साका
क्या जनरल डायर के नाम पर किसी सड़क , भवन का नामकरण किया जा सकता है?
जिस से भी पूछेंगे वो तुरंत जबाव देगा – नहीं।
बात भी सही है।
चूंकि इतिहास नहीं पढ़ा तो डायर को सबसे बड़ा हत्यारा माना जाता रहा। अंग्रेजी सरकारी आंकड़ों के अनुसार ३७९ निहत्थे लोगों की नृशंस हत्या की गई थी। आजादी के बाद इंग्लैंड की सरकार ने माफी मांगी थी और डायर देश में सबसे बड़ा हत्यारा माना जाने लगा।
आजकल इतिहास पढ़ सुन रहा हूं। इतिहास में एक नया शब्द सुना – साका
जब दुश्मन किले पर आक्रमण करते थे और दुश्मन की सेना बहुत बड़ी और अजेय लगती थी , ऐसे में बिना जीत की उम्मीद के सैनिक मरना तय मानकर केसरिया कपड़े पहनकर युद्ध के लिए तैयार होते हैं और महिलाएं आक्रांताओं के हाथ न आने की सोच के चलते जौहर करती थीं। केसरिया और जौहर को सामूहिक रूप से साका कहा जाता था। दुनिया में ऐसा युद्ध ऐसा बलिदान ऐसा साहस केवल राजस्थान के इतिहास में ही है।
प्रताप के राजा बनने से पहले १५६७-६८ में अकबर ने मेवाड़ को कमजोर समझकर आक्रमण किया। राणा प्रताप की उम्र कम थी , उन्हें गेरुआ की पहाड़ियों पर भेज दिया गया। अकबर को रोकने की जिम्मेदारी मीराबाई के चचेरे भाई जयमल को दी गई। मीरा राणा प्रताप की सगी चाची थी। अकबर ने जयमल को मेड़ता और नागौर राज्य देने और कुंभलगढ़ छोड़ देने की पेशकश की लेकिन जयमल ने ठुकरा दी। फलस्वरूप १५६८ में तीसरा साका हुआ। महिलाओं ने जौहर किया और सैनिक केसरिया पहनकर जान देने को तलवार भाले लेकर मुगलों की विशाल सेना के सामने आ गए। वास्तव में साका अपने राज्य के लिए जान देने वाले आत्मघाती दस्ते थे । भीषण युद्ध हुआ। जयमल के पैर में जब गोली लग गई तो उसने कल्ला राठौर के कंधों पर बैठकर युद्ध किया। सभी सैनिक मारे गए और अकबर का कुंभलगढ़ पर कब्ज़ा हो गया।
अकबर ने किले के अंदर रह रहे आम नागरिकों महिलाओं बच्चों सहित तीस हजार लोगों की नृशंस हत्या की।
हमने अकबर को महान माना और उसको सम्मान देते हुए सड़कों के नाम तक रख दिए।
हमने अपने वीर बलिदानियों के प्रति जैसी कृतघ्नता दिखाई है दुनिया के किसी समाज ने अपने नायकों के लिए ऐसा न किया होगा।
@गोविंद नारायण सिंह,
शाहजहांपुर की फेसबुक वॉल से
प्रतिक्रियायें और टिप्पणियां
**सतीश चंद्र सिंह, पटना
इस मानसिकता को ही स्टॉकहोम सिंड्रोम कहते है जिससे हिंदू सदियों से पीड़ित है और यही इनकी हजार वर्षों की गुलामी का मुख्य कारण भी है।यह न इतिहास याद रखते हैं न भविष्य की चिंता करते हैं,बस वर्तमान में जीते हैं और इतने कायर प्रकृति के होते हैं कि दुनिया के किसी भी अन्य धर्मावलंबियों की तुलना में सबसे जल्दी धर्मांतरित हो जाते हैं।