नेपाल भीषण बाढ़ का क्या था कारण? ISRO ने आपदा से पूर्व-पश्चात सैटेलाइट तस्वीरों से दर्शाया संपूर्ण चित्र
नेपाल पर नई आफत चेताई चीन ने, 3 दिनों में टूट सकती है बॉर्डर पास बनी बैरियर झील
चीन की सरकारी मीडिया ने तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में तीन लोगों की मौत और 558 लोगों के लापता होने की खबर दी, जिनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल थे. चीन के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि नेपाल की तरफ लगभग 100 चीनी नागरिक लापता थे.
नई दिल्ली/काठमांडू,पेइचिंग 27 अगस्त 2026।नेपाल पर नई आफत की चीन ने दी चेतावनी, अगले 3 दिनों में टूट सकती है बॉर्डर के पास बनी एक बैरियर झीलबाढ़ से पहले ही तबाही झेल रहे नेपाल को चीन की नई वार्निंग बड़े सदमे से कम नहीं.चीन ने चेतावनी दी है कि नेपाल बॉर्डर के पास बनी एक बैरियर झील अगले 3 दिनों में टूट सकती है. ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने चीनी अधिकारियों के हवाले से बताया कि नेपाल में छोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदियों के संगम के पास बनी बैरियर झील के तीन दिनों में टूटने का खतरा है. यह चेतावनी तब आई है जब चीन-नेपाल बॉर्डर इलाके में अचानक आई भयानक बाढ़ के कारण सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग लापता हैं.
कितना बड़ा है खतरा
चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने बताया कि बृहस्पतिवार सुबह तक झील में 20 लाख (2 मिलियन) क्यूबिक मीटर पानी जमा हो गया था और यह पहले से ही ओवरफ्लो थी. सरकारी ब्रॉडकास्टर CCTV की रिपोर्ट के अनुसार, अगले तीन दिनों में झील में और 30 लाख (3 मिलियन) क्यूबिक मीटर पानी आने की आशंका है, जिससे इसके टूटने का खतरा बढ़ जाएगा. मंत्रालय ने कहा कि वह झील पर बारीक नज़र रखे है और झील टूटने की आशंकित स्थिति से निपटने और आपातकालीन बचाव कार्यों में मदद को बाढ़ सिमुलेशन और जोखिम का आकलन कर रहा है.
अलग-अलग आंकड़े
तिब्बत में ग्लेशियर टूटने से चीन-नेपाल बॉर्डर पर भयानक बाढ़ और मडस्लाइड (कीचड़ का बहाव) आ गई. दोनों देशों के अधिकारियों ने 273 लोगों की मौत और 1,300 से ज़्यादा लोगों के लापता होने की जानकारी दी है, हालांकि डेटा इकट्ठा करने, उसकी पुष्टि करने और तालमेल में अंतर से अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में फ़र्क है. नेपाल पुलिस ने 270 लोगों की मौत और 826 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दी है.
भारतीयों पर भी आफत
बाद में नेशनल टूरिज़्म बोर्ड ने बताया कि लापता लोगों में 517 विदेशी नागरिक शामिल थे, जिनमें उस इलाके में आए पर्यटक और तीर्थयात्री भी थे. लापता विदेशी नागरिकों में सबसे ज़्यादा भारतीय है. भारत के 288 लोग लापता हैं, जिनमें से ज़्यादातर के बारे में माना जाता है कि वे हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल कैलाश यात्रा जा रहे थे. अमेरिका ने 65 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दी है, जबकि मलेशिया के 51, यूक्रेन के 53, ऑस्ट्रेलिया के 35 और ब्रिटेन के 33 लोग लापता बताए गए.
