विस्थापितों की आफत कि विस्थापित ही आफत?

20 जून। विश्व विस्थापित (Refugee) दिवस
आज दुनिया मे सबसे ज्यादा विस्थापित मुस्लिम हैं। इन्हे प्रायः उन देशो से निकाला गया है जो शरिया के अनुसार चलते हैं। परन्तु क्या इन्होने कभी अपने शरणदाता का उपकार माना? नहीं
1-इस्लामिक एस्टेट से भागकर यूरोप में आये शरणार्थियो के उत्पात ने यूरोपीय देशो को बता दिया है कि “इस्लाम शान्ति का मजहब है और इस्लाम और अपराध का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है”.
जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की उदारवादी आप्रवासी नीति के कारण साल 2015 में जर्मनी में अनुमान से ज्यादा मुस्लिम शरणार्थी आ गए जिनकी अनुमानित संख्या करीब 11 लाख बतायी जा रही है।
जर्मनी के कोलोन में 31 दिसंबर 2015 की रात ने जर्मनी में सब कुछ बदल दिया।
जो जर्मन मुस्लिम शरणार्थियों का स्वागत कर रहे थे, उस रात ने उनके अंदर न सिर्फ शरणार्थियों के प्रति बल्कि पूरे इस्लाम के प्रति नफरतों के बीज बो दिए।
न सिर्फ जर्मनी बल्कि पूरे विश्व में इस घटना क्रम ने सनसनी फैला दी, जिसके प्रभाव पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाने पर ले रहे हैं।
कोलोन में 31 दिसंबर 2015 की रात जर्मन लड़कियों पर यौन हमले हुए। जांच में सामने आया कि ये हमले करने वाले लोग मुस्लिम शरणार्थी थे। उस रात लगभग 1,200 शिकायतें आईं जिनमें से 500 से ज्यादा यौन हमलों की थीं। इस घटना ने पूरे जर्मनी को दहला दिया जगह जगह से शरणार्थियों के विरोध की आवाजें सुनाई देने लगीं हैं.
2-बेल्जियम ने पहले मोरक्को और तुर्की से और बाद में अल्जीरिया व ट्यूनीसिया से भी 1974 तक प्रवासी श्रमिक बुलाए। समय के साथ उन्हें अपने परिवार भी बेल्जियम लाने की छूट दे दी गई।
1960 से आस पास के मुस्लिम देशों से मुस्लिमों का आना शुरू हो गया। सरकार ने समरसता बनाते हुए 1974 में इस्लाम को एक धर्म की मान्यता भी दे दी। जिसको देश की सभी सुविधाएं और समानता का अधिकार दिया जाने लगा। आज बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में 350 से अधिक मस्जिदें हैं। यह ना भूलें की यह एक श्रमिक की भांति देश में लाये गए थे।
बेल्जियम स्कूलों में मुस्लिम छात्र सरकारी खर्चे पर अपने धर्म की कुरान की शिक्षा ले सकते है। मुस्लिम जैसा सभी देशों में करते है अपनी जनसंख्या को शून्य से पांच दशक में 10% तक बढ़ा ली। राजधानी ब्रसेल्स में 35% तक आ चुकी हैं। जर्मन में हेब्दो चार्ली के आतंकी इसी स्थान से थे। बेल्जियम अब आतंक का अड्डा बन गया है। बेल्जियम को शरीयत से चलाने की कोशिशों ने जोर पकड़ लिया है। यहाँ हर एक को 12 वर्ष तक पढ़ाई और वोट देने का कानून है। अभी चुनाव में मात्र दो काउंसलर है पर होने बाले चुनाव में इस्लामिक पार्टी ने एलान किया है कि यदि उसकी पार्टी जीतती है तो देश में शरिया लागू कर दिया जाएगा।
3-
यूरोप और इस्लामी दुनिया की समझ रखने वाले लेखक विचारक डेनियल पाइप्स इस पर अपनी राय बड़ी संजीदगी से रखते हुए कहते है कि मुसलमानों की उत्साही आस्था जिहादी सक्षमता और इस्लामी सर्वोच्चता की भावना से यूरोप की क्षरित ईसाइयत से अधिक भिन्न है. इसी अन्तर के चलते मुसलमान यूरोप को धर्मान्तरण और नियन्त्रण के परिपक्व महाद्वीप मानते हैं. डेनियल कुछेक मुस्लिम धर्म गुरुओं के अहंकारी सर्वोच्च भाव से युक्त दावों के उदाहरण सामने रखते है जैसे उमर बकरी मोहम्मद ने कहा “ मैं ब्रिटेन को एक इस्लामी राज्य के रूप में देखना चाहता हूँ. मैं इस्लामी ध्वज को 10 डाउनिंग स्ट्रीट में फहराते देखना चाहता हूँ”. या फिर बेल्जियम मूल के एक इमाम की भविष्यवाणी “ जैसे ही हम इस देश पर नियन्त्रण स्थापित कर लेंगे जो हमारी आलोचना करते हैं हमसे क्षमा याचना करेंगे. उन्हें हमारी सेवा करनी होगी. तैयारी करो समय निकट है. डेनियल इससे भी आगे बढ़कर एक ऐसी स्थिति का चित्र भी खींचते हैं जहाँ अमेरिका की नौसेना के जहाज यूरोप से यूरोपियन मूल के लोगों के सुरक्षित निकास के लिये दूर-दूर तक तैनात होंगे.