पुराने इतिहास की तो बात ही छोड़ दीजिए अगर आधुनिक भारत का इतिहास भी देखें तो 1947 का बंटवारा कम से कम पंजाब और बंगाल के उन हिंदुओं को तो जरूर याद रखना चाहिए जिन्होंने देश विभाजन की त्रासदी सबसे अधिक झेली है।लेकिन जिन राज्यों में लगभग 20 लाख हिन्दू गाजर मूली के समान काट दिए गए उनकी विडंबना यह है कि वहां आज भी घोर मुस्लिमपरस्त सरकारें सत्तासीन हैं और पूरे देश के हिंदुओं को चिढ़ा रही हैं।अपने सेवाकाल के दौरान मुझे इन दोनों राज्यों में कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हुआ जिसके दौरान मैने वहां के अधिकांश हिंदुओं को कांग्रेस,कम्युनिस्ट और टीएमसी का समर्थन करते पाया। बंगाल में तो मुसलमानों के विरुद्ध एक शब्द बोलना भी गंभीर अपराध और पाप है चाहे वह स्वयं कितना भी बड़ा अपराधी और हिंदुहंता ही क्यों हो। पंजाब के सिक्ख तो1984 के उन कांग्रेस प्रायोजित दंगों को भी भूल गए जिनमें उन्हें जिंदा जला दिया गया था।और जब1984 और 1947 भूल गए पंजाब के हिंदू और सिक्ख तो औरंगजेब का वह शासन उन्हें भला कैसे याद रहेगा जिसमें सनातन धर्म की रक्षा के लिए भाई मति दास और गुरु तेगबहादुर जैसी महान विभूतियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। वह तो दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह के उन दो दो मासूम बच्चों की शहादत भी भूल गए जिन्हें औरंगजेब ने दीवार में जिंदा ही चुनवा दिया था।
अपने इसी स्टॉकहोम सिंड्रोम को सहिष्णुता का नाम देकर आज देश के हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग अपनी छद्म धर्मनिरपेक्षता पर इतराता है और उन कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों का साथ देने में तनिक नहीं शर्माता जो हिंदुओं के घोर विरोधी और जिहादी मुसलमानों के कट्टर समर्थक हैं!अगर यही हाल रहा तो तो अगले बीस पच्चीस सालों में ही यह अपनी सहिष्णुता और मुस्लिम चाटुकारिता के विकेट पर हिट विकेट होने ही वाले हैं।गजवाए हिंद अगर सफल होगा तो यह या तो मरेंगे या कन्वर्ट हो जाएंगे और सनातन सनातन नहीं रहेगा,इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा!😥
जो नृशंसता की वो तो की, उसने चित्तौड़ की लड़ाई को जिहाद का नाम दिया। उसने 9 मार्च 1568 को एक विजय पत्र (फ़तहनामा) भी जारी किया जिसमें उसने पंजाब के अपने राज्यपालों को अभियान के बारे में संबोधित किया ।( आंद्रे विंक द्वारा उद्धृत )
“हम अपनी शक्ति के अनुसार जिहाद में लगे रहते हैं और उस महान प्रभु की दया से, जो हमारी विजयों का प्रेरक है, हमने काफिरों के कई किलों और नगरों पर अधिकार कर लिया है और वहाँ इस्लाम की स्थापना की है। अपनी रक्तपिपासु तलवार से हमने उनके मन से कुफ़्र के चिन्ह मिटा दिए हैं और उन स्थानों पर तथा सम्पूर्ण हिंदुस्तान में मंदिरों को नष्ट कर दिया है।”और हम इस रक्तपिपासु पशु को महान कहते और सुनते आए हैं!
