थे कौन ज्योतिबा फुले? क्या थी उनकी भूमिका?

अज्ञानता बुद्धिजीवी होने की निशानी नहीं है। सनातनी संस्कार के कारण अक्सर हिन्दुओं (हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन) के मुंह से सुनते हैं सभी धर्म एक समान है। सभी धर्म प्यार, मोहब्बत और इंसानियत की शिक्षा देते हैं। कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता,आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। अल्लाह,ईश्वर,गॉड सब एक है आदि।

ऐसा वही लोग कहते हैं जो सच्चाई से अनभिज्ञ होते हैं। जिन्हें इसाईयत और इस्लाम का इतिहास पता नहीं होता है। जो अरब और यूरोप का इतिहास नहीं जानते हैं और जिन्होंने कुरान और हदीस नहीं पढ़ा है। अगर वे पढ़े होते कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में इसाईयत कैसे फैला; अरब, मध्य एशिया और भारतवर्ष में इस्लाम कैसे फैलाया गया या उन्हें यह बात बताया गया होता तो वे मूर्खों की तरह वैसी बातें नहीं करते। इतिहास छोड़िये, अगर उन्हें वर्तमान वैश्विक घटनाओं की जानकारी होती तो भी शायद वे ऐसा नहीं कहते। ऐसे लोगों को कम से कम इस्लाम और इसाईयत का संक्षिप्त इतिहास निचे के लिंक पर पढ़ लेना चाहिए।

इस्लाम और इसाईयत का संक्षिप्त इतिहास
मेरा मानना है ज्योतिराव गोविंदराव फुले भी ऐसे ही बुद्धिजीवी और समाज सुधारक थे जो सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ, इसाईयत और इस्लाम की सच्चाई और इतिहास से बिलकुल अंजान, अपनी अज्ञानता को ही बुद्धिजीविता का पर्याय मानकर आत्ममुग्ध थे। वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त अपनी सोच को ही सच्चाई और इतिहास मान बैठे थे जिसका भयानक दुष्परिणाम पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित अवशेष भारत के दलित हिन्दुओं, बौद्धों को भी भुगतना पड़ा और अभी भी भुगत रहे हैं। इस पर हम विस्तार से आगे चर्चा करेंगें। पहले उनका परिचय और उनके सामाजिक, धार्मिक और राजनितिक विचारों जानें।

ज्योतिराव गोविंदराव फुले 
ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल सन् 1827 को पुणे में हुआ था। कोल्हापुर के पास ही एक पहाड़ी पर देवता ज्योतिबा का मंदिर है। इन्हें जोतबा भी कहते हैं। यह हिन्दू धर्मावलंबियों का पवित्र तीर्थ है। वस्तुतः भगवान शिव के तीनों स्वरूपों को ज्योतिबा (जोतिबा) देवता के नाम से अभिव्यक्त किया गया है। ये बहुत से मराठों के कुल देवता हैं।

जिस दिन फुले का जन्म हुआ उस दिन जोतबा देवता का उत्सव था इसलिए उनका नाम जोतिबा रखा गया। उनके पिता का नाम गोविंद राव फुले, माता का नाम विमला बाई एवं धर्मपत्नी का नाम सावित्री बाई फुले था। वे 19वीं सदी का महान समाज सेवक एवं सुधारक माने जाते हैं। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कई विसंगतियों को दूर करने के लिए सतत् संघर्ष किया। ईसाईयों ने ज्योतिबा फुले को धर्मांतरण को उकसाया और अपने साँचे में ढालने का प्रयास किया परंतु उन्होंने ईसाई मत ग्रहण किया था इसका कोई प्रमाण नहीं है।

ज्योतिबा फुले का सामाजिक और धार्मिक विचार
1.वे जाति-व्यवस्था का पूर्ण विरोध करते थे। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को अन्यायपूर्ण,अमानवीय और शोषणकारी मानते थे। उनका मानना था कि जाति जन्म से नहीं,बल्कि सामाजिक शोषण का उपकरण है। वे शूद्रों-अतिशूद्रों को भारत का मूल निवासी मानते थे,जिन्हें आर्य-ब्राह्मणों ने गुलाम बनाया। सभी मनुष्य जन्म से समान हैं—यह फुले का केंद्रीय सिद्धांत था। शिक्षा,सम्मान और अधिकारों पर किसी एक जाति या वर्ग का एकाधिकार नहीं होना चाहिए।

3.ज्योतिबा फुले के अनुसार ब्राह्मणवाद ऐसी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था थी जो शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा, ज्ञान और सत्ता से वंचित रखती थी। उन्होंने इसे असमानता और गुलामी का औज़ार कहा। “गुलामगिरी” (1873) में उन्होंने लिखा कि “ब्राह्मणों ने धर्मग्रंथों और मिथकों का प्रयोग कर बहुजन समाज को मानसिक रूप से दास बनाया”।

4. आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत

फुले का मानना था कि “आर्य भटके हुए विदेशी थे, जिन्होंने छल से इस देश के मूल निवासियों पर अधिकार जमाया। आर्य (जिन्हें वे ब्राह्मणों से जोड़ते थे) बाहर से आए। उन्होंने मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) को पराजित कर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को नीच घोषित किया। इसलिए वे ब्राह्मणों को ऐतिहासिक शासक वर्ग मानते थे, न कि ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठ।

