ये महान,वो महान, सबसे महान क्षत्रिय परमार वंशीय राजपूत राजा विक्रमादित्य

किसी भी महान राजा की वीरता का सही-सही अनुमान उसके राज्य का क्षेत्रफल देखकर ही लगाया जा सकता है ।

आज का पूरा भारत,पाकिस्तान,अफगानिस्तान,तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान,कजाकिस्तान,तुर्की,अफ्रीका,सऊदी अरब,इधर नेपाल,थाईलैंड,इंडोनेशिया,कंबोडिया,लंका,चीन का बड़ा भाग इन सब प्रदेशों पर विश्व के बड़े भूभाग पर महाराज विक्रमादित्य का शासन था ।।

और इतना ही नही —

विक्रमादित्य ने रोम के राजाओं को हराकर विश्व विजय भी कर लिया था ।।

“यो रूमदेशाधिपति शकेश्वरं जित्वा ” ।।

अर्थात उसने रोम के राजा और शक राजाओं को जीता ।। उसने सब मिलाकर 95 देश जीतें ।। आज भारत में डेमोक्रेसी है, लेकिन भारत शांत नही है, लेकिन इस डेमोक्रेसी की नींव डालने की शुरुवात ही खुद महान क्षत्रिय परमार वंश के राजपूत राजा विक्रमादित्य ने की थी, विक्रमादित्य की सेना का सेनापति प्रजा चुनती थी ।। वह प्रजा सै चुना हुआ धर्माध्यक्ष होता था । प्रजा से अभिषिक्त निर्णायक था । आज के समय में अमरीका और रूस के राष्ट्रपति की जो शक्ति है, वही शक्ति महाराज विक्रमादित्य के सेनापति की होती थी ।।

लेकिन यह सब भी अपना परम् वीर विक्रम को ही मानते थे ।। विक्रम ने भी अपने आप को शासक नही, प्रजा का सेवक मात्र घोषित कर रखा था ।।

पहला शक राजा मॉस था । उसने ईसा सदी से पूर्व गांधार जीत लिया था । इसके बाद सम्भवतः एजस नामक राजा बैठा । अब शक आगे बढ़े, इनका विस्तार पंजाब तक हो गया । इसके बाद दो शक राजा और हुए, यह लोग सीथियन लोगों को भेजकर गर्वनर प्रणाली से शासन चलाते थे ।। इनकी शक राजाओं से प्रेरित गर्वनर लोग ” क्षत्रप ” कहलाते थे ।।

इन सीथियन गर्वनरों ने तक्षशिला से लेकर मथुरा तक राज किया है । इन्होंने केवल यही तक संतोष नही किया, यह विंध्यांचल पार कर दक्षिण की ओर भी बढ़े ।। यही कारण है कि मालवा और गुजरात प्रदेश के आसपास विक्रम को क्षत्रपों से लड़ना पड़ा था और क्षत्रप वीर विक्रम के आगे मार खाकर भागे ।

इन क्षत्रपों की एक शाखा दक्षिण में गौतमीपुत्र सातकर्णी से लड़कर मार खाई, उस समय नेहपान दक्षिण पर आधिपत्य जमाये बैठा था, उसका राज्य कोंकण, महाराष्ट्र, मंदसौर, मालवा से राजस्थान के पुष्कर तक फैला हुआ था । ईसा की दूसरी सदी ने गौतमीपुत्र सातकर्णी में नेहपान पर आक्रमण कर उसके राज्य को सातकर्णी साम्राज्य में मिला लिया ।।

उज्जैन में उन दिनों चपटन नामक क्षत्रप राजा था, जिसने सातवाहन को जीतकर उसे अपने राज्य में मिला लिया था। उसके बाद उनके ही पुत्र गौतमीपुत्र सातकर्णी में चपटन ने बेटे नेहपान को परास्त कर उसके पूरे राज्य को अपने राज्य में मिला लिया ।।

विक्रमादित्य मालव जाति से थे, जो आज परमार कहलाते है ।। हरिवंश पुराण में इन्हें चन्द्रवँशी क्षत्रिय कहा गया है । यह लोग बड़े ही बलवान, पराक्रमी ओर वैभवशाली लोग कहे जाते थे । कौरव पांडव के बीच जब महाभारत का युद्ध हुआ था, तो इन्होंने कौरव पक्ष का साथ दिया था । यतार्थ में मालव लोग मलवंशीय क्षत्रिय है, अब भी मल्ल तथा शाही वंश के कुछ परिवार नेपाल की तराई में रहते है, इतनी शताब्दी से वहां गरीबी की मार है, फिर भी वहां के क्षत्रियो का रहन सहन अन्य लोगो को अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है, वे आज भी अपने आप को सबसे ऊंचा मानते है , वे लोग भी बड़े पराक्रमी ओर वीर है । मल्ल की व्याख्या से ही प्रतीत होता है कि कुश्ती लड़ने वाला शूरवीर । कृष्ण महाभारत, बलदेव कुश्ती से समझा जाये, तो इस वंश को समझने में ज़रा भी देर नही लगेगी ।।

नेपाल के मल्ल पंजाब से नेपाल गए थे, ओर पंजाब के मल्ल ही राजपुताना आये थे, अपनी जाति की याद को हमेशा जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने राज्य का नाम मालवा कर लिया । उज्जैयनी में मालव जाति का पहला राजा गन्धर्वसेन हुये है, यह पहली मालव राजा है, जिन्होंने अपने राज्य को अपनी भुजाओं के बल पर बढ़ाया । गन्धर्वसेन के बाद उनके ज्येष्ठपुत्र भृतहरि गद्दी ओर बैठे । किंतु कुछ काल के बाद विरक्त होकर इन्होंने नाथपन्थ की दीक्षा ले ली ।।

