण statutory rule है
यहाँ एक सूक्ष्म अंतर है।
Hindu Marriage Act, 1955 की Section 2 की Explanation के अनुसार, यदि माता-पिता में से एक Hindu है और बच्चा उस Hindu parent के परिवार/समुदाय के सदस्य के रूप में पाला जाता है, तो उस कानून के प्रयोजन के लिए उसे Hindu माना जा सकता है। इसी प्रकार की भाषा Hindu Adoptions and Maintenance Act और Hindu Succession Act में भी है। �
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इसलिए:
“अंतर-धार्मिक विवाह का हर बच्चा स्वतः पिता का धर्म मानता है” — आज के कानून का सार्वभौमिक नियम नहीं है।
5. महाराष्ट्र UCC के लिए इसका क्या महत्व है?
यहीं आपका मूल प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि महाराष्ट्र UCC में यह लिखा जाता है कि:
“अंतर-धार्मिक विवाह से जन्मा बच्चा पिता के धर्म का माना जाएगा”
तो यह पुराने judicial presumption को statutory rule में बदल देगा।
लेकिन यदि लिखा जाता है:
“बच्चे का धर्म माता-पिता की संयुक्त घोषणा से निर्धारित होगा और बालिग होने पर बच्चा अपना धर्म चुन सकता है”
तो यह Article 25 की freedom of conscience और आधुनिक privacy/autonomy jurisprudence के अधिक अनुरूप मॉडल होगा।
और तीसरा विकल्प:
“बालिग होने तक बच्चे को किसी धर्म का कानूनी सदस्य न माना जाए; 18 वर्ष की आयु पर स्वयं धर्म चुने”
और भी अधिक स्पष्ट secular model होगा।
6. इसलिए महाराष्ट्र UCC में यह प्रश्न अभी खुला है
मेरी वर्तमान जाँच के आधार पर महाराष्ट्र UCC समिति के उपलब्ध Terms of Reference में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि अंतर-धार्मिक विवाह में बच्चे का धर्म पिता या माता के धर्म के अनुसार स्वतः निर्धारित किया जाएगा।
और इसे महाराष्ट्र के Dharma Swatantrya Bill, 2026 से अलग रखना जरूरी है। उस Bill में unlawful conversion से जुड़े विशेष मामले में बच्चे को माँ के विवाह/relationship से पहले वाले धर्म का माना जाने का प्रस्ताव है। यह सामान्य inter-faith marriage के लिए UCC का नियम नहीं है।
निष्कर्ष
इस पूरे कानूनी इतिहास को तीन चरणों में समझना सबसे सही होगा:
पुराना न्यायिक दृष्टिकोण:
पिता का धर्म = सामान्य presumption.
⬇️
आधुनिक न्यायिक दृष्टिकोण:
माता-पिता का अंतर-धार्मिक विवाह अपने-आप किसी का धर्म नहीं बदलता; बच्चे के पालन-पोषण और उसकी अपनी धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण हैं। �
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⬇️
महाराष्ट्र UCC का संभावित भविष्य:
यदि समिति बच्चे के धर्म पर स्पष्ट statutory rule बनाती है, तो वह भारत के मौजूदा कानून में मौजूद इस अस्पष्टता को पहली बार व्यापक Uniform Civil Code के स्तर पर स्पष्ट कर सकती है।
**और यही वह बिंदु है जिस पर महाराष्ट्र UCC का अंतिम मसौदा आते ही सबसे गंभीर संवैधानिक बहस होने की संभावना है।**

जी। इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट के वास्तविक फैसलों को कालक्रम में देखना सबसे उपयोगी है। एक सुधार भी कर दूँ: पिछली चर्चा में Raj Kumar Gupta v. Barbara Gupta का उल्लेख हुआ था—वह सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं, कलकत्ता हाई कोर्ट का 1988 का फैसला है। हालांकि उसने सुप्रीम कोर्ट के R. Sridharan फैसले को आधार बनाया था।

1. CWT, Madras v. R. Sridharan — 1976

यह इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट फैसला है।

मामला एक हिंदू पुरुष आर. श्रीधरन और उनकी ईसाई पत्नी से जन्मे बेटे Nicolas Sundaram से संबंधित था। विवाह Special Marriage Act के तहत हुआ था। पिता हिंदू ही रहे और बेटे को हिंदू परिवार में पाला गया।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बच्चा हिंदू है और हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का सदस्य हो सकता है। अदालत ने विशेष रूप से यह देखा कि:

  • पिता हिंदू थे;
  • पिता ने धर्म नहीं बदला था;
  • बच्चा हिंदू परिवार में पाला गया;
  • उसे हिंदू समाज/परिवार का सदस्य माना गया;
  • पिता ने स्वयं बेटे को अपने हिंदू परिवार का सदस्य घोषित किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने Mayne’s Hindu Law and Usage में व्यक्त पुराने सिद्धांत को भी उद्धृत किया कि सामान्य परिस्थितियों में भारत में बच्चे के पिता का धर्म मानने की presumption रही है।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सावधानी

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि:

“हर अंतर-धार्मिक विवाह में बच्चा अनिवार्य रूप से पिता का धर्म ही मानेगा।”

फैसले में बच्चे के वास्तविक पालन-पोषण और सामाजिक पहचान को भी महत्वपूर्ण माना गया था।

यही फर्क महाराष्ट्र UCC की बहस में बहुत महत्वपूर्ण है।


2. Narayani v. Aravindakshan — 2005

यह भी सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने R. Sridharan में चर्चा किए गए पुराने हिंदू कानून के सिद्धांतों को दोहराया और समझाया कि Hindu law के codification के बाद किन परिस्थितियों में किसी बच्चे को Hindu law के अंतर्गत माना जा सकता है।

