विमर्श:धाम में शंख-बाजे और उत्तराखंड में गणेश विसर्जन, कितना ठीक,कितना गलत?

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। संभवतया 2006-07 की है। श्रीबदरीनाथ धाम में बदरी-केदार महोत्सव चल रहा था। सुर सम्राट नरेन्द्र सिंह नेगी अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। भगवान शिव को समर्पित एक पौराणिक गीत से उन्होंने स्वर लहरी की शुरुआत की। एक के बाद एक, कई भक्ति गीत उन्होंने गाए। त्रिजुगी नारैण, जय भाले भण्डारी और फिर नन्दा देवी जागर के गायन से देखते ही देखते उन्होंने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। भजनों की ध्वनि तरंगों और वाद्य यंत्रों के दिव्य नाद से समूचा बदरीकाश्रम क्षेत्र सकारात्मक ऊर्जा से भर गया। उपस्थित जनमानस को मानसिक शांति के साथ ही ध्यान जैसी स्थिति का अनुभव होने लगा।

इस भक्तिमय माहौल के बीच श्रीबदरीनाथ धाम के तत्कालीन मुख्य पुजारी रावल बदरीप्रसाद नम्बूरी जी ने स्टेज पर एक पर्ची भेजी। पर्ची के जरिए उन्होंने नरेन्द्र सिंह नेगी जी से मां गंगा पर एक गीत सुनाने का आग्रह किया।

आग्रह स्वीकार करते हुए नेगी जी ने “गंदलू कैरी यालु तेरू छाल्यु पाणि गंगा जी, मां का दूध लाज बि नि राखी जाणी गंगा जी” गीत गाया। यह गीत गंगा को मैला करने वालों पर तीखा प्रहार था। बिना हिले डुले स्रोताओं ने इस गीत को ध्यान से सुना। खत्म होने पर सभी ने अपने स्थान पर खड़े होकर नेगी जी को स्टेंडिंग ओवेशन दिया।

तालियों की गूंज से सन्नाटा टूट गया। लोगों का उत्साह देखकर रावल जी ने एक और पर्ची स्टेज पर भेजी। जिसमें कहा गया कि पर्यावरण पर भी कोई एक गीत हो जाता।

ये पर्चियां भुवन चंद उनियाल जी मंच पर नेगी जी तक पहुंचा रहे थे। फिर नेगी जी ने “डाल्यूं ना काटा चुचो डाल्यूं ना काटा, तौं डाल्यूं ना काटा दिदों डाल्यूं ना काटा” गीत गाकर समा बांध दिया। इसी दौरान श्रोताओं की ओर से डिमांड आई “चली भै मोटर चली” गीत सुना दीजिए। चूंकि नेगी जी की एल्बम “चली भै मोटर चली” ठीक एक साल पहले 2005 में रिलीज हुई थी, उस वक्त यह गीत सुपर हिट हुआ था, तो श्रोता इसे सुनना चाहते थे। लेकिन, नेगी जी ने तीर्थस्थल श्रीबदरीनाथ धाम की पवित्रता और धार्मिक महत्व का हवाला देकर श्रोताओं की मांग को विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया। यह 20 साल पहले की बात है। तब से अब तक अलकनन्दा में काफी पानी बह चुका। परिवेश तेजी से बदल रहा है। ऐसे में कलाकारों की विधा और उनके प्रशंसकों के मिजाज में भी तब्दीली दिखनी तो लाजमी है।

