सांप्रदायिक ग्रेगरियन कैलेंडर राष्ट्रीय हो गया और राष्ट्रीय संवत्सर धार्मिक?
#ग्रेगरियन_कैलेंडर_और_संवत्सर_का_सामाजिक_स्वाद
क्या किसी भी कैलेण्डर का प्रवर्तन कहीं भी हो सकता है? क्या कैलेण्डर सिर्फ टाइमकीपिंग का एक तरीका है, या आप लोग तो स्वयं डॉक्टर हैं तो मैं पूछ सकता हूँ कि कैलेण्डरों का न्यूरोएंडोक्राइन क्लॉक से कोई रिश्ता है? कि जितने भी vertebrates है, सभी की सीजनलिटीज़ की साइकल्स होती हैं, सभी का ऋतु-चक होता है. प्रत्येक के पास अपनी एक circaannual timing है। प्रत्येक का एक फोटोपीरियडिज्म है।
कि कैलेंडर सिर्फ कालांतर ही नहीं है, देशान्तर भी है। उसका एक पर्यावरणीय तर्क भी है। उसमें रहने वाले मनुष्यों की एक seasonal रिद्मिसिटी होती है। यही तो शास्त्रों में कहा गया कि संवसन्तेऽस्मिन् भूतानि – जिसमें समस्त भूत अच्छी प्रकार बसते हैं। सूर्य का एक नाम संवत्सर है। संवत्सर को त्रिनाभिचक्रम भी कहा गया : ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त।
तो कैलेण्डर का बदलना सिर्फ संस्कृति का बदलना ही नहीं है, वह प्रकृति का बदलना भी है। ऋतुचक्र से छेड़छाड़ ऋत से छेड़छाड़ है। विक्रम संवत् हमारे परिवेश और प्रकृति के अनुकूल है। और वह हमारी संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों का भी संरक्षण करता है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में जब हमने पोप ग्रेगरी तेरहवें के कैलेंडर को मान्यता दी और विक्रम सम्वत् को नहीं, तभी हमारी मूल्यगत प्राथमिकताएँ पता चल गयीं।
विक्रमादित्य के संस्कारों से अपने को जोड़ना सिर्फ पराक्रम की परंपरा से ही अपने को जोड़ना न था, वह न्याय की परंपरा के प्रति भी अपनी निष्ठा प्रकट करना था। जिन विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठकर एक ग्राम्य बच्चे तक का न्याय-बोध इतना जागृत हो जाता था, उनके सामने पोप ग्रेगरी तेरहवें की हैसियत ही क्या थी? इस पोप ने तो कैथलिक मज़हब को न मानने वालों को ईशद्रोही कहकर इनक्वीजीशन में मरवाया और प्रोटेस्टेंटों के नरसंहारों का अनुमोदन किया और जिसके लालच व भ्रष्टाचार के किस्से मशहूर हैं, उसके द्वारा प्रवर्तित कैलेंडर को चुनना आपके लिए क्यों जरूरी हो गया था।
राज्य अपनी कोई भी वरीयता बताए, भारत के समाज ने इस ग्रेगोरियन कैलेण्डर को चुनना सरासर अस्वीकार कर दिया। तंत्र ने अपनी कोई भी विवशता स्वतंत्र होने के बाद भी बतलाई हो, समाज ने ‘स्व’ होने का मतलब समझाया।
पर इससे राज्य और समाज के बीच की दूरी बढ़ गयी। इसके बाद समाज राज्य पर विश्वास कर न सका।
विक्रम संवत् और हम
