78 वर्ष का इजरायल: यहूदी देश में 20 लाख अरब कैसे,कौन हैं यें,कैसे बिगड़ा नेतन्याहू का खेल?

इजरायल में नेतन्याहू की सत्ता पर संकट में 20 लाख अरब मतदाताओं की राजनीतिक ताकत चर्चा में है.2026 चुनाव में अरब पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर नया रिकॉर्ड बनाया है.इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने को 61 सीटों की जरूरत है,जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को 53 और गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं.ऐसे में अरब पार्टियों का समर्थन सत्ता का समीकरण बदल सकता है. सवाल यह है कि ये अरब नागरिक कौन हैं,क्या ये गाजा और वेस्ट बैंक में रहने वाले फिलिस्तीनी हैं और इन्हें इजरायल में वोट देने का अधिकार कैसे मिला? इनका उत्तर छिपा है इजरायल के इतिहास,1948 की युद्ध कथा में।
अमेरिका में ट्रंप तो हारे ही हारे, नेतनयाहू की PM की गद्दी भी अब चली ही गई समझो. और उनको बाहर किया इज़रायल के अरब नागरिकों ने.
इज़रायल में अरब नागिरक कौन हैं जो वोट भी कर सकते हैं वहां ? इज़रायल यहूदियों का देश है, तो ये 20% अरब कौन हैं? क्या ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक के हैं ये लोग?
नहीं, ये वो नहीं हैं. वो तो इज़रायली चुनाव में वोट ही नहीं कर सकते. तो फिर ये कौन लोग हैं ये समझें.  इज़रायल की संसद में 120 सीटें हैं और वहां मोटे तौर पर तीन धड़े  चुनाव में थे . एक नेतन्याहू यहूदी पार्टियों का गठबंधन. दूसरा गादी आज़ेनकोट का यहूदी पार्टियों का गठबंधन. तीसरा पक्ष अरब पार्टियां. 61 सीटें चाहिए सरकार बनाने को. वो तीनों में किसी की नहीं मिली. यहूदी पार्टियों में नेतन्याहू गठबंधन को 53 सीटें, गादी आज़ेनकोट गठबंधन को 48 सीटें, और 19 सीटें अरब पार्टियों को मिली. 61 किसी को नहीं मिलीं।

अब या तो दोनों यहूदी धड़े मिल यहूदी एकता सरकार बनाते. या गादी आइज़ेनकोट पक्ष अरब पार्टियों का समर्थन ले सरकार बनाता. लेकिन हमास के तीन साल पहले हमलों के बाद से यहूदी पार्टियां अरब पार्टियों का समर्थन लेते दिखना नहीं चाहती थीं. लेकिन जब ट्रंप की पार्टी अमेरिका में हारी तो यहूदी पार्टियों को भी साफ़ संकेत मिल गया कि ट्रंप की विरोधी डेमोक्रैटिक पार्टी इज़रायल का भले ही समर्थन करती रहे, नेतन्याहू का नहीं करेगी. ट्रंप के रिपब्लिकन भी कहने लगे थे कि नेतन्याहू ने ही ट्रंप को ईरान युद्ध में घसीटा और वो इसी से हार गए. अमेरिकी समर्थन बिना इज़रायल चल नहीं सकता. तो यहूदी पार्टियां समझ गईं कि नेतन्याहू को प्रधानमंत्री नहीं बना सकते. उधर अरब पार्टियां भी समझ गईं कि नेतन्याहू को बाहर करने का यही मौक़ा है तो उन्होंने गादी आइज़ेनकोट का समर्थन करने का मन बना लिया. आइज़ेनकोट पक्ष के 48 और अरब पार्टियों के 19 के समर्थन से 120 सांसदों में अब 67 ऐसे दिख रहे हैं, जो आइज़नेकोट को प्रधानमंत्री बनवायेंगें.

ऐसे नेतन्याहू का पत्ता साफ़ होता दिखता है. लेकिन अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ये इज़रायल में अरब वोटर कौन से हैं, जिन्होंने अरब पार्टियों को 19 सीटें दिला दीं जिनसे नेतन्याहू का पत्ता साफ़ होता दिख रहा है. यह समझने को इज़रायल निर्माण का इतिहास समझना होगा. पिछले तीन साल से जो वहां हो रहा है तब से लोग इज़रायल का नक़्शा बार-बार देख चुके । मेडिटरेनियन सी यानी भूमध्य सागर के किनारे इज़रायल है. उसके उत्तर में लेबनान है. उसके पूर्व में ऊपर सीरिया है,उसके साथ जॉर्डन है. इज़रायल के दक्षिण में ईजिप्ट/मिस्र है. दो इलाक़े वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा पट्टी इज़रायल के अंदर हैं लेकिन इज़रायल में नहीं हैं.इज़रायल से घिरे हुए हैं लेकिन इज़रायल में नहीं माने जाते. यहां के अरबों ने वोट नहीं किया इन चुनावों में. यहां पैलेस्टिनियन अथॉरिटी का शासन है. क़ब्ज़ा तो इज़रायल का है लेकिन शासन पैलेस्टिनियन यानि फ़िलीस्तीनी अथॉरिटी का है. इसके चुनाव में 2006 में हमास जीत गया था. वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा के अरब वहां वोट देते हैं. तो इज़रायल की अरब पार्टियों को फिर कौन वोट देता है? वो हैं इज़रायल के अरब.