ये दिलचस्प वाकया भू-बैकुंठधाम श्रीबदरीनाथ की धार्मिक परम्परा, आस्था और लोकमान्यता से जुड़ा हुआ है। आज इसका जिक्र करना मुझे इसलिए प्रासंगिक लगा क्योंकि हाल ही में बदरीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि कल्चरल फेस्टिव 2026 के दौरान लोक गायिका प्रियंका महर की प्रस्तुति को लेकर सोशल मीडिया में बखेड़ा मचा हुआ है। ये आयोजन कुछ दिनों पहले अराइवल प्लाजा में हुआ था। प्रियंका महर के स्टाइल, गीत के बोल, पल्सिंग लाइट्स और एम्प्लीफाइड डीजे सिस्टम को देखकर सोशल मीडिया में उसे भला बुरा कहा जा रहा है। इण्डियन आर्मी समेत सहयोगी आयोजकों को लताड़ा जा रहा है। इस शो की तुलना नाइट क्लब से की जा रही है। हालांकि समाज का एक वर्ग इस प्रस्तुति को आज के परिवेश में आए बदलाव के तौर पर भी देख रहा है। यह कार्यक्रम क्यों और किस उद्देश्य से आयोजित किया गया था, इसकी जानकारी भी सामने आनी चाहिए। बदरीनाथ धाम में बदरी-केदार महोत्सव के आयोजन की शुरुआत 1987 में हुई थी। उत्तराखण्ड की संस्कृति, परम्परा और वेशभूषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस महोत्सव के आयोजन की शुरुआत की गई। आयोजन लिए स्थानीय स्तर पर बाकायदा बदरी-केदार महोत्सव समिति का गठन किया गया था। कुछ वर्षों तक समिति खुद के जुटाए संसाधनों से महोत्सव का आयोजन करती थी लेकिन बाद में संसाधनों के अभाव में इसके आयोजन में निरन्तरता नहीं रह पाई। फिर, नगर पंचायत बदरीनाथ संस्कृति विभाग के सहयोग से इसका आयोजन करने लगा। किसी साल आयोजन हुआ किसी साल नहीं। मौजूदा समय में केन्द्र सरकार अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़े हमारे देश के सीमांत गांवों के समग्र विकास और वहां चहल पहल बढ़ाने पर काम कर रही है लिहाजा सीमा पर तैनात सेना के जवानों को स्थानीय लोगों के साथ मेलजोल पर जोर दिया जा रहा है।

इसी क्रम में भारतीय सेना ‘ऑपरेशन सद्भावना’ के तहत पिछले दो सालों से बदरीनाथ धाम में ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिव कार्यक्रम में सहभागी बन रही है। देवभूमि कल्चरल फेस्टिव’ अब बदरी-केदार महोत्सव का नया स्वरूप है।

अब आते हैं असली मुद्दे पर। पूर्व में इस महोत्सव में एक ओर नरेन्द्र सिंह नेगी, प्रीतम भरतवाण, मीना राणा, किशन महिपाल जैसे लोकगायक तो दूसरी ओर सोनू निगम, नितिन मुकेश, सुखविंदर सिंह, अनूप जलोटा, अनुराधा पोडवाल आदि सुप्रसिद्ध पार्श्व गायक समय-समय पर अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। इनमें से वहां सोनू निगम और सुखविंदर सिंह की प्रस्तुति मैं भी देख चुका हूं। अधिकांश की प्रस्तुति के केन्द्र में ज्यादातर भक्ति गीत रहे लेकिन श्रोताओं की डिमांड पर एकआध गीत में प्रेम, वियोग और सौन्दर्य का रस भी रहा है। लेकिन इस बार की प्रस्तुति को लेकर प्रियंका महर अचानक निशाने पर आ गई है। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस बात का पक्षधर हूं कि धार्मिक स्थलों में कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन पूरी श्रृद्धा, विनम्रता और पवित्रता के साथ करना चाहिए, ताकि कला मनोरंजन न रहकर ईश्वर की आराधना का माध्यम बन जाए। उनका आचरण और पहनावा भी सात्विक व मर्यादित होना चाहिए। ऐसा भाव जो मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण के अनुकूल हो। लेकिन एक पहलू यह भी है कि समय और परिवेश में तेजी से बदलाव हो रहा है। पहले वाली पीढ़ी के स्टार नरेन्द्र सिंह नेगी थे तो आज की पीढ़ी प्रियंका महर की फैन है। यह बदलाव सिर्फ मनोरंजन तक सीमत नहीं रहा। धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक परम्पराएं भी बदलने लगी हैं। फिर, समय के साथ हो रहे बदलाव से भला धार्मिक स्थल भी कैसे अछूते रह सकते हैं। एक उदाहरण से इस परिवर्तन को समझिए। जब भी मौका मिलता है मैं बचपन से ही बदरीनाथ जी के दर्शन करने जाता हूं। लेकिन मैंने वहां कभी गणेश विसर्जन होते नहीं देखा था। अब पिछले चार-पांच सालों से वहां धूमधाम के साथ गणेश विसर्जन किया जा रहा है। इसे बाहर से आने वाले श्रृद्धालु नहीं कर रहे बल्कि बदरीनाथ मंदिर की पंडा पंचायत आधिकारिक रूप से इसका आयोजन कर रही है। विसर्जन के दिन गणेश जी को ढोल-दमाऊ और बैंड बाजों के साथ बाकायदा मंदिर परिसर में ले जाया जाता है। मंदिर प्रांगण में अबीर और गुलाल के साथ नृत्य किया जाता है। फिर गांधी घाट पर गणेश जी को अलकनंदा नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। जबकि हमारी देवूभूमि में गणेश विजर्सन की परम्परा कभी नहीं रही, यहां तो गणेश को अपने घरों की खोली में विराजमान किया जाता है। अब पंडा पंचायत ने यह परम्परा न जाने क्यों अपना ली। वो भी बदरीनाथ जी के मंदिर के भीतर तक। जबकि, मंदिर में तो सिर्फ भगवान बदरी विशाल, लक्ष्मी और बदरीश पंचायत से जुड़ी पूजाओं का ही निर्वहन होना चाहिए। बताइये, क्या यह बदलाव नहीं है ?

बदरीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता इसलिए यहां साउण्ड सिस्टम का उपयोग नहीं होना चाहिए था, इस तर्क से मैं कतई इत्तेफाक नहीं रखता। यहां मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने के मुहूर्त पर भारतीय सेना के बैंड और धुनें बजाई जाती हैं। जन्माष्टमी और विजयदशमी के दिन बदरीनाथ मंदिर परिसर में साउण्ड सिस्टम पर भजन बजाए जाते हैं जिन पर भक्तिमय माहौल में श्रृद्धालु देर रात तक झूमते हैं। प्रसिद्ध भारतीय ड्रमर और पद्म श्री से सम्मानित आनंदन शिवमणि बदरीनाथ मंदिर के ठीक बाहर जोर-जोर से ड्रम बजा चुके हैं। डॉल्वी एटमौस और स्पेटियल ऑडियो जैसी ऑब्जेक्ट बेस्ड साउंड तकनीक के साउण्ड सिस्टम पर बदरीनाथ धाम में आए दिन भागवत कथाएं होती है। दस-पन्द्रह साल पहले का साउंड सिस्टम तारों के जाल, भारी भरकम स्पीकर्स और सिर्फ लाउड आवाज पर निर्भर था, जबकि आज का साउंड सिस्टम वायरलेस, एआई स्मार्टनेस और थ्री-डी साउंड एक्सपीरियंस पर केंद्रित है। इस सिस्टम से जुड़े हर इंस्ट्रूमेंट की क्लियरिटी से ऐसा महसूस होता है कि ध्वनि आपके ऊपर, नीचे और चारों तरफ तैर रही है। तो क्या इसे बदलाव न माना जाए ? यह सच्चाई भी किसी से छिपी नहीं है कि भले ही बदरीनाथ मंदिर में शंख न बजाए जाते हों लेकिन वहां कई दुकानों में खुलेआम शंख बेचे जाते हैं। जाहिर है खरीददारी के वक्त बेचने या खरीदने वाले दोनों में से कोई एक तो ट्रायल के तौर पर शंख बजाता ही होगा। फिर शंख न बजाए जाने की बात को फेस्टिव से जोड़कर प्रियंका मेहरा और इंडियन आर्मी को निशाने पर लेना कितना तार्किक है। यह सिर्फ सुनियोजित सियासत नही तो और क्या है ?

‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिव’ धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सुंदर संगम है, जिसमें लोक संगीत, पारंपरिक नृत्य और अन्य स्थानीय रीति-रिवाज शामिल किए जाते हैं। ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ इस फेस्टिव की थीम थी। तो फिर पुराने दिग्गज कलाकारों के साथ ही भविष्य के कलाकार इसमें अपनी विधा का प्रदर्शन नहीं करेंगे तो क्या करेंगे। फेस्टिव में प्रियंका महर का न तो पहनावा उत्तेजक था और न ही उसके गीतों के बोल अश्लील थे। हमारी पहाड़ी संस्कृति के अनुरूप ‘भिना और स्याली’ के गीत में हंसी-मजाक, नोक-झोंक और अपनापन का भाव नहीं होगा तो और क्या होगा ? बाकी आपरेशन सद्भाव के तहत इस फेस्टिव से जुड़ी इण्डियन आर्मी ने फेस्टिव में लगी प्रदर्शनी में अपने अत्याधुनिक हथियार, मिसाइलें, युद्धक वाहन, टैंक, ड्रोन, रोबोटिक उपकरण, 1965 या 1971 के युद्ध के दौरान दुश्मन से हासिल की गई वस्तुओं से आम लोगों को रूबरू करवाया, उसे क्या हम दरकिनार कर दें ? वहां लगे स्टॉल में स्थानीय बुनकरों और स्वयं सहायता महिला समूहों के उत्पाद हाथों हाथ बिके, क्या ये छोटी उपलब्धि है ? देश की सुरक्षा के लिहाज से बार्डर विलेज के ग्रामीणों को सेकेण्ड डिफेंस लाइन माना जाता है। फेस्टिव के बहाने सीमा के इन प्रहरियों का सेना के जवानों से भावनात्मक लगाव बढ़ गया तो क्या इसे हासिए पर रख दें ?

