बाल यौन शोषण

उत्तराखंड में 10 महीने में बाल यौन शोषण के 150 मुकदमे, हल्द्वानी प्रकरण ने चौंकाया
देहरादून: उत्तराखंड में बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण और बाल यौन शोषण से संबंधित अवैध सामग्री के खिलाफ पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है. स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के अनुसार, साल 2026 में अब तक एनसीएमईसी/ साइबर टिपलाइन और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर प्रदेश में करीब 150 मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं. इसी क्रम में नैनीताल जिले के हल्द्वानी में ऑनलाइन अश्लील सामग्री सर्च और डाउनलोड करने से जुड़े मामले में डिजिटल सबूतों के आधार पर वैधानिक कार्रवाई की गई है.
NCRP से मिली 11 शिकायतों के आधार पर दर्ज हुआ मुकदमा: एसटीएफ के अनुसार, 25 अक्टूबर 2026 को एनसीआरपी से प्राप्त 11 शिकायतों के आधार पर कोतवाली हल्द्वानी में मुकदमा लिखा गया. मामले में पॉक्सो अधिनियम की धारा 14/15 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67(B) में कार्रवाई की गई. जांच में पुलिस ने दो मोबाइल फोन, एक टैबलेट, एक लैपटॉप और एक खाली मोबाइल बॉक्स बरामद किया. डिजिटल उपकरणों की तकनीकी जांच में लैपटॉप और मोबाइल फोन के ब्राउजरों में अश्लील सामग्री से संबंधित सर्च हिस्ट्री, डाउनलोड हिस्ट्री और अन्य डिजिटल प्रविष्टियां मिलीं.

पुलिस के अनुसार,लैपटॉप की एक ड्राइव में कई आपत्तिजनक वीडियो और फोटो मिले.इसके अलावा ब्रेव ब्राउजर की सर्च हिस्ट्री,डाउनलोड हिस्ट्री और रिसाइकल बिन में भी संबंधित डिजिटल फाइलें पाई गईं.गूगल क्रोम ब्राउजर की जांच में तीन ई-मेल आईडी लॉग-इन मिलीं. पुलिस के अनुसार,उपलब्ध विवेचनात्मक तथ्यों के आधार पर इनका संबंध साइबर टिपलाइन से प्राप्त शिकायतों से पाया गया.संबंधित व्यक्ति ने अपने बयान में दो ई-मेल आईडी स्वयं की और एक अपनी मां की बताई.
नाबालिग से अश्लील कृत्य की वीडियोग्राफी का मामला भी सामने आया: एसटीएफ के अनुसार, डिजिटल सबूतों और जांच में सामने आए तथ्यों के विश्लेषण में बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री को इंटरनेट पर सर्च और डाउनलोड करने के साथ ही एक नाबालिग किशोर से अश्लील कृत्य की वीडियोग्राफी के तथ्य भी प्रकाश में आए हैं. पुलिस ने इस मामले में किशोर की भूमिका से संबंधित तथ्यों की जांच कर संबंधित कानूनी प्रावधानों में कार्रवाई की है.

बच्चों 

उत्तराखंड में 10 महीने में बाल यौन शोषण से जुड़े 150 मुकदमे दर्ज, हल्द्वानी से आया चौंकाने वाला मामला

टेंशन बढ़ा रहे ऑनलाइन बाल यौन शोषण के मामले, एसटीएफ ने जून में ही 52 मुकदमे दर्ज किए गए

उत्तराखंड में बच्चों से संबंधित ऑनलाइन यौन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री के मामले लगातार सामने आ रहे है, जो चिंता पैदा कर रहे हैं.

देहरादून: उत्तराखंड में बच्चों से संबंधित ऑनलाइन यौन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री के मामलों को गंभीरता से लेते हुए एसटीएफ (स्पेशल टास्स फोर्स) साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन द्वारा लगातार प्रभावी कार्रवाई की जा रही है. साल 2026 के दौरान केवल मई महीने में एनसीएमईसी (National Center for Missing & Exploited Children) से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर करीब एक दर्जन एफआईआर दर्ज की गईं. वही जून 2026 एक महीने के दौरान ही 52 एफआईआर दर्ज कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जा रही हैं.

