ईसाइयत का प्रचार- रिलीजन का विस्तार या अस्तित्व रक्षा का प्रयास?
ईसाइयत का प्रचार- रिलीजन का विस्तार या अस्तित्व बचाने की कवायद?
यूरोप और अमेरिका में खाली होते चर्च ईसाइयत पर संकट के बादल को दर्शा रहे हैं.क्या मिशनरियों का वैश्विक नेटवर्क- ईसाइयत का प्रचार विस्तार का प्रतीक है,या फिर गिरते ग्राफ के बीच अस्तित्व बचाए रखने का आखिरी व्यावसायिक प्रयास?तथ्यों और आंकड़ों के साथ एक ऐसी कड़वी सच्चाई,जो आपको हैरान कर देगी.
भारत की एक तस्वीर, जिसमें मिशनरियाँ गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों, सड़कों, बाज़ारों और पार्कों में ईसाइयत का प्रचार कर रही है. बाएँ भाग में गाँव और चर्च, जबकि बाएँ शहरी क्षेत्र को दर्शाया गया है. भारत का शहर हो या गांव, हर तरफ ईसाई मिशनरियाँ प्रचार करती नजर आ रही हैं
आपने गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों, सड़कों, बाज़ारों और पार्कों में कंधे पर थैला टाँगे तथा हाथों में पतली-पतली किताबें व पर्चे लिए घूमते हुए कुछ लोग देखे होंगें. उन्होंने आपको टोका होगा और बात भी की होगी. इस दौरान, आपने उनसे आत्मा-परमात्मा, यीशु, परमेश्वर-पुत्र और परमेश्वर आदि की चर्चा सुनी होगी. आप हैरान हुए होंगें कि आखिर क्यों ये अजनबी अचानक आ धमकते हैं, और फेरीवालों की तरह आपका पीछा नहीं छोड़ते हैं जब तक आप उन्हें झिड़क नहीं देते हैं. हालाँकि, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है, और वे फिर किसी और के पीछे लग जाते हैं. मगर क्यों? संपर्क व प्रवचन का यह अजीबोगरीब तरीका ईसाइयत का प्रचार या मार्केटिंग है या फिर अस्तित्व को बचाने की कवायद?
एक ग्रामीण इलाके में मिशनरियों द्वारा ईसाइयत के प्रचार और पानी में सामूहिक बपतिस्मा संस्कार (Baptism) के दृश्यों को दर्शाती एक बंटी हुई तस्वीर.
मिशनरियों द्वारा ईसाइयत का प्रचार- मन परिवर्तन और सामूहिक बप्तिस्मा
सवाल उठता है कि दो हजार साल पुरानी तथा दुनियाभर में फैले मालदार और दिमागदार लोगों के रिलीजन- ईसाइयत को क्यों इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं? ऐसी क्या मजबूरी है कि स्कूलों-अस्पतालों, झुग्गी-झोपड़ियों और आदिवासी बस्तियों में महंत बने- कुंडली मारकर बैठे लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ रहा है? विदित हो कि ईसाई मिशनरियों और टिड्डी दल जैसे उनके प्रचारक समूहों की नगरी नगरी द्वारे द्वारे घूमती यह तस्वीर अकेले भारत की नहीं, बल्कि अधिकतर एशियाई-अफ्रीकी देशों की भी है. इसके कारण क्या हैं- यह समझने के लिए हमें विभिन्न पहलुओं पर विचार करना होगा तथा विभिन्न शोधों पर आधारित आंकड़ों और तथ्यात्मक रिपोर्टों के हवाले से वास्तविकता को परखना होगा, ताकि कहीं संदेह की गुंजाईश ना रहे, और सच भी उजागर हो सके.
अध्ययन बताता है कि ईसाइयत वैश्विक स्तर पर तो बढ़ रही है, मगर इंग्लैंड, यूरोप और अमरीका में लगातार घट रही है. विदित हो कि कभी यूरोप और अमरीका ईसाइयत के गढ़ हुआ करते थे. वहाँ से ईसाइयों की तूती बोलती थी, और यहीं से तैयार रणनीति व मानदंड के तहत शेष विश्व ईसाई समाज चलता था. लेकिन, अब काफी बदलाव आ चुका है. दरअसल, ईसाइयत के मानक रहे इन देशों में ही ईसाइयत की हालत नाजुक हो चली है, या फिर यूँ कहिये कि इसकी बुनियाद कमजोर हो चुकी है और किले के ढह जाने की संभावना है. ब्रिटेन या इंग्लैंड की हालत तो सब से बुरी है. इसके ठीक विपरीत, जब हम एशियाई और अफ्रीकी देशों को देखते हैं तो स्थिति कुछ और ही नजर आती है. वहां मसीही लगातार बढ़ रहे हैं- मजबूत हो रहे हैं. क्यों- आइये इसे समझते हैं.
यूरोप और अमेरिका के आंकड़ों का विश्लेषण:
विश्वप्रसिद्ध एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी प्रेस (प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा इस रिपोर्ट में संकलित) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले एक सौ साल के भीतर यूरोप और अमेरिका में ईसाईयों की संख्या में काफी बदलाव आए हैं. 1910 से 2010 तक के आंकड़ों में हम देखते हैं कि यहाँ ईसाईयों की संख्या लगातार घट रही है. 1910 में यूरोप में ईसाई 66% थे यानी हर तीन में से दो लोग स्वयं को ईसाई मानते थे. उत्तरी अमेरिका में 15% लोग अपने आपको ईसाई मानते थे. लैटिन अमेरिका यानी दक्षिण अमेरिका में 12.2% लोग ईसाई थे और बाक़ी दुनिया में कुल 4.1% ईसाई जहाँ-तहाँ बिखरे हुए थे. लेकिन, 2010 में यानी 100 साल के अंदर ये हालात बिलकुल बदल जाते हैं. सबसे खराब हालत अब यूरोप की है जहाँ सिर्फ़ 25% लोग ही खुदको मसीही यानी ईसाई मानते हैं. यहाँ हर चार में से केवल एक व्यक्ति ही ईसाई रह गया है. नार्थ अमेरिका में जहाँ 15% थे, घटकर वे लगभग 12% रह गए हैं. मगर, बढ़ोतरी कहाँ हुई है यह जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि एशिया में जहाँ पहले नाममात्र के ईसाई थे वहाँ इनकी संख्या बढ़कर 15% से ज्यादा हो गई है. अफ़्रीका में भी जहाँ पहले गिने-चुने ईसाई देखने को मिलते थे अब वहां उनकी सख्या 21% से भी बढ़ चुकी है. लैटिन अमेरिका यानी साउथ अमेरिका में जहाँ ये महज़ 12 फ़ीसदी थे वहां इनकी संख्या तकरीबन दुगनी होकर 24% तक पहुँच चुकी है.