एक सज्जन कुछ वर्षों पहले मेरे पास आए और मुझे गर्व से बताते हुए उन्होंने एक कैलेण्डर दिखाया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था : हिन्दू कैलेण्डर। वे विक्रम संवत का अनुवार्षिक प्रकाशन हिंदू नववर्ष की तरह करते थे। मैंने कहा कि बस यहीं पर मेरा मतभेद है। यह एक औपनिवेशक सत्ता के काफी चालाकी से खेले गए एक खेल का परिणाम है कि हम भी उन्हीं की पिच पर उन्हीं की शर्तों पर खेलने को तत्पर रहते हैं। इसी औपनिवेशिक सत्ता ने ‘हिंदू’ शब्द का अर्थ-संकुचन किया था और इसी ने ही विक्रम संवत को भी एक सांप्रदायिक परिधि में बांध दिया। आज विक्रम-संवत एक धार्मिक पहचान वाला संवत् इस सीमा तक बन गया है कि आज से कुछ सालों पहले जब मध्यप्रदेश सरकार ने इस संवत् के पहले दिन अर्थात् वर्ष प्रतिपदा अवकाश घोषणा किया तो कुछ हल्कों में उसे एक सांप्रदायिक पहल तब तक बताया जाता रहा जब तक कि उनके सामने यह तथ्य न लाया गया कि केरल में सरकार राज्य भर में चिंगम प्रथम पर आयोजन करती है। मलयालम कैलेंडर- ‘कोला वर्षम्’ तो फिर भी कोल्लम में शिव मंदिर निर्मित करने के उपलक्ष्य में 825 ई. में शुरू हुआ था। लेकिन विक्रम संवत् के प्रवर्तन में तो इतनी भी मजहबी या सांप्रदायिक संवेदना नहीं है।
जितनी कि उस तथाकथित ‘सिविल’ कैलेण्डर में है जिसे दुनिया के एक बड़े हिस्से में ‘क्रिश्चियन केलेण्डर’ के रूप में जाना जाता है।
इसे पोप ग्रेगरी तेरहवें ने 1582 में प्रवर्तित किया था। पोप की धर्माज्ञा (Papal Bull) 24 फरवरी, 1582 को Inter Gravissimas नाम से निकली थी। इसे प्रवर्तित करने की मुख्य प्रेरणा ईस्टर के पर्व की तिथि का समायोजन करना था। चर्च ऑफ रोम और चर्च ऑफ अलेक्ज़ेड्रिया में इस बारे में मतभेद चला आ रहा था। ऐसा कर ये मतभेद दूर किये गए। इसके बाद भी इसे शुरू में कैथलिक चर्च और पोपाधीन राज्य- यानी रोम, मार्शे, अंब्रया, रोमाग्ना के बाहर नहीं स्वीकार किया गया था। यह राज्य इटली प्रायद्वीप का एक हिस्सा मात्र था। प्रोटेस्टेंट और आर्थोडॉक्स सहित कुछ अन्य चर्चों ने भी इसे नहीं स्वीकारा था। जब पहली बार यह केलेण्डर प्रकाशित किया गया था तो इसकी बॉटमलाइन में पोप की अधिकृति (ऑथोरॉइजेशन) का उल्लेख था। ब्रिटेन और ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752 से पहले तक यह केलेण्डर नहीं स्वीकारा था। यानी ब्रिटिश प्रतिरोध लगभग 170 वर्ष तक चला। स्वीडिश प्रतिरोध 171 वर्ष। फ्रांस ने इसे स्वीकार भी किया और 1793 में इसे त्यागकर फ्रेंच रिपब्लिकन कैलेण्डर प्रवर्तित किया। 1805 में उसने इसे वापस स्वीकारा।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पोप ने अपनी धर्माज्ञा में ऐसे कैलेण्डर जारी करने को अपना पारंपरिक प्राधिकार बताया था। उसने तब कहा था : ‘’By this our decree, we therefore assert what is the customary right of the sovereign pontiff, and approve the calendar which has now by the immense grace of God towards his church been corrected and completed, and we have ordered that it be printed and published at Rome… We wish all patriarchs, primates, archbishops, bishops, abbots and others who preside over churches, to introduce the new calendar for reciting divine offices and celebrating feasts in all their churches, monasteries, convents, orders, militias and dioceses. ’’