दरअसल, यह बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स और अलग-अलग ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों का दुरुपयोग कर बच्चों से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री का प्रसारण, संग्रहण और साझा करने जैसी गतिविधियां बढ़ रही हैं. ऐसे अपराधों के खिलाफ उत्तराखंड पुलिस की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति है और प्रत्येक मामले में विधिक कार्रवाई करते हुए आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करने की प्रक्रिया लगातार जारी है.

एसटीएफ साइबर क्राइम पुलिस की नागरिकों से अपील:

किसी भी प्रकार की बाल अश्लीलता (Child Sexual Abuse Material) से संबंधित फोटो, वीडियो या लिंक को डाउनलोड, संग्रहित अथवा किसी अन्य व्यक्ति को साझा न करें.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, क्लाउड स्टोरेज और मोबाइल उपकरणों का उपयोग करते समय सतर्क रहें और बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर अभिभावक नियमित निगरानी रखें.
यदि किसी व्यक्ति को बच्चों से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री, संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि अथवा किसी प्रकार का साइबर अपराध दिखाई देता है, तो तत्काल इसकी सूचना निकटतम पुलिस स्टेशन, साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन या राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर दें.
इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
अभिभावक बच्चों को सुरक्षित इंटरनेट उपयोग, अजनबियों से ऑनलाइन बातचीत के जोखिम व निजी जानकारी साझा न करने के बारे में जागरूक करें.

वहीं, एसएसपी एसटीएफ अजय सिंह ने जनता से अपील की है कि साइबर अपराधों के प्रति जागरूक रहें और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता एवं जिम्मेदारी का परिचय दें. किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल पुलिस को देकर सुरक्षित और जिम्मेदार डिजिटल समाज के निर्माण में अपना सहयोग प्रदान करें.

चिंताजनकः देशभर में बच्चों के ऑनलाइन शोषण के 73 हजार से ज़्यादा मामले सामने आए

CSEAM में ऐसी तस्वीरें और वीडियो शामिल हैं जो बच्चों के यौन शोषण, उत्पीड़न या यौन संदर्भ में चित्रण करती हैं.

नई दिल्लीः देश भर में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक नेटवर्क ने बुधवार को दावा किया कि ऑनलाइन यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (cases of online Sexual Exploitation and Abuse Material: CSEAM) के 73,000 से अधिक मामले सामने आए हैं. इन्हें कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों को सौंप दिया गया है.

ऑनलाइन CSEAM की यह समस्या गंभीर है क्योंकि इसके पीड़ितों पर इसका विनाशकारी और आजीवन प्रभाव पड़ता है. CSEAM में ऐसी तस्वीरें और वीडियो शामिल हैं जो बच्चों के यौन शोषण, उत्पीड़न या यौन संदर्भ में चित्रण करती हैं. ऐसी सामग्री पीड़ितों को लगातार शोषण के चक्र में फंसाती है, उनकी गरिमा छीनती है. डिजिटल दुनिया में उनके दर्द को हमेशा के लिए जीवित रखती है.

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन (JRC) नामक नेटवर्क, जिसमें देश भर में बाल संरक्षण के लिए काम करने वाली 250 से अधिक संस्थाएं शामिल हैं, ने ETV भारत के साथ कुछ आंकड़े साझा किए हैं. इन आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से सितंबर तक कुल 73,258 CSEAM मामले सामने आए. इनमें से 1,272 मामले में FIR दर्ज की गई है.

ऑनलाइन CSEAM की पहचान कैसे करें?

भारत में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले नेटवर्क के अनुसार, इसे “हैश मैचिंग तकनीक” से पहचाना जा सकता है.

