साईलेंट किलर पेड

विहान के बहाने सवाल:बारिश होते ही ‘साइलेंट किलर’ क्यों बन जाते हैं पेड़ ? मुंबई में 10 साल में हुईं 45 मौतें

चेम्बूर हादसे में मासूम विहान की मौत के बाद मुंबई में पेड़ गिरने की घटनाएं गंभीर चर्चा में हैं. पिछले 10 साल में ‘साइलेंट किलर’ बने पेड़ों से 45 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. बीएमसी के मॉनसून पूर्व दावों के बीच कंक्रीटीकरण और अनियोजित कटाई से खोखली हो रही जड़ों पर देखिए यह विशेष रिपोर्ट.
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मॉनसून की आमद के साथ ही हर साल जलभराव की खबरें तो आम होती हैं, लेकिन इसी मौसम में एक ‘साइलेंट किलर’ भी सक्रिय हो जाता है. मुंबई में पेड़ और भारी-भरकम टहनियां गिरने की घटनाएं अब एक गंभीर जानलेवा संकट बन चुकी हैं.ताजा और बेहद दर्दनाक मामला चेम्बूर इलाके से सामने आया है, जहां 30 जून को एक विशालकाय पीपल का पेड़ ‘यूनिवर्सल हाई स्कूल’ की बस पर गिर गया. इस दर्दनाक हादसे में 11 साल के मासूम छात्र विहान श्रीवास्तव की जान चली गई. इस घटना ने अब बीएमसी की मॉनसून पूर्व तैयारियों और दावों को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है. वैसे भी पिछले एक दशक के आंकड़े डराने वाले हैं, जो यह साफ बताते हैं कि बीएमसी (BMC) के तमाम दावों और रखरखाव के बावजूद मुंबई की सड़कों पर लगे ये पेड़ राहगीरों के लिए काल साबित हो रहे हैं.
10 साल में 45 से अधिक मौतें और तेजी से बढ़ते आंकड़े
आधिकारिक और संस्थागत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में मुंबई में पेड़ और उनकी टहनियां गिरने की विभिन्न घटनाओं में 45 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. एक संस्था द्वारा जुटाए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, केवल साल 2023 से 2026 के बीच ही शहर में पेड़ गिरने से 12 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 125 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. इससे पहले नगर आपदा प्रबंधन कक्ष (Disaster Management Cell) के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2012 से 2019 के बीच ऐसी घटनाओं में 37 मौतें दर्ज की गई थीं. पिछले एक दशक में बीएमसी के पास पेड़ गिरने की 30,000 से अधिक घटनाएं आधिकारिक तौर पर दर्ज हो चुकी हैं.

अगर हाल के वर्षों में पेड़ गिरने के BMC’s Disaster Management Cell के ही द्वारा दिए गए सालाना आंकड़ों को देखें, तो यह ग्राफ लगातार बढ़ रहा है:

साल 2023: मुंबई भर में कुल 687 पेड़ गिरे, जिनमें से 180 बीएमसी की जमीन पर और 507 निजी संपत्तियों में थे.

साल 2024: पेड़ गिरने की कुल 653 घटनाएं आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड की गईं.

साल 2025: यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर सीधे 855 पर पहुंच गया.

बाहर से ‘स्वस्थ’ लेकिन अंदर से खोखले हो रहे पेड़
चेम्बूर की घटना और उसके बाद आए बीएमसी के आधिकारिक बयान ने एक्सपर्ट्स को गहरी चिंता में डाल दिया है. बीएमसी के मुताबिक, स्कूल बस को अपनी चपेट में लेने वाला वह विशालकाय पीपल का पेड़ करीब 60 से 70 साल पुराना था. हैरान करने वाली बात यह भी है कि इस हादसे से पहले बीएमसी को इस पेड़ की खराब स्थिति को लेकर जनता की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली थी.यही नहीं, इसी साल 12 मई को बीएमसी के मॉनसून पूर्व सर्वे में इस पेड़ का बाकायदा निरीक्षण किया गया था, जिसमें बाहरी तौर पर यह पूरी तरह स्थिर और सुरक्षित पाया गया था. इसके बाद 29 मई को सालाना रखरखाव के तहत इसकी टहनियों की छंटाई भी की गई थी, तब भी इसे पूरी तरह सेफ घोषित किया गया था. इसके बावजूद पेड़ का अचानक उखड़कर गिर जाना यह साबित करता है कि कंक्रीट और अनियोजित कटाई के कारण पेड़ अंदर ही अंदर अपनी जड़ों से दम तोड़ रहे हैं, जिसे बाहरी तौर पर देख पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है.