यह वहीं भृतहरि है जिन्होंने बाद में ” वैराग्य शतक ” नीति शतक ” सृंगार शतक ” नामक प्रसिद्ध शतश्लोकों ओर काव्यों की रचना की है । भृतहरि के बाद ऐतिहासिक वीर विक्रम गद्दी पर विराजमान हुए थे । इन्होंने ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी में राज किया था ।
यह शूरवीर बड़ा दानी था
वीर था
यह वीर विक्रम जमीन पर सोता था
अल्पाहार लेता था
केवल योगबल पर अपने शरीर को व्रज सा मजबूत बनाकर रखता था ।

इन्ही ने महान राष्ट्र की स्थापना कर सनातन धर्म का डंका पुनः बजाया था ।

महाभारत के युद्ध के बाद वैदिक धर्म का दिया लगभग बुझ गया था, हल्का सा टिमटिमा मात्र रहा था । इस युद्ध के बाद भारत की वीरता, कला, साहित्य, संस्कृति सब कुछ मिट्टी में मिल गयी ।। उस युद्ध के 6000 साल बीत गए, लेकिन उस काल जैसा प्रबल योद्धा ओर राजा भारत को आज तक नही मिला है ।।

इस देश का ऐसा कोई व्यक्ति नही, जिसने वीर विक्रम की वीरता और उदारता की कहानियां न सुनी हो ।

सम्राट विक्रम कैसे थे, इसका वर्णन एक गुणाढ्य कवि की इन पंक्तियों में मिलता है –

स पिता पितृहनिनामवन्धुनामं स बान्धव

अनाथानामं च नाथं सः प्रजानाम् कः सः नामवत

महावीरोप्यभदराजा स भीरू परलोकतः

शुरोपिशाचरचण्डकरः कुभतापर्यङ्गनप्रियः ।

अर्थात वह पितृहीनो का पिता, भातृहीनो का भाई, ओर अनाथों का नाथ था । वह प्रजा का क्या नही था ?? ।। महावीर होने पर भी वह परलोक से डरता था , शुर होने पर भी वह प्रचंडकर नही था । यही सब कारण है, की 2000 साल बाद भी हम उनके गुणों की चर्चा करते नही अघाते ।।

शकों के काल मे भारत की स्थिति क्या थी, इसका वर्णन आप इस श्लोक से समझ सकते है –

ये त्वया देव निरता , असुरा येच विष्णुना

ते जाता मल्लेछरूपेण पुनःरथ महीतले ।

व्यापादयन्ति ते विप्रान धांति यज्ञादकाकीय ।

हरन्तिमुनिकन्यास पापां की की न कुर्वते ।

भूलोका देवलोकास्चय शश्वदाप्यायते प्रभो ।

……..

अर्थात है विष्णुदेव आपने जिन मल्लेचो पर असुरों का वध किया है, वे धरती पर मल्लेचरूप धरकर पुनः प्रकट हो गए है । वे ब्राह्मण और मुनि कन्याओं को भगाकर ले जाते है, वे पापी क्या क्या अत्याचार नही करते ?

उक्त बातें शक ओर हूण हमलों की याद ताजा करने के लिए है, यह लोग आज के isis से भी ज़्यादा बर्बर होते थे, भारत की कुछ जातियां खुद को इनका वंसज होने का कहने में शर्म भी महसूस नही करती ।।

जब भारत मे इस तरह की हाहाकार मची थी, तब विष्णुजी ने पुकार सुनी । गुणाढ्य कवि ने एक जगह लिखा है की भारत की यह दुर्दशा देखकर स्वयं शिवजी ने विक्रमादित्य विक्रम का अवतार धरकर पृथ्वी पर जन्म लिया ।। इनके पराक्रम का अंदाजा इस बात से लगा सकते है, की जावा सुमात्रा तक के सुदूर देशों तक इन्होंने अपने सेनापति नियुक्त कर रखे थे ।

मथुरा जितने के पश्चात उन्होंने शकों को भारत से निकालने की ठानी ।

कालिदास की इस पंक्ति से उनके सैन्यबल का पता चलता है ।

यस्यापाष्टदश योजनानि कटके पादातिकोटित्रियम ।

वाहानामयुतायुतंच नेवते ……

3 करोड़ पैदल सेना

90,000 हाथी

4 लाख नॉकाएँ थी

——-

उत्तरपश्चिमी शकों का मान मर्दन करने के लिए मुल्तान के पास जागरूर नाम की जगह पर विक्रम का शकों के भयानक युद्ध हुआ । विशेषकर राजपुताना के उत्तरपश्चिमी राज्य की ओर शकों में उत्पात मचा रखा था । मुल्तान में विक्रम की सेना से परास्त होकर शक जंगलो में भाग गए, उसके बाद इन्होंने फिर कभी आंख उठाने की हिम्मत नही की,

विक्रम साक्षात शिव थे, क्यो की उज्जैन के राजा महाकाल के ।।

विक्रमादित्य के काल के सिक्कों पर ” जय मालवांना लिखा है । विक्रमादित्य के मातृभूमि से प्रेम से इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है, सिक्को पर अपना नाम न देकर अपनी मातृभूमि का नाम दिया ।।

विक्रमादित्य का हम जहां भी वर्णन पाते है, पूरे राज्य के कार्य वहीं करते है, युद्ध मे वह सेना का संचालन करते थे, बाद में राजदरबार में न्यायमूर्ति बनकर बैठते थे । विक्रम के पिता एक साधारण मांडलिक के राजा थे, जबकि विक्रम ने जावा सुमात्रा को भी अपने गणतंत्र में मिलाया ।।

विक्रम की गाथा चल रही है, तो वेताल के कारण। विक्रम की कहानियां काल्पनिक सी लगती है । पौराणिक काल में प्रत्येक राजा तंत्र का ज्ञाता अवश्य होता था और वह प्रकांड तांत्रिकों की संगत में हमेशा रहता, पटना का वैताल एक महातांत्रिक था, विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक था, वह महातांत्रिक तो क्या, स्वम् में एक महाशक्ति था ।