किसी तस्वीर या वीडियो का एक अनोखा डिजिटल फिंगरप्रिंट (हैश) बनाया जाता है और इसे अंतरराष्ट्रीय CSEAM डेटाबेस (जैसे NCMEC) से मिलान किया जाता है. अगर मिलान होता है, भले ही छोटे-मोटे बदलाव के साथ (पर्सेप्चुअल हैशिंग से), तो यह अवैध सामग्री की पुष्टि करता है.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML): इन तकनीकों से नई या पहले न देखी गई CSEAM सामग्री की पहचान की जाती है. AI मॉडल को शोषण सामग्री की विशेषताओं को पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, साथ ही सामान्य तस्वीरों और शोषण सामग्री में फर्क करने के लिए भी.

मेटाडेटा विश्लेषण: पुलिस और तकनीकी कंपनियां फाइल नाम, पथ और अन्य मेटाडेटा में संदिग्ध कीवर्ड, नामकरण पैटर्न या छिपाने की कोशिशों का विश्लेषण करती हैं.

उपयोगकर्ता और तीसरे पक्ष की रिपोर्ट: आम लोग, NGOs और अन्य संस्थाएं सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स या वेबसाइट्स पर संदिग्ध CSEAM सामग्री की रिपोर्ट कर सकते हैं. ये रिपोर्ट पहचान प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं.

ऐसी सामग्री की रिपोर्ट कैसे करें?

प्लेटफॉर्म को रिपोर्ट करेंः ज्यादातर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर “अभद्रता की रिपोर्ट करें” का विकल्प होता है. वेबसाइट, सोशल मीडिया या मैसेजिंग ऐप पर इसे इस्तेमाल करें.
राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टलः cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें.
स्थानीय पुलिस से संपर्कः अगर बच्चे को तत्काल खतरा है, तो तुरंत स्थानीय पुलिस को बताएं.
हेल्पलाइनः राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 या JRC हेल्पलाइन 1800-102-7222 पर संपर्क करें.
समस्या रोकने के लिए JRC के प्रयासः

JRC ने कहा, “हम पुलिस और सरकारी विभागों के साथ मिलकर CSEAM के संगठित अपराधों की जांच में सहयोग कर रहे हैं. राज्य सरकारों के साथ मिलकर साइबर पुलिस स्टेशनों को सक्रिय करने और संस्थागत क्षमता बढ़ाने का काम कर रहे हैं.”

यह नेटवर्क सिविल सोसाइटी संगठनों (CSOs) के साथ मिलकर जागरूकता, पीड़ितों को काउंसलिंग और कानूनी सहायता दे रहा है. साथ ही लोगों को ऑनलाइन बाल यौन शोषण के खतरों के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चला रहा है.

JRC शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर युवाओं को ऑनलाइन खतरों के प्रति जागरूक कर रहा है.

अगस्त में, महाराष्ट्र पुलिस ने JRC के पार्टनर इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन (ICP) की तकनीकी मदद से एक टेलीग्राम यूजर को पकड़ा, जो CSEAM बेचता और बांटता था और UPI से पैसे लेता था. उसे मुंबई के मरीन लाइंस से गिरफ्तार किया गया.

उसके डिवाइस की फोरेंसिक जांच में 150 टेलीग्राम चैनल्स तक पहुंच मिली, जिनमें से कई में भारतीय और विदेशी नाबालिगों से जुड़ा CSEAM था. क्लाउड स्टोरेज पर करीब 100 GB CSEAM सामग्री मिली. आरोपी गिरफ्तार है और जांच जारी है. सामग्री का स्रोत, लेनदेन और संभावित साथी ढूंढे जा रहे हैं.