यानि आज का तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष” कैलेण्डर मूलतः एक धार्मिक/ सांप्रदायिक कैलेण्डर था। एक संप्रदाय विशेष के प्रमुख ने जारी किया था। इसे प्रवर्तित करने की प्रेरणा और कारण भी धार्मिक था और इसका प्रयोजन व उपयोग भी प्रमुखतः धार्मिक था। दूसरी ओर आज कथित ‘हिंदू’ कैलेण्डर एक राष्ट्रीय उपलब्धि अनुष्ठानित करने को एक शासक/ प्रशासक से स्थापित और प्रवर्तित कैलेण्डर था। यह राष्ट्रीय पराक्रम के सम्मान में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य ने तब आरंभ किया जब उसकी सेनाओं ने 95 शक राजाओं को पराजित कर भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। भारत में संवत् ऐसे ही स्थापित/ प्रवर्तित नहीं हो जाते। शास्त्रीय मान्यता यह थी कि जिस नरेश को अपना संवत् चलाना हो, उसे संवत् चलाने के दिन से पूर्व अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुकाना होता था। महाराजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य कोष से धन देकर दीन दुखियों को साहूकारों के कर्ज से मुक्त किया था। इसकी तुलना आजकल की कर्ज माफी योजना से भी नहीं की जा सकती क्योंकि तब सिर्फ राजकीय ऋण ही नहीं माफ किए गए थे बल्कि निजी मनीलेंडर्स सहित किसी से भी लिए हुए कर्ज से मुक्त किया गया था। विक्रम शब्द सिर्फ तत्कालीन शासक का निजी नाम ही नहीं था बल्कि राष्ट्र की शक्ति और पराक्रम का परिचायक था। सारे पश्चिमी भारत सौराष्ट्र (काठियाकाड़), गुजरात, अवंती तक शक छा गए थे। सिंध, तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र तक में उनके केन्द्र बन चुके थे। उन विदेशी आक्रान्तों को पराजित करने का पराक्रम राष्ट्र ने दिखाया था, उसकी स्मृति चिरस्थाई बनाने को यह संवत् प्रवर्तित किया गया था।
फ्लीट और फर्गुसन आदि बहुत से औपनिवेशक इतिहासविदों ने विक्रम संवत् के बारे में भ्रांतियाँ फैलाने के अधकचरे प्रयास किए हैं। फ्लीट उसे शक प्रवर्तित बताते हैं, ‘शकारि’ से नहीं। कोशिश यही रही है कि विक्रम संवत् राष्ट्र की विदेशियों पर विजय का स्मारक-संवत् न रहकर उसकी पराजय की स्मृति में बदल जाए। लेकिन ऐसे प्रयास अपने ही अंतर्विरोधों से ध्वस्त हो चुके हैं।
