दिपके और वांगचुक का सपना बांग्लादेश दोहराना? पाक को भी मौका

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के बीच सीजेपी फाउंडर अभिजीत दिपके का एक बेहद सनसनीखेज बयान सामने आया है. मीडिया के तीखे सवालों का जवाब देते हुए दिपके ने कबूल किया कि प्रदर्शन के दौरान उनके पास 30-40 हजार लोग थे और वे चाहते तो दिल्ली को बांग्लादेश बना देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके साथ ही उन्होंने अस्पताल से सोनम वांगचुक का पत्र भी पढ़ा, जिसमें अनशन जारी रखने का एलान है.

राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संसद चलो आंदोलन और जंतर-मंतर पर सुरक्षाबलों के साथ हुई हिंसक झड़प के बाद अब इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की एक बेहद खतरनाक और चौंकाने वाली इनसाइड स्टोरी सामने आई है. मीडिया और इंटरनेट पर उठ रहे तीखे सवालों के बीच सीजेपी फाउंडर अभिजीत दिपके का एक बेहद सनसनीखेज बयान सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों और देश के नीति-नियंताओं के कान खड़े कर दिए हैं. दिपके ने सार्वजनिक रूप से कबूल किया है, “हम चाहते तो बांग्लादेश बना देते… लेकिन हमने ऐसा नहीं किया.”

सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं.

सीजेपी नेता का यह बयान साफ तौर पर यह इशारा करता है कि दिल्ली में शांतिपूर्ण आंदोलन के नाम पर जुटाई गई भीड़ से देश की राजधानी को एक बड़े और हिंसक तख्तापलट या अराजकता की ओर धकेलने की पूरी क्षमता और तैयारी बैकग्राउंड में मौजूद थी.
30-40 हजार की भीड़ और हमारा एक कॉल’
अभिजीत दिपके ने इंटरनेट और मीडिया पर उन पर लग रहे भरोसा तोड़ने और पीछे हटने के आरोपों का जवाब देते हुए यह विस्फोटक बयान दिया. उन्होंने प्रदर्शन की आक्रामकता और अपने पास मौजूद मैनपावर का हवाला देते हुए कहा:

दिपके का यह दावा बेहद गंभीर है. हाल ही में बांग्लादेश में हुए हिंसक तख्तापलट, आगजनी और अराजकता की यादें अभी ताजा हैं, जहां भीड़ ने प्रधानमंत्री आवास और संसद तक पर कब्जा कर लिया था. दिल्ली के प्रदर्शन के बीच बांग्लादेश बना देने जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह साफ करता है कि आंदोलनकारियों के दिमाग में किस स्तर की हिंसा और उथल-पुथल की रूपरेखा घूम रही थी.
अस्पताल से सोनम वांगचुक का पत्र पढ़ते हुए किया ऐलान
इस विस्फोटक बयान के साथ ही अभिजीत दिपके ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का एक पत्र भी पढ़कर सुनाया. दिपके ने पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाई पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पुलिस ने आज जंतर-मंतर पर जो करतूत की है और जिस तरह से धरना मंच को उखाड़ा है, उसे देखते हुए सोनम वांगचुक ने अस्पताल के बेड से ही अपना अनशन जारी रखने का फैसला किया है. सीजेपी नेताओं का कहना है कि वे दिल्ली पुलिस के इस एक्शन के आगे झुकने वाले नहीं हैं और मुख्य मंच हटाए जाने के बाद भी उनका विरोध प्रदर्शन केरल हाउस के सामने और अन्य रणनीतिक जगहों पर जारी रहेगा.
आंदोलन या सुनियोजित अराजकता?
अभिजीत दिपके के इस बांग्लादेश वाले एंगल ने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की क्रोनोलॉजी को संदिग्ध बना दिया है. यह बयान तब आया है जब दिल्ली पुलिस पहले ही संसद क्षेत्र और आसपास के इलाकों में हुए हिंसक टकराव में अपने 50 से अधिक जवानों के घायल होने की बात कह चुकी है और 70 से ज्यादा उपद्रवियों को हिरासत में लिया गया है. एक तरफ जहां पुलिस सीसीटीवी और वीडियो फुटेज खंगालकर दंगाइयों की पहचान कर रही है, वहीं सीजेपी नेतृत्व का यह खुलेआम स्वीकार करना कि उनके पास दिल्ली को बांग्लादेश जैसी हिंसक अराजकता में झोंकने की ताकत थी, इस बात का पक्का सबूत है कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन की आड़ में देश की राजधानी को बंधक बनाने की एक बहुत बड़ा और भयावह षडयंत्र रची जा रहा था।

