ज्ञान:पूजा में सिर ढंकना है शास्त्र विरुद्ध, और क्या-क्या है निषिद्ध?

सिर ढकने को शास्त्र निषेध!!
आजकल कुप्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते ही रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते हैं । कर्मकांडी भी नहीं मना करते जबकि पूजा में सिर ढकना शास्त्र निषेध करता है। शौच समय ही सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।

*शास्त्र कहते हैं*
*उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी* *गलावृतः ।*
*प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो* *निष्फलो जपः ॥*
अर्थात्
पगड़ी, कुर्ता पहन, नग्न हो, शिखा खोल, कण्ठ वस्त्र से लपेट, बोलते और काँपते हुए किया जप निष्फल होता है ।’

शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||

( -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)

अर्थात्– सिर या कण्ठ ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, पाँव धोए, फिर आचमन कर ही व्यक्ति शुद्ध (देवयजन योग्य) होता है)।

सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषी*वाचमेद् बुधः।
– कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 10अर्ध ।

अर्थात्– बुध्दिमान् व्यक्ति जूता पहनें,जल में रहते,सिर पर पगड़ी इत्यादि धारण किये आचमन नहीं करना चाहिए ।

शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैव प्रशस्यते। -(कर्मठगुरूः)

अर्थात्– वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान नहीं करना चाहिए ।

उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत् क्वचित् ॥-
( शब्द कल्पद्रुम )

अर्थात्– सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर ।

अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।

*न जल्पंश्च न* *प्रावृतशिरास्तथा।-योगी* *याज्ञवल्क्य*
अर्थात्– न वार्ता करते हुए और न सिर ढककर।

*अपवित्रकरो नग्नः शिरसि* *प्रावृतोऽपि वा ।*
*प्रलपन् प्रजपेद्यावत्तावत्* *निष्फलमुच्यते ।।* ( *रामार्च्चनचन्द्रिकायाम्* )

अर्थात्– अपवित्र हाथों से,बिना कच्छ के,सिर ढककर जपादि कर्म जैसे किये जाते हैं, वैसे ही निष्फल होते जाते हैं ।

शिव महापुराण उमा खण्ड अ.14– सिर पर पगड़ी रखकर,कुर्ता पहनकर ,नंगा होकर,बाल खोलकर , गले के कपड़ा लपेटकर,अशुद्ध हाथ लेकर,सम्पूर्ण शरीर से अशुद्ध रहकर और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।
✍🏻 आचार्य रामानुज जी

टीव्ही सीरियल ,फिल्मों और पत्रिकाओं में ब्राह्मणों को केश रहित गंजा क्यों दिखाया जाता है ??

वैदिक सभ्यता – संस्कृति में केशों का बड़ा महात्म्य है ।
बाल वृद्धादि असमर्थों के अतिरिक्त किसी भी वैदिक धर्मी को केश कटाने की आज्ञा नहीं है ।
बाल्यकाल में असमर्थ बालकों बालाओं का मुण्डन कर दिया जाता है , और जब अत्यन्त वृद्ध या रोगी होकर असमर्थ हो जाने पर मुण्डित करने की आज्ञा है ।
सन्यासियों का मुण्डन इसी दशा का सूचक है ।
इन दशाओं के अतिरिक्त सदैव दाढ़ी, मूँछ और शिर के केशों की रक्षा करनी चाहिए ।
“बृहस्पतिः प्रथमः सूर्यायै शीर्षे केशमकल्पयत् ” (श्रुति)
अर्थात् ज्ञानाधिष्ठान बृहस्पति- आकाश- ने पहले ही सूर्या के द्वारा शिर में केशों को उत्पन्न किया ।