कल्पना कीजिए कि यदि भारत गुलाम नहीं हुआ होता तो क्या ग्रेगोरियन कैलेण्डर हम पर लादा जा सकता था? आज भी सरकार और राज्य ने भले ही इसे चला रखा है, लेकिन भारतीय समाज अपने पर्व-त्यौहार ग्रेगोरियन कैलेण्डर से नहीं मनाता। न अपने घर-परिवार की ब्याह-शादियों का निर्धारण उससे करता है। तो समाज राष्ट्रीय कैलेण्डर से चल रहा है और राज्य धार्मिक कैलेण्डर से। राज्य और समाज के बीच दूरी के बहुत से उदाहरण हैं। लेकिन ‘स्टेट’ और ‘चर्च’ के पृथक्करण की यहाँ इस बिंदु पर एक हद तक उपेक्षा कर दी गई है। ‘चर्च’ की तारीखें स्वतंत्र भारतीय राज्य ने अपना ली हैं। यह औपनिवेशिक बोझ है जिसका प्रसन्नतापूर्वक परिवहन हम सब कर रहे हैं। तो अब हम पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाते हैं जब प्रकृति अपनी सबसे लुटी-पिटी हालत में होती है, हरियाली तीज या हरियाली अमावस्या पर नहीं जब प्रकृति की सुषमा अपने गौरव में खिलती है।
अब हम इस प्रशासकीय उपलब्धि पर बने कैलेण्डर का कोई प्रशासनिक विनियोग भी नहीं करते। गुलामी के पहले ऐसा विनियोग करते हुए हमें किंचित् भी लज्जा की अनुभूति नहीं होती थी। तब वसंत पंचमी के दिन स्लेट-पट्टी पर लिखना सिखाया जाता था और वह दिन शाला का प्रवेशोत्सव दिवस होता था। ‘ओनामासी धम/बाप पढ़े न हम’ जैसी कहावतों में वह आज भी छुपा हुआ है। ‘ओनामासी धम’ यानी ‘ओम नमः सिद्धम’। तब बलराम दिवस किसान दिवस हो सकता था, विश्वकर्मा दिवस अभियंताओं का दिन हो सकता था, धन्वन्तरि दिवस चिकित्सकों का दिन हो सकता था। तब दशहरे से लेकर देवउठनी एकादश तक वृक्ष-पूजा/ वृक्षारोपण/ वृक्ष-संरक्षण के 5 दिन हो सकते थे। जिस देश में राष्ट्र ही धर्म था, वहाँ धर्म के आधार पर राष्ट्र स्थगित कर दिया गया।
यह भी देखें कि 1582 ई. में ग्रेगोरियन कैलेण्डर आने के 18 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का इंग्लैंड में गठन होता है, 20 साल बाद डच ईस्ट इंडिया कंपनी का, 46 साल बाद पोर्तुगीज ई.इं.क.का और 1664 ई. में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी का। इन सबने दुनिया को गुलाम बनाने का अभियान शुरू किया। यानी भारतीय कैलेण्डर जहाँ दासता से मुक्त करता था, वहीं ग्रेगोरियन कैलेण्डर का विकास विश्वभर में गुलामी प्रसारित करने से हुआ। भारतीय कैलेण्डर जहाँ ऋणोन्मोचन से होता था, ग्रेगोरियन कैलेण्डर भारत से हुए पूंजी के उस ड्रेन की याद दिलाता है जिसकी चर्चा दादा भाई नौरोजी ने इतने विस्तार से की है।
कैलेण्डर शब्द संभवतः ‘कालान्तर’ शब्द का ही एक रूप है। वह सामाजिक जीवन से संगठन के लिए एक उपयोगी उपकरण ही नहीं है बल्कि वह यथार्थ के एक निश्चित पर्सेप्शन का माध्यम है। विक्रम संवत् जागतिक स्थिरता एवं लय को पकड़ने वाला ऐसा संवत् है जो प्रकृति से निरन्तर संवाद करता है। यह सिंतबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर की तरह वहाँ सात, आठ, नौ, दस की तरह की गिनती नहीं है। यहाँ जूलियस सीज़र या ऑगस्टस की तरह राजाओं के नाम पर जुलाई-अगस्त नहीं है। वे भी बाद में जोड़े जाए। पहले वे भी नहीं थे। गिनती की अशुद्धियाँ भी हैं क्योंकि 12 महीनों वाले कैलेण्डर का आखिरी महीना दस पर कैसे खत्म हो सकता है। इसका मतलब यह है कि जनवरी और फरवरी ग्यारहवें और बारहवें महीने हुए अर्थात् पहला