सिखों को सनातन से अलग कैसे किया गया?

एंग्लो-सिख वॉर 1845 के बाद अंग्रेज समझ गए कि बिना सिखों को हिन्दुओं से तोड़े भारत पर राज करना संभव नहीं, इसके लिए बड़े पैमाने पर कार्य किया गया।

पहले तो रणजीत सिंह के बेटे दिलीप सिंह को ईसाई बनाया गया, उसी दिलीप सिंह ने विक्टोरिया को लिखे पत्र में लिखा था — “जैसे एक कुत्ता अपने मालिक की खुशियों और दुखों में साथ देता है, वैसे ही मैं भी विनम्रता से उन सभी बातों में आपका साथ देता हूँ जो आपकी महिमा को प्रभावित करती हैं।
नानक का धर्म और आज का हिंदू धर्म एक-दूसरे से बहुत अलग है, पहला एक शुद्ध एकेश्वरवाद है जिसमें ईसाई धर्म के कई सिद्धांत हैं, जबकि दूसरा सिर्फ मूर्ति पूजा है जो किसी भी समझदार दिमाग को पसंद नहीं आ सकती।” (100 Best Letters 1847-1947, compiled and edited by H.D. Sharma)

यह बकवासवाद महान् राजा रणजीत सिंह के कुपुत्र का है, अंग्रेजो ने सिख समुदाय को हिन्दुओं से अलग करने का कार्य एक अंग्रेज मैक्स ऑर्थर मैकलीव ने किया। इसने प्रचारित किया कि सिख एक मार्शल कौम है और फिर पंजाब में सेना की नौकरी में सिखों के लिए आरक्षण लागू कर दिया। इसी मैकलीव ने कानसिंह नाभा से सन् 1889 में एक पुस्तक लिखवाई ‘हम हिन्दु नहीं हैं’।

फिर इसने 1909 में स्वयं एक पुस्तक लिखा ‘The Sikh Religion: Its Gurus, Sacred Writings And Authors’.

इसी पुस्तक में सिखों को सनातन से अलग करने की भूमिका तय कर दी, इसी में खालसा पूजा पद्धति के नियम लिखे गए, सेना में सिखों के लिए अलग शपथ परम्परा का भी जिक्र लिखा।

गुरुद्वारे महन्तों, पुरोहितों की देखरेख में होते थे, इसी पुस्तक में खालसा प्रबंधक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया गया और पूरा खाका तैयार होने के बाद सन् 1906 में अंग्रेजों ने सिख को अलग धर्म के रूप में मान्यता दे दी।

1906 में अमृतसर स्वर्ण मंदिर में स्थापित हिन्दु देवी-देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया गया और सभी गुरुद्वारों में इसकी मुहिम चलाई गई, फिर 1909 में आनंद कारज एक्ट पास कराया गया जिसमें सिखों की अलग विवाह पद्धति तैयार की गयी जबकि अब तक सिखों में विवाह हिन्दु पुरोहितों द्वारा हुआ करता था।

1925 में गुरुद्वारा बिल पास कराया गया इसके बाद सभी गुरूद्वारों के महन्तों के उपर आरोप लगाकर गुरुद्वारा से बेदखल किया गया इस प्रक्रिया में बहुत से महन्तों से मारपीट, महन्तों की हत्या की गयी।

1945 में एक आचार संहिता जिसे ‘रहत मर्यादा’ कहते हैं, बनाया है जिसमें तय किया कौन सिख है कौन नहीं, इसमें कहा गया कि सिखों में मूर्तिपूजा प्रतिबंधित है।

सिख बस गुरुग्रंथ साहिब में आस्था रखेंगें इसके लिए कई फर्जी कहानियां बुनी गई जैसे कि स्वर्ण मंदिर की नींव मुसलमान ने रखी थी जबकि यह कहानी फर्जी है।

दशम ग्रंथ में ‘चंडी दी वार’ को मिलावटी बताया गया, गुरु गोविंद सिंह की वाणी ‘विचित्र नाटक’ को भी खारिज़ कर दिया गया क्योंकि इस नाटक में हिन्दु समाज पर मंडरा रही खतरों पर गोविंद सिंह ने बात की है।

गुरुग्रंथ में राम, दुर्गा, शिव के नामों का अलग मतलब निकाला गया।

सतीदास, मतिदास, हकीकत राय, बन्दा वैरागी को सिखों का बलिदान बताकर प्रचार किया गया जबकि इनके वंशज आज भी हिन्दु ही हैं, यही कार्य हर उस हिन्दु के साथ किया जिसने सिख पहचान के साथ जीवन जीया था।