साइबर स्पेस में बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकारी कदमः

IT एक्ट, 2000 की धारा 67B में ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण या देखने पर कड़ी सजा है.
POCSO एक्ट की धारा 14 में बच्चों को अश्लील उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने पर सजा का प्रावधान है.
सरकार समय-समय पर गंभीर CSEAM वाली वेबसाइट्स को ब्लॉक करती है. इसके लिए इंटरपोल की “सबसे खराब सूची” का इस्तेमाल होता है, जो CBI (भारत में इंटरपोल की नोडल एजेंसी) के जरिए मिलती है.
MeitY का ISEA प्रोग्राम महिलाओं और बच्चों समेत यूजर्स को इंटरनेट की डिजिटल सुरक्षा के बारे में जागरूक कर रहा है.
बाल अधिकार विशेषज्ञ की रायः

इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन (ICP) की कार्यकारी निदेशक संपूरना बेहुरा ने ETV भारत को बताया, “CSEAM से निपटने के लिए मजबूत और समन्वित कार्रवाई की जरूरत है, जैसा कि जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन बनाम एस हरिश (2024) के फैसले में कहा गया. सुप्रीम कोर्ट ने ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ की जगह ‘CSEAM’ शब्द इस्तेमाल करने का निर्देश दिया ताकि अपराध की गंभीरता दिखे. साथ ही, ऐसी सामग्री रखना या देखना भी दंडनीय है.”

उन्होंने कहा कि सरकार को POCSO एक्ट में संशोधन करना चाहिए, साइबर फोरेंसिक ढांचा मजबूत करना चाहिए. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए और स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा शिक्षा देनी चाहिए. उन्होंने जोर दिया कि समाज को जागरूक, सतर्क और संवेदनशील माहौल बनाना होगा जहां शोषण रोका जाए, पीड़ितों को सहारा मिले और अपराधी सजा पाएं.

समाज शोषण से लड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है. परिवार, स्कूल और स्थानीय संगठन मिलकर सुरक्षित माहौल बनाएं, बच्चों और बड़ों को व्यक्तिगत सुरक्षा, सहमति और शोषण के संकेतों के बारे में शिक्षित करें, और पीड़ितों को चुप रहने की बाध्यता तोड़ें. उन्होंने कहा- “समाज को मजबूत कानून, नैतिक मीडिया और ऑनलाइन सुरक्षा की वकालत करनी चाहिए ताकि बच्चे भौतिक और डिजिटल दोनों जगह सुरक्षित रहें.”

हर 6 में से एक बच्चा ऑनलाइन यौन शोषण का शिकार; 12 देशों के एक करोड़ बच्चों से गंदी हरकतें

निजी तस्वीरों का दुरुपयोग,ब्लैकमेलिंग,धमकी जैसी शिकायतें, 12 से 17 साल के 11 हजार बच्चों पर सर्वे, युगांडा-फिलीपींस में हालात ज्यादा खराब.
अजनबी दुश्मन कर रहे बच्चों का उत्पीड़न.

बच्चा मोबाइल चलाता है,सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता है,ऑनलाइन रिश्ते बनाता है तो माता-पिता को सचेत रहने की जरूरत है.एशिया और अफ्रीका के 12 देशों के 11 हजार से अधिक बच्चों पर हुए सर्वे में जो जानकारियां निकलकर सामने आईं हैं,वे पालन-पोषण और मजबूत बनाने पर जोर देती हैं.इंटरनेट वाले रिश्ते बच्चों को टेंशन दे रहे हैं. उन्हें यौन शोषण का शिकार बना रहे हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि इनमें से आधी भी शिकायतें पुलिस के पास नहीं पहुंच रहीं.

Disrupting Harm Project में हुए इस सर्वे में कई अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता शामिल रहे. सर्वे में इथियोपिया, केन्या, मोजाम्बिक, नामीबिया, तंजानिया, युगांडा, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, थाइलैंड और वियतनाम के 12 से 17 साल के इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 11912 बच्चे शामिल हुए. इस सर्वे में भले ही भारत के बच्चे शामिल नहीं है लेकिन रिपोर्ट में जो डेटा सामने आए वो अपने देश के हर माता-पिता को भी झकझोरने के लिए काफी हैं.