वेद में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी आदि सभी स्त्री पुरुषों के लिए केश रखने का उपदेश किया है ।
ब्रह्मचारी के लिए अथर्ववेद ११|५|६ में —
“ब्रह्मचार्य्येति समिधा समिद्धः कार्ष्ण वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः |”
इसमें ब्रह्मचारी को दीर्घ श्मश्रु वाला अर्थात् बड़े दाढ़ी मूँछोंवाला कहा गया है ।
ब्रह्मचारी के लिए “क्षुरकृत्यं वर्जय” अर्थात् ब्रह्मचारी को बाल बनवाना मना है ।
इसी प्रकार गृहस्थ के लिए मना है ।
राजा के लिए —
“शिरो मे श्रीर्यशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि |
राजा मे प्राणो अमृतं सम्राट् चक्षुर्विराट श्रोत्रम् || {यजु. २०|५}
इसमें राजा के शिर के केशों और दाढ़ी,मूँछों की भी प्रशंसा की गई है ।
इसी तरह वनस्थ के लिए “जटाश्च विभृतान्नित्यं श्मश्रुलोमनखानि च”
अर्थात् वानप्रस्थ सदैव जटा रखे और कभी बाल और नाखून न कटावे ।
अथर्ववेद में – ‘कृत्रिमः कण्टकः शतदन्, शीर्षे केश अपः लिखात्’
अर्थात् अनेक कृत्रिम काँटों वाले कंघे से शिर के बालों का विन्यास किया जाए ।
इन समस्त आज्ञाओं से पता लगता है कि वैदिक सभ्यता में केशों की रक्षा का विधान है ।
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अब इतिहास पर दृष्टिपात करें जिससे स्पष्ट होगा कि दण्डस्वरूप किसी का शिर मुँडवा देना पूर्वयुग से होता आया है –
अर्ध शकानां शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् ।
यवनानां शिरः सर्वे काम्बोजानां तथैव च ।।
पारदाः मुक्तकेशाश्च पह्लवाश्मश्रुधारिणः ।
निःस्वाध्यायवषट्काराः कृतास्तेन महात्मना ।।
अर्थात् शकों का आधा शिर मुँडवा दिया गया, यवनों का पूरा शिर मुँडवा दिया गया, कम्बोजों का समस्त शिर मुँडवा दिया गया………………पह्लवों के शिर तथा दाढ़ी के बाल मुँडवा दिये गए ।
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पाण्डवों ने जयद्रथ के बाल इस प्रकार मुँडवाए गए थे कि पाँच चोटियाँ छोड़ी गईं थीं ।
जैसे आजकल भी होता है शिर पर चौराहा बनाकर गधे पर बैठाल कर निकालना (किसी कुकर्मी को ) .
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टीव्ही सीरियल ,फिल्मों और पत्रिकाओं में आचार्य चाणक्य गंजे दिखाये जाते हैं ,नीचे चित्र में उद्धृत गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज । नवीन चित्र में केश श्मश्रु रहित हैं जबकि प्राचीन चित्र में दीर्घकेशश्मश्रु युक्त हैं ।
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विचार करें कि कहीं आप ??
✍🏻वरुण शिवाय

केशरंजन और केशरंजना

केश या बाल ! स्त्री के लिए सम्पदा से कम नहीं। उम्र के साथ केशों का संबंध है और केशों की निरंतरता जीवन के स्पंदन की निशानी भी है। नारी को केशी कब कहा गया मालूम नहीं, मगर उसके केशरंजन पर सौन्दर्यविदों, साहित्यविदों का बड़ा ध्यान गया। आयुर्वेदविद् भी पीछे नहीं रहे। वात्स्यायन ने तो नारी की प्रादेशिक पहचान में केशों को भी एक आधार माना है।

केश एकैकजा यानि एक मूल से एक निकले तो चरक, गर्ग जैसे संहिताकारों ने शुभ माना। अनेक उपमाएं भी केशों के आधार पर नर नारियों को मिलीं। अगरु से सुवासित रखने के बहुतेरे सन्दर्भ मिलते हैं लेकिन मूर्ति कला में जो केश विन्यास मिलता है, वह आज तक किसी न किसी रूप में नारी जीवन की निधि बना हुआ है।