संपादकीय संदर्भ
राजपूतों के साका “famous saka of Rajputs”
राजपूतों के साका: वीरता और बलिदान की अमर गाथाएं
राजपूतों का इतिहास वीरता, सम्मान और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है। “साका” (या शाका) राजपूत योद्धाओं की एक प्राचीन परंपरा थी, जिसमें युद्ध में पराजय निश्चित होने पर पुरुष योद्धा अपनी पत्नियों और बच्चों के जौहर (आत्मदाह) के बाद केसरिया वस्त्र धारण कर, तुलसी पत्र मुख में रखकर और पत्नियों की चिता की राख तिलक के रूप में लगाकर अंतिम युद्ध के लिए निकल पड़ते थे। यह युद्ध मृत्यु तक लड़ना था, जिसमें वे दुश्मन सेना पर टूट पड़ते और सम्मानपूर्वक प्राण त्याग देते। यह परंपरा मुख्य रूप से राजस्थान के किलों में मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध देखी गई, जहाँ जौहर और साका एक साथ संपन्न होते थे। यह राजपूतों की “मरण जय सी” (मरते हुए भी जीत) की भावना का प्रतीक था।नीचे राजपूतों के कुछ प्रमुख साकों का संक्षिप्त वर्णन दिया गया है, जो इतिहासकारों द्वारा दर्ज प्रसिद्ध घटनाएँ हैं। ये चित्तौड़गढ़ जैसे किलों से जुड़े हैं, जो राजपूत प्रतिरोध के केंद्र थे।साका का नाम/घटना/ वर्ष /स्थान/
प्रमुख व्यक्ति /संक्षिप्त विवरण
प्रथम चित्तौड़ साका,1303,चित्तौड़गढ़ (मेवाड़),रानी पद्मिनी, रतन सिंह
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण पर रानी पद्मिनी सहित 1600 महिलाओं ने जौहर किया। अगले दिन 30,000 राजपूत योद्धाओं ने साका किया, जिसमें वे केसरिया बान्हगिरी के साथ दुश्मन पर टूट पड़े। यह राजपूत गौरव की सबसे प्रसिद्ध घटना है।
द्वितीय चित्तौड़ साका,सन् 1535,चित्तौड़गढ़ (मेवाड़),रानी कर्णावती, विक्रमादित्य सिंह
गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के घेराबंदी पर रानी कर्णावती ने 13,000 महिलाओं के साथ जौहर किया। राजपूत पुरुषों ने साका कर दुश्मन सेना को भारी क्षति पहुँचाई। रानी ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी, लेकिन दीनी भाई बहादुर शाह की इस्लामिक अपील पर हुमायूं ने सहायता से इंकार किया और महीनों बाद पहुंचा तो भी जौहर की चितायें ठंडी नही हुई थीं ।
तृतीय चित्तौड़ साका सन् 1568 चित्तौड़गढ़ (मेवाड़),उदय सिंह द्वितीय, जयमल राठौड़, पत्ता सिसोदिया
मुगल सम्राट अकबर के आक्रमण पर 8000 महिलाओं ने जौहर किया। अगले दिन जयमल और पत्ता जैसे वीरों ने 8000 राजपूत योद्धाओं के साथ साका किया, जिसमें वे अंतिम सांस तक लड़े। अकबर ने विजय प्राप्त की, लेकिन राजपूतों की वीरता अमर हो गई।
चंदेरी साका सन् 1528,चंदेरी (मालवा),मेदिनी राय
बाबर की सेना के आक्रमण पर महिलाओं ने जौहर किया। राजपूत पुरुषों ने केसरिया वस्त्र पहनकर साका किया, जिसमें हजारों योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। यह राणा सांगा के सहयोगी मेदिनी राय की वीरता का प्रतीक है।
रानी पद्मावती का साका (संबंधित),1303,चित्तौड़गढ़
रानी पद्मावती
पद्मावती की कथा से जुड़ा यह साका लोकगीतों में अमर है। अलाउद्दीन की लालच पर राजपूतों ने सामूहिक साका किया, जो राजपूत सम्मान की मिसाल है।
ये साके न केवल युद्ध की घटनाएँ थीं, बल्कि राजपूत संस्कृति में सम्मान, पितृभक्ति और स्वाभिमान के प्रतीक बने। इतिहासकार जैसे जेम्स टॉड और अबुल फजल (अकबरनामा) ने इन्हें विस्तार से वर्णित किया है। राजपूतों ने इन बलिदानों से भारतीय इतिहास में एक अनुपम स्थान बनाया, जो आज भी प्रेरणा स्रोत है।
