बाबरी मस्जिद पोस्ट पर मुकदमा निरस्त करने से सुको की “न”

Supreme Court Justices Surya Kant And Joymalya Bagchi Rejects Talha Abdul Rahman Plea To Quash Criminal Case Over Social Media Post
बाबरी मस्जिद, अश्लील पोस्ट… तल्हा अब्दुल रहमान की याचिका निरस्त,सुप्रीम कोर्ट ने कहा- टिप्पणी करवाने की कोशिश मत करो
उच्चतम न्यायालय ने बाबरी मस्जिद पर सोशल मीडिया पोस्ट में एक व्यक्ति का आपराधिक मामला निरस्त करने से मना कर दिया,जिसमें कहा गया था कि ‘बाबरी मस्जिद एक दिन तुर्की की सोफिया मस्जिद की तरह फिर से बनाई जाएगी’।

नई दिल्ली 28 अक्टूबर2025 : सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला निरस्त करने से मना कर दिया, जिस पर बाबरी मस्जिद को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट करने का आरोप है। आरोपित ने पोस्ट में बाबरी मस्जिद बनाए जाने को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट लिखी थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्य बागची की बेंच ने एडवोकेट तल्हा अब्दुल रहमान (याचिकाकर्ता की ओर से) का तर्क सुन मामला निरस्त करने से मना कर दिया। इस बीच याची ने मामला वापस लेने की गुहार लगाई। कोर्ट ने मामला वापस लेने की अनुमति देते हुए याचिका निरस्त कर दी।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल की पोस्ट में कोई अश्लीलता नहीं थी। उन्होंने कहा कि एक अन्य व्यक्ति ने उस पोस्ट पर अश्लील और भड़काऊ टिप्पणी की थी, जिसकी जांच नहीं की गई। जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता की पोस्ट को देखा है और टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि हमसे कोई टिप्पणी करवाने की कोशिश मत कीजिए। अदालत ने यह कहते हुए मामला निपटा दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सभी तर्कों पर ट्रायल कोर्ट अपने विवेक से विचार करेगा।

6 अगस्त 2020 को याचिकाकर्ता मंसूरी (जो अब कानून स्नातक हैं) के विरुद्ध मुकदमा लिखा गया था। आरोप था कि उन्होंने फेसबुक पर एक अपमानजनक पोस्ट की थी,जिस पर एक अन्य व्यक्ति ने हिंदू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी की।

प्रथम सूचना रिपोर्ट भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 292, 505(2), 506, 509 और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 67 में लिखी गई थी। बाद में लखीमपुर खीरी के जिलाधिकारी ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA),1980 में नजरबंदी का आदेश जारी किया,जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सितंबर 2021 में निरस्त कर दिया।

इस वर्ष, ट्रायल कोर्ट ने मंसूरी के खिलाफ दायर चार्जशीट पर संज्ञान लिया,जिसके बाद उन्होंने मामला निरस्त कराने को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मंसूरी का कहना था कि उनका अकाउंट हैक हो गया था और उनकी पोस्ट में कोई आपराधिक भावना या सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने का उद्देश्य नहीं था।

Why Supreme Court refuses to quash criminal case over Babri Masjid Facebook Post Justices Surya Kant
ऐसा मत कहो, वरना परिणाम भुगतने होंगे; जस्टिस सूर्यकांत की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने कानून के एक छात्र के खिलाफ फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया। पोस्ट में था कि बाबरी मस्जिद भी एक दिन फिर से बनाई जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे तुर्की में सोफिया मस्जिद फिर से बनायी गयी थी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने कहा कि उन्होंने संबंधित फेसबुक पोस्ट देखी है और उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। अदालत ने कहा कि अभियुक्त के उठाए गए सभी बचाव के बिंदु ट्रायल कोर्ट में अपने गुण-दोष के आधार पर विचार किए जा सकते हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।

मामला क्या है
यह मामला 2020 में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता ने बाबरी मस्जिद से जुड़ी एक “आपत्तिजनक” पोस्ट फेसबुक पर अपलोड की थी। यह पोस्ट 5 अगस्त 2020 को डाली गई थी- वही दिन जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन हुआ था।

इस पोस्ट में लिखा था, “बाबरी मस्जिद भी एक दिन फिर से बनाई जाएगी, जैसे तुर्की में सोफिया मस्जिद को दोबारा बनाया गया।” पुलिस ने इस पोस्ट को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील बताया और याचिकाकर्ता के खिलाफ मामला दर्ज किया।

याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा कि यह पोस्ट संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग मात्र थी, जिसमें कोई भड़काऊ या अभद्र भाषा नहीं थी। उन्होंने कहा कि कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां तीसरे पक्ष के अकाउंट्स से आई थीं जिन्हें गलत तरीके से उनके नाम से जोड़ दिया गया।

उन्होंने यह भी बताया कि जांच के दौरान यह सामने आया कि उन अकाउंट्स में से एक फर्जी प्रोफाइल थी, जिसे किसी अन्य व्यक्ति ने संचालित किया था। इसके बावजूद केवल उन्हीं के खिलाफ कार्यवाही जारी रखी गई। याचिकाकर्ता ने यह भी जिक्र किया कि इसी फेसबुक पोस्ट के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) में एक साल से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था, जिसे बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2021 में निरस्त कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में बहस
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पोस्ट में कोई अश्लीलता नहीं थी और जो आपत्तिजनक शब्द हैं, वे किसी अन्य व्यक्ति की टिप्पणी में थे। इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “कृपया हमें इस पर टिप्पणी करने के लिए न कहें।” वकील ने आग्रह किया कि न्यायालय कम से कम पोस्ट को देख ले। इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “हमने आपकी पोस्ट देखी है, कई बार पढ़ी है।”

जब वकील ने बार-बार कहा कि अदालत ने पोस्ट नहीं देखी, तो न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कठोर चेतावनी दी, “ऐसा मत कहिए कि हमने नहीं देखी। यदि आप ऐसा व्यवहार करेंगे, तो आपको इसके परिणाम भुगतने होंगे।” आखिरकार, याचिकाकर्ता के वकील ने यह कहते हुए याचिका वापस ले ली कि वे नहीं चाहते कि कोई ऐसी टिप्पणी हो जो उनके ट्रायल में बचाव को प्रभावित करे। अदालत ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी।

राम मंदिर फैसले को चुनौती देने वाले वकील पर 6 लाख का जुर्माना, कोर्ट ने कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

कोर्ट ने वकील महमूद प्राचा पर कुल ₹6 लाख का जुर्माना लगाया है, जिसमें से ₹1 लाख निचली अदालत पहले ही लगा चुकी थी और अब जिला न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने ₹5 लाख की अतिरिक्त पेनल्टी जोड़ दी है.

वकील ने अपनी याचिका में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के फैसले को अमान्य घोषित करने की मांग की थी.

पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड के बयान को आधार बनाते हुए राम मंदिर के फैसले को रद्द कराने की मांग करने वाले वकील को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने वकील महमूद प्राचा पर कुल ₹6 लाख का जुर्माना लगाया है, जिसमें से ₹1 लाख निचली अदालत पहले ही लगा चुकी थी और अब जिला न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने ₹5 लाख की अतिरिक्त पेनल्टी जोड़ दी है. अदालत ने कहा कि प्राचा की याचिका तुच्छ, भ्रमपूर्ण और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वाली है.

प्राचा ने अपनी याचिका में 2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के फैसले को शून्य और अमान्य घोषित करने की मांग की थी. उन्होंने दावा किया था कि तब के न्यायाधीश और वर्तमान में पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने एक भाषण में स्वीकार किया था कि अयोध्या फैसला भगवान श्री राम लला विराजमान से प्रदत्त समाधान था, जिससे न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठता है.

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जस्टिस चंद्रचूड़ के भाषण का गलत अर्थ निकाला गया. न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने कहा कि पूर्व CJI ने केवल ईश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना करने की बात कही थी, जो पूरी तरह आध्यात्मिक अभिव्यक्ति थी, न कि किसी प्रकार का पक्षपात या बाहरी प्रभाव. अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता कानूनी व्यक्तित्व (Juristic Personality) और ईश्वर के बीच के फर्क को समझने

कोर्ट ने जजेज प्रोटेक्शन एक्ट, 1985 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों के विरुद्ध इस तरह की दीवानी कार्रवाई प्रतिबंधित है. अदालत ने प्राचा के कदम को कानून को मजाक बनाने की प्रवृत्ति बताया और कहा कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए कड़ा जुर्माना आवश्यक है.

अपने फैसले में न्यायाधीश राणा ने टिप्पणी की कि कुछ लोग न्यायपालिका और सार्वजनिक पदाधिकारियों को बदनाम करने का दुरुपयोग कर रहे हैं. स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब रक्षक ही शिकारी बन जाए. अंततः अदालत ने निचली अदालत का फैसला बनाये रखते हुए प्राचा की अपील निरस्त कर दी और उन पर लगाया गया जुर्माना बढ़ाकर ₹6 लाख कर दिया.

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