महीना वही मार्च हुआ, जिसमें प्रायः चैत्र पड़ता है, जिससे विक्रम संवत् की शुरूआत होती है। फायनेंशियल इयर के रूप में कमोबेश वही विक्रम संवत् दुनिया भर में चलता है। एक तरह से वैश्वीकरण की प्रक्रिया में इसका अनदेखा योगदान है। जिस ग्लोबलाइजेशन के तर्क पर ग्रेगोरियन कैलेण्डर आवश्यक हो गया है, उसी तर्क को फायनेंशियल इयर के रूप में व्यवहारतः विक्रम संवत् ने, अप्रत्यक्ष रूप से, कोई दावा किए बिना पूरा किया है। सेचा स्टर्न (कैलेंडर्स इन इंटीक्विटी) प्राचीन समाजों के एक अध्ययन में कहते हैं कि तब एक दोहरी कैलेंडर परंपरा चली आई। एक सिविल कैलेण्डर की और एक धार्मिक कैलेण्डर की। बहुत प्राचीन लैटिन लेखक सेंसोरिनस (तृतीय शती ई.पू.) ने इसका उल्लेख सहज रूप से किया है, लेकिन इनकी contrastive pairing आधुनिक स्कॉलरशिप की देन है। प्राचीन मेसोपोटामिया में एक चंद्र संवत भी था और 30 दिन के महीनों वाला एक दूसरा संवत् भी था जो लेखादि प्रयोजनों में काम आता था। ऐसी दुहरी या विविध संवतों वाली व्यवस्था के दृष्टान्त इसराइल, मिस्र, ग्रीस, अरब में भी पाए जाते हैं।
भारत में समय का चक्र पूरा घूम गया है। अब जो ‘धार्मिक’ था, वह ‘सिविल’ हो गया है और जो ‘सिविल’ था, वह ‘धार्मिक’ हो गया है। यह परिवर्तन भारत की गुलामी के बिना संभव नहीं हुआ।
इसलिए अनुरोध है कि आज नए विक्रम संवत् का आरंभ सेलीब्रेट करते हुए इतिहास की इस त्रासदी और विडम्बना का परिप्रेक्ष्य जरूर ध्यान रखें।
✍🏻मनोज श्रीवास्तव
भारत ने कैसे अपनाया अंग्रेजी साल? ग्रेगोरियन कैलेंडर से कितना अलग है हिंदू पंचांग
जश्न के बीच जानिए भारत ने क्यों अपनाया अंग्रेजी साल? ग्रेगोरियन कैलेंडर से कितना अलग है हिंदू पंचांग
Gregorian Calendar VS Vikram Samvat: भारत के लगभग सभी राज्यों में आज भी स्थानीय पंचाग यानी कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित हिंदू पंचांग है. इसको विक्रम संवत भी कहते हैं. आइए, जानने की कोशिश करते हैं कि अपने देश ने आखिर ग्रेगोरियन कैलेंडर क्यों अपनाया और यह विक्रम संवत से कितना अलग है?
Western Gregorian Calendar: दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी नए साल 2024 के लिए जश्न की शुरुआत हो चुकी है. सब नए साल का स्वागत कर रहे हैं. इसके साथ ही पुराने कैलेंडर बदले जा रहे हैं. दुनिया के ज्यादातर देश ग्रेगोरियन कैलेंडर को मानती है.इसके मुताबिक 31 दिसंबर, 2023 के बाद नए साल के पहले दिन के रूप में 01 जनवरी, 2024 आ रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापार इसी कैलेंडर के मुताबिक होती है. आइए, जानते हैं कि हिंदू पंचांग का लंबा इतिहास और बेहतर स्थानीय जुड़ाव होने के बावजूद इस पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर को क्यों अपनाया है. इस ग्रेगोरियन कैलेंडर का क्या इतिहास है और विक्रम संवत से कितना अलग है.