मनीषा सिंह की कलम से सम्राट विक्रमादित्य:-
एक स्वर्ण युग जिससे ब्रिटिश इतिहासकारों ने षडयंत्रपूर्वक आंखें बंद कर ली । इस षड्यंत्र अंधकार में खोये इतिहास से अवगत कराया इतिहासविदुर श्री कोटा वेंकटाचलम ने।

VIKRAMADITYA ERAS (विक्रमादित्य युग)
वंश परिचय – सम्राट विक्रमादित्य से पूर्व चार राजवंश हुए अग्निवंशी कुल के जिन्होंने २९१ वर्ष शासन किया। ३९२ ईस्वी पूर्व से १०१ ईस्वी पूर्व तक । महाभारत युद्ध (३१३८ ईस्वी पूर्व) के समय से लेकर गुप्त चन्द्रवंशी राजवंश गुप्त साम्राज्य के समय तक अग्निवंशी शासन रहा। सम्राट गंधर्वसेन के दो पुत्र प्रथम शंख और द्वितीय पुत्र विक्रमादित्य। गंधर्वसेन परमार १८२ से १३२ ईस्वी पूर्व तक शासन कर अपने बड़े पुत्र शंख को साम्राज्य सौंपकर जंगल में तपस्या करने चले गये परन्तु दुर्भाग्यवश बड़े पुत्र शंख की अकाल मृत्यु हो गई । गंधर्वसेन परमार ने तपस्या त्याग  वापस राजपाठ संभाला। उसी समय भगवान शिव के पार्षद विक्रमादित्य परमार का जन्म हुआ 101 ईस्वी पूर्व । गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र विक्रमादित्य को ८२ (82 B.C) ईस्वी पूर्व में राजपाठ सौंपकर सन्यास लिया एवं फिर तपस्या करने चले गये । (Even before Vikramaditya the four dynasties of Agni Vamsa covered over a period of 291 years from Kali 2710(or 392 BCE) to Kali 3001(or 101 BCE). The Chronology of ancient Indian History right from the time of Mahabharata War (3138 BCE) down to the beginning of Gupta dynasty (327 BCE) )
सम्राट विक्रमादित्य की जीवनी -:
सम्राट विक्रमादित्य का जन्म सन १०१ ईस्वी पूर्व में (101 B.C) हुआ था । पांच वर्ष की आयु में विक्रमादित्य तपस्या करने जंगल चले गये। १२ वर्ष तक तपस्या की । तपोबल से दिव्य शक्तियां प्राप्त कर अम्बावती (वर्त्तमान उज्जैन) लौटे । २० साल की आयु में राज्याभिषेक हुआ। 32 सोने की पुतलियों का सिंहासन मिला । भारतवर्ष के सम्पूर्ण भूमंडल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। ८२ (82 B.C) ईस्वी पूर्व उज्जैन की राजगद्दी पर आसीन हुए महाराज विक्रमादित्य ने सौ वर्ष[  १९ ईस्वी तक (19 A.D) तक पूरी पृथ्वी पर शासन किया । ऐसा अपराजित योद्धा , चारों दिशाओं का सम्राट मनुष्य तो हो ही नही सकता अवतार ही होंगें । यह ध्यान देना चाहिए, विक्रमादित्य किसी उपाधि का नाम नही हैं जैसा कि पश्चिमी इतिहासकारों ने धारणा बनाई हैं । उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र का नाम सूर्य के समान पराक्रमी होने से (जिनका पराक्रम आदित्यवत हो) विक्रमादित्य रखा था इतिहास में शकारी विक्रमादित्य नाम से जाने जाते हैं (शकारी का अर्थ शकों का शत्रु) ।
(When he was 5 years old, Vikrama went to the forest and did penance for 12 years. Having enriched his greatness by penance he reached the city Ambavati or Avanti (Ujjain) and was appointed as a king on a golden throne decorated with 32 golden dolls.” (This was in the year 3020 0f Kali era i.e. 82 BCE.) (Bhav. 3-1-7-17,18). It should be noted that Vikramaditya was not a title as some historians think. But it was the name christened by the father.)
अवन्ती राज्य के राजा कैसे बने सम्पूर्ण भारतवर्ष के स्वामी एवं विश्व विजेता सम्राट -:
कलियुग के ३१८२ (3182) वर्ष पूरे हो चुके थे। शक् के अत्याचार से भारतवर्ष का कण- कण त्राहि त्राहि कर रहा था। सनातन पर अतिभारी संकट था। इस वक़्त धर्म में किसी अवतार की ज़रूरत थी जो शक जैसे क्रूर मलेच्छों से धर्म रक्षा करे । मंदिर लूटे और ध्वस्त किये जा रहे थे । नारियों का शील भंग हो रहा था । महाराज विक्रमादित्य परमार ने ८२ ईस्वी पूर्व में राजा बनते ही शक मलेच्छ को भारतवर्ष से खदेड़ने को युद्ध अभियान आरंभ किया ।
कालिदास ने लिखा हैं इस युद्ध के विषय में -:
अथ शाककर्तृत्वमाह – निहन्तीति — यो भूतलमण्डले शकान् मलेच्छान् निहन्ति कस्मिन् कलौ कलियुगे किंभूतान् सपञ्चेति । अब्जं शतकोटिसहस्रस्व दलमर्घं पञ्चाशत्कोटि अब्जदलं सह पञ्चकोट्यो वर्तते यत्तत्सपञ्चकोटि तच्चाब्ज दलान् तेन प्रमीयन्त इति प्रमा: स्यु: । अंकतोऽप्यत्र (५५,००,००,०००) । स राजपुत्र: शक कारको नृपाधिराजश्चक्रवर्ती भवेत् । हि युक्तार्थे । उत पुनः शकानां म्लेच्छाना नाशकाल: शाक: शाक कर्तृन् हन्तीति शाककर्तृहा सोऽपि शाककर्ता चक्रवर्ती भवेत् । यथा जैन मते वासुदेवं प्रति वासुदेवत् ।