तिब्बत में भी शोक
चीन में, सरकारी मीडिया ने तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में तीन लोगों की मौत और 558 लोगों के लापता होने की खबर दी, जिनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल थे. चीन के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि नेपाल की तरफ 100 चीनी नागरिक लापता थे. चीनी अधिकारियों ने प्रभावित इलाकों में इमरजेंसी रिस्पॉन्डर, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान, इंजीनियरिंग टीमें, टेलीकॉम ऑपरेटर और राहत संगठन तैनात हैं. बचाव टीमों को मुश्किल रास्तों, लगातार बारिश और आगे और आपदाओं के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।
नेपाल में विनाशकारी बाढ़ से अभी तक 160 मौतें हो चुकी है.750 लोग लापता हैं.जिसमें भारत के भी 133 जन शामिल हैं. इसरो ने सैटेलाइट इमेज से इस आपदा के कारण बताये हैं.
नेपाल में आई भीषण बाढ़ का क्या था कारण? ISRO ने आपदा से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों से बताई पूरी कहानी
ISRO ने नेपाल में आई बाढ़ से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए इसकी वजह पर बड़ा खुलासा किया है.
नेपाल विनाशकारी बाढ़ का कारण क्या था? आखिर हिमालय की चोटियों पर ऐसा क्या हुआ कि इतनी भयानक जलप्रलय आयी? नेपाल के रसुवा क्षेत्र में विनाशकारी फ्लैश फ्लड से अभी तक 160 जनों की मौत हो चुकी है.750 जन लापता हैं.इनमे भारत के भी 133 जन हैं. इस भीषण बाढ़ की तस्वीरें और वीडियो बुधवार दोपहर बाद से ही सोशल मीडिया पर वायरल हैं. जिसे देखकर हर कोई सहम जा रहा है. पुल, होटल, सड़क, टॉवर सब पानी के भीषण वेग में बहते दिख रहे हैं. नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है. भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से तस्वीरें उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने विनाश के पैमाने का आकलन किया और वे घटनायें समझने की कोशिश की, जिनसे हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई.
4.9 तीव्रता से आये भूकंप से टूटा ग्लेशियर
अभी भारत के 56 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं. NRSC के शुरुआती विश्लेषण में, आपदा तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में शुरु हुई. वैज्ञानिकों के अनुसार 4.9 तीव्रता के भूकंप ने संभवतः एक सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) प्रभावित किया, जिससे उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया. इससे बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ, जो तेजी से नीचे घाटी की ओर बढ़ा. इससे भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर अचानक नीचे बहा. इससे त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई और व्यापक विनाश हुआ. सैटेलाइट इमेज स्टडी करते वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्क ग्लेशियर के ढहने और उससे आइस-रॉक एवलॉन्च इस आपदा की सबसे संभावित वजह है.
बुधवार सुबह 8 बजकर 22 मिनट पर आया था भूकंप
उल्लेखनीय हो कि भारत के भूकंप निगरानी नेटवर्क ने सुबह 8 बजकर 22 मिनट (भारतीय समयानुसार) 10 किलोमीटर की गहराई पर 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया था. नेपाल का समय भारत से 15 मिनट आगे है. राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार, भूकंप का केंद्र 28.076 अक्षांश और 86.494 देशांतर पर था, जो रसुवा क्षेत्र के पास है. हिमालयी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील है.
आपदा से पहले और बाद के सैटेलाइट इमेज के आधार पर विश्लेषण
आपदा के प्रभाव और विस्तार को समझने के लिए हैदराबाद स्थित NRSC ने क्विक जियोग्राफिकल असेसमेंट किया. वैज्ञानिकों ने यूरोपीय सेंटिनेल-2 उपग्रह के 24 अगस्त 2026 को ली गई आपदा-पूर्व तस्वीरों की तुलना ISRO के रिसोर्ससैट-2ए द्वारा 26 अगस्त 2026 को हासिल की गई आपदा के बाद की तस्वीरों से की. इसके अलावा 4 अप्रैल 2026 की रिसोर्ससैट-2ए तस्वीरों की भी नवीनतम चित्रों से तुलना कर भू-भाग में आए बदलावों और नुकसान का आकलन किया गया.
नेपाल में आई बाढ़ की वजह को बताती ISRO की यह रिसर्च इन दो सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित है.
