नैनीताल से भाजपा के दलित चेहरा दिनेश आर्य होंगें उत्तराखंड से राज्यसभा प्रत्याशी,लंबी निष्ठा और धामी की निकटता का लाभ
कौन हैं उत्तराखंड के राज्यसभा कैंडिडेट दिनेश आर्य, जानें पॉलिटिकल प्रोफाइल
दिनेश आर्य अभी उत्तराखंड में राज्यमंत्री हैं. वे राज्य स्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष हैं.
राज्यसभा कैंडिडेट दिनेश आर्य
देहरादून 04 अक्टूबर 2026 : भारतीय जनता पार्ट ने राज्यसभा चुनाव के लिए आज दो प्रत्याशी घोषित किये हैं. जिसमें बंगाल और उत्तराखंड के राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किये गये. भाजपा ने उत्तराखंड से अपने वरिष्ठ दलित नेता दिनेश आर्य को राज्यसभा चुनाव के लिए कैंडिडेट बनाया है. उनकी जड़े ठेठ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में हैं।
अगले कुछ दिनों में उत्तराखंड भाजपा के वरिष्ठ नेता दिनेश आर्य राज्यसभा के सांसद होंगे. भाजपा ने दिनेश आर्य को राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया है. संख्या बल के आधार पर दिनेश आर्य का राज्यसभा जाना तय है. दिनेश आर्य भाजपा के अनुसूचित चेहरे हैं, लेकिन उनकी समाज के हर वर्ग में बहुत अच्छी पकड़ मानी जाती है. नैनीताल भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष रहे दिनेश आर्य भाजपा के कभी किसी गुट का हिस्सा नहीं रहे. वे बेहद ही सौम्य स्वभाव के नेता हैं.
दिनेश आर्य का सामाजिक-राजनीतिक सफर काफी रोचक रहा है. उनका संघ से पुराना नाता रहा है. दिनेश आर्य साल 1982 लखीमपुर खीरी, 1983 में बरेली- 1996 में नागपुर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण प्राप्त हैं. उन्होने में विद्यार्थी परिषद कार्यकर्ता के रूप में नैनीताल में सदस्यता ग्रहण की. 1986 में विद्यार्थी परिषद का नैनीताल जिला संयोजक नियुक्त हुये. दिनेश आर्य ने 1988 तक विद्यार्थी परिषद का जिला संयोजक के रूप में कार्य किया.
इसके बाद वे भाजपा से जुड़े. 1988 से 1991 तक वे नैनीताल जिले युवा मोर्चा मंत्री रहे. इसके बाद 1992 से 1995 तक जिलाध्यक्ष अनुसूचित मोर्चा नैनीताल, 1996 से 1998 तक प्रदेश उपाध्यक्ष युवा मोर्चा, 2001 से 2002 तक प्रदेश महामंत्री अनुसूचित मोर्चा रहे.
इसके बाद दिनेश आर्य ने प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कार्य किया. दिनेश आर्य 2007 से 2010 तक जिलाध्यक्ष भाजपा नैनीताल रहे. 2017 से 2021 अनुसूचित जाति मोर्चा राष्ट्रीय सचिव के साथ-साथ मोर्चे के पंजाब प्रभारी के रूप में संगठन का कार्य किया. 2021 में दिनेश आर्य को पुष्कर सिंह धामी के जनसम्पर्क का जिम्मा सौंपा गया. जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया.![]()
दलित चेहरे को राष्ट्रीय मंच देना, कुमाऊं-गढ़वाल को बराबर राजनीतिक महत्व देना और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का भरोसा दिलाना, दिनेश आर्य का चेहरा भाजपा की इन सभी जरूरतों को पूरा करता है। मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami के करीबी होने का लाभ भी निश्चित रूप से दिनेश आर्य को मिला है।
वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में वह नैनीताल सीट से टिकट के प्रबल दावेदार थे लेकिन 2017 में पार्टी ने कांग्रेस से भाजपा में आए यशपाल आर्य के पुत्र संजीव आर्य को टिकट दिया था। जबकि 2022 में भी पूर्व में कांग्रेसी नेत्री रहीं सरिता आर्य को नैनीताल सीट से उम्मीदवार बनाया गया। इन दोनों ही अवसरों पर कांग्रेस मूल के नेता उनका टिकट ले उड़े थे। फिर भी वह तन, मन, धन से संगठन की सेवा करते रहे। 2023 से अभी तक दिनेश आर्य उपाध्यक्ष राज्य स्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद उत्तराखण्ड सरकार (दायित्वधारी) के रूप में कार्य कर रहे हैं.