अमेरिका में चर्च जानेवाले लोगों की संख्या का विश्लेषण:
अमेरिका में ईसाईयों की स्थिति हम वहां चर्च जानेवाले लोगों की संख्या के आधार पर भी जान सकते हैं. आइए हम इसे एक ग्राफ द्वारा समझने की कोशिश करते हैं.
60 वर्षों के दौरान अमरीकी ईसाईयों का गिरता ग्राफ़
उपरोक्त ग्राफ में 1952 से लेकर 2012 तक यानि 60 वर्षों के आंकड़े दर्शाए गए हैं जिससे ये साफ़ हो जाता है कि अमेरिका में चर्च जानेवाले लोगों की संख्या में आश्चर्यजनक गिरावट आयी है. अब हम एक दूसरे और थोड़े नए ग्राफ में दर्शाए गए आंकड़ों पर नजर डालते हैं.
धर्म का प्रचार, बेवक़ूफ़ बनाने की मुहिम, निशाने पर ग़रीब व मज़बूर
20 वर्षों के दौरान अमरीकी चर्चों में उपस्थिति के आंकड़े
इसमें हमें पता चलता है कि 1994 में चर्च जानेवाले 62% लोग थे जो 2014 में घटकर 53% रह गए. इसका मतलब यह है कि 20 वर्षों के दौरान अमेरिकी चर्चों में ईसाईयों की उपस्थिति में 9% की गिरावट दर्ज की गई जो हैरान करने वाली तथा चिंताजनक है.
इंग्लैंड में ईसाइयत का हाल:
आइए अब इंग्लैंड में भी ईसाइयत का हाल जानने के लिए नेशनल सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (NatCen) द्वारा जारी किये गए प्रसिद्ध ब्रिटिश सोशल एटिच्यूड सर्वे की रिपोर्ट के ग्राफ पर नजर डालते हैं. इसमें 1983 से लेकर 2011 के बीच यानी 28 साल के आंकड़े दर्शाये गए हैं.
धर्म का प्रचार, बेवक़ूफ़ बनाने की मुहिम, निशाने पर ग़रीब व मज़बूर
28 वर्षों के दौरान इंग्लैंड में ईसाईयों के बदलते आंकड़े
यहाँ हम काली रेखा को देखते हैं तो पता चलता है कि जो No Religion (नो रिलिजन) हैं यानी जो किसी धर्म को नहीं मानते हैं, उनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. 1983 में जिनकी आबादी 32% थी वह 2009-10 में बढ़कर 50% को पार कर चुकी है. अब ईसाइयत के हम अगर विभिन्न मतों की बात करें तो उसमें Anglican (एंग्लिकन) यानि इंग्लैंड के चर्च से जुड़े ईसाईयों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है. वे 40% से सीधे 20% पर आ पहुंचे हैं. जो Non Christian (नॉन क्रिस्चियन) यानि गैर-ईसाई हैं, उनमें कुछ तो मुसलमान हैं जबकि बाकी हिन्दू और अन्य धर्मों के लोग हैं, उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है. रोमन कैथलिक मत वाले भी घट रहे हैं. वे 10% से घटकर नीचे आ गए हैं.
यूरोप, अमेरिका और इंग्लैंड में ईसाईयों के गिरते ग्राफ के मायने:
इसके मायने बिल्कुल साफ और यह हैं कि जो विकसित देश हैं- जहाँ शिक्षा है, रोज़गार है, ख़ुशहाली है वहां पर तो ईसाईयों का ग्राफ गिरता जा रहा है, जबकि जहाँ अशिक्षा है, बेरोज़गारी और कंगाली है वहां आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं. अब यहाँ समझने की ज़रूरत है, और बहुत महत्वपूर्ण भी यह है कि जब यूरोप, अमेरिका और इंग्लैंड में आंकड़ा कम हो रहा है तो जिन ईसाई मिशनरियों की दुकानदारी ईसाइयत पर चलती है उनके लिए यहाँ घाटे का मामला है. उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए वैकल्पिक स्थान, अपने प्रोडक्ट और ब्रांड के लिए नए ग्राहक की तलाश जरुरी है. और वे यह बखूबी समझते हैं कि जहाँ ग़रीबी, लाचारी और भूखमरी है वहां टारगेट कर अगर धावा बोलते हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, जो आसान भी है. बेवकूफ बनाने से मेरा मतलब यहाँ हमारी तार्किक क्षमता से है, जिसकी कमी देखने को मिल रही है. हमारी दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली के कारण यहाँ अच्छे पढ़े-लिखे लोगों में भी तर्कशक्ति विकसित नहीं हो पाती है, जबकि अमरीका व यूरोपीय देशों का शिक्षित व्यक्ति सही मायने में तर्क व विश्लेषण की क्षमता रखता है.