प्रोफेसर थॉमस होमर-डिक्सन कहते हैं कि इस्लामिक शरणार्थी यूरोप के लिए चुनौती बड़ी है. क्योंकि ये मध्य-पूर्व और अफ्रीका के अस्थिर इलाकों के क़रीब है. यहां की उठा-पटक और आबादी की भगदड़ का सीधा असर पहले यूरोप पर पड़ेगा. हम आतंकी हमलों की शक्ल में ऐसा होता देख भी रहे हैं. अमरीका, बाक़ी दुनिया से समंदर की वजह से दूर है. इसलिए वहां इस उठा-पटक का असर देर से होगा.जब अलग-अलग धर्मों, समुदायों, जातियों और नस्लों के लोग एक देश में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे, तो झगड़े बढ़ेंगे. पश्चिमी देशों में शरणार्थियों की बाढ़ आने के बाद यही होता दिख रहा है. वहीं कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि हो सकता है पश्चिमी सभ्यताएं ख़त्म ना हों लेकिन उनका रंग-रूप जरूर बदलेगा. लोकतंत्र, उदार समाज जैसे फलसफे मिट्टी में मिल जाएंगे. चीन जैसे अलोकतांत्रिक देश, इस मौक़े का फायदा उठाएंगे. ऐसा होना भी एक तरह से सभ्यता का पतन ही कहलाएगा. किसी भी सभ्यता की पहचान वहां के जीवन मूल्य और सिद्धांत होते हैं. अगर वही नहीं रहेंगे, तो सभ्यता को जिंदा कैसे कहा जा सकता है? यह आज यूरोपियन लोगों का सबसे बड़ा सवाल है.
4-भारत मे घुसे हुए बंगलादेशी और रोहींग्या शरणार्थी नहीं घुसपैठिए हैं।
उन अघोषित घुसपैठियों में से आधे तो पुरानी सरकारों में नागरिकता पा भी चुके हैं किन्तु बहुतों के पास कोई कागजात नहीं है । असली आक्रोश उनके लिये ही है । उनकी संख्या करोड़ों में है,जबकि CAA का लाभ तो मुट्ठी भर गैर−मुस्लिमों को मिल रहा है । अतः आक्रोश इस का है कि उन अवैध करोड़ों का क्या होगा जो न भारत के बन सके और न अब बांग्लादेश या पाकिस्तान के ही रहे । वे शरणार्थी भी नहीं हैं और न ही उत्पीड़ित।वे उन लोगों के अंश हैं जिन्होंने भारत के टुकड़े करके पाकिस्तान ले लिये थे । जिनको पिछली केन्द्र सरकारों अथवा दिल्ली वा बंगाल आदि की राज्य सरकारों ने गलत तरीके से भारतीय होने के कागजात दे दिये हैं।जैसे कि आधारकार्ड,वोटर कार्ड,राशन कार्ड आदि,उनको भी भय है कि कहीं उनके इतिहास की छानबीन न होने लगे । ऐसे सात करोड़ घुसपैठिये आक्रोशित हैं और उनके करोड़ों मित्र भी ।
लंबे समय तक लेफ्ट फ्रंट का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है, पर वहां भी जेलों में आधे कैदी मुसलमान हैं. बंगाल में सदैव सेकुलर पार्टियों का राज रहा. यही नहीं, महाराष्ट्र में हर तीसरा तो उत्तर प्रदेश में हर चौथा कैदी मुसलमान है.
जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी और सिक्किम के अलावा देश के अमूमन हर सूबे में मुसलमानों की जितनी आबादी है, उससे अधिक अनुपात में मुसलमान जेल में हैं.
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विस्थापित अथवा शरणार्थी  शब्द किसी क्षेत्र या परिस्थिति के कारण अपने मूल स्थान से बेघर हुए लोगों को दर्शाता है। दुनिया भर में विस्थापन का कारण बनने वाली घटनाओं के आधार पर उनके धर्म /पंथ/संप्रदाय अलग हो सकते हैं, जैसे:

मध्य पूर्व (सीरिया, इराक, अफगानिस्तान): इन क्षेत्रों से विस्थापित अधिकतर लोग इस्लाम के अनुयायी हैं।

यूक्रेन: यहाँ के विस्थापितों (या शरणार्थियों) में मुख्यत: ईसाई धर्म (रूढ़िवादी और कैथोलिक) के अनुयायी शामिल हैं।

म्यांमार (रोहिंग्या संकट): म्यांमार से विस्थापित अधिकांश लोग इस्लाम को मानते हैं।

तिब्बत: तिब्बती शरणार्थियों का मुख्य धर्म बौद्ध धर्म है। भारत विभाजन में हिंदू-सिख विस्थापित हुये। फिर इस्लामिक आतंक से  कश्मीर से पंडित विस्थापित हुए।

विश्व में विस्थापितों (शरणार्थियों और अपने ही देश में बेघर हुए लोगों) में सबसे अधिक संख्या ईसाईयों की है। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों (Migrants) और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्थापित होने वाले समूहों में ईसाई धर्म के लोगों की संख्या  सबसे ज्यादा है。विस्थापितों और प्रवासियों से जुड़े कुछ मुख्य तथ्य :

ईसाई : यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी और विस्थापित समूह है। प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, कुल अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों में लगभग 47% लोग ईसाई धर्म से संबंधित हैं।

इस्लाम: इस धर्म के लोग विस्थापित समूहों में दूसरे स्थान पर आते हैं। वैश्विक प्रवासियों में लगभग 29% हिस्सेदारी मुस्लिम समुदाय की है।अन्य: इनके अलावा बौद्ध, हिंदू और बिना किसी धर्म से जुड़े (नास्तिक) लोग अन्य विस्थापित समूहों में शामिल हैं。

कारण: युद्ध, आर्थिक संकट और धार्मिक उत्पीड़न के कारण दुनिया भर में पलायन की स्थिति उत्पन्न होती है。

ईसाई प्रवासियों (Christian Migrants and Refugees) का विस्थापन मुख्य रूप से आर्थिक अवसरों, पारिवारिक पुनर्मिलन और धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए होता है। विश्व स्तर पर ईसाई सबसे बड़ा प्रवासी समूह हैं, जो मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, रूस, और स्पेन जैसे देशों में शरण या निवास लिए हुए हैं। दुनिया भर में ईसाई प्रवासियों (कुल ~13.1 करोड़) के अपना प्रमुख गंतव्य देश और मार्ग :

संयुक्त राज्य अमेरिका: यह ईसाई प्रवासियों को सबसे बड़ा केंद्र हैं।यहाँ मुख्य रूप से मैक्सिको, फिलीपींस और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों से आए लाखों ईसाई बसे हैं。

जर्मनी: यह दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा देश है जहाँ विदेशी  ईसाई ( 84 लाख ) रहते हैं। यहाँ ज्यादातर ईसाई पोलैंड और अन्य यूरोपीय देशों से आते हैं。

रूस: यह तीसरा सबसे लोकप्रिय गंतव्य है।यहाँ विस्थापित होकर रहने वाले ईसाइयों की संख्या 72 लाख से अधिक है जो मुख्य रूप से यूक्रेन, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान से आते हैं。

स्पेन: यह देश लैटिन अमेरिका और यूरोप के ईसाई प्रवासियों के लिए एक प्रमुख पनाहगाह के रूप में उभरा है。