अलकाओं का वेणी के रूप में विन्यास किसी कला से कम नहीं। तीन लड़ियों को रज्जू की तरह शिरपृष्ठ से लेकर अंतिम सिरे तक गूंथना वेणी का बहुत प्रचलित रूप है। अन्यथा फुग्गे और लपेटन के रूप भी कम नहीं रहे।

वेणी की सज्जा का काम भी कम नहीं। मूल से अंतिम सिरे तक बंधकों का प्रयोग, राखीदार पुष्पियों का उपयोग और फुन्दनो, परांदों का इस्तेमाल भी पुराना है। कभी यह संदर्भ पढ़ने आया की चोटी ने हथियार का काम भी किया? चाणक्य और कामंदक ही नहीं, वराह मिहिर तथा उसके टीकाकारो ने यह उदाहरण लिखा है कि रानी ने अपनी वेणी में अस्त्र छिपाकर रखा था। जब अकेले राजा विदूरथ आया तो उसको मार डाला। चाणक्य ने सलाह दी है कि राजरानी के अंतर्गृह में मुलाकात से पहले किसी अनुभवी वृद्धा से परीक्षण करवाया जाए।

बालों के साथ सिर की सज्जा के लिए उपयोगी हंस तिलक, दंडक, मुक्ताजाल, चूड़ामण्डन और चूड़क जैसे गहने भारतीय जनजीवन के अंग रहे और ऐसे ही अनेक गहनों की कामना नारी गीतों में उल्लिखित रही है। बाल कैसे बढ़ाए जाएं?
पतिव्रता स्त्री के केश लम्बे करने के उपाय का कथन हरिवंश में आया है जिसे हमें अत्रि विक्रमार्क जी ने भेजा है :

ऊर्मिमन्तः स्वरालाग्राः श्रोणिदेशावलम्बिनः ।
तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्या हि भर्तरि ।।
शिरो निर्वेष्टुकामा तु गोमयेन शिरः शती।
प्रक्षालयेन्मलं धात्र्या बिल्वेन श्रीफलेन च ।।
गोमूत्रं च सदा प्राश्येच्छिरःस्नानं च मिश्रयेत्।
कृष्णां चतुर्दशीं त्वेतत् कर्तव्यं वरवर्णिनि ।।
भवत्यविधवा चैव सुभगा विज्वरा तथा ।
शिरोरोगैर्नैव चास्याः शरीरमभितप्यते।। (हरिवंश, विष्णु पर्व)

मूर्तिकला में ये ही अभिप्राय रूपसियों की पहचान के परिचायक होकर रहे हैं और कालक्रम को बताते हैं। इनमें भी पुष्प सज्जा स्मरणीय है। कालिदास ने इसी कारण इस सज्जा को अलकसंयमन नाम दिया है।

कुछ नाम आपको भी याद होंगे…
जय जय।

संवरणा : सिर सज्जा का रूप

कितना ही अभ्यंग स्नान हो और वस्त्राभरण धारण हो जाए, लेकिन केश सज्जा नहीं तो सजावट को पहचान नहीं मिल पाती। केश सज्जा भले ही ऊपर से ना दीखे लेकिन सामने से दिखाई देना ही बहुत होता है कि केश घुंघरवाले हैं या चंद्रमा सरीखे फुग्गेदार। जटाजूट, मुंडितशिर, क्षुद्रकेश, त्रिजटा, शिखा, पंचकेशी जैसे कई रूप शिर सज्जा के कहे गये हैं और सब जानते भी हैं। इनका विन्यास करना संवरना या संवरणा कहा जाता है। यह एक पारिभाषिक शब्द है।