( ) – शकोंको मारकर विक्रमादित्यने शक सम्वत् प्रारंभ की – इन्होंने कलियुग में समस्त भूमण्डलके ५५ करोड़ शकों को युद्धमें मार डाला था । इन शकोंके दल में ५५ करोड़ की संख्या में सैनिक थे ,उन सबका समूल नाश किया था श्री विक्रम ने । वह महान् राजपूत राजा विक्रम शक् सम्वत् प्रारंभ कर चक्रवर्ती सम्राट हो गये ।
श्लोक 17 अध्याय -: 22
शक राजा रुममा ने अपनी ५५ (55) करोड़ सेना के साथ अवन्ती पर आक्रमण किया एवं सम्राट विक्रमादित्य के १४ (14) करोड़ । महान विक्रमादित्य के अप्रतिरोध्य पराक्रम से पराजित होकर शक राजा रुममा उत्तर पश्चिमी राज्य को छोड़कर भाग गया एवं भारतवर्ष शक अश्शूरो के अत्याचारों से मुक्त हो गया एवं दक्षिण में भी युद्ध अभियान कर सम्राट विक्रमादित्य ने शको को पराजित कर भारतवर्ष के बाहर बैक्ट्रिया या बाख़्तर तक खदेड़ा । महाभारत युद्ध के बाद यह युद्ध दूसरा महाभारत के रूप में भी जाना जाता हैं क्योंकि इस युद्ध के बाद शक मलेच्छों का अस्तित्व केवल मुट्ठीभर रह गया था। शको को पराजित कर भारतवर्ष के इन राज्य पर पुन: धर्मस्थापित किया। हिमालय की चोटी से लेकर , सिंध नदी के पश्चिम दिशा से लेकर दक्षिण दिशा एवं हिमालय के उत्तरी सीमा के बद्रीनारायण राज्य एवं कपिलावस्तु राज्य इन सभी राज्यों का शुद्धिकरण करवा वैदिक मंदिर मठ , चिकित्सालय , रास्ते , गुरुकुल निर्मित करवाये । महान् सम्राट विक्रमादित्य ने शको का उन्मूलन कर वैदिक संस्कृति सभ्यता की पुनर्स्थापना कर अनेक मंदिरों का निर्माण किया जिसमे अयोध्या राम मंदिर जीर्णोद्धार किया । ८४ स्फटिक के खम्बे लगवाएं  मंदिर में। शक अश्शूरो को पराजित करके अनेक मन्दिरों का निर्माण कराके वैदिक धर्म पुनर्स्थापित किया ।
श्लोक नंबर 22-1-: सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य में सम्मिलित प्रान्तों कम्भोज , गौड़ा , आंध्र , मालवा , अनर्ता , सौराष्ट्र , गुर्जरात्रा की प्रजा ने सम्राट विक्रमादित्य के प्रशंसा गीत भी गाये थे क्योंकि सम्राट विक्रमादित्य वर्णाश्रम के महानतम रक्षक थे ।
सम्राट विक्रमादित्य के अधीन 18 भारतीय राज्य थे ,
1) इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली-हरियाण ), 2) पाञ्चाल (गंगा के उत्तर और दक्षिण के भाग फर्रुखाबाद और बरेली) , 3) कुरुक्षेत्र (पंजाब , हरियाणा उत्तरप्रदेश का पश्चिमी भूभाग( , 4) कपिलराष्ट्र ((बांग्लादेश से पूर्व में स्थित भूखण्ड , 5) अन्तर्वेदी, 6) व्रजराष्ट्र ( मथुरा, मण्डल, आगरा), 7) मद्र , मत्स्य आदि राज्य, 8 मरुधन्व (आधा अजमेर आधा मारवाड़ एवं सम्पूर्ण राजस्थान) 9), गुर्जरात्रा , सौराष्ट्रकाठियावाड़ , 10) महाराष्ट्र (विदर्भ -लाट आदि ) , 11) द्रविड़ ( कर्नाटक,तमिलनाडु, केरल, पांड्य,लङ्का आदि), 12) कलिंग (उत्कल , आंध्रप्रदेश आदि ), 13) अवन्तिउज्जैन) , मालवा , गोंडवाना आदि ), 14) उडुपम -उड़ीसा) , ताम्रलिप्तक्) 15) बांग्लादेश (वंग ) , 16) गौड़देश ढ़ाका) ,आसाम आदि), 17) मगध ( -गंगा जी के दक्षिण में स्थित गया, -पाटिलपुत्र आदि) 18) कौसल (अयोध्या , लखनऊ , नेपाल आदि) ,

सम्राट विक्रमादित्य के राज्य के महत्वपूर्ण भाग -:
1), कश्यपमेरु (कश्मीर) 2), Cape Comorin (कन्याकुमारी) 4), कम्पास (चीन) 5), और्व / अर्व (अरब हो गया) 6), इथियोपिया 7), रोम