5. वेद-पुराणों की आलोचना

फुले ने वेद, पुराण और मनुस्मृति को असमानता फैलाने वाले ग्रंथ कहा जो केवल ब्राह्मण प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए रचे गए। उनके अनुसार धर्म का उपयोग नैतिकता के बजाय सत्ता बनाए रखने के लिए हुआ। उन्होंने गुलामगिरी (1873) में लिखा है, “ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों को अज्ञान में रखकर धर्मग्रंथों के सहारे उनकी दासता को स्थायी बना दिया। जो ग्रंथ एक मनुष्य को श्रेष्ठ और दूसरे को नीच ठहराते हैं, वे ईश्वरकृत नहीं हो सकते।” “मनुष्य की श्रेष्ठता उसका जन्म नहीं, उसका कर्म और नैतिकता तय करती है।”

6. दैविक अवतारों पर फुले के विचार

ज्योतिबा फुले भगवान राम को आर्य सत्ता का प्रतीक और शंबूक वध को शूद्र दमन का उदाहरण मानते थे। फुले ने विष्णु को पालक ईश्वर नहीं, बल्कि आर्य/ब्राह्मण सत्ता का प्रतीक माना। उनका कहना था कि विष्णु के अवतारों की कथाएँ मूल निवासियों पर “धर्म” के नाम पर सत्ता स्थापित करने की कहानियाँ हैं।

वामन अवतार फुले की सबसे प्रसिद्ध आलोचनाओं में से एक है। फुले अपनी पुस्तक गुलामगिरी में राजा बली को मूल निवासी, न्यायप्रिय शासक और भगवान वामन को छल करने वाला आर्य/ब्राह्मण मानते हैं। तीन पग भूमि दान को धोखे से सत्ता हड़पने की कथा है। उन्होंने लिखा “जिस छल को पुराणों में देवत्व कहा गया, वह वास्तव में अन्याय और विश्वासघात था।” फुले ने वामन को नैतिक रूप से नायक मानने से इंकार किया और भगवान वामन को छल द्वारा सत्ता हथियाने वाला कहा। वामन अवतार के लिए उन्होंने “बंब्या (अज्ञानी / मूर्ख)”, “घातकी”, “लबाड (झूठा)”, “कृतघ्न” अदि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है।

नृसिंह की कथा (हिरण्यकशिपु वध) को फुले ने “असहमति और विद्रोह को हिंसा से कुचलने” की कथा कहा। नृसिंह उनके लिए धार्मिक आतंक का प्रतीक हैं। उनका मानना था “पुराणों के देवता इतिहास के नायक नहीं, विजेताओं द्वारा गढ़े गए चरित्र हैं।” उनका आरोप था कि देवताओं को सदैव आर्य पक्ष में और असुर/राक्षसों को सदैव दुष्ट दिखाया गया जबकि वे वास्तव में मूल निवासी समुदाय थे।

फुले ने ब्राह्मणों की गायत्री-कथा को आर्य/विदेशी प्रभाव से जोड़ा और गायत्री को “यावनी” (यवन स्त्री / बाहरी स्त्री) के रूप में वर्णित किया।

सन्दर्भ:
Jyotirao Phule, Gulamgiri, 1873
Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit, Manohar
Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule
G P Deshpande (ed), Selected Writings of Jotirao Phule, OUP, 2002
7.ज्योतिबा फुले की नजर में मोहम्मद पैगम्बर और इस्लाम

ज्योतिबा फुले ने पैग़म्बर मुहम्मद को एकेश्वरवाद का प्रवर्तक, समानता का संदेश देने वाला, पाखंड और पुरोहितवाद का विरोधी बताया है। उन्होंने लिखा है,“पैग़म्बर मुहम्मद ने एक ईश्वर का उपदेश देकर मनुष्यों के बीच की ऊँच-नीच को नष्ट करने का प्रयास किया।”

फुले ने इस्लाम को जाति-विहीन धार्मिक व्यवस्था,एकेश्वरवादी जबकि पुरोहितवादी और ब्राह्मणवाद के विपरीत के रूप में वर्णित किया। उन्होंने लिखा है,“इस्लाम में मनुष्य-मनुष्य में जन्म से भेद नहीं माना गया, इसलिए शूद्र-अतिशूद्र समाज ने उसे अपनाया।” “जहाँ ब्राह्मण धर्म जन्म से दास बनाता है, वहाँ इस्लाम मनुष्य को मनुष्य मानता है।”

स्रोत: Jyotirao Phule, Gulamgiri, 1873
Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology, Cambridge University Press
Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma, 1891 G.P. Deshpande (ed।), Selected Writings of Jotirao Phule, Oxford University Press
8.ज्योतिबा फुले की ईसाई धर्म और ईसाई मिशनरियों पर राय

इतिहासकारों और शोधों के अनुसार फुले ने ईसाई मिशनरियों का सकारात्मक उल्लेख किया क्योंकि उन्होंने जातिवादी रूढ़ियों और अंधविश्वास के खिलाफ काम किया और शिक्षा को बढ़ावा दिया। फुले ने पंडिता रामाबाई के ईसाई धर्म अपनाने के अधिकार का खुलकर समर्थन किया। यह उन्होंने अपनी रचना Satsar (The Essence of Truth) में किया है।

फुले ने देखा कि ईसाई धर्म जाति-आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं करता और सभी मनुष्यों में बराबरी पर ज़ोर देता है। शोधकर्ता Nseeb Benjamin कहते हैं कि, “ज्योतिबा फुले ईसाई धर्म के बारे में सहानुभूतिपूर्ण थे और उन्होंने मिशनरियों के काम को सराहा, लेकिन ब्राह्मणों की आलोचना की वजह से ईसाई बनने की बात मिथ्या है।“ फुले ने स्वयं ईसाई धर्म अपनाया नहीं। उनका कोई बपतिस्मा, चर्च सदस्यता या स्वयं की धर्म-परिवर्तन घोषणा का इतिहास नहीं मिलता।