देवालयों के लक्षणों में भी संवरणा एक विशिष्ट अर्थ लिए है। 2005 के आसपास जब मैं राजा भोज कृत “समरांगण सूत्रधार” के संपादन और अनुवाद का काम कर रहा था तब प्रासाद शिखर की सज्जा के लिये संवरणा का विवरण आया मगर वह पाठ खंडित पाठ था। इसकी पूर्ति करने के लिए मैंने भोज के लिए आधारभूत ग्रंथ रहे “जयपृच्छा” का सहारा लिया। उसमें संयोग से वह अंश था। यही नहीं, भोज के बनवाये चित्तौड़ के समीधेश्वर मंदिर की स्थापत्य रचना को भी देखा। इस त्रिदिशीय द्वार वाले शिव प्रासाद की शिखर की रचना संवरणाओं को लिए है।

इसके लिए पाषाणों के खंडों को छत के विस्‍तार के लिए अपेक्षित आकार में विभाजित किया गया अौर उन पर आड़ी-खड़ी रेखाओं को खींचते हुए वर्गाकार कोष्‍ठक बनाए गए। इनकी कटाई तिर्यक् रूप में कुछ इस तरह की गई कि स्‍थापित होने पर वे सीधी दिखाई दें। इसके बाद इन पर शंकु और शकोरों के आकारों को कंदुक पर आरोपित करते हुए घुंघरवाले वालों को आकार दिया गया। यह काम अब आसान नहीं है।

इसी बीच ‘अपराजित पृच्‍छा’ के अनुवाद के दौरान भी यह संदर्भ मेरे हाथ आया। यानी यह परंपरा उस समय मारु गुर्जर शैली के मंदिरों में लोकप्रिय रही। यह बाद में, 17वीं सदी में जबकि जगदीश मंदिर बना, तब भी लोकप्रिय थी। इसका एक हस्‍तरेखा चित्र मुझे रणकपुर के जैन मंदिर के समय का मिला था। इसी चित्र से जाहिर हुआ था शिखर की केश जैसी सज्‍जा संवरणा है। हमारे यहां देहात में मिट्टी के मकानों की छत पर केवलू की छवाई करना भी हारणा या हांवरणा कहा जाता है, यह भी संस्कृत के संवरणा का ही देशज रूप है।

आप भी देखियेगा कि कितनी युक्तियां से शिखर को घुंघरवाला बनाकर संवारा गया है ! यह संवरणा ज्यामिति, रेखागणित के ज्ञान और उसके उपयोग को बताती है। शेष तो सोचकर ही समझा जा सकता है।
जय जय..

कंघी – कांघसी – कंकतक

पुन: पोस्ट : श्रीकृष्ण “जुगनू”
हमारे सिर के केशों को संवारने के लिए कंघा या कंघी बड़ी उपयेागी है। केशों से लघाव रखने वाले जेब या पर्स में भी कंघी रखती है। आजकल तो तरह-तरह के कंघे बाजार में मौजूद हैं। मगर, एक दौर वह भी था ज‍बकि ग्‍वारिया समुदाय वाले लोग कलात्‍मक कंघों का निर्माण करते थे। हाट में ये बिकने आते थे, मेलों में बिकते थे। महिलाएं केश संवारकर बांदनवाल में इनको सहेजकर रखती थी। ‘गम गियौ कांघसियो…’ जैसे लोकगीतों में कांघसी के प्रति नारी मन का लगाव मिलता है।

संस्‍कृत में कंघे को कंकत या कंकतक कहा जाता है। ये जानवरों के सींग पर आरी चलाकर बहुत ही चाव से बनाई जाती थी। जो भाग केशों में घुसकर उनको संवार लेता, उसको दांता वाला भाग कहा जाता, ये दांते छोटे और बड़े दो तरह के होते, दोनों ही ओर होते। कंघे या कंघी को कभी पांवाें के नीचे से नहीं निकाला जाता, धूप में नहीं रखा जाता। महिलाएं बारीक दांतों का प्रयोग करने के लिए कई बार मौली आदि लपेट लेती थी ताकि जूं के अलावा लीखें (लिक्षा) को भी बाहर निकाला जा सके।