हाल ही में यह स्टडी रिपोर्ट शोत्र पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुई है. इसमें बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है. स्टडी में बताया गया है कि एशिया और अफ्रीका के 12 देशों के एक करोड़ से अधिक बच्चे ऑनलाइन यौन शोषण का शिकार हुए. सर्वे में शामिल बच्चों ने बताया कि कम से कम बार जरूर उनका ऑनलाइन यौन उत्पीड़न हुआ. इनमें दुर्व्यवहार करना, अश्लील सामग्री भेजना, यौन तस्वीरें या वीडियो मांगना, ऑनलाइन धमकी देना, ब्लैकमेल करना, यौन बातचीत के लिए मजबूर करना आदि मामले शामिल रहे. आईए इस रिपोर्ट के बारे में अब विस्तार से जानते हैं…

प्रत्येक 6 में से एक बच्चा परेशान : मौजूदा समय भारत समेत पूरी दुनिया के बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे रोजाना कई घंटे सोशल मीडिया पर भी बिता रहे हैं. कोई खास सुरक्षा घेरा न होने के कारण वे ऑनलाइन गलत लोगों के संपर्क में आ रहे हैं. स्टडी रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक 6 में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में एक बार जरूर ऑनलाइन रिश्तों के कारण यौन शोषण का शिकार बना. इंटरनेट का प्रयोग करने वाले 16% बच्चों ने यह शिकायत की.

टीएनएजर्स को सबसे ज्यादा खतरा : आजकल छोटे से लेकर बड़े उम्र के लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. बड़े लोगों की समझ ज्यादा विकसित होने से उनके साथ ऑनलाइन यौन शोषण जैसी समस्याएं बेहद कम देखने को मिलती हैं. इसके विपरीत अपने भले-बुरे की सीमित समझ रखने वाले टीएनएजर्स को यह खतरा ज्यादा होता है. इसमें लड़के-लड़कियों की संख्या बराबर ही हो सकती है. टेक्नोलॉजी जीवन की राह जितनी आसान बना रही है उतने ही ज्यादा खराब अनुभव भी दे रही है.

ऑनलाइन यौन शोषण के शिकार ज्यादातर बच्चे शिकायत नहीं करते हैं.
बच्चों के भविष्य को बर्बाद कर रहे गुमनाम दुश्मन : स्टडी में यह भी पता चला है कि पुलिस समेत मदद पहुंचाने वाली अन्य संस्थानों में शिकायत न पहुंचने पर कार्रवाई नहीं हो पाती है. ऑनलाइन दुनिया के गुमनाम दुश्मन बच्चों के भविष्य के बर्बाद कर देते हैं. शिकायत न करने पीछे की वजह ये होती है कि बच्चों को ये लगता है कि अगर उन्होंने किसी को अपनी परेशानी बताई तो उन्हें ही गलत मान लिया जाएगा. अगर वे किसी से शिकायत करते भी हैं तो उन्हें परेशान करने वाले के बारे में सटीक जानकारी ही नहीं हो पाती है. ऐसे केस में आरोपी हमेशा अपनी पहचान छिपाते हैं.

पीड़ित हर 2 बच्चों में से एक ने साधी चुप्पी : स्टडी रिपोर्ट में यह भी जानकारी सामने आई कि पीड़ित 51% बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण या अन्य किसी भी तरह गलत व्यवहार होने पर भी कार्रवाई के लिए आवाज नहीं उठाई. इस तरह के मामलों में पीड़ित हर 2 बच्चों में से एक ने चुप्पी साधे रखी. शोधकर्ताओं के अनुसार शर्म, डर, सामाजिक कलंक और सहायता तंत्र पर भरोसे की कमी इसकी प्रमुख वजहें हो सकती हैं. वहीं माता-पिता की ज्यादा सख्ती भी उनकी चुप्पी का कारण बन जाती है.