ज्योतिबा फुले ने लिखा है, “ईसाई धर्म में मनुष्य को जन्म से नीच-ऊँच नहीं माना गया है। वहाँ सभी को एक ईश्वर की संतान कहा गया है।” “जिस धर्म में किसी मनुष्य को जन्म से दास नहीं बनाया जाता, वही धर्म मानवता के अधिक निकट होता है।” “मिशनरी लोग शूद्र-अतिशूद्रों को पढ़ाते हैं, जबकि ब्राह्मण धर्म उन्हें अज्ञान में रखना चाहता है।”

स्रोत: Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma, 1891
G. P. Deshpande (ed.), Selected Writings of Jotirao Phule, Oxford University Press
Rosalind O’Hanlon, Caste, Conflict and Ideology, Cambridge University Press
Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit, Manohar
9.ज्योतिबा फुले के भारत में अंग्रेजी शासन के प्रति विचार

ज्योतिबा फुले ने अंग्रेज़ी शासन को राजनीतिक रूप से विदेशी सत्ता माना, लेकिन सामाजिक रूप से उसे ब्राह्मणवादी, पेशवाकालीन शासन से कम दमनकारी बताया। इसलिए वे भारत में अंग्रेजी राज का समर्थन करते थे। उन्होंने लिखा है, “पेशवाओं के राज्य में शूद्र-अतिशूद्र पशु से भी नीच समझे जाते थे, जबकि अंग्रेज़ी शासन में उन्हें कम से कम मनुष्य तो माना गया।” यह तुलना फुले ने बार-बार की है। “अंग्रेज़ों की शिक्षा ने शूद्रों की आँखें खोल दीं, जिन्हें ब्राह्मण धर्म ने सदियों से बंद रखा था।”

फुले ने माना कि अंग्रेज़ी कानून जातिवादी धार्मिक ग्रंथों से स्वतंत्र हैं। इससे शूद्र और अतिशूद्र वर्ग को न्याय मिलने की संभावना बढ़ी।

स्रोत: Jyotirao Phule, Sarvajanik Satyadharma (1891);
G. P. Deshpande, Selected Writings of Jotirao Phule
Dhananjay Keer, Mahatma Jyotiba Phule
गुलामगिरी (1873), शेतकऱ्याचा आसूड (किसानों का कोड़ा, 1883)
Eleanor Zelliot, From Untouchable to Dalit
10.क्या ज्योतिबा फुले भी डॉ आंबेडकर और रामास्वामी पेरियार की तरह भारत में अंग्रेजी शासन का समर्थन करते थे?

ज्योतिबा फुले ने स्वराज्य/राजनीतिक स्वतंत्रता को प्राथमिक मुद्दा नहीं माना। उनका केंद्र सामाजिक समानता, जाति‑दमन उन्मूलन, स्त्री शिक्षा था। अंग्रेज़ी शासन को उन्होंने ब्राह्मणवादी पेशवाकालीन दमन की तुलना में सामाजिक सुधार का अवसर माना। उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन/स्वराज का मुख्य लक्ष्य नहीं अपनाया। उनका प्राथमिक लक्ष्य सामाजिक मुक्ति था, राजनीतिक स्वतंत्रता बाद में भी संभव थी।

कोई भी सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति भी ज्योतिबा फुले के उपर्युक्त दस बिन्दुओं में वर्णित सामाजिक, धार्मिक और राजनितिक विचारों को पढ़कर आसानी से समझ जायेगा कि तथाकथित बुद्धिजीवी और समाज सुधारक का ज्ञान कितना सतही, अज्ञानतापूर्ण से लेकर मूर्खतापूर्ण, सच्चाई से परे से लेकर सच्चाई के विपरीत, पूर्वाग्रह ग्रस्त और काल्पनिक है. मैं सभी दस बिन्दुओं की खामियों को विस्तार से बखिया उधेड़ना शुरू करूँ तो एक किताब भी कम पर जायेगा, इसलिए, एक-एक कर संक्षेप में लेते हैं…

1. फुले चातुर्वर्ण्य व्यवस्था अन्यायपूर्ण, अमानवीय और शोषणकारी मानते थे। उनका मानना था कि जाति जन्म से नहीं, बल्कि सामाजिक शोषण का उपकरण है। वे शूद्रों-अतिशूद्रों को भारत का मूल निवासी मानते थे, जिन्हें आर्य-ब्राह्मणों ने गुलाम बनाया।

वैदिक चातुर्वर्ण्य व्यवस्था कर्म आधारित था जन्म आधारित नहीं. मनुस्मृति के अनुसार सभी जन्म से शूद्र अर्थात अज्ञानी होते हैं कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बनते हैं. परन्तु फुले ने सिर्फ आधे श्लोक का ही प्रचार प्रसार किया कि ब्राह्मण धर्म जन्म से ही लोगों को दास बनाता है इसलिए इस्लाम और ईसाई धर्म श्रेष्ठ है. सवाल है किसे जन्म से दास (शूद्र) कहा गया है – दलित, सवर्ण, अगड़ा, पिछड़ा, क्षत्रिय, ब्राह्मण को किसे? जवाब है सभी को. फिर इन्हें क्यों दिक्कत है? मनुष्य अपने कर्मों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बने यह अच्छा है कि नीच का पुत्र नीच ही कहलायेगा और ब्राह्मण का कुपुत्र भी ब्राह्मण ही कहलायेगा ये अच्छा है?