अन्य देश: कई एशियाई (जैसे भारत और फिलीपींस) और अफ्रीकी ईसाई भी खाड़ी देशों, यूनाइटेड किंगडम (UK) और कनाडा में रहते हैं。

हिंसा, संघर्ष और उत्पीड़न से विस्थापित  ईसाइयों की संख्या नाइजीरिया में सबसे अधिक है, जहाँ  1.6 करोड़  से अधिक ईसाई उप-सहारा अफ्रीका क्षेत्र (सब-सहरा अफ्रीका) में अपने ही घरों से विस्थापित हुए हैं। दुनिया भर में विस्थापित या प्रवासी ईसाइयों की स्थिति और उनके मूल देशों का विवरण:

नाइजीरिया और कांगो (DRC): सब-सहरा अफ्रीका में हिंसा के कारण 1.6 करोड़ ईसाई आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं। कांगो (DRC) और नाइजीरिया में विस्थापन के मामले सबसे ज्यादा  हैं।

मेक्सिको: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी ईसाइयों की संख्या मेक्सिको में सबसे अधिक है। यहाँ से लगभग 1.13 करोड़ ईसाई अन्य देशों (मुख्य रूप से अमेरिका) में विस्थापित/प्रवास कर चुके हैं।

रूस: लगभग 78 लाख ईसाई प्रवासियों के साथ रूस दूसरे स्थान पर है।

मुस्लिम विस्थापित 

संयुक्त राष्ट्र (UNHCR) और Pew Research Center के अनुसार, मुख्य रूप से तुर्की में सबसे अधिक 39 लाख मुस्लिम विस्थापित और शरणार्थी रहते हैं। ये विस्थापित मुख्य रूप से सीरिया, अफगानिस्तान और इराक जैसे देशों के नागरिक हैं।दुनिया भर में मुस्लिम विस्थापितों (शरणार्थियों) की स्थिति कुछ इस प्रकार है:

तुर्की: लगभग 39 लाख  विस्थापित। यहाँ मुख्य रूप से सीरियाई युद्ध के कारण विस्थापित हुए लोग रहते हैं।जॉर्डन: लगभग 22 लाख  से अधिक फिलिस्तीनी और सीरियाई शरणार्थी।

ईरान: लगभग 27 से 30 लाख  मुख्य रूप से अफगान और इराकी शरणार्थी।

लेबनान: लगभग 15 लाख  सीरियाई और फिलिस्तीनी विस्थापितों को आश्रय दे रहा है।

पाकिस्तान: 21 लाख  मुख्य रूप से अफगान शरणार्थी। वहीं, आंतरिक रूप से विस्थापितों (IDPs) में सीरिया और सूडान में अपने ही देश में विस्थापित हुए मुस्लिमों की संख्या सबसे अधिक (करोड़ों में) है।

असम में मुस्लिम घुसपैठ

असम के जनगणना अधीक्षक, ब्रिटिश अधिकारी एससी मुलान, आईसीएस ने 1931 में लिखा था, “…पूर्वी बंगाल के जिलों से जमीन के भूखे बंगाली अप्रवासियों की एक विशाल भीड़ का आक्रमण; जिनमें ज्यादातर मुसलमान हैं…”।

सीमा पुलिस से लेकर विदेशी न्यायाधिकरणों और राष्ट्रीय जनगणना (एनआरसी) तक, वर्षों से ‘अवैध अप्रवासियों’ की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और निर्वासित करने को उठाए गए विभिन्न उपायों के मिश्रित परिणाम रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से, बंगाली भाषी कई मुस्लिम, जो अपनी कृषि क्षमता को जाने जाते थे, ब्रिटिश प्रशासकों ने उपजाऊ ब्रह्मपुत्र घाटी में प्रवास करने को प्रोत्साहित किए गए थे, जिन्होंने घने जंगल कृषि भूमि में परिवर्तित कर दिये। यह प्रक्रिया बिहार और छोटा नागपुर के पठारों से असम के चाय बागानों में वनवासियों के अक्सर जबरन  प्रवास के समान थी। ब्रिटिश खजाना भरने, राजस्व देने वाले आंतरिक प्रवास, एससी मुलान जैसे अधिकारियों के पहचान को बढ़ावा देने से ‘असम में अवैध अप्रवासियों’ का प्रश्न उठा।