इजरायल के बनने की कहानी
इज़रायल कैसे बना ये समझिये. ये वो इलाक़ा है जहां से यहूदी पंथ शुरू हुआ. जीज़स क्राइस्ट भी बाद में आए और इस्लाम भी बाद में आया. पहले यहां यहूदी धर्म आया. ये सब बहुत सदियों पहले की बात हो रही है. फिर यहां रोम साम्राज्य का क़ब्ज़ा हो गया था और यहूदियों पर यहां ज़ुल्म हुए और उनको भगा दिया गया था और वो युरोप के दूसरे इलाक़ो में जा कर बस गए. लेकिन इज़रायल हमेशा उनकी गाथाओं में रहा कि यहूदियों की अपनी भूमि वही हैं. फिर पूरे अरब पर तुर्की के ऑटोमन तुर्क साम्राज्य का शासन हो गया. तो इस इलाक़े पर भी उनका शासन था. ये इलाक़ा फ़िलीस्तीन कहा जाने लगा था. और बंजर रेगिस्तान ही था. ऑटोमन तुर्कों का भी इस इलाक़े पर कोई बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं रहता था. कई अरब क़बीले होते थे यहां रेगिस्तान में. फिर पहली वर्ल्ड वॉर में तुर्क हार गए. और ये फ़िलीस्तीन का इलाक़ा आ गया ब्रिटेन के राज्य में. तो 1917 में ब्रिटेन ने बोला कि इस बंजर इलाक़े में दुनिया भर के यहूदियों को बसने के लिए ज़मीन दी जाएगी जो भी आना चाहे. क्योंकि कई जगहों पर यहूदियों को प्रताड़ित किया जाने लगा था. उनको भगाया जा रहा था. तो यहूदी आ कर बसना शुरु हुए ब्रिटेन के शासन में. फिर तो हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों पर ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिये. और पूरे यूरोप से यहूदी भगाए जाने लगे. औऱ कई भाग कर फ़िलीस्तीन के इस बंजर रेगिस्तान में आ कर बसने लगे. फिर दूसरी वर्ल्ड वॉर हुई और हिटलर की हार हुई. लेकिन यहां इस इलाक़े में यहूदियों और यहां के अरबों में तनाव शुरू हो गया था. ब्रिटेन ने वही किया जो भारत में उसने किया. यहां भारत पाकिस्तान बना कर चला गया. वहां पर ब्रिटेन ने बोला कि हम तो जा रहे हैं शासन छोड़कर. यहां दो मुल्क बना दिये जाएं फ़िलीस्तीन में, एक यहूदियों का और एक अरबों का.

यहूदी और अरब की कहानी, कौन हैं ये अरब पार्टी वाले

UN में यानी संयुक्त राज्य में भी ये प्रस्ताव रखा गया कि दो देश बना दो. यहूदी तो राज़ी थे, लेकिन अरब नहीं माने. उनका कहना था कि यहूदी तो यहां बसाए गए हैं, ये तो अरब देश है. लेकिन 14 मई 1948 को यहूदी नेताओं ने इजरायल को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया. ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक वाला इलाक़ा अरब इलाक़ा था, वो उन्होंने छोड़ दिया और बाक़ी को इज़रायल घोषित कर दिया अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाएं हमला करने आ गईं इज़रायल पर. यानी इज़रायल बनते ही उसपर अटैक कर दिया अरब देशों ने. लेकिन इस 1948 के युद्ध में इजरायल जीत गया. अरब माने नहीं थे दो देश बनाने के लिए. यहूदी मान गए थे. लेकिन यहूदियों ने इज़रायल बना दिया और उसपर हमला हो गया तो इज़रायल जब जीत गया युद्ध में तो सात लाख अरब लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा वहां से. लेकिन उसके बाद भी जो अरब लोग इजरायल की नई सीमाओं के अंदर रह गए, उनकी संख्या करीब डेढ़ लाख थी. इजरायल ने उन्हें नागरिकता दे दी. इस तरह वो इजरायल के नागरिक बन गए और 1949 से ही वोट डालने लगे.