जोरावर सिंह, गुलाब सिंह इनको भी सिख लड़ाका, राजा बताया गया जबकि ये डोगरा राजपूत थे, इनके वंशज आज हिमाचल में हैं।
गुरु गोविंद सिंह स्थापित निर्मल अखाड़ा  नकार दिया गया क्योंकि यह वेदांत और संस्कृत प्रचार को बनाया गया था।
और फिर आज़ाद भारत में उदय होता है भिंडरावाले का जो इस नक्शे पर चल अलग देश की मांग को हवा देता है। आज खालिस्तान के रूप में नया आंतक से सामना करना पड़ रहा है हिन्दु और इस देश को।

✍️ : Sarth Arya

​मैक्स आर्थर मैकॉलिफ (Max Arthur Macauliffe)
​जन्म: माइकल मैकॉलिफ
जन्म तिथि: 11 सितंबर 1838
स्थान: ग्लेनमोर, मोनागिया, काउंटी लिमरिक, आयरलैंड
मृत्यु: 15 मार्च 1913 (आयु 74 वर्ष)
स्थान: वेस्ट केंसिंग्टन, लंदन, यूनाइटेड किंगडम
​प्रसिद्धि: * सिख पंथ ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवादक और सिख पंथ के इतिहासकार।
​20वीं सदी के सिख पंथ के प्रमुख विद्वान।
​मैक्स आर्थर मैकॉलिफ (11 सितंबर 1838 – 15 मार्च 1913), जिन्हें मूल रूप से माइकल मैकॉलिफ नाम से जाना जाता था, वरिष्ठ ब्रिटिश प्रशासक और लेखक थे। मैकॉलिफ को सिख ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ के आंशिक अंग्रेजी अनुवाद और सिख इतिहास के लेखन के लिए जाना जाता है।
​प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
​मैकॉलिफ का जन्म 10 सितंबर 1841 को आयरलैंड के काउंटी लिमरिक के न्यूकैसल वेस्ट में हुआ। उन्होंने न्यूकैसल स्कूल, लिमरिक और स्प्रिंगफील्ड कॉलेज से शिक्षा। उन्होंने 1857 और 1863 के बीच क्वीन्स कॉलेज गैलवे में पढ़ाई , जहाँ वें 1857-60 को साहित्य विभाग में जूनियर छात्रवृत्ति से सम्मानित हुए। 1860 में उन्होंने आधुनिक भाषाओं में प्रथम श्रेणी सम्मान के साथ बी.ए. की डिग्री पाई। उन्होंने प्राचीन क्लासिक्स और इतिहास में भी वरिष्ठ छात्रवृत्तियाँ पाई। वह कॉलेज की ‘साहित्यिक एवं वाद-विवाद समिति’ के सचिव भी रहे।
​करियर
​मैकॉलिफ 1862 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) में शामिल होकर फरवरी 1864 में पंजाब पहुँचे। 1882 में पंजाब के डिप्टी कमिश्नर और 1884 में एक डिवीजनल जज बने। वह 1893 में भारतीय सिविल सेवा से सेवानिवृत्त हुए।
​मैकॉलिफ ने सिख पंथ के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ का अंग्रेजी अनुवाद किया। उन्होंने ‘द सिख रिलिजन: इट्स गुरुज़, सेक्रेड राइटिंग्स एंड ऑथर्स’ (छह खंड, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1909) भी लिखी। सिख विद्वान प्रताप सिंह ज्ञानी ने उनकी सहायता की थी।
​सिख धर्म के प्रति झुकाव
​मैकॉलिफ ने 1860 के दशक में सिख धर्म अपनाया।  उन्होंने कुछ सिख विद्वानों से मिलकर यह सिद्ध करने के लिए कड़ा परिश्रम किया कि हिंदू और सिख अलग-अलग इतिहास वाले अलग पंथ हैं।
​सिख ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद को सिख समुदाय में मैकॉलिफ का बहुत सम्मान है। लाहौर सिंह सभा के वार्षिक सत्र में एक व्याख्यान में मैकॉलिफ ने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब पवित्र शिक्षाओं की पुस्तक के रूप में बेजोड़ है।
​1882 में उन्हें उनके संस्थान ने एम.ए. (मानद उपाधि) से सम्मानित किया। 15 मार्च 1913 को लंदन स्थित अपने घर में उनका निधन हो गया।
​प्रमुख प्रकाशन
​द सिख रिलिजन, खंड I – VI (1909)
​जपजी का अनुवाद – एम. मैकॉलिफ
​संदर्भ और विरासत
​मैकॉलिफ को पश्चिमी दुनिया में सिख पंथ का परिचय कराने वाले पहले प्रमुख विद्वान माना जाता है। उनकी रचनाएँ आज भी सिख अकादमिक अध्ययन को महत्वपूर्ण माना जाता हैं। उन्हें आयरलैंड में भले ही कम जानते हों, लेकिन दुनिया भर के सिख उन्हें याद करते हैं।

 

 

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