अवैध अप्रवासी या प्राकृतिक विकास?
गणितज्ञ और गुवाहाटी विश्वविद्यालय में सांख्यिकी के पूर्व प्रोफेसर अब्दुल मन्नान का ‘ इनफिल्ट्रेशन: जेनेसिस ऑफ असम मूवमेंट ‘ में तर्क है कि असम के कुछ जिलों में मुसलमानों की अधिक आबादी (जनगणना आंकड़ों के अनुसार) के दो कारण हो सकते हैं – अवैध आप्रवासन या प्राकृतिक वृद्धि। उन्होंने पाया कि 0-6 वर्ष के बच्चों की अच्छी खासी संख्या है। जनसंख्या में यह वृद्धि मुस्लिम समुदाय में गरीबी और परिणामस्वरूप कम उम्र में शादियों के कारण है। दक्षिण सालमारा में मुस्लिम आबादी का 24% हिस्सा 0-6 वर्ष की आयु के बच्चे हैं।

भूमि निगलने वाली, ‘अवैध अप्रवासी पैदा करने वाली नदियाँ
महान ब्रह्मपुत्र (और असम की कई अन्य प्रमुख और छोटी नदियों) की सहायक नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती हैं, जिससे भूभाग जलमग्न हो जाता है, नदियाँ और चरागाह डूब जाते हैं और कभी-कभी नई भूमि उभर आती है। असम में यह भौगोलिक प्रक्रिया कुछ ही वर्षों में पूरी हो सकती है। ऐसे विस्थापित हुए लोग नदी के दूसरे किनारे अस्थायी गाँव बसा लेते हैं और अंततः उन्हें नावों से दूसरे जिले में ले जाकर सरकार भूमि दे देती है। इनमें ग्रामीण बंगाली हिंदू और मुस्लिम हैं।

हिंसा प्रभावित असम के आंतरिक शरणार्थी
असम में कौन निवासी है, कौन नागरिक है और कौन अवैध अप्रवासी है, यह सवाल राज्य भर में हिंसा की कई घटनाओं का कारण बना है। 1984 में नेल्ली की घटना से लेकर 1993 में कोकराझार-बोंगाईगांव की घटना तक, हिंसा की हर घटना ने आंतरिक शरणार्थियों की एक लहर पैदा की, जो कुछ समय शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद धीरे-धीरे और अनिवार्यत: राज्य के अन्य हिस्सों में बस जाते हैं।

अभिलेखों से तय हो सकता है कि कौन भारतीय है?
2015 में, तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली असम सरकार ने असम समझौते में राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण (एनआरसी) अद्यतन करने का निर्णय लिया। समझौते ने असम में आप्रवासी विरोधी आंदोलन के खूनी अध्याय का अंत किया था। एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का उद्देश्य यह निर्धारित करना और पंजीकृत करना है कि कौन भारतीय है। असम में दशकभर की इस प्रक्रिया ने, 19,00,000 से अधिक लोगों को एनआरसी से बाहर कर उन्हें stateless घोषित कर दिया, जिनमें से 7 लाख हिंदू हैं। बहिष्कृत लोग विभिन्न भारतीय जनजातियों जैसे राभा, सोनवाल, खरबी आदि से आते हैं। मुसलमानों की संख्या 4.86 लाख है। एनआरसी से महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित हैं। विवाह और दूरदराज के गांवों में स्थानांतरण से महिलाओं को अक्सर अपने अभिलेखों को लेकर जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। अक्सर उनका मायका अभिलेख देने को तैयार नहीं होता, या वे शादी के बाद अपने निवास स्थान के क्षेत्र में अभिलेख बनवा लेते हैं, जिससे और भी जटिलताएं होती हैं।

क्या शरणार्थी अवैध अप्रवासी हैं?
दक्षिण एशिया के तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान और बांग्लादेश के शरणार्थियों/अवैध अप्रवासियों को भारत में शरण मिली है। अन्य क्षेत्रों तिब्बत, श्रीलंका, अफगानिस्तान और म्यांमार से आये विस्थापितों का प्रबंधन कुछ हद तक व्यवस्थित किया गया है।  बांग्लादेशी शरणार्थियों/अवैध अप्रवासियों की संख्या पर बड़े पैमाने पर ध्यान नहीं दिया गया है।