महान सम्राट विक्रमादित्य के दरबार -:
आठवी एवं नौवी श्लोक अध्याय 22 कालिदास ने सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में रहनेवाले कवी , पंडितों की सूचि भी दिए हैं जो सम्राट विक्रमादित्य के दरबार की शोभा बढ़ाते थे -:
१) मणि, २) अंगुदत्ता , ३) जीष्णु , ४) त्रिलोचना , ५) हरी (हरी स्वामी शुक्ल एवं यजुर्वेद के महान ज्ञाता थे ), ६) सत्याचार्य, ७) सरुतासेन ८) बद्रायण, ९) मनीत्था , १०) कुमार सिंह ( ज्योतिषाचार्य ) एवं इनके अलवा नौ रत्न और थे -:
विक्रमार्कस्य आस्था ने नवरत्नानि :-
धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः।
ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।
उनके दरबार में “नवरत्न” कहलाने वाले नौ विद्वान थे। वे थे-1. धनवंतरी, 2. क्षपणक, 3. अमरसिंह, 4.शंकु भट्ट, 5. वेताल भट्ट, 6. घटकर्पर, 7. वाराहमिहिर, 8. वररुचि, 9. कालिदास (संस्कृत के प्रसिद्ध कवि)। रुद्रसागर में कुछ रत्न हैं, जो राजा विक्रमादित्य के सिंहासन के अवशेष कहे जाते हैं । उनके दरवारमें रहते थे , 16 वैदिक ज्योतिर्विद् ,16 महान् चिकित्सक ,16 भट्ट ब्राह्मण ,16 ढाढ़िन , 16 वेदपाठी ब्राह्मण विक्रमादित्य की सभा में शोभा बढ़ाते थे । 800 मूर्धाभिषिक्त राजा उनके दरवारमें रहते थे एवं तीन हज़ार दरबारी राजा थे , शस्त्र विद्या के महाग्यता ऐसे एक करोड़ सैनिक थे (In 22-11 Kalidasa gives a further accountg of the court of Vikrama. There were 800 Vassal kings and 3000 courtier kings , one crore of good soldiers, 16 great scholars, 16 astrologers, 16 efficient doctors, 16 bhattas and 16 scholars of Vedik lore; Vikrama sitting on his throne was illuminated by these scholarly courtiers.) Reference-: Chronology of Kashmir History Reconstructed By Pandit Kota Venkatachelam Page No.- 180
1 कोस में तीन किलोमीटर चार कोस में एक योजन होता हैं और 18 योजन में २१६ (216) किलोमीटर । विक्रमादित्य के राज्य का मात्र २१६ किलोमीटर अर्थात 18 योजन को 3 करोड़ सैनिक घेरकर रहते थे , दस करोड़ विभिन्न रथी सैन्य हुआ करते थे , गज सेना में 24,300 केवल हाथी थे , 4 लाख जल जहाज़ थे । यह सिर्फ उनके राज्य अवन्ती (वर्त्तमान उज्जैन) के सैनिक थे । तो चिंतन कीजिये सम्पूर्ण भारतवर्ष में कितने सैन्यबल हुआ करते थे महाराजा विक्रमादित्य के । कालिदास से लेकर अब तक के निष्पक्ष सारे इतिहासकारों ने लिखे हैं सम्राट विक्रमादित्य के बाद भारत का कोई सम्राट इतना शक्तिशाली नही हुआ एवं महाभारत युद्ध के बाद कोई इतना पराक्रमी नही हुआ था और इनके बाद भी कोई नही हुआ । (Jyotirvidabharana Kalidasa Slokha 22-12 the following particulars are given about the army of Vikramaditya :-
His army continuously spread over 18 yojanas (small jyotisha yojanas, 1 small jyotisha yojana= 4 11/12 english miles) and consisted of the following:—
1. There were 3 crores of soldiers.
2. Ten crores of various vehicles.
3. 24,300 elephants.
4. 4,00,000 (four lakhs) of ships, This was the army that accompanied him in his expeditions. In this respect there was no emperor to be compared to Vikrama in those days, says Kalidasa.)
सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य में १२ करोड़ ७० लाख ५० हज़ार सेना थे -: ६ (6) करोड़ पैदल सेना थे , ५ (5) करोड़ अश्वारोही सेना थे , १ (1) करोड़ रथी सैन्य हुआ करते थे , ५० (50) हज़ार गज सेना , ७० (70) लाख जल जहाज़ थे
सम्राट विक्रमादित्य के युग में सभी अपने अपने वर्णाश्रम को मान कर चले १४ से १६ करोड़ क्षत्रिय विक्रमादित्य के सैन्यदल में थे , ब्राह्मण पंडित वैद्य , चिकित्सक , गुरुकुल के आचार्य , ज्योतिष इत्यादि वर्णानुसार कर्म किये वैश्य , शुद्र सभी ने , परन्तु तब किसी ने नही कहा कि हमे ब्राह्मण बनना हैं और हमे बनने नही दिया जा रहा हैं अथवा  हम दबे कुचले श्रेणी से हैं हमे आरक्षण चाहिए । सबने वर्णानुसार कर्म किया एवं प्रजाओ ने सम्राट विक्रमादित्य को वर्णाश्रम रक्षक की उपाधि दिए एवं सभी राज्य के प्रजाओ ने प्रशंसा गीत गाने की प्रचालन का शुरुवात किये थे यह अंतर था तब के राजतन्त्र में एवं आज के लोकतंत्र में ।
कैसे हुआ विक्रम संवत की शुरुवात -:
सम्राट सम्पूर्ण प्रजा का कर मुक्त कर दे वही संवत का आरंभ करता हैं सम्राट विक्रमादित्य ने ५७ (57 B.C) ईस्वी पूर्व में सम्पूर्ण प्रजा का ऋण मुक्त कर के उन्होंने कलियुग में सतयुग की स्थापना की इसीलिए उन्होंने कीरितयुग नामक संवत का आरम्भ किया था उनके प्रजा ने उनकी याद में विक्रम संवत नाम प्रचलित कर दिया ।
यह तो केवल सम्राट विक्रमादित्य के भारत विजय की इतिहास हुआ, किसी अन्य पोस्ट में यूरोप एवं अरब विजय पर भी बात होगी ।