भारत में आधिकारिक तौर पर क्यों चलता है ग्रेगोरियन कैलेंडर
नए साल के आगाज के जश्न मनाने के बीच कई सवाल उठाते हैं कि यह नया साल पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक है. भारत ने इसे क्यों अपनाया, जबकि भारत में आज भी स्थानीय पंचांग का इस्तेमाल होता है. इसी के मुताबिक देश में रस्म-रिवाज और तीज-त्योहारों को मनाया जाता है. अपने देश में सबसे प्रचलित हिंदू पंचांग को विक्रम संवत कहा जाता है. वहीं, इस्लाम, जैन, बौद्ध, सिख, यहूदी समेत कुछ और धर्मों के रिवाज और त्योहार भी ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार नहीं बल्कि अपने कैलेंडर के मुताबिक तय होते हैं. इसके बावजूद भारत में आधिकारिक तौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर क्यों चलता है.
ब्रिटिश उपनिवेशवाद और राज्यों के बीच शुरुआती विवाद से परहेज भी कारण
दुनिया के कई देशों के लिए पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर ज्यादा सुविधाजनक था. इसकी एक वजह ब्रिटिश उपनिवेशवाद भी था. इसलिए कई देश इस कैलेंडर को अपनाते चले गए. भारत में ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाने का भी अन्य कारण नहीं है. आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार और बाकी कामकाज जारी रखने के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर ही चलता रहा. शुरुआत में राज्यों के बीच कैलेंडर को लेकर बेमतलब विवाद से बचने के लिए भी इसे चलता रहने दिया गया. हालांकि, भारत में सांस्कृतिक तौर पर विक्रम संवत को भी अपनाया गया, पर सरकारी काम के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल भी जारी रहा.
जनवरी से पहले 25 मार्च में शुरू होता था रोमन नया साल
पहली जनवरी को ही साल की शुरुआत की वजह रोम साम्राज्य के तानाशाह जूलियस सीजर को माना जाता है. 2000 से ज्यादा साल पहले सीजर ने भ्रष्टाचारी नेताओं को सबक सिखाने के लिए कैलेंडर में बदलाव किए थे. इसके बाद से धीरे-धीरे पूरी दुनिया ने 1 जनवरी को नया साल मनाना शुरू कर दिया. इसकी पृष्ठभूमि में 673 ईसा पूर्व रोम में नूमा पोंपिलस नाम के राजा ने अपने शासन काल में रोमन कैलेंडर में बदलाव करने का फैसला भी है. पोंपिलस ने ही पहले 25 मार्च की जगह जनवरी से नया साल मनाने का फैसला किया.नूमा पोंपिलस के कैलेंडर में एक साल में 310 दिन और सिर्फ 10 महीने होते थे. उस समय एक सप्ताह में 8 दिन होते थे.
नूमा पोंपिलस के 607 साल बाद रोम में राजशाही को उखाड़ कर फेंक साम्राज्य को चलाने की जिम्मेदारी रोमन रिपब्लिक ने अपने हाथों में ले ली. सत्ता में रहने के बाद रिपब्लिक के नेता भ्रष्टाचारी होने लगे और इसका फायदा उठा कर रोमन आर्मी के जनरल जूलियस सीजर ने सारा साम्राज्य अपने अंदर कर लिया. रिपब्लिक के नेता ज्यादा वक्त तक सत्ता में रहने के लिए और चुनावों में धांधली के लिए कैलेंडर में मनमर्जी के बदलाव करने लगे थे.
जूलियन कैलेंडर में पहली बार 1 जनवरी को मनाया जाने लगा नया साल
इसके जवाब में जूलियस सीजर ने कैलेंडर ही बदल डाला. 46 ईसा पूर्व में रोम साम्राज्य के तानाशाह जूलियस सीजर ने एक नया कैलेंडर जारी किया. खगोलविदों ने बताया कि पृथ्वी को सूर्य के चक्कर लगाने में 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं. इसके बाद सीजर ने रोमन कैलेंडर को 310 दिन से बढ़ाकर 365 दिन कर दिया. हर 4 साल में बढ़ने वाला एक दिन एडजस्ट करने के लिए फरवरी को 29 दिन करने का फैसला किया. 45 ईसा पूर्व से 1 जनवरी को नया साल मनाया जाने लगा. इसे जूलियन कैलेंडर कहा जाने लगा.