वैदिक समाज में ब्राह्मण एक पद होता था जिसे कोई भी व्यक्ति अपनी कठोर तपस्या, साधना से प्राप्त ज्ञान, विज्ञान; राष्ट्र, धर्म और समाज की भलाई करने हेतु प्राप्त शक्ति आदि से प्राप्त कर सकता था. वे महान विद्वान, दूरदृष्टा, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, भूगोलवेत्ता, अभियंता, अन्वेषक, खोजकर्ता आदि होते थे. उन्हें ब्राह्मण पद प्राप्ति को कठोर अनुशासित जीवन जीना पड़ता था तथा राष्ट्र, धर्म और समाज हित में विशेष उपलब्धि पानी होती थी. मतंग ऋषि, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, पंडित विदुर, विश्वामित्र आदि अपने कर्मों से ब्राह्मण बने थे जन्म से नहीं.

इसी तरह राष्ट्र, धर्म और समाज की सुरक्षा और शासन करने वाले कोई भी व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता था. राष्ट्र, समाज और परिवार के लिए अर्थोपार्जन करने वाले वैश्य कहलाते थे. प्रारम्भ में तो सिर्फ तीन ही वर्ग थे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य. फिर जैसे-जैसे समाज प्रगति करता गया उन्हें अपने कार्य निष्पादन को सहयोगी की आवश्यकता हुई और शूद्रों अर्थात जो अपने आप में ब्रह्मनत्व, क्षत्रियत्व या वैश्यत्व उत्पन्न करने में असफल रह गये उनसे सहयोग और शारीरिक श्रम लेने लगे जिन्हें आज हम नौकर, चाकर, मजदूर, श्रमिक आदि नामों से जानते हैं.

सोनार, लोहार, कुम्भकार, चर्मकार, धोबी, जुलाहा, बनिया, तेली, बढ़ई, ठठेरा, लकड़हारा, धनुक, कहार, नाई, पासी, किसान, पशुपालक अहीर, ग्वाला आदि व्यापारिक वर्ग थे, वैश्य थे. इनमे से कई विभिन्न कालों में शासक वर्ग भी रहे हैं जैसे नन्द वंश, मौर्य वंश, राजा सुहैलदेव पासी के वंशज राजभर, होलकर, सिंधिया आदि. अविभाजित भारत में 1947 में 565 से अधिक रियासतें थी जिनमें सिर्फ 19-21 रियासतें ही ब्राह्मण शासित थी.

डॉक्टर आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “शुद्र कौन थे” में स्पष्ट लिखा है कि वैदिक शूद्र आज के शूद्र जैसे नहीं थे. वैदिक शूद्र उपर्युक्त वर्णित जैसे ही थे. उन्होंने लिखा है आज के अधिकांश शूद्र क्षत्रियों के ही वंशज हैं. मौर्य काल में भारत में रहे ग्रीक नागरिक मेगस्थनीज के अनुसार भारत में 7 जातियां ही थी:

दार्शनिक (Philosophers): संख्या में कम, लेकिन सर्वोच्च (ब्राह्मण?)।

किसान (Farmers): जनसंख्या में सबसे अधिक (वैश्य?)।

पशुपालक/चरवाहे (Shepherds/Herdsmen) (वैश्य?):

कारीगर (Artisans) (वैश्य?):

योद्धा (Warriors) (क्षत्रिय?):

निरीक्षक/पर्यवेक्षक (Inspectors/Overseers) (नौकरी पेशा, शूद्र?):

सभासद/पार्षद (Councilors/Assessors) (प्रशासक वर्ग?):

विस्तृत जानकारी के लिए निचे पढ़िए:

दलित जातियां दरिद्र बने क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य लोग हैं, भाग-१
2. उन्होंने ब्राह्मणवादी धर्म, जिसे वे आर्य धर्म कहते थे, की आलोचना की। फुले ने वेद-पुराण आधारित ब्राह्मणवादी धर्म को शोषण की व्यवस्था बताया। उनका कहना था कि धार्मिक ग्रंथों का उपयोग शूद्रों को गुलाम बनाए रखने के लिए किया गया।

भारतवर्ष सनातन धर्म से चलता है. ब्राह्मण सनातन धर्म का हिस्सा हैं, कोई ब्राह्मणवादी धर्म नहीं है. भारतवर्ष के लोग सबसे ज्यादा रामायण और महाभारत को पढ़ते और मानते हैं जिनकी रचना क्रमशः वाल्मीकि और व्यास जी ने की थी जो इनके अनुसार शूद्र थे. रामायण या महाभारत में कहीं भी किसी को भी गुलाम बनाने वाली बात नहीं लिखी है. बृहत् सामाज में सामाजिक बुराई आती रहती है, उनके निदान की जरूरत है जैसे वर्णव्यवस्था का जाति व्यवस्था में परिवर्तन सामाजिक बुराई है, कर्म आधारित मनुस्मृति के वर्ण व्यवस्था का जन्म आधारित संवैधानिक जाति व्यवस्था में परिवर्तन सामाजिक बुराई है और उसका दुरूपयोग राजनितिक बुराई है. ब्राह्मण या क्षत्रिय के घर में जन्म लेने मात्र से कोई थोड़े विद्वान और योद्धा बन जायेगा? वैसे ही शुद्र के घर जन्म लेनेवाला व्यक्ति अपने ज्ञान, तपस्या और परिश्रम से क्यों नहीं शासक, प्रशासक, योद्धा, विद्वान अर्थात क्षत्रिय, ब्राह्मण सकता है?