ईसाइयत के गढ़ में ही ईसा मसीह पर यकीन नहीं:
अध्ययन व हालिया रिपोर्टों से यह जानकारी मिलती है कि यूरोप, अमरीका तथा इंग्लैंड के अधिकाँश लोग सुनी-सुनाई तथा मनगढंत बातों को आँख मूंदकर मान लेने के बजाय उस पर तर्क कर सच और झूठ में फर्क करने पर ज्यादा यकीन रखते हैं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यहाँ के अधिकतर विश्वविद्यालय इस बात से इनकार करते हैं कि यीशु या ईसा नामक कोई व्यक्ति कभी अस्तित्व में था. वे उनके चमत्कारों व मान्यताओं पर भरोसा नहीं करते हैं. वे नहीं मानते कि दुनिया का तथाकथित राजा यीशु लौटकर आएगा तथा कायापलट कर न्याय करेगा.
ईसा मसीह का पुनरागमन
तो क्या सच में ऐसी कोई बात है जो भरोसे के काबिल नहीं है अथवा विवादस्पद है? और यदि ऐसा है, तो लाजिमी है सवालों का उठना. इस पर चर्चा होनी चाहिए. आलोचकों का कहना है कि बार-बार संशोधित हो चुके बाइबल में कई ऐसे प्रसंग हैं जो परस्पर विरोधी है और स्वयं ही विवाद पैदा कर ईसा मसीह के जीवन-दर्शन को अविश्वसनीय बना देते हैं. उनके अनुसार, ईसाइयत के मूल में ही देखें तो ईसा मसीह की वंशावली पर मतभेद है. शायद यही कारण है कि ईसाई मतावलंबी भी एक राय नहीं रखते हैं और विभिन्न मतों में बंटे हुए हैं. परंतु, वे विवादित मुद्दे क्या हैं तथा उनपर बाइबल का नजरिया क्या है, उनका निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक विश्लेषण कर आइये हम पता लगाने की कोशिश करते हैं कि सच क्या है और झूठ क्या है. वे मुख्य विषय-वस्तु जो अक्सर चर्चा के केंद्र में रहते हैं, इसप्रकार हैं:
1. ईसा मसीह के दादा का नाम कहीं पर याक़ूब तो कहीं पर एली:
बाइबल के मुताबिक, परमेश्वर ने ईसा मसीह या यीशु के चार शिष्यों- मत्ती (मैथ्यू), मरकुस (मार्क), लूका (ल्यूक) और युहन्ना (जॉन) को प्रेरित किया और गॉस्पेल यानी सुसमाचार लिखे गए, जिनमें झूठ की रत्तीभर भी गुंजाईश नहीं है. यानी वे अकाट्य हैं. हालाँकि, जब हम यीशु के पूर्वजों को जानने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि मरकुस तथा यूहन्ना के सुसमाचारों में इसका कोई जिक्र नहीं है. मत्ती तथा लूका के सुसमाचारों में वर्णन मिलते हैं पर वे भी आपस में मेल नहीं खाते हैं. यानी दोनों में यीशु या ईसा मसीह के दादा का नाम अलग-अलग बताया गया है. मत्ती के अनुसार यीशु का दादा याक़ूब था, जबकि लूका एली को यीशु का दादा बताता है. है न परस्पर विरोधी? चलिए सबूत के तौर पर मत्ती का सुसमाचार देखते हैं:
मत्ती रचित सुसमाचार (आयत संख्या-16) में यीशु के दादा का नाम याक़ूब
यहाँ अब्राहम से लेकर यीशु तक 39 पूर्वजों का ज़िक़्र है. इसमें 16 नंबर पर मत्ती बताता है- 16. और याकूब से यूसुफ उत्पन्न हुआ; जो मरियम का पति था जिस से यीशु जो मसीह कहलाता है उत्पन्न हुआ॥
आइये, अब हम लूका का सुसमाचार देखते हैं कि इसमें यीशु के दादा की क्या चर्चा है:
लूका का सुसमाचार(यूसुफ की वंशावली :आयत संख्या-23 ) में यीशु के दादा का नाम एली
यहाँ भी अब्राहम से लेकर यीशु तक के पूर्वजों का वर्णन है, लेकिन इसमें उनकी संख्या बढ़कर 52 हो जाती है. अब यह बाइबल के ईश्वर की गलती है या फिर लूका भटक गया लगता है. खैर, जहाँ तक यीशु के दादा का प्रश्न है तो लूका बताता है- 23. यीशु ने जब अपना सेवा कार्य आरंभ किया तो वह लगभग तीस वर्ष का था। ऐसा सोचा गया कि वह एली के बेटे यूसुफ का पुत्र था।
यहाँ यीशु के पिता यूसुफ को एली का पुत्र बताया गया है. यानी यीशु का दादा अब एली (यूसुफ का पिता) है, जो मत्ती वाली वर्णित वंशावली में याक़ूब था. अजीब बात है- यीशु के चार चेले जो साथ रहते थे, सब कुछ जानते थे और ईश्वर की प्रेरणा से लिखा गया फिर भी इतनी बड़ी गलती हो गई.