पाकिस्तानी खुराफात 

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बीच पाकिस्तानी हैंडल्स ने सोशल मीडिया पर झूठा दावा किया कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भारतीय सेना तैनात कर दी है और हथियारों के इस्तेमाल से कई मौतें हुई हैं. भारतीय सेना और दिल्ली पुलिस ने त्वरित फैक्ट-चेक जारी कर इस दुष्प्रचार को पूरी तरह खारिज किया और स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था केवल दिल्ली पुलिस और CAPF संभाल रहे हैं.

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के चलो संसद मार्च और जंतर-मंतर पर मचे घमासान के बीच भारत विरोधी ताकतों ने देश के माहौल बिगाड़ने का एक बेहद घृणित षडयंत्र रचा था. दिल्ली की सड़कों पर चल रहे नागरिक प्रदर्शनों की आड़ लेकर सीमा पार पाकिस्तान से संचालित प्रोपेगैंडा सोशल मीडिया हैंडल्स ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की सुरक्षा एजेंसियां बदनाम करने को एक झूठी टूलकिट एक्टिव कर दी. हालांकि, इस बार भारतीय सेना और दिल्ली पुलिस के त्वरित फैक्ट-चेक ने तुरंत एक्‍शन लेते हुए पाकिस्तान के इस झूठ के गुब्बारे की हवा निकाल दी और उसकी अक्ल ठिकाने लगा दी.

पाकिस्‍तान की तरफ से गलत जानकारी फैलाई जा रही है.

इस डिजिटल हमले के पीछे का मुख्य मकसद दिल्ली में जारी छात्र और नागरिक आंदोलन का सहारा लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाना और देश के भीतर गृह-युद्ध जैसी अफवाहें फैलाकर पैनिक क्रिएट करना था.

पाकिस्तानी हैंडल्स का वो झूठ
पाकिस्तान समर्थित और कई संदिग्ध सोशल मीडिया हैंडल्स ने एक सोची-समझी साजिश के तहत कुछ विजुअल्स और तस्वीरों को इंटरनेट पर वायरल करना शुरू कर दिया. इन पोस्ट्स में झूठे दावे किए गए कि दिल्ली में प्रदर्शनों को दबाने के लिए भारतीय सेना को सड़कों पर उतार दिया गया है. बात यहीं नहीं रुकी, प्रोपेगैंडा फैलाते हुए यहां तक कह दिया गया कि सेना संसद भवन के पास प्रदर्शनकारियों पर सीधे बंदूकें तान रही है और इस हथियारों के इस्तेमाल से कई लोगों की मौत और दर्जनों घायल हो चुके हैं.
इस डिसइन्फॉर्मेशन पैटर्न में नागरिक विरोध प्रदर्शनों के पुराने या असंबंधित फुटेज को उठाया गया, उसे सेना की फर्जी तैनाती के साथ जोड़ा गया ताकि दुनिया के सामने यह नैरेटिव सेट किया जा सके कि भारत अपने ही नागरिकों के खिलाफ सैन्य बल का इस्तेमाल कर रहा है.