3. ज्योतिबा फुले के अनुसार ब्राह्मणवाद एक ऐसी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था थी जो शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा, ज्ञान और सत्ता से वंचित रखती थी। उन्होंने इसे असमानता और गुलामी का औज़ार कहा।

I. प्राचीन भारत की कुछ प्रमुख विदुषी नारियाँ:

गार्गी वाचक्नवी: वैदिक काल की प्रसिद्ध ऋषि, जिन्होंने राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य से दार्शनिक शास्त्रार्थ किया था।

मैत्रेयी: महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी, जो एक महान दार्शनिक थीं और आत्मज्ञान में रुचि रखती थीं।

लोपामुद्रा: ऋषि अगस्त्य की पत्नी, जिन्होंने ऋग्वेद में कई मंत्रों की रचना की थी।

अपाला: प्रसिद्ध ऋषिका (मंत्र रचने वाली) थीं, जिनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

घोषा: वेदों की प्रकांड विद्वान, जिन्होंने मंत्रों की रचना की थी।

सुलभा: एक योगिनी और ज्ञानी महिला, जिनका उल्लेख दर्शनशास्त्र में मिलता है।

रोमासा, सूर्या, यमी, श्रद्धा, काश्यपी: वेदों में वर्णित अन्य प्रमुख महिला ऋषि अर्थात ज्ञानी पंडित थी।

भारती: 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक और मीमांसा विद्वान मंडन मिश्र की पत्नी। वे स्वयं एक अत्यंत विदुषी और ज्ञानी महिला थीं, जिन्हें सरस्वती का अवतार माना जाता था। उन्होंने ही आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ में निर्णायक (जज) की भूमिका निभाई थी।

II. प्रमुख हिंदू रानियाँ (Hindu Queens):

रानी अहिल्याबाई होल्कर (इंदौर): कुशल प्रशासक और न्यायप्रिय।

रानी लक्ष्मीबाई (झांसी): 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना।

रानी रुद्रमादेवी (काकतीय वंश): दक्षिण भारत की महान शासक।

रानी चेन्नम्मा (कित्तूर): अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाली साहसी रानी।

नायकी देवी (गुजरात): मुहम्मद गोरी को हराने वाली रानी।

रानी दिद्दा (कश्मीर): एक शक्तिशाली शासिका।

रानी दुर्गावती (गोंडवाना): मुगलों के खिलाफ लड़ीं।

इनके अलावा, कोठा रानी (कश्मीर) और चोल रानी कुंतवई आदि भी भारतीय इतिहास में सम्मानजनक स्थान रखती हैं। उपर्युक्त उदहारण ही उनके असत्य को साबित करने के लिए पर्याप्त है.

4. फुले का मानना था कि आर्य (ब्राह्मण) बाहर से आए। उन्होंने मूल निवासियों (शूद्र-अतिशूद्र) को पराजित कर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को नीच घोषित किया।

आर्य कोई जाति वर्ग नहीं थे और न ही वे विदेशी थे. आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत ब्रिटिश साम्राज्यवाद का भारत में खुद को वैध शासक बताने का विभाजनकारी षडयंत्र था ये बहुत पहले साबित हो चूका है. इसलिए जिहादी, वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकार आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत को छोड़कर आर्यों के विस्थापन के सिद्धांत लेकर आये परन्तु वे भी अब ऐतिहासिक, सामाजिक, नृजातीय और वैज्ञानिक शोधों से ध्वस्त हो चूका है. खुद डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत को झूठ और बकबास बता चुके हैं और आज के अधिकांश शूद्रों को क्षत्रियों के वंशज बता चुके हैं. हमारे शोध में तो महार जाति भी क्षत्रिय साबित हुआ है.

भारत पर आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत ब्रिटिश साम्राज्यवादी षड्यंत्र था
5. फुले ने वेद, पुराण और मनुस्मृति को असमानता फैलाने वाले ग्रंथ कहा जो केवल ब्राह्मण प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए रचे गए।

मैं इस विषय पर अपनी टिपण्णी तब दूंगा जब मुझे यह प्रमाण मिल जायेगा कि उन्होंने सचमुच वेद पढ़े थे और अंग्रेजों द्वारा विकृत अनुवादित मनुस्मृति नहीं मूल मनुस्मृति पढ़ा था.

6. दैविक अवतारों पर फुले के विचार भ्रम, भ्रान्ति, अज्ञानता और पूर्वाग्रह का शिकार है. यह वैसा ही है कि रामायण काल्पनिक महाकाव्य है पर शम्बूक इतिहास पुरुष, महाभारत काल्पनिक महाकाव्य है पर कर्ण और एकलव्य इतिहास पुरुष आदि.

वे असुरों, दैत्यों, दानवों और राक्षसों को मूल निवासी शूद्र-अतिशूद्र और देव जातियों, ब्राह्मणों को विदेशी आर्य बताते हैं. क्या इन्हें पता नहीं था देवता और असुर, दैत्य, दानव एक ही ब्राह्मण कश्यप और क्षत्रिय राजा दक्ष की विभिन्न पुत्रियों से उत्पन्न भाई थे? देव जातियों और असुर जातियों का संघर्ष सत्ता संघर्ष था जातीय संघर्ष नहीं? भारत के लोग महाराज मनु के वंशज होने के कारण मानव कहलाते थे, देवता या असुर नहीं. पौराणिक कथायें प्राचीन विश्व इतिहास है भारत का इतिहास नहीं और लोकप्रिय तीन लोक – मानव लोक, असुर लोक और देव लोक में सिर्फ मानव लोक ही भारत में था शेष दो लोक पृथ्वी के अलग अलग हिस्सों में था. इस पर विस्तार से जानकारी के लिए निचे लेख पढ़ें.