वैखानस ग्रंथ में सोना, चांदी के कंघे बनाने की परंपरा मिलती है जो आठ अंगुल के होते थे। ये छह अंगुल के भी होते। इस प्रमाण का आधा उसका विस्‍तार होता। इन पर बीस-बीस दांत होते थे और ये दोनों ही बाजुओं पर होते थे। यदि सोलह और आठ अंगुल होते तो उस कंघे को शुभ माना जाता था –

कंकतं कनकं रूप्‍यमपि वाष्‍टांगुलायतम्।
षडंगुलायतं यद्वा तदर्धांगुल विस्‍तरम्।।
विंशत्‍या दशनैर्युक्‍तं भवदुभयतो मुखम्।
यद्वा षोडशभिर्दन्‍तैरष्‍टाभिर्वाथ मंगलम्।।

समरांगण सूत्रधार में भी कंकत बनाने की विधि लिखी गई है। मूर्तियों में ऐसा प्रयोग देखने को नहीं मिलता, मगर देवालयो में नाना वस्‍तुओं के दान के विषय में ऐसे लक्षण मिलते हैं, जैसा कि वीर मित्रोदय के लक्षण प्रकाश में आया है। विदेशों में भी कंघे का उपयोग बहत हाेता आया है। वहां कंघी के प्रयोग की मूर्तियां भी बनी हैं। आप भी बतायें कि कंघा उपयोगी वस्‍तु है कि नहीं।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू

किबला उजले बालों को रंग डालो
बन जाओ गुलफाम।

पहले उजले केशों पर प्राकृतिक मेंहदी लगाई जाती थी और कुछ लोग उजले केश न होने पर भी शिर की गर्मी अथवा पीडा के कारण प्राकृतिक मेंहदी लगाते थे पर अब तो केमीकल का जमाना है। केमीकल केशरञ्जक का व्यापार बहुत बड़ा है। यदि आप केश नहीं रंगेंगे तो इससे होने वाली उनकी आय बन्द हो जायेगी। तभी तो वे अंकल-दीदी और भैया-आण्टी वाले विज्ञापन दिखाकर आपको डराते हैं।

आप षड्यन्त्र में क्यों फँसते हैं?

पहले वृद्ध नाट्य कलाकारों को किसी युवा पात्र का अभिनय करते समय केशों को रंगना पड़ता था किन्तु जनसामान्य द्वारा ऐसा करना नितान्त अनावश्यक और मिथ्या व्यवहार है।

४०-५० वर्ष की आयु के पश्चात् केशों का पकना आरम्भ होना चाहिए किन्तु किसी-किसी के केश किशोरावस्था अथवा बाल्यावस्था में ही पकना आरम्भ हो जाते हैं जो एक आनुवांशिक रोग है। इससे ग्रस्त कुछ जन इसे छिपाने के लिए केश रंगते हैं। अब प्रश्न यह है कि जो शरीर के तल पर कुछ का कुछ दिखाना चाहते हैं वे मन के तल पर ऐसा क्यों न करेंगे! मन तो शरीर से सूक्ष्म ही है। केशों को रंगकर लोग निर्दोष केश वाले spouse भी पा जाते हैं जो एक छल है क्योंकि दम्पति में से किसी एक में भी केशदोष होने पर वह अनिवार्यरूपेण सन्तति में आता ही है। ऐसे में अच्छा यही होगा कि विवाह से पूर्व किसी शारीरिक दोष को छिपाया न जाये। दूसरा जन दोष जानकर भी विवाह करना चाहे तो यह उसका स्वतन्त्र चयन होगा।

जिनके केश ४०-५० वर्ष की आयु के पश्चात् पकना आरम्भ हुए वे भी यदि केश रंगते हैं तो इसका अर्थ है कि वे अपरिपक्व अथवा बचकाने हैं और जीवन को उसकी पूर्णता में स्वीकार नहीं करना चाहते। वृद्धावस्था जीवन का वैसा ही सच है, जैसा बाल्यावस्था। यौवन-मात्र ही जीवन नहीं है। जिसने यौवन को ठीक से बिताया वह न केवल वृद्धावस्था का अपितु मृत्यु का भी स्वागत करेगा।