बांग्लादेशी प्रवासियों को अक्सर रोहिंग्या समझ लिया जाता है। हालांकि, राष्ट्रीय राजस्व पंजीकरण (एनआरसी) की स्क्रीनिंग प्रक्रिया रोहिंग्याओं की स्क्रीनिंग को निर्धारित नहीं है। उन शरणार्थियों को संयुक्त राष्ट्र में पंजीकृत किया जाता है। रोहिंग्या बंगाली भी नहीं हैं। वे म्यांमार के पूर्व अराकान साम्राज्य से हैं और 2017 में हुए नरसंहार बाद 14 लाख रोहिंग्याओं में से 7 लाख से अधिक ने दुनिया भर के देशों में शरण ली।

जिन देशों ने रोहिंग्या शरणार्थियों को स्वीकार किया
यूएसए 12000
यूएई 50000
भारत 20,000
बांग्लादेश 1,000,000
स्रोत: रॉयटर्स , अल जज़ीरा

अन्य शरणार्थियों के अलावा, 12000 को अमेरिका भेजा गया, 50000 को संयुक्त अरब अमीरात भेजा गया, और भारत ने 20,000 रोहिंग्रिया शरणार्थियों को स्वीकार किया।

रोहिंग्या विस्थापित और राज्यविहीन लोग हैं, जो देश भर में फैले शरणार्थी शिविरों में रहते हैं। लेकिन उनका मुस्लिम होना ही सत्ता में बैठे सबसे शक्तिशाली लोगों द्वारा उन पर लगाए गए घृणित आरोपों का कारण बन गया है। उत्पीड़न से भाग रहे शरणार्थियों के अधिकारों और विस्थापन के मुद्दे को “अवैध अप्रवासियों” के साथ जोड़कर, इस्लाम और मुस्लिम देशों को “छिपी हुई साजिश” के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया जा रहा है।

भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले प्रवासियों के मुद्दे को व्यवस्थित रूप से हल करने के बजाय, आज चरमपंथी दक्षिणपंथी नेता आम भारतीय मुसलमानों को परेशान कर रहे हैं: “बांग्लादेशी” जैसे अपमानजनक शब्द का लगातार इस्तेमाल उन्हें असुरक्षित और दोयम दर्जे का नागरिक साबित करने के लिए किया जा रहा है। विशेष रूप से असम और पश्चिम बंगाल राज्यों से कई मामले सामने आए हैं, जहां भारतीय मुसलमानों को अधिकारियों द्वारा गलत तरीके से हिरासत में लिया जाता है और उन्हें अवैध बांग्लादेशी प्रवासी करार दिया जाता है। असम में, भाजपा के एक अन्य चरमपंथी दक्षिणपंथी नेता और राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, राज्य में रहने वाले बंगाली मुस्लिम समुदाय के साथ खुलेआम भेदभाव और उत्पीड़न कर रहे हैं । बंगाली प्रवासी, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, पूरे देश में कलंकित हैं, जबकि वे देश की श्रम शक्ति का आधार हैं।

अश्विनी उपाध्याय कौन हैं?
अश्विनी उपाध्याय पूर्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता भी रह चुके हैं। हालांकि, अपनी राजनीतिक कुशलता से कहीं अधिक, वे मुख्य रूप से सांप्रदायिक मुद्दों से संबंधित मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर करने के अपने तीक्ष्ण रुझान के लिए जाने जाते हैं। उपाध्याय ने भारत की सर्वोच्च अदालत में कई जनहित याचिकाएं दायर की हैं, जिनमें हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने की याचिका से लेकर मुगल शासकों के नाम पर रखे गए कई स्थानों के नाम बदलने की मांग तक शामिल हैं। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार , उपाध्याय ने 5 वर्षों में 50 जनहित याचिकाएं दायर करने का रिकॉर्ड बनाया है। उनके कई दावे, विशेष रूप से सोशल मीडिया पर, अक्सर मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति स्पष्ट पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं। ये दावे, जिनमें से चार को मुख्य न्यायाधीश ने खारिज कर दिया है, अक्सर गलत सूचना और दुष्प्रचार की सीमा पर होते हैं।

यहां उस व्यक्ति का विस्तृत परिचय दिया गया है।

 

नफरत को प्रभावी ढंग से और शीघ्रता से खत्म करना आवश्यक है। इसके प्रसार को रोकने में व्यापक नागरिक भागीदारी महत्वपूर्ण है।

 

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