संदर्भ-:
“purne thrimsachchate varshe
Kalau prapte bhayamkare
Sakanamcha Vinasardham Arya
Dharma vivruddhaye
Jatassivajnaya sopi kailasat
Guhyakalayat.” (Bhavishya Maha Purana 3-1-7-14,15 verses)
“ Vikramaditya namanam pita
Krutwa mumodaha
Sa balopi mahaprajanah pithru
Mathru priyamkarah” (3-1-7-16)
“pancha Varshe vayah prapte
Tapasordhe vanam gatah
Dwadasabdam prayathnena
Vikramena krutam tapah” (Bhavishya 3-1-7-17)
“Paschadambavatim divyam
Purim yatah sriyanvitah
Divyam simhasanam ramyam
Dwathrimsan murthi samyutam” (Bhavishya 3-1-7-18)
हमारे देश के काले अंग्रेज इतिहासकारों ने केवल सुल्तान एवं सिकंदर को महान बताया वास्तविक इतिहास को छुपा इसलिए दिया ताकि हम अपने पूर्वजो पर गर्व ना कर पाए । सिंहासन बत्तीसी , वेताल पचीसी ऐसे ऐसे अपमानजनक नाटक निकाल कर सम्राट विक्रमादित्य के इतिहास को सदेव छुपाने की निरंतर चेष्ठा चलायें हैं और अभी भी चला रहे हैं जब की वेताल को भूत नही वेताल भट्ट सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्न में से एक थे ऐसे कई महान विद्वानों को वामपंथी कामरेडी ने भूत बना दिया , पर कोई बात नही जहा ऐसे गद्दार हैं वही डॉक्टर के.एम. राव , एस .बी. कुलकर्णी , पंडित कोटा वेंकटाचेलाम, कल्हण जैसे निष्पक्ष इतिहासविदुर भी जन्म लिए हैं जिन्होंने हमेसा मेरे मार्गदर्शन किये एवं आज सही एवं निष्पक्ष इतिहास पता चलता है ।।

 

अब पढें मिथक और किंवदंती बताने वालों की कहानी

 

असली विक्रमादित्य कौन हैं? मिथकों और किंवदंतियों के पीछे छिपी कहानी…
असली विक्रमादित्य कौन है? मिथकों और किंवदंतियों के पीछे छिपी कहानी है एक सफल गुप्त राजा की।
बौद्ध कथाएँ, जैन कहानियाँ, शैव अनुष्ठान—हर कोई पौराणिक राजा विक्रमादित्य के बारे में कुछ न कुछ जानना चाहता था।
अनिरुद्ध कनिसेट्टी 

22 मई, 2025,
गुप्त राजा चंद्रगुप्त द्वितीय का सिक्का, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य की कथा प्रेरित की थी।

लगभग एक महीने पहले, मध्य प्रदेश सरकार ने लाल किले में पौराणिक राजा विक्रमादित्य के सम्मान में तीन दिवसीय उत्सव का आयोजन किया। हममें से अधिकांश लोग उन्हें विक्रम-वेताल की कहानियों से जानते होंगे, जो मूल रूप से 12 वीं शताब्दी की कहानी है जिसमें विक्रमादित्य के एक राक्षस को पकड़ने के साहसिक प्रयासों का वर्णन है। लेकिन विक्रमादित्य भारत की महान कथा परंपरा में 1500 वर्षों से अधिक समय से मौजूद हैं।

राजा के बारे में किंवदंतियाँ कश्मीर (सोमदेव की वेताल-पंच-विंसति में ) से लेकर कन्याकुमारी (तमिल मुप्पत्तिरंतु-पथुमै-कथा में) तक लगभग अक्षरशः सुनाई गई हैं । ये कहानियाँ कहाँ से आईं, और इस प्राचीन नायक में यह नया राजनीतिक आकर्षण क्यों पैदा हुआ?

वास्तविक विक्रमादित्य
इतिहासकारों का आम तौर पर मानना ​​है कि विक्रमादित्य नाम केवल एक ही व्यक्ति से आया होगा: गंगा के सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ( लगभग 375-415 ईस्वी )। चौथी शताब्दी ईस्वी में उपमहाद्वीप के प्रमुख शासक चंद्रगुप्त द्वितीय दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक थे। उत्तरी भारत में उनकी छवि और उपाधियों वाले सोने के सिक्कों की प्रचुरता से पुष्ट होती है कि उन्होंने एक समृद्ध खजाने वाले विशाल साम्राज्य पर शासन किया था।

चंद्रगुप्त के वास्तविक जीवन के बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं है। मुद्राशास्त्री संजीव कुमार ने उपलब्ध सबसे ठोस प्रमाणों—सिक्कों—को अपनी पुस्तक ‘ गुप्त साम्राज्य के खजाने ‘ में संकलित किया है । कुमार ने खजाने के खोज स्थलों का विश्लेषण करके सिद्ध किया है कि चंद्रगुप्त के पिता समुद्रगुप्त ( लगभग 335-375 ईस्वी ) ने गुप्त साम्राज्य का विस्तार वर्तमान पूर्वी बिहार से पूर्वी मध्य प्रदेश तक किया था। लेकिन चंद्रगुप्त उनके इच्छित उत्तराधिकारी नहीं थे।

उस समय उत्तर भारत के सबसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर उज्जैन के आसपास के प्रतिष्ठित क्षेत्र पर युवराज रामगुप्त का शासन था। अपने पिता की मृत्यु के बाद, रामगुप्त ने शीघ्र ही शाही क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और अपने सिक्के जारी किए , हालांकि , ये सिक्के एक-दो साल में ही इतिहास से गायब हो गए । इनके स्थान पर चंद्रगुप्त के सिक्के प्रचलन में आ गए।

कुछ सूत्र देवी चंद्रगुप्तम से मिलते हैं, जो चंद्रगुप्त द्वितीय के समय के लगभग 200 वर्ष बाद रचित संस्कृत नाटक है । हालांकि नाटक के कुछ ही अंश उपलब्ध है, इसमें रामगुप्त की हार का वर्णन है, जो शक या इंडो-स्किथियन राजा रुद्रसिंह तृतीय (वर्तमान गुजरात के शासक) के हाथों हुई थी।