क्या अर्बस्थान, अफ्रीका और यूरोप ही पौराणिक असुर लोक था?
भगवान वामन पर उनके विचार उपर्युक्त अज्ञानता का ही परिणाम है. अब देखिए नृसिंह की कथा (हिरण्यकशिपु वध) को फुले ने “असहमति और विद्रोह को हिंसा से कुचलने” की कथा कहा। नृसिंह उनके लिए धार्मिक आतंक का प्रतीक हैं। सवाल है पूरे असुर लोक में सिर्फ एक बालक प्रह्लाद की “असहमति” को हिरण्यकशिपु द्वारा बर्दाश्त नहीं कर उसे नाना प्रकार से कुचलने की कोशिस पर वे मौन हैं पर एक बालक को एक दुष्ट, आतंकी से सुरक्षा की कथा उन्हें धार्मिक आतंक का प्रतीक लग रहा है. क्या ज्योतिबा फुले के एक शूद्र, अतिशूद्र पिता के नाबालिग पुत्र को अपने पिता से “असहमत” होने का अधिकार नहीं है?

7. ज्योतिबा फुले के अनुसार “पैग़म्बर मुहम्मद ने एक ईश्वर का उपदेश देकर मनुष्यों के बीच की ऊँच-नीच को नष्ट करने का प्रयास किया।” इस्लाम जाति-विहीन धार्मिक व्यवस्था है, “इस्लाम में मनुष्य-मनुष्य में जन्म से भेद नहीं माना गया, इसलिए शूद्र-अतिशूद्र समाज ने उसे अपनाया।” “जहाँ ब्राह्मण धर्म जन्म से दास बनाता है, वहाँ इस्लाम मनुष्य को मनुष्य मानता है।”

मुझे लगता है आज इस पर ज्यादा टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है. इस्लाम आज इस कदर नंगा हो चूका है कि यदि अक्ल पर पत्थर और आँखों पर हरा चश्मा न हो तो सब साफ साफ दिखाई देगा ही. फिर भी जिन्हें भ्रम हो वे ऊपर लिंक में इस्लाम का संक्षिप्त इतिहास पढ़कर अपना भ्रम दूर कर सकते हैं और डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर की पुस्तक “पाकिस्तान और पार्टीशन ऑफ़ इंडिया” पढ़ सकते हैं. मैं यहाँ ज्योतिबा फुले की एक कविता सुनाता हूँ. फुले ने “मानव मोहम्मद” नामक एक कविता लिखी थी, जिसमें मोहम्मद की तारीफ की थी:

महंमद हुआ सच्चा मानव

जिसने संसार को त्यागा सत्य के लिये।

झूठा धर्म छोड़कर जग को बताया सही राह।

उसने दुनिया की भलाई के लिये कुरआन लिखा।

हिम्मत का रणवीर, धरती पर वीर पुरुष मंगल करे।

उसे संसार का पालक और मार्गदर्शक माना गया,

जो जात-मत के भेद को तोड़कर सत्य की ओर ले जाये।

उसने अधर्म और मतभेद का विनाश किया,

सबके लिये समानता और एकता को दृढ़ किया।

उसने मोह और अभिलाषा को त्याग दिया,

सबको उदारता से जीवन का सहयोग दिया।

उसने मानवीय हृदय में कल्याण का स्थान दिया,

माया-भक्ति की तुच्छता से ऊपर उठाया।

मूर्ति पूजा के बँधन को उसने तोड़ा,

ढोंगी मतों से लोगों को ईश्वर के प्रति मोड़ा।

ईश्वर को एक बताते हुए उसने ग्रंथ स्थापित किया,

मनोज़गत के सभी जनों को बंधु रूप में स्वीकार किया।

स्रोत: ज्योति फुले वांग्मय, पृष्ठ 607

उपर्युक्त कविता पढ़कर आप आसानी से ज्योतिबा फुले की मानसिक दशा, इतिहास का ज्ञान और धर्म की व्याख्या की क्षमता का अनुमान लगा सकते हैं. शायद फुले को यह भ्रम था कि मोहम्मद, इस्लाम और मुसलमानों ने केवल हिन्दुओं का नरसंहार किया, केवल सनातन धर्म के देवी, देवताओं और मन्दिरों को नष्ट किया इसलिए वे ख़ुशी से मोहम्मद का गाना गा रहे थे.

अगर उन्हें पता होता कि इस्लाम और मुसलमानों ने हिन्दुओं से ज्यादा बौद्धों का नरसंहार किया, बौद्ध मन्दिरों और मठों को नष्ट किया तो शायद वे इतना नहीं खुश हो होते. अगर उन्हें इतिहास, भूगोल का ज्ञान होता और पता होता कि मोहम्मद, इस्लाम और मुसलमानों ने कैसे उनके प्यारे ईसाई धर्म और ईसाईयों को अरब, अफ्रीका से लेकर स्पेन तक खत्म कर दिया, ईसाईयों का नरसंहार किया, चर्चों को तोड़कर मस्जिद बना दिया और ईसाई/यहूदी/बौद्ध स्त्रियों को जिहादी पैदा करने का मशीन बना दिया तब तो वे बिलकुल नहीं उछल रहे होते.

जब इतनी सी बात पता नहीं है जो आज सबको पता है तो सोचिए इन्हें इस्लाम के 82 फिरके, सैकड़ों जातियां, शिया, सुन्नी, अहमदिया, मुहाजिर आदि की हिंसक लड़ाई; विभिन्न फिरकों का भेदभाव जो एक दुसरे के मस्जिदों में नहीं घुसने देने से लेकर एक दुसरे के मस्जिदों को तोड़ने और बम से उड़ाने में दिखाई देता है, कहाँ पता होगा?