🙏 जय बदरी विशाल 🙏
दीपक फर्स्वाण*
बदरीधाम तक पहुंची राजनीति की चिंगारी

जीवन में तीसरी बार कल भगवान बद्री विशाल के दर्शनों के लिए जाने की योजना है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पिछले दिनों बद्रिकाश्रम में आयोजित किए गए देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल को लेकर के कुछ लोगों ने जो धमाल मचा रखा है उस पर भी गौर किया जाए।
इस आयोजन को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को घेरने की जो कोशिश से हुई, उसको लेकर के मैंने इस पूरे घटनाक्रम की पड़ताल करने की कोशिश की। पहाड़ की एक नामचीन गायिका प्रियंका मेहर के शो को लेकर पहाड़ के ही कुछ लोगों ने जो हायतौबा मचा रखी है, उसको अगर बारीकी से समझा जाए तो एक बड़े राजनीतिक षड्यंत्र की बू भी आती है।
इस आयोजन को लेकर के जो भी विरोधी प्रतिक्रिया सामने आई उसमें सभी ने सबसे पहली बात यह लिखी कि बद्रीनाथ धाम में शंख नहीं बजाया जाता है। बहुत सारे वरिष्ठ पत्रकार साथियों, चिंतकों और भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी साहब की प्रतिक्रिया भी सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से पढ़ने को मिली।
इस विषय पर अपनी चिंता जाहिर करने वाले इन महानुभावों ने इस बात पर कभी गौर नहीं किया कि जिस बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु का ध्यान भंग ना हो इसके लिए शंखध्वनि भी वर्जित है। उन्हें में से बहुत सारे इसी धाम में अपनी महंगी कारों के हूटर और कानफोड़ू ध्वनि निकालने वाले हार्न बजाते रहे होंगे। पहला सवाल यह है कि क्या उनके महंगे वाहनों के हार्न और हूटरों की आवाज शंखध्वनि से कम रहती होगी। क्या उनके हूटरों और हार्न की आवाज से भगवान विष्णु का ध्यान भंग नहीं होता होगा। यही नहीं बड़ी शख्सियतों को हेलीकॉप्टर से यहां लाने वाले हेलीकॉप्टरों की गर्जना किसी शंख ध्वनि से कम होगी क्या।
अब दूसरा सवाल। पूरे घटनाक्रम की जानकारी जुटाने के बाद ही मैं इस पोस्ट को लिख रहा हूं। उस दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी वहां हेलीकॉप्टर से करीब 10:00 बजे पहुंचे। उसके बाद उन्होंने भगवान बद्री विशाल के दर्शन किए और पूजा अर्चना की। इसके बाद में वे किसी संस्था के द्वारा आयोजित भागवत कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। उनका तीसरा कार्यक्रम बामणी गांव में आयोजित नंदा महोत्सव में सम्मिलित होने का था। जहां उन्होंने इस गांव की पारंपरिक प्रसिद्ध धांकुड़ी नृत्य में प्रतिभाग कर उत्तराखंड की संस्कृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार भी किया।
इसके बाद धामी उस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए जिसको लेकर के तथाकथित संस्कृति के ठेकेदारों ने पूरा हिमालय सर पर उठा रखा है। इस कार्यक्रम में धामी महज आधा पौन घंटा रहे और देश के प्रथम गांव माणा के एक पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम पांडव नृत्य को देखा। इस कार्यक्रम से पहले उन्होंने इस अवसर पर विभिन्न विभागीय और महिला समूह के द्वारा लगाए गए स्टालों का भी अवलोकन किया।
जैसा कि मुझे जानकारी मिली मुख्यमंत्री धामी यहां माणा गांव के कार्यक्रम को देखने के बाद लगभग 12:00 से 12:30 के बीच में देहरादून के लिए निकल गए। प्रियंका महर के जिस कार्यक्रम को लेकर के सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार को घेरने की जो कोशिश हो रही है वह शाम 5:00 बजे के बाद आयोजित किया गया। यानी कि जब यह कार्यक्रम हुआ उससे कई घंटा पहले ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बद्रीनाथ से जा चुके थे।