नाटक में, रुद्रसिंह तृतीय शांति के बदले रामगुप्त से अपनी पत्नी ध्रुवदेवी सौंपने की मांग करता हैं । रामगुप्त यह मांग मान लेता हैं। क्रोधित होकर उनका छोटा भाई चंद्रगुप्त इस अपमान का बदला लेने का निश्चय करता है और रानी के वेश में शक सेना में प्रवेश कर राजा की हत्या कर देता है। विजयी होकर लौटकर वह रामगुप्त की भी हत्या कर सिंहासन कब्जा और अपनी भाभी ध्रुवदेवी से विवाह कर लेता है।

वास्तव में, चंद्रगुप्त द्वितीय की एक रानी थीं जिनका नाम ध्रुवदेवी था; उन्होंने वास्तव में शक हरा उन पर विजय प्राप्त की। लेकिन उन्होंने यह अपने शासनकाल के अंत में किया, न कि शुरुआत में। उनके भाई रामगुप्त को शकों ने नहीं हराया: उन्होंने अश्वमेध यज्ञ की स्मृति में कांस्य के सिक्के जारी किए, जो इसके विपरीत संकेत देते हैं। गुप्त काल के अधिकांश विद्वान एस.आर. गोयल और के.के. थपल्याल सहमत हैं कि देवी चंद्रगुप्तम भाइयों के बीच की शत्रुता का आधिकारिक संस्करण हो सकता है—अर्थात चंद्रगुप्त का संस्करण।

इससे चंद्रगुप्त की शासकीय सफलता घटती नहीं। शकों पर विजय प्राप्त करने से गुप्त शक्ति का विस्तार भारत के पश्चिमी तट से पूर्वी तट तक हुआ , जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार फला-फूला। चंद्रगुप्त द्वितीय के एक शताब्दी बाद तक उनके वंशजों ने उत्तरी भारत पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा।

गुप्त सम्राटों ने अलचोन हूणों से युद्ध किया और धार्मिक संस्थानों को भरपूर संरक्षण दिया। कई सम्राटों की उपाधियाँ ‘ -आदित्य ‘ से समाप्त होती थीं , जिससे शायद आम धारणा में वे अनजाने में एक-दूसरे से घुलमिल गए। साहित्यिक और सांस्कृतिक उथल-पुथल के इस दौर में, गुप्त इतिहास के विभिन्न तत्व एक नए, पौराणिक व्यक्तित्व, विक्रमादित्य के रूप में आकार लेने लगे।

दक्षिण में विक्रमादित्य
गुप्तकालीन राजशाही में शौर्य, बौद्धिक और प्रेम संबंधी पारखीपन तथा देवताओं के साथ घनिष्ठ संबंध शामिल थे। इन सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले पौराणिक विक्रमादित्य को रचनाकारों और कथाकारों ने आसानी से अपनाया और उन्हें नए लोकप्रिय संदर्भों के अनुरूप ढाला। साथ ही, गुप्तों के दरबारी विचारों को भारतीय उपमहाद्वीप और उससे बाहर के राजपरिवारों ने भी अपनाया। अगले 500 वर्षों तक ये दोनों धाराएँ एक-दूसरे को पोषित करती रहीं।

राजा विक्रमादित्य के युद्ध में जाने का चित्र
विक्रमादित्य राजा के युद्ध में जाने का चित्र | हचिंसन की ‘स्टोरी ऑफ द नेशंस’, पृष्ठ 143
इतिहासकार डी.सी. सिरकार ने अपनी उत्कृष्ट कृति ‘ प्राचीन मालवा और विक्रमादित्य परंपरा ‘ (1966) में उल्लेख किया है कि वीर राजा विक्रमादित्य का उल्लेख बौद्ध कथाओं में सबसे पहले छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में मिलता है , जब गुप्त वंश  पतनोन्मुख था। सुबंधु के वासवदत्त जैसे बौद्ध ग्रंथों में विक्रमादित्य को शिक्षकों को लाखों सोने के सिक्के बाँटते दिखाया गया है ।

गुप्तों के पतन के बाद, कई अन्य राज्यों ने उनके विचार और उपाधियां अपनायी, जिससे विक्रमादित्य के विकास में और अधिक समृद्धि आई। सातवीं शताब्दी में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने अपने प्रारंभिक काल में अलचोन हूणों से युद्ध कर ‘शिलादित्य’ उपाधि धारण की। साथ ही विभिन्न शैव संप्रदाय राजा की विजय सुनिश्चित करने को तांत्रिक अनुष्ठान विकसित कर रहे थे । शायद यह संयोग ही था कि नौवीं और दसवीं शताब्दी तक विक्रमादित्य की कथाओं की एक नई लहर विकसित हुई , जिसमें उन्हें तांत्रिक अनुष्ठानों में भाग लेते और विदेशी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते दर्शाया गया है।

राज्य निर्माता होने से, राजाओं से न्याय करने की क्षमता प्रदर्शन भी अपेक्षित था; इसीलिए विक्रमादित्य अक्सर भूतों से पेश की गई पेचीदा और मनोरंजक चुनौतियों में शामिल होते थे। सोमदेव के कथासरित सागर जैसे ग्रंथों में अच्छी तरह से संरक्षित यह चरित्र , हमारे ज्ञात पौराणिक विक्रमादित्य के काफी करीब है ।

रोचक यह है कि विक्रमादित्य को हमेशा एक आदर्श नायक के रूप में नहीं देखा जाता था, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता था जिसमें कुछ कमियाँ थीं। जैन दक्कन के राजा अमोघवर्ष प्रथम (814-879) ने अपने संजन ताम्रपत्र शिलालेख में विक्रमादित्य को “गुप्त वंश के कलियुग के तिरस्कृत दानदाता” वर्णित किया है , जिसने अपने भाई की हत्या करके उसके राज्य और उसकी पत्नी पर भी कब्जा कर लिया था। ( एपिग्राफिया इंडिका XVIII पृ. 235)

अमोघवर्ष के वंशज गोविंद चतुर्थ ने विक्रमादित्य की उदारता और वीरता की प्रशंसा की, लेकिन उन पर अपने भाई सै क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने, उसकी पत्नी का बलात्कार और पिशाचों की पूजा करने का आरोप लगाया । स्पष्टतः, जैन धर्म विक्रमादित्य का बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं था।