बीएमसी की तैयारी और कमिश्नर का नया आदेश
बीएमसी के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, प्रशासन ने साल 2026 में अपनी मॉनसून पूर्व तैयारियों के तहत पूरे शहर में 468 मृत या बेहद खतरनाक पेड़ों की पहचान कर उन्हें हटाया था. इसके साथ ही शहर भर में करीब 1,00,318 पेड़ों की टहनियों की छंटाई भी की गई थी.हालांकि,विहान श्रीवास्तव की मौत ने इन तैयारियों की कमियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है. चेम्बूर हादसे के बाद बीएमसी प्रमुख ने अब पूरी मुंबई में संभावित रूप से खतरनाक और संवेदनशील पेड़ों की समयबद्ध तरीके से नए सिरे से री-इंस्पेक्शन (पुनः निरीक्षण) और छंटाई करने के सख्त आदेश दिए हैं.

आखिर मुंबई में क्यों गिर रहे हैं इतने पेड़?
मुंबई में पेड़ों के इस कदर कमजोर होकर गिरने के पीछे केवल तेज हवाएं या भारी बारिश ही एकमात्र वजह नहीं है.एक्सपर्ट्स की रिसर्च में इसके पीछे कई गंभीर मानव निर्मित और प्रशासनिक कारण सामने आए हैं:

कंक्रीट का जाल और दम घुटती जड़ें
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के दिशानिर्देशों के मुताबिक, किसी भी पेड़ के तने के चारों ओर कम से कम एक मीटर का क्षेत्र कंक्रीट से मुक्त होना चाहिए. लेकिन आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) की एक पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में फुटपाथों और सड़कों के चौड़ीकरण के चक्कर में पेड़ों के बेस को कंक्रीट और पेवर ब्लॉक से पूरी तरह बंद कर दिया जाता है. इससे जड़ों को न तो पर्याप्त ऑक्सीजन मिलता है और ना ही पानी,जिससे वे अंदर ही अंदर सड़कर कमजोर हो जाते हैं. चेम्बूर का पीपल का पेड़ भी इसी ‘इंटरनल चोकिंग’ का शिकार हुआ.

जड़ों की अनियोजित कटाई
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के मुताबिक, मुंबई में भूमिगत केबल, गैस पाइपलाइन और सीवरेज लाइनों के लिए लगातार सड़कों की खुदाई होती है. इस अनियोजित खुदाई के दौरान ठेकेदारों द्वारा पेड़ों की मुख्य या फिर सहायक जड़ों (Anchor Roots) को बेरहमी से काट दिया जाता है. जड़ें कटने से पेड़ जमीन पर अपनी पकड़ खो देते हैं.

विदेशी प्रजातियों के पेड़ों की बहुतायत
बीएमसी के ट्री अथॉरिटी (Tree Authority) के आंकड़ों से पता चलता है कि मुंबई में ‘गुलमोहर’, ‘रेन ट्री’ और ‘पेल्टोफोरम’ (येलो गुलमोहर) जैसी विदेशी प्रजातियों के पेड़ बहुत ज्यादा संख्या में लगाए गए हैं. ये पेड़ बहुत तेजी से बड़े और भारी होते हैं, लेकिन इनकी जड़ें उथली यानि जमीन में गहराई तक न जाने वाली होती हैं. मुंबई की रेतीली और पथरीली मिट्टी में ये भारी पेड़ तेज हवाओं का दबाव नहीं झेल पाते. जाहिर है जब तक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के दौरान जड़ों को सुरक्षित रखने और पेड़ों के आसपास से कंक्रीट हटाने की सख्त और पारदर्शी नीति नहीं अपनाई जाएगी, तब तक मॉनसून में मासूम जानों के जाने का यह सिलसिला रोकना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा.

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