भारतीय मुस्लिम समाज में मुख्य रूप से तीन सामाजिक श्रेणियां हैं: अशरफ (उच्च), अजलाफ (मध्यम/पिछड़ी) और अरजाल (दलित)। अशरफ में सैयद, शेख, पठान, मुगल शामिल हैं। अजलाफ में अंसारी (जुलाहा), कुरैशी (कसाई), मंसूरी, राईन, सैफी आते हैं। अरजाल में हलालखोर, भंगी, मेहतर जैसे समुदाय हैं, जो सबसे निचले पायदान पर हैं।

l. अशरफ (उच्च/कुलीन जातियां):

सैयद: पैगंबर मुहम्मद के वंशज माने जाते हैं।

शेख: अरब या स्थानीय उच्च शिक्षित वर्ग।

पठान (खान): अफगान मूल के।

मुगल: मध्य एशियाई मूल।

मलिक: (कुछ संदर्भों में)।

ll. अजलाफ (पिछड़ी/कारीगर जातियां – पसमांदा):

अंसारी (जुलाहा): बुनकरी पेशा।

कुरैशी (कसाई): मांस व्यवसाय।

मंसूरी/धुनिया: कपास धुनने वाले।

राईन/सब्जीफरोश: सब्जी विक्रेता।

सैफी/लोहार: लोहे का काम करने वाले।

सलमानी/नाई: बाल काटने वाले।

मनिहार: चूड़ी बनाने वाले।

lll. अरजाल (सबसे निचली/दलित जातियां – पसमांदा):

हलालखोर/भंगी: सफाई कर्मचारी।

लालवेगी: सफाई कर्मी।

चिक: मांस का काम।

बहना: रुई धुनने वाले आदि.

8. ज्योतिबा फुले ने मिशनरियों के काम को सराहा. उन्होंने लिखा है, “ईसाई धर्म में मनुष्य को जन्म से नीच-ऊँच नहीं माना गया है। वहाँ सभी को एक ईश्वर की संतान कहा गया है।” “जिस धर्म में किसी मनुष्य को जन्म से दास नहीं बनाया जाता, वही धर्म मानवता के अधिक निकट होता है।” “मिशनरी लोग शूद्र-अतिशूद्रों को पढ़ाते हैं, जबकि ब्राह्मण धर्म उन्हें अज्ञान में रखना चाहता है।”

इस सम्बन्ध में भी मैं वही बातें कहूँगा की फुले को इतिहास, भूगोल का तनिक भी ज्ञान नहीं था. उन्हें बिलकुल नहीं पता था कि 312 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच यूरोप में इसाईयत ठीक वैसे ही फैला जैसे अरब में इस्लाम फैलाया गया अर्थात तलवार और जबरन धर्मांतरण द्वारा. उन्हें बिलकुल पता नहीं था कि अफ्रीका और अमेरिका में यूरोपियनों ने उससे भी बर्बर तरीके अपनाकर इसाईयत फैलाया जिन बर्बरता से उन्हें जबरन ईसाई बनाया गया था.

उन्हें शैतान कोलंबस के जघन्य अत्याचारों के बारे में बिलकुल पता नहीं था. उन्हें अफ्रीका और अमेरिका के मूल निवासियों को गुलाम बनाकर व्यापार करने के बारे में बिलकुल कोई जानकारी नहीं था. उन्हें जबरन धर्मांतरण के लिए इसाईयत का सबसे जहरीला हथियार INQUISITION के बारे में बिलकुल पता नहीं था. उतना दूर छोड़िये, अगर उन्हें अपने पड़ोस गोवा का इतिहास पता होता, वहां पुर्तगालियों द्वारा गोवा के लोगों को जबरन ईसाई बनाने के लिए फ्रांसिस जेवियर के नेतृत्व में किये गये जघन्य अत्याचार, हिंसा, कुकर्मों और inquisition के बारे में थोड़ा भी पता होता तो वे एसी बातें कभी नहीं करते. ईसाईयों में भी वैसे ही विभिन्न ऊँच नीच जातियां, फिरके और उनके अलग अलग चर्च हैं जैसे मुसलमानों में है.

9. ज्योतिबा फुले ने लिखा है, “पेशवाओं के राज्य में शूद्र-अतिशूद्र पशु से भी नीच समझे जाते थे, जबकि अंग्रेज़ी शासन में उन्हें कम से कम मनुष्य तो माना गया।” फुले ने माना कि अंग्रेज़ी कानून जातिवादी, धार्मिक ग्रंथों से स्वतंत्र हैं। इससे शूद्र और अतिशूद्र वर्ग को न्याय मिलने की संभावना बढ़ी।

यहाँ मैं उस “पूर्वाग्रह” को विस्तार से बताना चाहूँगा जिसकी चर्चा मैंने पहले की है. दरअसल, ज्योतिबा फुले हों या आंबेडकर दोनों एक ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे और वह था “ब्राह्मण पेशवा से जातीय दुश्मनी” और “पेशवा का शासन”. इन दोनों के विचार और लेखन में पेशवा ही ब्राह्मण का प्रतिनिधित्व करता है, पेशवा का शासन ही ब्राह्मणवादी शोषक शासन है और पेशवा का धर्म ही ब्राह्मण धर्म है. इस पूर्वाग्रह को विस्तार से समझने के लिए निचे लेख पढिएगा पर संक्षेप में यहाँ बताता हूँ.

डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर न दलित थे न अछूत, वे क्षत्रिय थे
महार लड़ाकू जाति थे, सैनिक जाति थे, क्षत्रिय थे. ये छत्रपति शिवाजी से लेकर पेशवा के शासन तक सेना में उच्च पदों पर काम करते थे. अंग्रेजों के आगमन के बाद कुछ महार अंग्रेजी सैनिक में शामिल हो गये जिससे महारों की प्रतिष्ठा मराठा सेना में गिरने लगी जो बाजीराव द्वितीय के समय निचले स्तर तक पहुँच गई. 1 जनवरी 1801 ईस्वी को महारों के बाहुल्य वाली अंग्रेजी सेना ने कोरेगांव के युद्ध में बाजीराव द्वितीय के मराठी सेना को हरा दिया. इतना ही नहीं उन्होंने अंग्रेजों से मराठों के इस हार का जश्न भी मनाया. इससे कुपित होकर मराठों ने ब्रिटिश सेना और जश्न में शामिल महारों को जाति बहिष्कृत (अछूत नहीं) घोषित कर दिया जिसके कारण उन्हें नगर या गाँव के बाहर मांगी जाति के साथ रहना पड़ा जो चमड़े का काम करते थे.

बाद में अंग्रेजों ने भी उन्हें सेना से निकाल दिया जिससे उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती चली गई और उन्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. इसीलिए पेशवा, पेशवा का शासन और पेशवा का धर्म ज्योतिबा फुले और आंबेडकर के लिए विरोध का प्रतीक बन गये और ईसाई धर्म, ईसाई मिशनरी और अंग्रेजी शासन उनके उद्धारक, उनके पालक, संरक्षक और माई बाप बन गये. अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के कारण उन्हें भारत में अत्याचारी, हत्यारे, लूटेरे और शोषक अंग्रेजी शासन जरुरी लगने लगा, वे भारत में अंग्रेजी राज के समर्थक बन गये और आंबेडकर गर्व से कहने लगे कि दलितों (वास्तव में महारों) के बदौलत ही अंग्रेज भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हुए.

रही बात उनकी न्यायव्यवस्था की तो भारत में कमोवेश आज भी अंग्रेजों का ही न्यायव्यवस्था और पुलिस प्रशासन लागू है जो क्रमशः भारत की सबसे भ्रष्ट पहली और दूसरी संस्था है. इनसे न्याय मिलने की उम्मीद किस दलित, शूद्र, अतिशूद्र, पिछड़े और सवर्ण को है मुझे पता नहीं पर इतना दावे से कह सकता हूँ कि देश के बड़े बड़े भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, माफिया, जिहादियों और अपराधियों को इनसे न्याय की पूरी उम्मीद रहती है और पूरी भी होती है.

उपसंहार:
उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो गया है कि ज्योतिबा फुले का ज्ञान अधुरा, अज्ञानता, भ्रम, कल्पना पर आधारित और पूर्वाग्रह से ग्रस्त था. उन्हें इतिहास, भूगोल और सच्चाई का बिलकुल ज्ञान नहीं था. इसका परिणाम यह हुआ कि भोली भाली जनता जो उन्हें अपना आदर्श मानते थे वे भटक गये. वे दिग्भ्रमित होकर अपने ही राष्ट्रीय पहचान, धर्म, संस्कार और समाज का विरोध करने लगे और फुले की माने तो वे मुसलमान और ईसाई धर्म अपनाने लगे. वे आक्रमणकारी, बर्बर, हिंसक, लम्पट, लूटेरे मुसलमानों और अंग्रेजों के सहयोगी बन गये और उनकी सत्ता भारत में स्थापित करने में सहयोगी बन गये जिससे देश, धर्म और समाज का अवर्णनीय नुकसान हुआ.

इससे भी घातक बात यह हुई की इनके बह्काबे में आकर जोगिन्द्रनाथ मंडल जैसे कई नेता उत्पन्न हो गये जो अपने ही देश के विभाजन का समर्थन करने लगे और पाकिस्तान बनने में न सिर्फ मदद किया बल्कि दलितों को बरगलाकर पाकिस्तान के पक्ष में वोटिंग भी करवाया. वे लाखों दलित हिन्दुओं को पाकिस्तान और बांग्लादेश ले गये और वहां पाकिस्तान में मंत्री बन गये. लाखों करोड़ों दलित हिन्दू बौद्ध पाकिस्तान में इन सबके बह्काबे में आकर रह गये. उनकी क्या दुर्दशा हुई और हो रही है यह किसी से छिपी बात नहीं है.

जोगेन्द्रनाथ तो खुद मुसलमानों के डर से भागकर भारत वापस आ गये पर जो इनके भरोसे पाकिस्तान, बांग्लादेश में रह गये थे और साथ गये थे वे करोड़ों हिन्दू, दलित, बौद्ध मुसलमानों द्वारा कत्ल कर दिए गये, रेप किये गये, उनके घरों मकानों को लूट लिया गया और उन्हें जबरन मुसलमान बना दिया गया. पाकिस्तान में तो वे लगभग खत्म हो चुके हैं, बांग्लादेश में उन्हें खत्म किया जा रहा है जिसकी दुखद सूचना हमें रोज मिल रही है.

आवश्यकता इस बात का है कि अज्ञानी, कनवर्टेड, पूर्वाग्रह से ग्रस्त, राजनीतिक स्वार्थ में अंधे, अंग्रेजों के मोहरे और गुलाम मानसिकता वाले कुबुद्धिजीवियों, चाहे वे कल के हों या आज के, उनका महिमामंडन बंद होना चाहिए और सत्य का शोधन कर उनकी खामियों और उसके सामाजिक, धार्मिक, राजनितिक दुष्परिणामों से जनता को अवगत कराना चाहिए ताकि भोली भाली जनता फिर किसी जोगिन्द्रनाथ मंडल के बह्काबे में आकर अपने ही देश, धर्म और समाज से गद्दारी न करे और विधर्मियों द्वारा मारे, पिटे, लुटे और बलित्कृत होने से बचे.

लेखक: मुकेश कुमार वर्मा

अस्वीकरण: इस लेख में ऐतिहासिक तथ्यों के आलावा लिखित या व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. इससे सहमत होना या न होना पाठकों के विवेक पर निर्भर है. हमारा बेबसाईट इसके लिए किसी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा.

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