लेकिन जैसे-जैसे भारतीय राजतंत्र का विकास होता गया, वैसे-वैसे विक्रमादित्य की कथा भी विकसित होती गई। 11 वीं और 12 वीं शताब्दी तक, महलों में कवियों की बड़ी-बड़ी सभाएँ आयोजित होने लगीं और राजा पुरोहितों के समान ही कवियों को संरक्षण देने लगे। इसी क्रम में, गुजराती जैन धर्म में विक्रमादित्य को सबसे बड़ा संरक्षक वर्णित किया गया और उनके संरक्षक, चालुक्य राजा कुमारपाल (1143-1172) को एक नए विक्रमादित्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।

महान विद्वान और संरक्षक , धारा के भोज (1010-1055) ने भी अपने लेखन में स्वयं को विक्रमादित्य से जोड़ा है । लोकप्रिय किंवदंती में , अंततः दोनों को एक ही मान लिया गया। इस किंवदंती पर दावा करने का सबसे प्रभावशाली प्रयास दक्कन से आया । चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI (1076-1126) ने अपने शिलालेखों में घोषणा की कि वे एक नए पंचांग, ​​चालुक्य विक्रम युग की शुरुआत कर रहे हैं, ताकि विक्रमादित्य स्थापित पौराणिक पंचांग को “मिटा” सकें। इसी बीच, उत्तरी कर्नाटक में उनके एक जागीरदार वंश ने अपना नाम बदलकर “गुट्टा” रख लिया, अपने घर को “गुट्टावोलाल” घोषित किया, जिसका शाब्दिक अर्थ है “गुप्तों का स्थान”, अपने सरदारों को “विक्रमादित्य” कहा और यहां तक ​​कि ” उज्जैन के राजा विक्रमादित्य” से वंशज होने का दावा भी किया । ( बॉम्बे कर्नाटक शिलालेख, खंड III )

विक्रमादित्य आज​
कई मायनों में, विक्रमादित्य का व्यक्तित्व हमें दिखाता है कि सदियों से संस्कृत में राजत्व की अवधारणा कैसे विकसित हुई। उपमहाद्वीप में मुस्लिम शासन स्थापित होने के बाद भी उनका आकर्षण बना रहा। जैसा कि सिरकार बताते हैं, 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब उत्तर भारतीय अफ़गानों ने मुगलों को खदेड़ने का प्रयास किया, तो उनका नेतृत्व हेमू ‘विक्रमादित्य’ नामक हिंदू ने किया – यह नाम एक पौराणिक राजा की ओर सीधा संकेत था, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने विदेशियों को खदेड़ दिया था।

इसके तुरंत बाद, जब मुगल सम्राट अकबर ने अपने दरबार में सुधार किया, तो संभवतः उन्होंने विक्रमादित्य की परंपरायें आत्मसात करने को अपने “नौ रत्नों” का चयन किया होगा। बाद की शताब्दियों में, विक्रमादित्य का राजनीतिक महत्व घट गया, लेकिन वे जनमानस में समृद्ध रहे। यदि कोई शाही कार्य करना होता, शापों को निरस्त करना होता या पहेलियों का उत्तर खोजना होता, तो विक्रमादित्य ही वह व्यक्ति थे।

आज विक्रमादित्य की छवि कुछ अलग है। कुछ साल पहले , मैं एक नए मीम मानचित्र को देखकर बहुत हैरान हुआ था जिसमें एशिया के एक बड़े हिस्से को केसरिया रंग से रंगा गया था और उसे ” विक्रमादित्य का साम्राज्य” घोषित किया गया था। अब कई लोग इसे सच मान लेते हैं और दावा करते हैं कि वास्तव में विक्रमादित्य ने अरब और यूरोप पर शासन किया था।

किसी मध्ययुगीन कथाकार के किसी महान सम्राट को विश्व शासक वर्णित करना एक बात है ; लेकिन किसी निर्वाचित सरकार की यह घोषणा कि विक्रमादित्य एक वास्तविक व्यक्ति थे जिन्होंने ईरान, चीन और तुर्की पर शासन किया, बिलकुल अलग बात है। हालांकि मैं क्षेत्रीय इतिहासों के गहन अध्ययन की आवश्यकता से सहमत हूं, लेकिन योद्धा राजाओं की यह अंधभक्ति वास्तव में इन इतिहासों को मिटा देती है और उनकी जगह आक्रामक राष्ट्रवादी मिथक स्थापित कर देती है।

पौराणिक कथाओं में वर्णित चतुर, न्यायप्रिय और धूर्त विक्रमादित्य की छवि अब एक अधिक मुखर, सतही लेकिन राजनीतिक रूप से कहीं अधिक लाभदायक छवि से धूमिल हो रही है। विडंबना यह है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राजा भारतीय शासन के विकास का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं।

खुद को लोक इतिहासकार कहलाना पसंद करने वाले अनिरुद्ध कनिसेट्टी ‘लॉर्ड्स ऑफ अर्थ एंड सी: ए हिस्ट्री ऑफ द चोला एम्पायर’ और पुरस्कार विजेता ‘लॉर्ड्स ऑफ द डेक्कन’ के लेखक हैं। वे ‘इकोज़ ऑफ इंडिया’ और ‘युद्धा’ पॉडकास्ट के होस्ट हैं। वे ट्विटर पर @AKanisetti और ​​इंस्टाग्राम पर @anirbuddha के नाम से हैं।

Anirudh Kanisetti is a public historian. He is the author of ‘Lords of Earth and Sea: A History of the Chola Empire’ and the award-winning ‘Lords of the Deccan’. He hosts the Echoes of India and Yuddha podcasts. He tweets @AKanisetti and is on Instagram @anirbuddha.

 

 

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