इसी प्रकार, एक और खास बात है जिसकी चर्चा भी जरुरी है. ईसाई मिशनरियां बार-बार डेविड अथवा दाउद का नाम लेती हैं. ऐसे में, जब हम मत्ती की वंशावली में दाउद से शुरु करते हैं, तो यीशु का नाम 27 वें नंबर पर आता है, जबकि लूका वाले वर्णन में यीशु 42 वें नंबर पर पहुँच जाता है. गौरतलब है कि चार में से दो सुसमाचार तो यीशु के पूर्वजों के बारे में बताते ही नहीं हैं, और जो दो सुसमाचार बताते भी हैं उनमें भी नामों का मिलान नहीं होता है. पहले 6 नाम तो मिलते हैं, लेकिन उसके बाद नाम बदलने शुरु हो जाते हैं, कुछ आगे-पीछे हो जाते हैं और जब हम आगे चलते हैं तो नाम भी मिलने बंद हो जाते हैं. साथ ही, अंत आते-आते मत्ती वाले में यीशु आ जाता है, लेकिन लूका में चूँकि पूर्वज ज़्यादा हैं, इसलिए सूची लंबी होती जाती है और यीशु बहुत बाद में नजर आता है. प्रमाण देखिए:
ल्युक मैथ्यू
अब्राहम अब्राहम
इसाक इसाक
जेकब जुडास
जुड़ा फेयर्स
फेयर्स एस्रौम
एस्रौम एरम
एरम अमिनादाब
अमिनादाब नासौन
नासौन साल्मौन
साल्मौन बूज़
बूज़ ओबैद
ओबैद जैसी
जैसी राजा डेविड
राजा डेविड सोलोमन
नाथन रोबोआम
मत्ताथा अबिया
मेनन असा
मेलेया जोसाफत
एलिअकिम जोरम
जोनान ओज़िअस
जोसेफ जोआथम
जुड़ा अकाज़
सिमिओन एज़ेकियास
लेवी मनासेस
मत्थात आमोन
जोरिम जोसिआस
एलिएज़र जेकोनिआस
जोसे सलाथिअल
एर ज़ोरोबबेल
एल्मोदम अबियुड
कोसाम एलिआकिम
अड्डी अज़ोर
मेल्की सैदौक
नेरी अचिम
सलाथिअल इलियड
ज़ोरोबबेल एलिआज़र
रहेज़ा मत्थान
जोआना जेकब/याक़ूब
जुड़ा जोसेफ/यूसुफ
जोसेफ जीसस (जो यीशु अथवा ईसा मसीह कहलाया )
सेमेयी
मत्तथिआस
माठ
नग्गे
एसलि
नौम
अमोस
मत्तथिआस
जोसेफ
जन्ना
मेल्की
लेवी
मत्थात
हेली/एली
जोसेफ/यूसुफ
जीसस (जो यीशु अथवा ईसा मसीह कहलाया )
इसमें यह स्पष्ट है कि मत्ती में दाउद तथा यीशु के बीच आनेवाले 26 नामों में से सिर्फ चार ऐसे हैं जो लूका में भी आते हैं. तीन ऐसे हैं जिनके नाम मिलते-जुलते हैं और जो नाम दोनों में समान भी हैं उनका क्रम मेल नहीं खाता है.
2. ईसा मसीह के जन्म और जन्मस्थान पर विवाद:
यीशु का जन्म वास्तव में कब हुआ था, और कहाँ यानी किस स्थान पर हुआ था, इसपर विद्वानों में एकमत नहीं है. समय-समय पर अलग-अलग लोगों ने भिन्न-भिन्न दावे किए हैं, जिनकी चर्चा जरुरी है. आइए, पहले उनके जन्म से संबंधित विभिन्न विचारों या दावों का अवलोकन करते हैं, फिर जन्मस्थान की चर्चा करेंगे.
ईसा मसीह का जन्म-काल:
बाइबल में ईसा मसीह या यीशु के जन्म की कोई तारीख नहीं है, इसलिए यीशु के शिष्यों द्वारा वर्णित प्रसंगों,न्यू कैथोलिक इनसाइक्लोपीडिया,इनसाइक्लोपीडिया ऑफ अरली क्रिस्चियानिटी और कुछ अन्य विद्वानों की राय के आधार पर यीशु के जन्मकाल को समझा जा सकता है. हम देखते हैं कि सम्राट ऑगस्तुस द्वारा जारी आदेश जिसमें रोमन साम्राज्य के सभी निवासियों को अपने-अपने शहरों में अपना नाम दर्ज करवाना था (लूका 2:1-3 ), की चर्चा है, उससे लगता है कि यह कड़ाके की सर्दी (25 दिसंबर-क्रिसमस) का वक़्त नहीं रहा होगा. साथ ही, उक्त आदेश का मतलब शायद कर वसूली अथवा सेना में भर्ती का रहा होगा, इसलिए ऐसा नहीं लगता है कि ऑगस्तुस ने अपने आदेश के लिए ऐसे मौसम का चुनाव किया होगा कि जिसमें सभी लोगों को ठिठुरते हुए लंबी दूरी तय करनी पड़े. ऐसा होने पर, लोग भड़क जाते और रोमन साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह भी कर सकते थे.
चरनी में बालक यीशु के दर्शन करते श्रद्धालु
कुछ जानकारों के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था. उनके मुताबिक, क्योंकि यीशु के जन्म के समय गड़रिये खुले मैदान (जहाँ स्वर्गदूत ने सुसमाचार सुनाया) में अपने भेड़ों के झुंडों की देखरेख कर रहे थे (लूका 2:8–डेली लाइफ इन द टाइम ऑफ जीसस ), इसलिए यह समय सर्दियों का नहीं, बल्कि फसह के एक हफ्ते पहले यानी मार्च के मध्य से लेकर नवंबर के मध्य तक का रहा होगा. उनका मानना है कि उस वक्त अगर दिसंबर वाली कड़ाके की ठंढ़ होती, तो गड़रिये खुले मैदान की जगह गुफा में पनाह लिए होते. यह दलील भी विचारयोग्य है कि अगर गड़रिये मैथुन काल के दौरान भेड़ों की देखभाल कर रहे होते, तो वे उन भेड़ों को झुंड से अलग कर रहे होते जो समागम कर चुकी होतीं. ऐसा होता, तो यह पतझड़ का मौसम होता.
शेफर्ड्स फील्ड में चरवाहों को यीशु के जन्म का सुसमाचार सुनाता स्वर्गदूत
कुछ विद्वान यीशु की मौत के समय के आधार पर उनके जन्म के समय का आकलन करते हैं. उनके अनुसार, यीशु की मौत 33 ईस्वी के वसंत में नीसान 14 को यानि फ़सह के दिन (यूहन्ना 19:14-26) हुई थी. इससे पहले उसने जब अपने 3 साल के धर्मप्रचार-कार्य की शुरुआत (लूका 3:23) की, तो वह 30 साल का था. इस तरह उसका जन्म ईसा पूर्व 2 के पतझड़ मौसम की शुरुआत में मुमकिन है. फिर तो यहाँ 25 दिसंबर को क्रिसमस के त्यौहार की मान्यता की धज्जियाँ उड़ जाती हैं.