लड़कियां ज्यादा हो रहीं शोषण की शिकार : इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट इससे पहले भी आ चुकी है. उसमें बताया गया था कि लड़कों की तुलना में लड़कियां ज्यादा ऑनलाइन शोषण की शिकार होती हैं. वे बदनामी के डर से इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताती हैं. वहीं दूसरी ओर लड़के इस तरह ही घटना होने के बाद काफी ज्यादा शर्म महसूस करते हैं. इस वजह से वे किसी से कुछ कह नहीं पाते हैं. नई रिसर्च में बच्चों से उनका माता-पिता की ओर से इंटरनेट मीडिया की निगरानी के बारे भी पूछा गया. निष्कर्ष निकाला गया कि अभिभावकों की सक्रियता से ऐसे मामले में जल्द उजागर हो सकते हैं.

माता-पिता निभा सकते हैं अहम जिम्मेदारी : स्टडी में ऑनलाइन चुनौतियों का जिक्र करते हुए बच्चों को इसके साइड इफेक्ट से बचाने के उपाय भी बताए गए हैं. कहा गया है कि अगर माता-पिता इंटरनेट चलाते समय बच्चों की निगरानी करते हैं या उन्हें खुलकर इसके खतरों के बारे में बताते हैं, सावधानी बरतने के लिए कहते हैं तो ऐसे हाल में बच्चे खुलकर अपनी परेशानी उनसे कह सकते हैं. इसके अलावा अभिभावक बच्चों पर पाबंदी लगाकर भी खतरे को कम कर सकते हैं. माता-पिता बच्चे की ऑनलाइन एक्टिविटी पर ध्यान देकर भी उन्हें किसी भी तरह के शोषण से बचा सकते हैं.

समाज और संस्कृति का भी बच्चों पर पड़ता है असर : स्टडी में यह भी बताया गया है कि बच्चों पर समाज और संस्कृति का भी काफी प्रभाव पड़ता है. इसके लिए रिसर्चर ने बच्चों से 3 सवाल पूछे. जैसे शादी से पहले किसी से नजदीकियां कहां तक उचित हैं?, क्या इस बारे में फैसला केवल पुरुष को ही लेना चाहिए? और क्या पुरुषों को अपनी मान-मर्यादा की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना चाहिए?. इस पर 2 तरह के नजरिए सामने आए. पहले में एक हिस्सा ऐसा मिला जो लड़का-लड़की को बराबरी का दर्जा देता है जबकि दूसरे हिस्से में ऐसे सोच भी सामने आई तो पुरुषों का वर्चस्व कायम करती दिखी.

सर्वे के दौरान बच्चों ने अपने साथ हुई कई घटनाओं का जिक्र किया.

कई बार शोषण को आम समझ लेते हैं लोग : रिसर्चर के अनुसार समाज के जिस तबके में लड़का-लड़की में भेदभाव होता है. यानी पुरुषों को महिलाओं से बड़ा माना जाता है वहां कई बार बच्चों के साथ होने वाले शोषण को भी आम मान लिया जाता है. यह रूढ़िवादी सोच बच्चों की मानसिक स्थिति पर दबाव डालती है. इसके कारण वे बदनामी के डर से अपने साथ हुई ज्यादती के बारे में किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. इथियोपिया में हुई एक रिसर्च भी ऐसा ही इशारा करती है. इसमें पता चला कि कोई बच्चा हिंसा का शिकार होगा या नहीं, यह उसके घर के अलावा समाज की सोच पर भी निर्भर करता है.

शोषण से बचा सकते हैं ये तरीके : स्टडी में बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाने के लिए कुछ अन्य तरीकों को भी परखा गया. जैसे बच्चों को स्कूल या घर पर सेक्स एजुकेशन दी गई है या नहीं?, बच्चों को इंटरनेट पर कुछ गलत चीज दिखने पर उसे ब्लॉक करने की समझ है या नहीं?, किसी भी तरह का डिजिटल शोषण होने पर बच्चे को किस तरह से बचाव करना है?, किससे संपर्क करना है?, कहां से मदद मिल सकती है?, इन बातों की जानकारी है या नहीं?. अगर इन तीनों बिंदुओं पर बच्चे को जानकारी है तो काफी हद तक वह शोषण से बच सकता है.