प्रत्याशी चयन के लिए प्रदेश संगठन ने 15 नामों की सूची नेतृत्व को भेजी थी जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, रमेश पोखरियाल निशंक, राज्यसभा सांसद नरेश बंसल, अनिल गोयल, मदन कौशिक, ज्योति प्रसाद गैरोला, बलराज पासी, केदार जोशी, बलवंत सिंह भौंर्याल जैसे दिग्गज नेताओं के नाम थे लेकिन अंततः बाजी दिनेश आर्य के हाथ लगी।
भाजपा के इस फैसले को विधानसभा चुनाव के परिपेक्ष्य में सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश माना जा सकता है। उत्तराखंड में अनुसूचित जाति समाज की आबादी चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में इस वर्ग से आने वाले एक सक्रिय राजनीतिक चेहरे को राज्यसभा भेजने का निर्णय पार्टी के लिए प्रतीकात्मक और राजनीतिक, दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव की तैयारी में पार्टी के सामने सरकार के कामकाज के साथ-साथ सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। राज्यसभा टिकट से दिनेश आर्य का राजनीतिक कद स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इसका असर विधानसभा चुनाव में भी दिख सकता है। इसके अलावा, दिनेश आर्य का राजनीतिक आधार नैनीताल रहा है। नैनीताल विधानसभा सीट अनुसूचित जाति आरक्षित है और यहां भाजपा की राजनीति में आर्य लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उन्हें राज्यसभा भेजना कुमाऊं की राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण संदेश माना जाएगा। आर्य को राष्ट्रीय राजनीति में जगह देकर भाजपा एक ऐसा चेहरा मजबूत कर रही है, जो संगठन, दलित समाज और कुमाऊं तीनों स्तरों पर पार्टी को उपयोगी होगा। भाजपा के इस फैसले का एक संदेश विपक्ष को भी है। कांग्रेस यदि अनुसूचित जाति समाज को अपना परंपरागत आधार मानकर चलती है तो भाजपा अब उस आधार को चुनौती देने को संगठन के भीतर से निकले चेहरे सीधे राष्ट्रीय फलक पर आगे कर रही है। दिनेश आर्य का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के साथ क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश में है। पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कुमाऊं से सिर्फ भगत सिंह कोश्यारी को ही राज्यसभा का मौका मिला था। गढ़वाल मण्डल से महेंद्र भट्ट, अनिल बलूनी, मनोहर कांत ध्यानी और नरेश बंसल को भाजपा ने जबकि कांग्रेस ने मनोरमा डोबरियाल शर्मा को उच्च सदन भेजा था। इससे पूर्व भाजपा ने सुषमा स्वराज को तो कांग्रेस ने सत्यव्रत चतुर्वेदी और राज बब्बर जैसे प्रदेश से बाहर के नेताओं को उत्तराखण्ड कोटे की सीटे से राज्यसभा में एडजेस्ट किया था।
बता दें दिनेश आर्य की पहचान ग्राउंड लेवल पर पकड़ वाले नेता की है. वे मिलनसार और सुलभ हैं. जिसके कारण कार्यकर्ताओं पर उनकी अच्छी पकड़ है. अभी दिनेश आर्य नैनीताल विधानसभा से विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे थे.
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