33 ईस्वी के नीसान 14 (फसह के दिन) को क्रूस पर लटके यीशु
कुछ शोधकर्ता व विशेषज्ञों की राय में, 25 दिसंबर ईसा मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्मतिथि नहीं है और इस तिथि को एक रोमन पर्व पैगन (अजेय सूर्य का जन्मदिन मनाने की परंपरा) या मकर संक्रांति (शीत अयनांत) से संबंध स्थापित करने के लिए चुना गया है, ताकि मसीही रिलीजन अपनाने वाले गैर ईसाईयों को मसीही धर्म ज्यादा आकर्षक लगे. वैसे भी 25 दिसंबर रोमन कैथलिक और प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों की पारंपरिक तारीख है, लेकिन ग्रीक, कॉप्टिक और सीरियाई रूढ़िवादी ईसाई 6 जनवरी को तो आर्मेनियाई रूढ़िवादी ईसाई 19 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं. बेतलहम में अधिकतर क्रिसमस जुलूस गिरजाघर के सामने स्थित मेंजर स्क्वायर से होकर गुज़रते हैं तो रोमन कैथलिक संत कैथरीन गिरजाघर में और प्रोटेस्टैंट चरवाहों के मैदान शेफर्ड्स फील्ड में क्रिसमस मनाते हैं.
बेतलहम में मेंजर स्क्वायर से होकर गुज़रता क्रिसमस जुलूस
ईसा मसीह के जन्मस्थान पर मतभेद:
ईसा मसीह या यीशु के जन्मस्थान को लेकर भी मतभेद है. सबसे पहले तो बेतलहम का वह भवन जिसमें यीशु के माता-पिता यूसुफ तथा मरियम ठहरे थे, यह स्पष्ट नहीं है कि वह घोड़ों का अस्तबल था या गोशाला, या फिर भेड़शाला. दूसरे, बेतलहम भी दो बताये जाते हैं. इन दोनों ही मसलों पर अलग-अलग राय है यानी जितने मुँह उतनी बातें है. कुछ विद्वानों का मत है कि यीशु का जन्म एक कोठार यानी गोशाले में हुआ था जहाँ कृषि-पशु या मवेशी रखे जाते थे. कुछ दूसरे जानकार बताते हैं कि यह स्थान घोड़ों का अस्तबल था, जबकि तीसरी विचारधारा के लोग भेड़शाला को जन्मस्थली बताते हुए एक बिलकुल अलग ही राय रखते हैं. वे यीशु के जन्म को बलि दिए जानेवाले भेड़ों के जन्म के साथ जोड़कर देखते हैं. उनके मुताबिक, यहाँ मंदिर की आधिकारिक भेड़शाला थी जिसमें फसह के मेमने जन्म लेते थे तथा परमेश्वर का पुत्र यीशु भी जैसे परमेश्वर का एक मेमना था; जिसके जन्म का उद्देश्य अपने लोगों के लिए बलिदान देना था.
बेतलहम स्थित गोशाला अथवा भेड़शाला जहाँ यीशु का जन्म हुआ
आज का बेतलहम (फिलिस्तीनी शहर) इजरायल की राजधानी येरुशलम से 10 किलोमीटर दूर सेंट्रल वेस्ट बैंक में स्थित है. यहाँ मौजूदा वक्त में स्थित चर्च ऑफ नेटिविटी को ही ईसा मसीह का जन्मस्थान माना जाता है. इसे ‘हाउस ऑफ ब्रेड’ भी कहते हैं. ईसाई पक्ष या समर्थक जस्टिन मार्टियर के अनुसार, इसे पहले ईसाई रोमन सम्राट कॉन्स्टैन्टिन और उनकी माँ हेलेना द्वारा 327 में बनवाया गया था, जबकि यहूदी और अधिकतर मसीही लोगों की मान्यताओं पर यदि गौर करें तो पता चलता है कि नाजरत के पास स्थित बेतलहम में यीशु जन्मे थे.
फलीस्तीनी शहर बेतलहम स्थित चर्च ऑफ नेटिविटी
नया नियम (न्यू टेस्टामेंट) के सुसमाचारों के स्रोत और यीशु के शिष्यों के अनुसार भी, यीशु के माता-पिता नाजरत निवासी थे, जो अपना नाम दर्ज कराने बेतलहम गए थे; लेकिन यीशु के जन्म के बाद वे भागकर मिस्र चले गए ,और राजा हेरोड की मृत्यु के बाद फिर वापस नाजरत आकर रहने लगे.
यीशु का पवित्र जन्मस्थान
इसके ठीक उलट, एक तबका ऐसा भी है जो इस धारणा का खंडन करता है और यह मानता है कि यीशु का जन्म बेतलहम में नहीं, बल्कि बेतलहम एप्राता में हुआ था. देखिये, अब यहाँ एक दूसरे बेतलहम का जिक्र आ जाता है जो नाजरत के पास वाले बेतलहम से अलग है और जिसका नाम बेतलहम एप्राता है. उनके अनुसार, ‘भविष्यवक्ता मीका (उत्पत्ति की क़िताब-35:19) ने भविष्यवाणी की थी कि यीशु का जन्म बेतलहम एप्राता में होगा जहाँ राहेल की क़ब्र है. इसलिए, बेतलहम एप्राता ही यीशु का वास्तविक जन्मस्थान मानने योग्य है.’
चर्च के निचे स्थित गुफा में गर्भगृह के दर्शन को जाते श्रद्धालु
3. ईसा मसीह का पुनरुत्थान (फिर से जी उठना):
ईसाई मिशनरियां जब मसीही धर्म का प्रचार करती हैं तो उनके पास एक बड़ी दलील यह होती है कि ईसा मसीह जिसे सूली पर लटका दिया गया था, तीन दिन बाद वो फ़िर से जी उठा था. उनके मुताबिक, यह सबसे बड़ा सबूत है कि वह गॉड यानी ईश्वर या ‘परमेश्वर’ था, क्योंकि कोई मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता है. इसका सबूत देने के लिए वे बाइबल पेश करते हैं. ऐसे में, हमें बाइबल को देखना होगा, जिसके दूसरे भाग न्यू टेस्टामेंट (नया नियम) में गॉस्पेल (Gospel) यानी सुसमाचारों (शुभ या अच्छा समाचार) में यीशु के पुनरुत्थान यानी मृत्यु के बाद फिर से जी उठने (जिन्दा होने) की चर्चा है. मगर हम सुसमाचारों में जाएँ, उससे पहले इनका महत्त्व जानना जरुरी है.
विदित हो कि आज दुनिया में जितने भी ईसाई हैं उनमें आधे तो रोमन कैथलिक हैं और ज्यादा प्रभावशाली हैं, जबकि 50 से भी ज्यादा अलग-अलग मत हैं. आइये, हम इसे ग्राफ के जरिए समझते हैं.
दुनियाभर में फैले विभिन्न ईसाई मतावलंबियों की संख्या (प्रतिशत में) दर्शाता ग्राफ-चित्र
हम यहाँ देखते हैं कि 50% रोमन कैथलिक हैं और शेष अलग-अलग मत हैं. शेष अन्य सभी मतावलंबियों में प्रोटेस्टैंट सबसे ज्यादा (17%) हैं. लेकिन, इन सबको यदि एक साथ मिला भी दें, तो भी ये रोमन कैथलिक ईसाईयों से कमतर ही दिखाई देते हैं. रोमन कैथलिक ईसाइयत वेटिकन से या फिर पोप से चलती है, जिनका कहना है- ”Old Testament And New Testament Have God As Their Author”-Vatican
”पुराना नियम और नया नियम का लेखक गॉड स्वयं है ”-वैटिकन
इसका मतलब यह है कि जो पुराना नियम और नया नियम हैं, उन्हें स्वयं ईश्वर ने लिखे हैं, इसलिए उनमें कोई त्रुटि यानी कुछ भी गलत नहीं है. हालाँकि, जो शेष अन्य (मतावलंबी) हैं वे सीधा ऐसा नहीं कहते हैं कि लेखक गॉड स्वयं है , वे कहते हैं- गॉड की प्रेरणा से लिखे गए हैं यानी ईश्वर के प्रेरितों द्वारा लिखे गए हैं. मतलब यह है कि सुसमाचार परमेश्वर ने स्वयं नहीं लिखा, बल्कि उसकी प्रेरणा से यीशु के शिष्यों द्वारा लिखा गया है, जिसमें गलती की कोई गुंजाईश नहीं है. वैसे भी अंग्रेजी भाषा में गॉस्पेल अथवा गॉस्पेल ट्रूथ (Gospel Truth) का मत्लब यथार्थ सत्य अथवा अकाट्य सत्य होता है.
यूँ कहिये कि सारे के सारे गॉस्पेल इतने सच्चे है कि जैसे सच की कसौटी हैं. ऐसे में, अब हमे यह देखना है कि यीशु के सूली पर लटकाए जाने के तीन दिन बाद उनके फिर से जीवित हो जाने के बारे में विभिन्न सुसमाचारों में क्या वर्णन है. यानी परमेश्वर के प्रेरितों अथवा ईसा मसीह के शिष्यों- मत्ती, मरकुस, लुका और युहन्ना के सुसमाचारों में उपरोक्त घटना की चर्चा का अध्ययन तथा विश्लेषण हमें करना है.
युहन्ना का सुसमाचार :
सबसे पहले हम युहन्ना का सुसमाचार देखते हैं. युहन्ना यहाँ कहता है-” सप्ताह के पहले दिन अलख सुबह अँधेरा रहते मरियम मगदलिनी कब्र पर आयी. और उसने देखा कि कब्र से पत्थर हटा हुआ है. तब वह दौड़ी-दौड़ी शमौन पतरस और उस शिष्य के पास गई जिससे यीशु को बहुत प्यार था, और उससे कहा, ”वे प्रभु को कब्र से निकाल कर ले गए हैं. और हमें नहीं पता कि उन्होंने उसे कहाँ रखा है. तब पतरस और दूसरा शिष्य कब्र की ओर चल दिए. वे दोनों साथ-साथ भागने लगे, मगर दूसरा शिष्य पतरस से तेज दौड़ा और कब्र पर पहले पहुँच गया. उसने झुककर कब्र में झाँका, तो उसे मलमल के कपड़े दिखाई दिए. मगर वह अंदर नहीं गया. तब शमौन पतरस भी उसके पीछे-पीछे आ पहुंचा और कब्र के अंदर घुस गया. उसने वहां मलमल के कपड़े पड़े हुए देखे.”
यूहन्ना का सुसमाचार : मरियम मगदलिनी,यीशु की लाश उसके चेले और कपड़ों की चर्चा
इस प्रकार, यहाँ युहन्ना के सुसमाचार से यह पता चलता है कि जब मरियम मगदलिनी कब्र पर पहुँचती है, तो यीशु की लाश वहाँ नहीं थी, मगर उनके कपड़े पड़े हुए थे, जिसके बारे में वर्णन है.
मत्ती का सुसमाचार :
अब उपरोक्त विवरण के मद्देनजर मत्ती के सुसमाचार में देखते है कि वह क्या कहता है. मत्ती कहता है- ”सब्त के बाद, हफ़्ते के पहले दिन पौ फटते ही मरियम मगदलिनी और दूसरी मरियम कब्र को देखने आयीं. कुछ समय पहले एक भारी भूकंप आया था, क्योंकि यहोवा का दूत स्वर्ग से उतरा था. उसने कब्र के मुँह पर रखा पत्थर लुढ़का दिया था और उसपर बैठा हुआ था. उसका रूप बिजली जैसा था और उसके कपड़े बर्फ जैसे सफेद थे. पहरेदार इतने डर गए थे कि वे काँपने लगे और मुर्दे जैसे हो गए थे. मगर जब ये औरतें कब्र पर आयीं तो स्वर्गदूत ने उनसे कहा, ”डरो मत. तुम यीशु को ढूँढ रही हो ना, जिसे काठ पर लटकाकर मार डाला गया था? वह यहाँ नहीं है, उसे जिंदा कर दिया गया है.”
मत्ती का सुसमाचार: दो स्त्रियां,स्वर्गदूत और पहरेदार का ज़िक़्र
अब देखिये, यहाँ मत्ती कुछ अलग ही कहानी कह रहा है. इसका वर्णन युहन्ना के वर्णन से काफी अलग है, और यहाँ चार मुख्य बिंदु बिल्कुल स्पष्ट नजर आते हैं. पहला, युहन्ना बता रहा है कि सिर्फ मरियम मगदलिनी कब्र पर गई थी, जबकि मत्ती ने एक दूसरी औरत जोड़ दी है. उसके मुताबिक मरियम मगदलिनी के साथ एक दूसरी मरियम भी थी.
गुफ़ा के द्वार पर मरियम मगदलिनी के साथ दूसरी मरियम
दूसरा बिंदु यह है कि यूहन्ना किसी स्वर्गदूत की बात नहीं कर रहा है, मत्ती वाले वर्णन में स्वर्गदूत आ जाता है. इतना बड़ा फर्क कैसे संभव है? यदि स्वर्गदूत रोज प्रकट होते रहते हों, रोज उनका आना-जाना लगा रहता हो, तो यह छोटी-मोटी घटना होगी, और इसे भूल सकते हैं. मगर यदि ऐसा नहीं है, तो क्यों युहन्ना इसे बताना भूल गया- जबकि मत्ती बता रहा है. तीसरा बिंदु है भूचाल का आना. यूहन्ना को भूचाल महसूस नहीं होता है, जबकि मत्ती बता रहा है कि भूचाल आया था. अब भूचाल भी क्या रोज आते हैं, जिसे सामान्य बात समझकर यूहन्ना भूल गया?
चौथा बिंदु यह है कि यूहन्ना वाले वर्णन में किसी पहरेदार का जिक्र नहीं मिलता है, जबकि मत्ती बता रहा है कि वहाँ पहरेदार थे, जो डर के मारे थर-थर काँप रहे थे और ऐसा लगता था जैसे वे मर गए हों.
मरकुस का सुसमाचार :
अब मरकुस का सुसमाचार लेते हैं और देखते है कि इसमें वह क्या कहता है. मरकुस कहता है- ”जब सब्त का दिन बीत गया, मरियम मगदलिनी, याक़ूब की माँ मरियम और सलोमी ने खुशबूदार मसाले खरीदे, ताकि आकर यीशु के शरीर पर लगाएँ. वे हफ्ते के पहले दिन सुबह-सुबह जब सूरज निकला ही था, कब्र पर आयीं. वे कह रही थीं, ”कौन हमारे लिए कब्र के मुँह से पत्थर हटाएगा?” मगर, उन्होंने जब नजर उठाकर देखा, तो पत्थर पहले से ही लुढ़का हुआ था, इसके बावज़ूद कि वह बहुत बड़ा था. जब वे कब्र के अंदर गयीं, तो उन्होंने देखा कि एक नौजवान सफेद चोगा पहने दायीं ओर बैठा हैं और वे हैरान रह गयीं. उसने उनसे कहा, ”हैरान मत हो. तुम यीशु नासरी को ढूढ़ रही हो न, जिसे काठ पर लटकाकर मार डाला गया था? उसे ज़िंदा कर दिया गया है, और वह यहाँ नहीं है. यह जगह देखो जहाँ उसे रखा गया था. जाओ और जाकर पतरस और बाकी चेलों से कहो, ‘वह तुमसे पहले गलील को जायेगा.”
मरकुस का सुसमाचार: तीन महिलाएँ, गुफा के द्वार का पत्थर और एक नौजवान का वर्णन
हमने देखा कि मरकुस के सुसमाचार में एकदम से एक नई कहानी आ जाती है, जो पिछले दोनों से मेल नहीं खाती है. यहाँ पर सलोमी नामक एक तीसरी महिला प्रकट हो जाती है जो पहले कहीं भी नजर नहीं आती है. युहन्ना की अकेली मरियम मगदलिनी को मत्ती में आते-आते दूसरी मरियम का साथ मिल जाता है और फिर मरकुस में तो इनकी संख्या बढ़कर तीन हो जाती है. वहाँ एक में पत्थर की कोई बात नहीं थी तो दूसरे में पत्थर को स्वर्गदूत ने लुढ़काया था, और अब यहाँ पत्थर पहले से लुढ़का हुआ है. वहाँ कोई युवक नहीं था, जबकि यहाँ एक युवक आकर बैठा हुआ है.
लूका का सुसमाचार :
यीशु का एक और चेला यानी शिष्य लूका भी अपने सुसमाचार में कब्र से उनके फिर से ज़िंदा होने की बात बताता है. इसमें लूका कहता है- ” हफ्ते के पहले दिन, वे औरतें तैयार किये गए खूशबूदार मसाले लेकर कब्र पर आयीं. मगर उन्होंने देखा कि कब्र के मुँह पर रखा गया पत्थर दूर लुढ़का हुआ है. अंदर जाने पर उन्हें वहां प्रभु यीशु की लाश नहीं मिली. जब वे इस बात को लेकर बड़ी उलझन में थीं, तभी अचानक उनके पास दो आदमी आ खड़े हुए, जिनके कपड़े तेज चमक रहे थे. वे औरतें डर गयीं और अपना सिर नीचे झुकाये रहीं. तब उन आदमियों ने कहा, ”जो जिंदा है, उसे तुम मरे हुओं के बीच क्यों ढूँढ रही हो? वह यहाँ नहीं है, बल्कि उसे जिंदा कर दिया गया है.”