सैटेलाइट इमेज की स्टडी में नदी के बहाव में दिखे बदलाव
आपदा से पहले और बाद के सैटेलाइट इमेज की स्टडी में नदी के बहाव में बड़े बदलाव दिखे. कई हिस्सों में मलबे के जमाव और बाढ़ के संकेत मिले. इन तस्वीरों की मदद से वैज्ञानिकों ने प्रभावित इलाके का मानचित्र तैयार किया और समझा कि पहाड़ी भूभाग में आपदा किस तरह विकसित हुई. यह घटना एक बार फिर प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की अहमियत को बताती है.
चक्रवात, भूस्खलन, बाढ़ और जंगल की आग जैसी घटनाओं के कारण को समझने के लिए सैटेलाइट इमेजिंग स्टडी आज की सबसे प्रमाणिक स्टडी मानी जाती है. रसुवा फ्लैश फ्लड के मामले में भी आपदा से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करके वैज्ञानिकों ने आपदा के कारणों को समझाया है.
US जियोलॉजिकल सर्वे ने भी यहीं बताई वजह
US जियोलॉजिकल सर्वे ने भी यहीं कहाई बताई है. US जियोलॉजिकल सर्वे ने कहा कि नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियर के ढहने से भूकंप जैसी हलचल हुई और निचले इलाकों में भयानक असर पड़ा. एजेंसी ने कहा कि भूकंप के तौर पर बताई गई हलचल असल में ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव की घटना थी, जिसके कारण बाद में निचले इलाकों में भयानक असर हुआ.
सर्क ग्लेशियर क्या होता है? जिसके टूटने से आई इतनी भीषण आपदा
इस भीषण सैलाब के सेंटर में सर्क ग्लेशियर की भूमिका महत्वपूर्ण है. सर्क ग्लेशियर पर्वतों की ढलानों पर कटोरे के आकार में बनते हैं, जहां लंबे समय तक बर्फ जमा होती रहती है. ये ग्लेशियर ऊंचाई वाले क्षेत्रों से आने वाले हिमस्खलनों से भी तैयार होते हैं. जब भौगोलिक या जलवायु संबंधी कारणों से इनकी स्थिरता प्रभावित होती है, तो बर्फ और चट्टान तीजे से नीचे की ओर खिसकता है. इसरो की शुरुआती स्टडी के अनुसार तिब्बत में संभवतः यही प्रक्रिया हुई.
आइस रॉक एवलॉन्च ने पहले नदी के बहाव को रोका, फिर तेजी से नीचे आया मलबा
उपग्रह चित्रों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि घटनाक्रम में पहले आइस-रॉक एवलॉन्च हुआ, जिसने नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया. इसके बाद पानी जमा होकर एक अस्थायी झील जैसी स्थिति बनी और फिर अचानक अवरोध टूटने से भारी मात्रा में पानी और मलबा तेजी से नीचे की ओर बह निकला. इसी कारण यह पर्वतीय धंसाव विनाशकारी बाढ़ में बदल गया.
इस आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में चिंताएं बढ़ा दी हैं. यहां के नाज़ुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र, तीखी ढलानें और विशाल ग्लेशियर नेटवर्क ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जहां भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियर ढहना और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं. इससे इनकी भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन दोनों ही चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं.
भारत पर खतरा कम, क्योंकि आपदा का उद्गम स्थल 200 किमी दूर
NRSC का यह शुरुआती आकलन मुख्य रूप से घटना की मैपिंग और वैज्ञानिक समझ पर केंद्रित है, लेकिन क्षेत्र से परिचित कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर इसका प्रत्यक्ष खतरा सीमित हो सकता है. आपदा का उद्गम स्थल भारत-नेपाल सीमा से 200 किलोमीटर से अधिक दूर है. इसलिए सबसे गंभीर प्रभाव संभवतः तिब्बत और नेपाल के प्रभावित नदी गलियारों तक ही सीमित रहेंगे. ISRO ने भारत पर संभावित प्रभाव को लेकर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है.


