देहरादून में बंजर आबाद करने को सरकारी मदद से बसाये थे “ग्रांट”
देहरादून के इतिहास में बंजर भूमि को बसाने के लिए दी जाने वाली ग्रांट या सरकारी मदद का बहुत बड़ा महत्व रहा है। सन् 1838 में यहाँ मुख्य रूप से नौ बड़ी ग्रांट थीं, जिनमें एटिक फार्म, आर्केडिया, मारखम, इनिसफेल, इंडेव फार्म, होपटाउन, कारगी, बधौत, भारूवाला और नागला शामिल थीं। मारखम और इंडेव को छोड़कर बाकी सभी जमीनें पछवादून क्षेत्र में थीं। इनमें से आर्केडिया ग्रांट देहरादून से लगभग चार मील पश्चिम में साढ़े पांच हजार एकड़ में फैली हुई थी, जबकि इनिसफेल ग्रांट यमुना नदी के किनारे स्थित थी। इन सभी जमीनों का कुल क्षेत्रफल 72 वर्ग मील था। सरकार ने इन बंजर जमीनों को आबाद करने के लिए बहुत आसान शर्तें रखी थीं। ग्रांट पाने वाले लोगों को बस यह करना था कि वे बीस साल के भीतर झाड़ियों और पेड़ों को साफ करके उस पूरी जमीन को खेती के लायक बना दें।
जमीन मिलने के कुछ समय बाद आर्केडिया, होपटाउन, एटिक फार्म और मारखम ग्रांट के मालिकों ने अपने फायदे के लिए मिलकर ‘कग्रेगर एंड कम्पनी’ नाम से एक खेती की कंपनी बनाई, जिसमें 40 शेयर थे। लेकिन यह कोशिश पूरी तरह नाकाम रही, क्योंकि इसमें स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किया गया था, सिंचाई के साधनों की भारी कमी थी और जमीनों का आकार इतना बड़ा था कि उन्हें संभालना बहुत मुश्किल था। इसके बाद भी भारतीय और यूरोपीय व्यापारी बंजर जमीनें लेने के लिए आगे आते रहे। सबसे बड़ी मारखम ग्रांट को बाद में सरकार ने वापस ले लिया था। इसके अलावा जौली ग्रांट और माजरी ग्रांट भी काफी बड़ी थीं, लेकिन बड़े आकार के कारण कोई भी व्यापारिक कोशिश कामयाब नहीं हो सकी।
धीरे-धीरे दून घाटी में बड़े जमींदारों का असर बढ़ने लगा। डूंगा के जमींदार चौधरी शिवराम के उत्तराधिकारी चौधरी दिगंबर सिंह के पास माजरी की लिस्टर ग्रांट जैसी कीमती जमीन थी। उन्होंने जौली ग्रांट का भी एक हिस्सा खरीदा और अपने गांव के पास कई और गांव खरीद लिए। इसी तरह देहरादून के वकील ज्योति स्वरूप पूर्वी दून में मारखम ग्रांट खरीदने के बाद बहुत बड़े भू-स्वामी बन गए। बनिया बिरादरी में ‘घटा बनिया’ के नाम से मशहूर नन्दलाल, प्रताप सिंह और मनराम तुलसीराम ने स्थानीय रावत जमींदारों को कर्ज देकर उनकी अधिकांश संपत्तियां अपने नाम कर ली थीं। उन्होंने कंडोली का एक बहुत कीमती जंगल, जिसकी कीमत करीब एक लाख रुपये थी, एक गरीब किसान से सिर्फ एक हजार रुपये में खरीद लिया था।
पछवादून क्षेत्र में तिमली के चौधरी रामसिंह गूजर के पास आसन नदी के दक्षिण के कई गांव और उत्तर का फतेहपुर इलाका था। जस्सूवाला के ममराज सिंह और रामपुर के पंडित फकीरचंद भी बड़े जमींदार थे। यहाँ के पुराने भू-स्वामियों में बंजारों का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि बंजारे यहाँ सबसे पहले आकर बसने वाले लोगों में से थे, जो अपनी जमीन का टैक्स गढ़वाल के राजा को देते थे। जीवन गढ़ ग्रांट का एक हिस्सा और रामपुर उन्हीं के पास था, जिसका सबूत आज भी देहरादून का ‘बंजारावाला’ गांव है। लार्ड केनन के शासनकाल में साल 1861 में जमीनों के नियम बदले और सामान्य भूमि तीन रुपये प्रति एकड़ और जंगल साफ की हुई जमीन पांच रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से बेची जाने लगी, जबकि दलदली जमीनों के दाम कम रखे गए।
ब्रिटिश सरकार ने 1857 की क्रांति में वीरता दिखाने वाले कुछ सैनिकों और अफसरों के परिवारों को इनाम के तौर पर टैक्स-फ्री जमीनें भी दी थीं। जैसे, रेनोरपुर ग्रांट कैप्टन रेनोर के बच्चों को मिली, बालावाला ग्रांट कैप्टन फोरेस्ट के परिवार को और बरसी ग्रांट सेकेंड गोरखा राइफल्स के सूबेदार वीर सिंह थापा को दी गई थी। इसी तरह सूबेदार मेजर जुधवीर सिंह को भी पूर्वी दून में एक छोटा क्षेत्र मिला था।
कृषि के क्षेत्र में लक्ष्छीवाला की 970 एकड़ जमीन पर सैम्युअल कुनलिफ लिस्टर ने दून घाटी में पहली बार रेशम के कीड़े पालने का सफल प्रयोग किया था, और पछवादून का ‘लिस्टरपुर’ गांव आज भी उन्हीं के नाम पर है। जनरल रॉबर्ट डिक ने डालनवाला में 942 एकड़ की एस्टेट खरीदी थी, लेकिन 1846 में सिख युद्ध में उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी ने इसे भारतीय व्यापारियों को बेच दिया।
आर्थिक जमींदारी के अलावा दून घाटी का एक बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक संस्थाओं को दान में मिला हुआ था, जिस पर कोई टैक्स नहीं लगता था। देहरादून के गुरु राम राय गुरुद्वारे के महंत के पास देहराखास, धरतावाला, मेहूंवाला, पंडितवाड़ी, राजपुर और चामासारी जैसे बड़े क्षेत्र थे। इसके अलावा डोभालवाला की जमीन बद्रीनाथ मंदिर को, प्रेमपुर और जाखन केदारनाथ को, ऋषिकेश और तपोवन भरत जी को, और गोरखपुर तथा जोगीवाला गुरु गोरखनाथ को समर्पित थे। इनमें से कई जमीनों को अंग्रेजों के आने से पहले ही गढ़वाल के राजाओं या गोरखा शासकों ने धार्मिक कार्यों के लिए मान्यता दे दी थी।