इस आयोजन बहाने धामी सरकार को कटघर में खड़ा करने वालों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देने के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी जी से भी इस पर तत्काल मीडिया में बयान दिलवा दिया।
पिछले लगभग 10 सालों की बात करें उत्तराखंड के मूल निवासी रहे डॉ मुरली मनोहर जोशी साहब के दो बयान ही मुझे याद आते हैं। पहला उन्होंने त्रिवेंद्र रावत जी के मुख्यमंत्री रहते हुए तब दिया था, जब त्रिवेंद्र सिंह रावत जी ने गैरसैण को कमिश्नरी बनाने की घोषणा की थी। जोशी जी ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने से अल्मोड़ा का सांस्कृतिक महत्व खत्म हो जाएगा।
हालांकि यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई की गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने से अल्मोड़ा का सांस्कृतिक महत्व कैसे खत्म होता। आज फिर एक बार उन्होंने बद्रीनाथ में हुए इस आयोजन को लेकर के उत्तराखंड की संस्कृति को लेकर बड़े सवाल उठाने की कोशिश की है। महत्वपूर्ण यह है कि जोशी जी ने पिछले 10 साल में जो यह दो बड़े सवाल उत्तराखंड को लेकर उठाए हैं क्या यह उन्होंने अपनी स्वेच्छा से उठाए हैं या उनसे उठवाए गए हैं। ये विचारणीय है।
उन्होंने उत्तराखंड के हित के लिए कभी कोई बड़े सवाल या सुझाव दिए हों, ऐसा मेरी जानकारी में बिल्कुल नहीं है। किसी साथी को अगर ज्ञात हो कि उन्होंने कभी उत्तराखंड के व्यापक हितों के लिए बड़ी और प्रभावशाली तरीके से आवाज उठाई हो तो वह प्रतिक्रिया जरुर दें।
अब जहां तक प्रियंका महर के इस कार्यक्रम को लेकर के उठे बवाल की बात है। मुझे तो साफ तौर पर यह लगता है कि प्रशासन मैं बैठे अफसरों ने अपने नंबर बढ़ाने के लिए एक बेहतरीन और विशाल कार्यक्रम करने की कोशिश में यह आयोजन किया। इसका न तो सरकार से कुछ लेने देना था और न ही सरकार ने ऐसा कोई आदेश दिया था। अब जिलाधिकारी इस संपूर्ण कार्यक्रम की जिम्मेदारी गढ़वाल स्काउट के कमान अधिकारी पर डालने की कोशिश कर अपना दामन बचा रहे हैं। जबकि जिलाधिकारी के ही कई पत्र यह साबित कर रहे हैं इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के लिए उन्होंने ही मुख्य विकास अधिकारी को अधिकृत किया था।
उल्लेखनीय है कि देवभूमि कल्चरल फेस्टिव’ ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ की थीम पर आधारित एक कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के माध्यम से देश-विदेश से भगवान बद्री विशाल के दर्शन के लिए पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं को उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और एक ऐसी विरासत से रूबरू कराने का उद्देश्य था, जो उन्हें सिर्फ इसी क्षेत्र में दिखाई देती है।
फेस्टिव में प्रियंका महर का न तो पहनावा उत्तेजक था और न ही उसके गीतों के बोल अश्लील थे। हमारी पहाड़ी संस्कृति के अनुरूप ‘भिना और स्याली’ के गीत में हंसी-मजाक, नोक-झोंक और अपनापन का भाव नहीं होगा तो और क्या होगा ? बाकी आपरेशन सद्भाव के तहत इस फेस्टिव से जुड़ी इण्डियन आर्मी ने फेस्टिव में लगी प्रदर्शनी में अपने अत्याधुनिक हथियार, मिसाइलें, युद्धक वाहन, टैंक, ड्रोन, रोबोटिक उपकरण, 1965 या 1971 के युद्ध के दौरान दुश्मन से हासिल की गई वस्तुओं से आम लोगों को रूबरू करवाया।
इस आयोजन के चलते वहां लगे स्टॉल में स्थानीय बुनकरों और स्वयं सहायता महिला समूहों के उत्पाद हाथों हाथ बिके। हमारे इस पड़ोसी क्षेत्र के उत्पादन और कल की प्रसिद्ध देश दुनिया भर से आए लोगों तक पहुंची। यह था भगवान बद्री विशाल के चरणों में आयोजित देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल के आयोजन का मुख्य उद्देश्य। अब इसको कौन कैसे प्रचारित करता है यह सब के अपने दिमाग की उपज है।