लूका का सुसमाचार : गुफ़ा के द्वार के पत्थर और दो अज़नबियों की चर्चा
अब यहाँ ध्यान देने की बात ये है कि लूका ‘वे औरतें’ लिखकर किन औरतों की बात कर रहा है तथा कितनी औरतों की बात कर रहा है, यह स्पष्ट नहीं है. दूसरे, वहां एक नौजवान था जो बैठा था, जबकि यहाँ दो व्यक्ति चमचमाते हुए कपड़े पहनकर आते हैं और फिर बातें होती हैं. विडंबना देखिये कि चार चेले, चार सुसमाचार और एक यीशु के फिर से जी उठने का प्रसंग कितना उलझा हुआ और परस्पर विरोधी है! उसमें भी चर्चा के केंद्र में वे किताबें हैं जो आम किताबें नहीं हैं. वे या तो स्वयं ईश्वर द्वारा लिखी गई हैं, या फिर उसकी प्रेरणा से लिखी गई हैं, फिर भी इतनी सारी भिन्नता या मतभेद है कि कभी विश्वास नहीं किया जा सकता है कि वे एक ही घटना के बारे में बता रही हैं.
कुल मिलकर, ये जो अंतर या परस्पर विरोधी बातें हैं, उनसे स्पष्ट है कि अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग समय में कहानियां गढ़ी गईं, और फिर उन्हें जोड़कर गॉस्पेल यानी सुसमाचार का नाम दे दिया गया; जिसकी, मसीही लोग मार्केटिंग कर रहे हैं.
यीशु से जुड़ी कई अन्य घटनाएं भी विवादों से घिरी हैं :
यीशु के जीवन-दर्शन से जुड़ी कई अन्य बातें भी हैं,कई सवाल हैं जो बाइबल को कठघरे में खड़ा करते हैं और जिनका जवाब नहीं मिलता.मसलन,यीशु जब 12 वर्ष के हुए तो येरुशलम में दो दिन रुककर पुजारियों से धार्मिक-चर्चा करते रहे.13 वर्ष की उम्र में वो कहाँ चले गए ये कोई नहीं जानता.13 से 29 साल की उम्र के बीच वो कहाँ रहे तथा क्या किया, ये अज्ञात है.33 वर्ष की उम्र में उन्हें सूली पर टांग दिया गया लेकिन तीन दिन बाद यदि वो फ़िर से जीवित हो गए तो फ़िर ग़ायब क्यों हो गए, ये प्रश्न संशय में डालता है.क्योंकि उनका जन्म ईश्वर की योजनानुसार प्राणिमात्र की सेवा व रक्षा के लिए हुआ था तो उन्हें अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए था बिल्कुल उसी तरह जैसे उन्होंने शैतान के सामने दृढ़ता का परिचय दिया था.लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसलिए, ये कहा जा सकता है कि उनका जन्म ही नहीं बल्कि उनकी तथाकथित शहादत भी बेकार चली गई.सबसे बड़े विवाद का विषय तो ये है कि दुनिया की रक्षा करने आया परमेश्वर-पुत्र अथवा परमेश्वर (ईसाई उन्हें परमेश्वर भी बताते हैं) स्वयं की रक्षा नहीं कर सका और दर्दनाक एवं अपमानजनक मृत्यु को प्राप्त हुआ.
येरुशलम स्थित मंदिर के पुजारियों से धार्मिक-चर्चा करते हुए 12 वर्षीय यीशु
कुछ मनोवैज्ञानिक एवं तर्कशास्त्री संदेह व्यक्त करते हैं तथा कहते हैं कि वास्तव में संसार में यदि यीशु नामक कोई व्यक्ति अस्तित्व में था तो अवश्य ही वह एक दोहरे अथवा खंडित व्यक्तित्व (Split Personality) का मनुष्य रहा होगा.उनका कहना है कि यीशु को जब सूली पर लटकाया जा रह था तो वो दर्द से कराहते हुए और ज़ोर से पुकारकर बोला- 46 “एली, एली, लमा शबक्तनी।” अर्थात्, “मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती के अनुसार ).ये दर्शाता है कि तक़लीफ़ की उस अवस्था में यीशु को ये महसूस हो गया था कि वो भ्रम की स्थिति में जी रहा था.तभी उसके साथ सलीबों पर टंगे दो अपराधी भी हैरानी व्यक्त कर रहे थे कि मसीहा भी क्यों पापियों के जैसा ही यातनाएं झेल रहा था.इस दौरान एक अपराधी और यीशु के बीच हुए वार्तालाप का वर्णन भी सामने आता है.
सूली पर टंगे यीशु और एक अपराधी के बीच वार्तालाप का सांकेतिक चित्र
इसप्रकार,उपरोक्त तमाम बिंदुओं और उनके विश्लेषण से ये बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि ईसाइयत और बाइबल की शिक्षा शिक्षितों तथा बुद्धिजीवियों के लिए मायने नहीं रखती.यह उन्हीं लोगों को बेवक़ूफ़ बनाने का मार्ग है जो अशिक्षित हैं,मज़बूर है या फ़िर जाहिल हैं.इसलिए चाहे जितना भी प्रचार हो अथवा विस्तार यह महज एक व्यापार है और अस्तित्व बचाने की कवायद भी.
परमेश्वर-पुत्र तथा राजाओं का राजा यीशु और पवित्र बाइबल
अमेरिका इंग्लैंड ईसा मसीह क्रिसमस चर्च पूर्वज बाइबल भारत मत्ती मरकुस मिशनरी यीशु युहन्ना लूका वंशावली सुसमाचार
भारत की एक तस्वीर, जिसमें मिशनरियाँ गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों, सड़कों, बाज़ारों और पार्कों में ईसाइयत का प्रचार कर रही है. बाएँ भाग में गाँव और चर्च, जबकि बाएँ शहरी क्षेत्र को दर्शाया गया है.