कुछ दशकों पहले दाढ़ी शेव कराकर रखने का चलन जोरों पर था पर इस बीच आई कुछ movies के प्रभाव से अब trimmed (थोड़ी बढ़ी हुई) दाढ़ी रखने का चलन जोर पकड़ रहा है। अच्छा ही है कि पुरुष अपने पुरुष-चिह्नों का स्वागत कर रहे हैं किन्तु trimmed दाढ़ी की border setting कराकर इसका सत्यानाश कर लिया जाता है। आशा है कि दाढ़ी की ही भाँति पके केशों की सहज स्वीकृति भी बढ़ेगी किन्तु लगता यही है कि इसके लिए भी movies की ही राह देखनी होगी क्योंकि जनसामान्य विवेकी नहीं होता। वह तो नाट्य-काव्य आदि से ही प्रेरणा ग्रहण करता है।

ग्रीष्म और मुण्डन

स्वेच्छा से शिर मुँडाने हेतु गृहस्थों के लिए दो विकल्प हैं –
१. आषाढ मास।
२. आषाढ, कार्तिक व फाल्गुन मास।

हमारे केश न केवल सूर्य के सीधे प्रकाश से शिर की त्वचा और शिरस्थ अङ्गों की रक्षा करते हैं अपितु शिर की त्वचा का ताप बढ़ जाने पर कुछ ताप भी खींच लेते हैं जिससे मस्तिष्क व आँखों आदि का तापमान नहीं बढ़ने पाता और हानि की शक्यता न्यून हो जाती है। इसके अतिरिक्त बढ़े हुए केश स्नानोपरान्त देर तक आर्द्र बने रहते हैं जिससे शिर की त्वचा व आँखों आदि में भी देर तक शीतलता का सुखद अनुभव होता रहता है।

वैशाख व ज्येष्ठ मास में ग्रीष्म का प्रकोप होता है अतः इस समय शिर मुँडाना मस्तिष्क व आँखों आदि के लिए विशेष हानिकारक होता है। इस बात का परीक्षण करने हेतु अपने कानों के निकटवर्ती केशों को काट लें। इसके पश्चात् आप आँखों व कानों में किञ्चित् दाह का अनुभव करेंगे। विचार करें कि केवल कानों के निकटवर्ती केशों को काट लेने पर यदि इतनी समस्या होती है तो पूरा शिर मुँडा लेने का क्या परिणाम होगा!

वैशाख व ज्येष्ठ में मुख के लोमों को यदि मुँडाना चाहें तो उन्हें भी ट्रिमर से केवल छोटा ही करें अथवा कंघा लगाकर उसके ऊपर आने वाले लोमों को काट लें। पूर्णतया न मुँडाएँ।

कुछ संन्यासी प्रत्येक चतुर्दशी को शिर, श्मश्रू आदि मुँडाते हैं परन्तु वे अपने शिर व कानों को कपड़े से ढक कर रखते हैं। इसके अतिरिक्त वे भोजनोपरान्त अपना पूरा मुख, शिर व कान आदि भली-भाँति धोकर शीतल करते हैं ताकि ग्रीष्म के प्रकोप से मस्तिष्क व आँखों आदि की रक्षा हो सके। सामान्यतः एक गृहस्थ यह सब नहीं कर सकता और न ही उसे इस सब के चक्र में फँसना चाहिए।

अपने केशों, श्मश्रू आदि को झंझट अथवा दोष न मानें। सप्ताह में एक-दो बार बेसन के घोल से उन्हें धो लिया करें। इससे वे मृदु, स्निग्ध और कान्तियुक्त बने रहेंगें और सुखद प्रतीत होंगें।
✍🏻प्रचण्ड प्रद्योत

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