सेना मैदान में नहीं, दिल्ली पुलिस और CAPF संभाल रहे मोर्चा
जैसे ही यह दुष्प्रचार सोशल मीडिया पर फैलना शुरू हुआ, भारतीय सेना के आधिकारिक फैक्ट-चेक विंग और दिल्ली पुलिस ने मिलकर मोर्चा संभाला और पूरे सच को देश और दुनिया के सामने रख दिया.
कोई सेना तैनात नहीं: आधिकारिक स्पष्टीकरण में साफ किया गया कि नई दिल्ली में प्रदर्शनों को संभालने के लिए भारतीय सेना की कोई तैनाती नहीं की गई है.
कानून-व्यवस्था पूरी तरह पुलिस के हाथ: दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने का जिम्मा पूरी तरह से दिल्ली पुलिस और अन्य नामित कानून-प्रवर्तन इकाइयों जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के हाथों में है.
पूरी तरह से भ्रामक दावे: दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरें फैलाने वालों को सख्त चेतावनी दी और नागरिकों से अपील की कि वे ऐसी किसी भी अपुष्ट और झूठी खबरों पर विश्वास न करें.

सोनम वांगचुक का अनशन रहा ‘फ्लॉप’, हर तिकड़म के बाद भी अन्ना आंदोलन की तरह क्यों नहीं मिला जनसमर्थन

सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अभिजीत दीपके की प्लानिंग और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में किया जा रहा अनशन आंदोलन समाप्ति की ओर बढ़ता दिख रहा है. सोमवार को संसद मार्च फ्लॉप होने के बाद सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त कर दिया. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि सोनम वांगचुक 2011 के अन्ना आंदोलन की तरह माहौल क्यों नहीं बना पाए. अन्ना हजारे के मुकाबले लंबे समय तक अनशन करने के बाद भी जन समर्थन क्यों नहीं मिल पाया. आइए इन तमाम सवालों के जवाब पांच प्वाइंट में समझते हैं.

 

सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अभिजीत दीपके के आह्वान पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन आंदोलन करीब-करीब समाप्ति की ओर है. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त कर दिया है. अभिजीत दीपके की तरफ से इंस्टाग्राम पर कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक पेज बनाया गया, जिसपर मिलियन में फॉलोअर आ गए. इसके बाद NEET समेत देशभर में तमाम नौकरियों और एंट्रेंस एग्जॉम के पेपर लीक के खिलाफ सख्त नियम बनाए जाने की मांग को लेकर अनशन आंदोलन शुरू किया गया है.

अन्ना हजारे से ज्यादा दिन अनशन करके भी जनसमर्थन क्यों नहीं जुटा पाए सोनम वांगचुक?

28 जून से राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन आंदोलन किया जा रहा है. इस आंदोलन की अगुवाई सोनम वांगचुक कर रहे हैं. वह 22 दिनों से अनशन पर हैं. हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से सरकार से उनकी सेहत का ध्यान रखने को कहा, जिसके बाद बिना यूनिफॉर्म में पहुंची पुलिस ने उन्हें धरना स्थल से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया है. इस आंदोलन में यूं तो कई डिमांड हैं, लेकिन पेपर लीक की तात्कालिक जवाबदेही तय करने के नाम पर शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है.
इस आंदोलन का मकसद था कि वह सोमवार से शुरू हो रहे संसद की कार्यवाही के दौरान वहां घेराव करेंगे और मजबूती से सरकार तक अपनी बात पहुंचाएंगे. हालांकि सोनम वांगचुक पहले से ही अस्पताल में हैं और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते संसद भवन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे युवाओं को रास्ते में ही रोक दिया गया.

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के पास कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल लोगों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों की ओर से लाठीचार्ज किए जाने और आंसू गैस का इस्तेमाल किए जाने के बीच अफरा-तफरी की स्थिति उत्पन्न हो गई. संसद के निकट भारतीय रिजर्व बैंक के नजदीक सीजेपी के कम से कम सात प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. सुरक्षाबलों ने भारतीय रिजर्व बैंक के पास प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया. संसद के कुछ गेट कुछ देर के लिए बंद कर दिए गए. वहीं सुरक्षा बलों ने जब ताबड़तोड़ आंसू गैस के गोले दागे तो प्रदर्शनकारी तितर-बितर हो गए।

इन तमाम घटनाक्रम के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर सोनम वांगचुक की ओर से शुरू किया गया अनशन आंदोलन 2012-13 के अन्ना हजारे वाले अनशन के मुकाबले कमजोर क्यों रहा. वांगचुक को अन्ना की तरह जन समर्थन क्यों नहीं मिला. आइए इस बात को पांच प्वाइंट में समझें।                

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