जूलियन कैलेंडर को बदलकर आया नया ग्रेगोरियन कैलेंडर, हुआ ये बदलाव
बाद की कालगणना में पाया गया कि जूलियस सीजर के समय गणना में कुछ खामी थी. एक साल 365 दिन और 6 घंटे की जगह 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकेंड होता है. 1580 के दशक में रोमन चर्च के पोप ग्रेगोरी ने इस पर काम शुरू किया था. इसलिए इसका नाम ग्रेगोरियन कैलेंडर रखा गया. इसमें भी नया साल 1 जनवरी से ही शुरू होता था. पहले ब्रिटेन के पोप ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को मानने से इनकार कर दिया. इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर को सबसे पहले 1582 में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने अपनाया. 1583 में जर्मनी, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने, 1586 में पोलैंड और 1587 में हंगरी ने अपनाया.
ब्रिटेन ने 2 सितंबर 1752 को ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया, भारत में भी लागू
1752 तक ब्रिटेन में 25 मार्च से ही नए साल की शुरुआत होती थी. इसी साल इंग्लैंड की संसद में सहमति बनी कि नए साल की शुरुआत के मामले में बाकी यूरोपीय देशों के साथ चलना चाहिए. इसके बाद 2 सितंबर 1752 को ब्रिटेन ने भी इस ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया. ब्रिटेन ने अपने कब्जे वाले भारत में भी इसी दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर को लागू कर दिया. इसके काफी बाद यानी 1912 में चीन ने, 1917 में रूस ने 1972 में जापान ने इस पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया.
पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर और भारतीय विक्रम संवत में क्या है अंतर
पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर में सूर्य के अनुसार काल गणना दिन, महीने और साल की गिनती होती है. इसके मुकाबले प्राचीन भारतीय विक्रम संवत में काल गणना चंद्रमा की कलाओं के अनुसार होती है. पृथ्वी के सूर्य का चक्कर लगाने की अवधि से साल की अवधि का तालमेल ग्रेगोरियन कैलेंडर में ज्यादा उत्तम होता है और उसकी सटीक गणना के साथ समय से पहले आकलन विक्रम संवत में ज्यादा अच्छा हैं. विक्रम संवत यानी हिंदू पंचांग में तिथियों के तालमेल को अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास या मलमास उपयोग होता है. इससे ही विक्रम संवत की एक तिथि ठीक एक साल बाद बदलती है, वही नहीं होती है. इसके मुकाबले ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह तालमेल लीप ईयर से होता है.
पड़ोसी देश नेपाल में ग्रेगोरियन कैलेंडर नहीं, हिंदू पंचांग विक्रम संवत प्रचलित
अंग्रेजी साल का उत्सव देख भले ही लगता हो कि पूरी दुनिया ही पश्चिमी ग्रेगोरियन कैलेंडर मानती है, लेकिन नेपाल दुनिया का एक ऐसा देश है जो इस कैलेंडर को नहीं बल्कि हिंदू पंचांग मानता है.यह विक्रम संवत कैलेंडर का ही प्रचलित नाम है. भारत का पड़ोसी देश नेपाल कभी अंग्रेजों का गुलाम नहीं रहा और हाल तक हिंदू राष्ट्र की पहचान पर गर्वित रहा है. इससे वह हमेशा ही पहले से उपयोग में चले आ रहे विक्रम संवत को मानता रहा और यही आज भी जारी है.
भारत में भी लंबे समय तक हिंदू पंचांग ही चलता रहा है. आजादी के बाद देश को कैलेंडर तय करने का फैसला करते प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ही विक्रम संवत भी अपनाया. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालमेल बनाए रखने को ग्रेगोरियन कैलेंडर भी छोड़ा नहीं गया .
