सुको ने हिरासत और गिरफ्तारी बीच अंतर किया समाप्त,हर हाल 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने ले जाना होगा
गिरफ्तारी और हिरासत में कोई अंतर नहीं: SC ने कहा कि 24 घंटे की घड़ी तब शुरू होती है जब आजादी पर रोक लगाई जाती है
कोर्ट ने कहा 24 घंटे में सर्च और सीजर के लिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए.
नई दिल्ली 05 नवंबर 2026: अपनी आजादी के बचाव के उपायों को मजबूत करने वाले एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को “गिरफ्तारी” और “हिरासत” के बीच का अंतर निरस्त कर दिया. कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक हिरासत में रखने के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा उसी समय लागू हो जाती है जब किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने में 24 घंटे की सीमा को औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने तक टाला नहीं जा सकता. कोर्ट ने आगाह किया कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अधिदेश को कमजोर करेगा.
जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि यह विचार कि 24 घंटे केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होते हैं, बीएनएसएस के अनुच्छेद 22(2) और 56 के संवैधानिक जनादेश के विपरीत है. पीठ ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तार करने वाले प्राधिकारी द्वारा बंदी की गिरफ्तारी से पहले पूछताछ या जांच में लगने वाले समय को छोड़ने की अनुमति नहीं देता है.
पीठ ने कहा कि संविधान में सिर्फ एक छूट दी गई है, वह है गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक की यात्रा के लिए जरूरी समय. पीठ ने कहा कि किसी मौलिक अधिकार को कुछ समय के लिए सस्पेंड नहीं किया जा सकता, और इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि थोड़े समय के लिए हिरासत में रखना गिरफ्तारी नहीं है.
पीठ ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे हिरासत की तारीख और समय रिकॉर्ड करें और यह पता करें कि हिरासत के समय से 24 घंटे का समय पूरा हुआ है या नहीं. पीठ ने कहा कि हिरासत और गिरफ्तारी के बीच बनावटी अंतर करने की कोई भी कोशिश संवैधानिक रूप से टिकने लायक नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) में “हर व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया गया है और हिरासत में रखा गया है” अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है और “गिरफ्तार” तथा “हिरासत में लिया गया” अभिव्यक्तियों को संयुक्त एवं संयुक्त के रूप में देखा जाना चाहिए.
पीठ ने ये बातें चार लोगों की अर्जी पर दिए गए फैसले में कहीं. इन लोगों ने एनडीपीएस एक्ट के तहत एक मामले में त्रिपुरा हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें जमानत देने से मना कर दिया गया था. अपील करने वालों को 29 सितंबर, 2025 को दोपहर 2 बजे सर्च और सीजर के तहत हिरासत में लिया गया था. हालांकि, उन्हें औपचारिक रूप से 30 सितंबर, 2025 को सुबह 11 बजे अरेस्ट किया हुआ दिखाया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे से 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था.
पीठ ने कहा कि आर्टिकल 22 के हिसाब से 24 घंटे का समय, हिरासत में लिए गए व्यक्ति की हिरासत की तारीख और समय से शुरू होगा, न कि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी के समय से. पीठ ने कहा कि अगर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने से पहले व्यक्ति की हिरासत 24 घंटे से ज़्यादा रहती है, तो उसे तुरंत हिरासत से रिहा कर दिया जाएगा.