कितनी है इजरायल में इनकी संख्या

आज उनकी संख्या बढ़कर 20 लाख हो गई है. वो इजरायल के अंदर के नागरिक हैं, इसलिए चुनाव में वोट डालते हैं. वेस्ट बैंक और गाजा को इज़रायल ने छोड़ दिया था क्योंकि वहां पर अरब देश बनना था जिसपर अरब माने नहीं थे. 1948 के युद्ध में वेस्ट बैंक पर जॉर्डन ने क़ब्ज़ा कर लिया था और ग़ाज़ा पर मिस्र ने क़ब्ज़ा कर लिया था. लेकिन फिर 1967 में युद्ध हुआ और फिर इज़रायल जीत गया. तो 1967 इजरायल ने जॉर्डन से वेस्ट बैंक छीन लिया और मिस्र से गाजा पट्टी छीन ली. लेकिन वहां रहने वाले अरब लोगों को इजरायल ने अपना नागरिक नहीं बनाया. वहां आंदोलन जलता रहा और 1994 में वहां पर एक पैलेस्टिनियन अथॉरिटी बनाने पर राज़ी हो गया. कि वो लोकल शासन कर लेगी. और क़ब्ज़ा हालांकि इज़रायल का ही है. उम्मीद ये थी कि ये पैलेस्टिनियन अथॉरिटी आगे चल कर एक फ़िलीस्तीन देश बन जाएगी और जो 1948 में बात हुई थी UN और अरब नहीं माने थे आख़िर वही होगा. मतलब एक यहूदियों का इज़रायल और ये वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा में अरब लोगों का देश हो जाएगा फ़िलीस्तीन. लेकिन वो बात उस दिशा में जाने के बजाए और बिगड़ गई. और हमास ने चुनाव जीत लिये वहां 2006 में. और तबसे ये तनाव बना हुआ है.

हमास और इजरायल की दुश्मनी

हमास पूरे इज़रायल को ही फ़िलीस्तीन बनाने तो इज़रायली यहूदी पार्टियां हमास को ख़त्म करना चाहती हैं. लेकिन हमास के 2023 के हमलों के बाद इज़रायल के अरबों को भी नेतन्याहू सरकार में बहुत कुछ झेलना पड़ा. इससे पहले तक वे चुनावों में रुचि नही लेते थे. यहूदी ही ज़्यादा वोटिंग करते थे. इज़रायल के नागरिक अरब रेगिस्तान में ज़्यादा रहते हैं और जीवन शैली क़बीलों वाली  है . महिलाएं तो वोट देने जाती ही नहीं थीं. लेकिन इस बार इजरायल के अरब नागरिकों ने भारी संख्या में वोट डाला. पहले 40% लोग भी वोट नहीं डालते थे अरब. इस बार 80% लोग वोट डालने गए नेतन्याहू की नीतियों के ख़िलाफ़. नतीजा ये कि अरब पार्टियों को 19 सीटें मिल गईं और उन्होंने ही रोका नेतन्याहू को पुन: PM बनने से.  इज़रायल के कलम ने इस बार अपनी ताक़त दिखा दी.

त्वरित प्रश्नोत्तर

इज़रायली चुनावों में अरब पार्टियों ने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार हटाने में कैसे भूमिका निभाई?
इज़रायल के अरब नागरिकों ने नेतन्याहू की नीतियों के विरुद्ध भारी मतदान किया,जिससे अरब पार्टियों को 19 सीटें मिलीं.फिर गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्त्व वाले विरोधी धड़े और अरब पार्टियों के समर्थन से 67 सांसद हो गए, जो नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने को पर्याप्त हैं।

इज़रायल की संसद (नेसेट) में सरकार बनाने को जादुई आंकड़ा । चुनाव में किसे कितनी सीटें मिलीं?
इज़रायल की 120 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। हालिया चुनावों में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें, विरोधी गादी आइज़ेनकोट के धड़े को 48 सीटें और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिली हैं।

इज़रायल निवासी ये अरब नागरिक कौन हैं और वे चुनाव में मतदान क्यों कर पाते हैं?
ये वे अरब लोग हैं जो 1948 के युद्ध के बाद इज़रायल की नई सीमाओं में रह गए थे,संख्या डेढ़ लाख थी और इज़रायल ने उन्हें नागरिकता दे दी थी। इन्ही की संख्या बढ़कर 20 लाख हो चुकी है और इज़रायल के नागरिक होने से ये चुनावों में मतदान करते हैं।

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