विशेष रूप से अदालत ने यह स्वीकार किया कि:

यदि माता-पिता में से एक हिंदू है और बच्चा उस हिंदू parent के समुदाय/परिवार के सदस्य के रूप में पाला जाता है, तो वह Hindu law के दायरे में आ सकता है।

इस फैसले में R. Sridharan के विभिन्न सिद्धांतों को विस्तार से दर्ज किया गया है।


3. फिर आया महत्वपूर्ण बदलाव: केवल “पिता का धर्म” पर्याप्त नहीं

यहीं से हमें न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक सावधानी से समझना चाहिए।

पुराना सिद्धांत था:

पिता हिंदू → सामान्यतः बच्चा हिंदू माना जाएगा।

लेकिन आधुनिक कानून में statutory provisions ने इसे अधिक nuanced बना दिया है।

उदाहरण के लिए Hindu Minority and Guardianship Act में यह महत्वपूर्ण विचार है कि यदि:

माता-पिता में से एक हिंदू है और बच्चा उस parent के परिवार/समुदाय के सदस्य के रूप में पाला जाता है,

तो उसे Hindu माना जा सकता है।

अर्थात “पिता कौन है?” के साथ “बच्चे को किस रूप में पाला गया?” भी महत्वपूर्ण है।


4. Raj Kumar Gupta v. Barbara Gupta — 1988

फिर इस मामले को विशेष रूप से देखना चाहिए क्योंकि यह Hindu father + Christian mother + Special Marriage Act वाला मामला था।

लेकिन पुनः स्पष्ट कर दूँ:

यह Supreme Court का नहीं, Calcutta High Court का फैसला है।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने R. Sridharan का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में बच्ची को Hindu माना जा सकता है क्योंकि:

  • पिता Hindu थे;
  • बच्ची Hindu परिवार में पली;
  • उसका नाम/सरनेम भी उसी पारिवारिक पहचान से जुड़ा था;
  • माता-पिता दोनों ने अदालत में बच्ची को Hindu मानने पर विवाद नहीं किया था।

और यही फैसला एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहता है:

बच्चे का धर्म निर्धारित करने में वास्तविक upbringing महत्वपूर्ण है।

इसलिए इसे “पिता का धर्म = automatic religion of child” के रूप में पढ़ना सही नहीं होगा।


5. आधुनिक संवैधानिक दृष्टिकोण

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत autonomy और freedom of conscience को बहुत अधिक महत्व दिया है।

Shafin Jahan v. Asokan K.M. — 2018

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वयस्क व्यक्ति के अपनी पसंद से विवाह करने और जीवनसाथी चुनने के अधिकार को Article 21 की liberty से जोड़ा।

इसका आपके प्रश्न से अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण संबंध है:

यदि दो वयस्क अलग-अलग धर्मों के होते हुए विवाह कर सकते हैं, तो केवल विवाह के कारण उनमें से किसी एक का धर्म दूसरे पर स्वतः आरोपित नहीं किया जा सकता।

यानी:

Interfaith marriage ≠ automatic conversion.


6. Supriyo v. Union of India — 2023

यह फैसला मुख्यतः same-sex marriage के प्रश्न पर था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Special Marriage Act की प्रकृति पर महत्वपूर्ण चर्चा की।

SMA का मूल विचार ही यह है कि अलग-अलग धर्मों के लोग अपना धर्म बदले बिना नागरिक विवाह कर सकते हैं।

इसलिए:

हिन्दू + मुस्लिम → Special Marriage Act marriage

का अर्थ यह नहीं है कि हिन्दू मुस्लिम बन गया या मुस्लिम हिन्दू।

और इसी तर्क से बच्चे का धर्म भी केवल विवाह के कारण स्वतः निर्धारित हो जाना आवश्यक नहीं है।


तो सुप्रीम कोर्ट की स्थिति को एक वाक्य में कैसे समझें?

पुराना/परंपरागत presumption:

बच्चे का धर्म सामान्यतः पिता के धर्म का माना जा सकता है।

लेकिन आधुनिक statutory position:

केवल पिता का धर्म निर्णायक नहीं; बच्चे को किस धर्म में पाला गया और लागू personal law की शर्तें क्या हैं, यह भी महत्वपूर्ण है।

और आधुनिक constitutional principle:

व्यक्ति को अपनी conscience और religion के संबंध में autonomy प्राप्त है; interfaith marriage स्वयं conversion नहीं है।


सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष

इसलिए यदि महाराष्ट्र UCC में कभी यह धारा प्रस्तावित होती है:

“अंतर-धार्मिक विवाह से जन्मा बच्चा पिता के धर्म का माना जाएगा।”

तो यह केवल एक प्रशासनिक नियम नहीं होगा। यह 1976 के R. Sridharan में दिखाई देने वाले पुराने presumption को एक सार्वभौमिक statutory rule में बदलने जैसा होगा।

इसके विपरीत यदि महाराष्ट्र कहता है:

“बच्चे का धर्म माता-पिता की घोषणा/पालन-पोषण से निर्धारित होगा और बालिग होने पर बच्चा स्वयं अपना धर्म चुन सकेगा,”

तो यह R. Sridharan के upbringing वाले तत्व तथा आधुनिक constitutional autonomy—दोनों को अधिक स्पष्ट रूप से कानून में उतारेगा।

और तीसरा मॉडल—“18 वर्ष तक बच्चे का कोई कानूनी धार्मिक दर्जा नहीं और बालिग होने पर स्वयं चयन”—तो भारतीय UCC के संदर्भ में बिल्कुल नया और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रयोग होगा।

अगर आप चाहें, मैं अगली बार निकालकर दे सकता हूँ। यह महाराष्ट्र UCC के लिए खासा मजबूत संदर्भ बनेगा।

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