सभी देशों में एक जैसी समस्याएं नहीं : स्टडी रिपोर्ट में सामने आए नतीजे सभी देशों में एक जैसे हैं, यह कहना सही नहीं है. अच्छे सामाजिक परिवेश और बच्चों के जीवन में माता-पिता की ज्यादा दखल ऑनलाइन यौन शोषण जैसी समस्याओं के असर को बहुत सीमित कर सकती है या खत्म कर सकती है. स्टडी में माता-पिता की निगरानी के स्तर का पता नहीं लगाया गया है. इसके बावजूद, यह रिसर्च बहुत अहम है. यह छिपे हुए शोषण को सामने लाती है. बच्चों की छिपी हुई मनोदशा से अवगत कराती है. मार्च 2026 में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व के लगभग दो तिहाई यानी हर 3 में से 2 बच्चे ऑनलाइन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं.

अपने देश में ऑनलाइन यौन उत्पीड़न के कितने मामले? : भारत में बाल संरक्षण पर कई संस्थाएं काम कर रहीं हैं. इनमें से एक जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन नेटवर्क भी है. इससे 250 से अधिक संस्थाएं जुड़ी हैं. इसके अनुसार साल 2025 में जनवरी से सितंबर तक 9 महीने के दौरान देश में कुल 73 हजार 258 ऑनलाइन यौन उत्पीड़न के मामले सामने आए. अहम बात ये रही कि इनमें से केवल एक हजार 272 मामलों में ही मुकदमे दर्ज हो पाए. यह डेटा कुछ ही महीनों का है. सालभर वाले आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं. ऐसे मामलों की संख्या अनुमान से अधिक हो सकती है.

ऑनलाइन यौन उत्पीड़न की कहां करें शिकायत? : आम तौर पर जिस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है, उसी पर ‘अभद्रता की रिपोर्ट करें’ का विकल्प होता है. इसका इस्तेमाल कर संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है. अगर किसी बच्चे को तत्काल ज्यादा खतरा महसूस होता है तो परिजनों को बताने के साथ पुलिस की भी मदद लेनी चाहिए. cybercrime.gov.in पर भी शिकायत कर सकते हैं. 1930 या JRC हेल्पलाइन नंबर 1800-102-7222 पर भी संपर्क कर सकते हैं. किसी भी घटना पर खामोशी आरोपी को बढ़ावा देती है. समय से कार्रवाई होने पर ऐसी घटनाओं को रोकना आसान हो जाता है.

फिलीपींस और युगांडा में हालात ज्यादा खराब.

भारतीय युवा सोशल मीडिया पर कितना वक्त बिता रहे? : भारतीय युवा (15 से 29 साल) रोजाना सोशल मीडिया पर कितना वक्त बिता रहे हैं, इसे लेकर मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन ने साल 2025 में एक रिपोर्ट जारी की थी. इसके अनुसार भारतीय युवा रोजाना करीब 2 घंटे का वक्त सोशल मीडिया के इस्तेमाल में गुजार रहे हैं. शहरी क्षेत्र के युवा सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. वहीं वैश्विक स्तर की बात करें तो ग्लोबल डिजिटल रिपोर्ट के अनुसार फिलीपींस के युवा दुनिया में सबसे ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. वहां एक युवा रोजाना करीब 4 घंटे का वक्त सोशल मीडिया पर बिताता है.

कितना होना चाहिए बच्चों का स्क्रीन टाइम? : डब्ल्यूएचओ (WHO) के अनुसार एक साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल नहीं देना चाहिए. 1 से 4 वर्ष के बच्चे रोजाना एक घंटे मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इससे ज्यादा हानिकारक है. 2-5 वर्ष के बच्चों को माता-पिता की मौजूदगी में ही मोबाइल देखना चाहिए. IAP (Indian Academy of Pediatrics) और AAP (American Academy of Pediatrics) के अनुसार 7 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम अधिकतम 2 घंटे तक ही होना चाहिए. अभिभावकों को बच्चों को मोबाइल-टीवी दिखाने के बजाय पढ़ने, कहानी सुनने आदि के लिए प्रेरित करना चाहिए.

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