🙏 जय बदरी विशाल लाल 🙏

अर्जुन सिंह बिष्ट घेसवाले

बदरीनाथ धाम डीजे विवाद: DM ने सेना को भेजा नोटिस, कमांडिंग ऑफिसर से मांगा स्पष्टीकरण

बद्रीनाथ धाम में बिना अनुमति बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल पर चमोली के जिलाधिकारी ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल शांतनु को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।

बद्रीनाथ धाम में बिना सक्षम प्रशासनिक अनुमति के बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का मामला सामने आया है।

मामले को गंभीरता से लेते हुए चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल शांतनु को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। डीएम ने भविष्य में इस प्रकार के आयोजन की पुनरावृत्ति न होने देने के निर्देश भी दिए हैं।

उच्च आवाज वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल
जिलाधिकारी ने नोटिस में कहा है कि विभिन्न संचार माध्यमों और सोशल मीडिया के जरिए उन्हें जानकारी मिली कि श्री बद्रीनाथ धाम में वृहद कल्चरल फेस्टिवल कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में काफी संख्या में लोगों की भीड़ एकत्र हुई और उच्च आवाज वाले साउंड सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। डीएम ने कहा कि श्री बद्रीनाथ धाम धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और इस पवित्र धाम की उच्चकोटि की धार्मिक एवं आध्यात्मिक गरिमा है।

उन्होंने कहा कि धाम में इस प्रकार के सामूहिक आयोजन और तेज आवाज में साउंड सिस्टम का प्रयोग किए जाने से प्रतिदिन आयोजित होने वाले पूजा-अर्चना कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। इससे धार्मिक विद्वानों में अप्रसन्नता की भावना उत्पन्न होने के साथ ही स्थानीय प्रशासन की छवि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नोटिस में कमांडिंग ऑफिसर से पूछा गया है कि बद्रीनाथ धाम में इस प्रकार का कार्यक्रम आयोजित किए जाने का क्या औचित्य था और आयोजन के लिए सक्षम स्तर से पूर्व अनुमति प्राप्त की गई थी अथवा नहीं। साथ ही कार्यक्रम में उच्च आवाज वाले साउंड सिस्टम का प्रयोग किन कारणों से किया गया, इसका भी स्पष्टीकरण मांगा गया है।

बदरीनाथ धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम पर पुरोहित महापंचायत ने उठाए सवाल

बदरीनाथ धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्वरूप पर उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने नाराजगी जताई है।

बदरीनाथ धाम में आयोजित ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ के सांस्कृतिक कार्यक्रम के स्वरूप और प्रस्तुति पर उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने नाराजगी जताई है।

महापंचायत का कहना है धाम की धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं को ध्यान में रख कर कार्यक्रमों किए जाने चाहिए। संगीत के माध्यम से शोर उत्पन्न करना धाम की धार्मिक गरिमा के अनुरूप नहीं है। उधर, जिला प्रशासन का कहना है कि सेना के स्थानीय अधिकारियों को धाम की धार्मिक आस्था, पौराणिक-आध्यात्मिक महत्व और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुरूप ही आयोजन कराने की सलाह दी थी।

सेना की ओर से प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी बदरीनाथ स्थित टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में दो दिवसीय ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ का आयोजन किया गया। महोत्सव की थीम ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’थी। आयोजन का उद्देश्य क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय परंपराओं और प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के साथ ही सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना था।

सेना के अनुरोध पर जिला प्रशासन ने विभिन्न जनोपयोगी एवं जनकल्याणकारी योजनाओं से संबंधित स्टाल लगाए थे। फेस्टिवल में नाच-गाने को लेकर सवाल उठे थे। सामाजिक संगठनों ने कुछ गायकों की प्रस्तुति पर आपत्ति जताते हुए इसे बदरीनाथ धाम की मर्यादा के विरुद्ध बताया है। उनका आरोप था कि कुछ गायकों ने फूहड़ता का प्रदर्शन किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *