अभिव्यक्ति स्वतंत्रता/ Hate Speech: SC ने साफ की विधिक स्थिति-कानून पर्याप्त,सुधार की भी जगह

legal Freedom Of Expression Vs Hate Speech Supreme Court Clarifies Legal Position Laws Are Adequate Yet Scope For Reform Exists
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम Hate Speech: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट की विधिक स्थिति – कानून पर्याप्त, सुधार संभव 
हेट स्पीच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में संतुलन को लेकर समय-समय पर कई महत्वपूर्ण निर्णय आए हैं। ताजा फैसले में जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच का “विधायी शून्य नहीं है” कथन पुराने निर्णयों की न्यायिक परंपरा आगे बढ़ाती है।

नई दिल्ली 29 अप्रैल 2026 : भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाओं की चर्चा में सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि देश में हेट स्पीच से निपटने को “विधायी शून्य” नहीं है। यानी वर्तमान कानून ऐसे अपराधों से निपटने को पर्याप्त हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार आवश्यक समझे तो इस क्षेत्र में और स्पष्ट या कठोर कानून बनाने पर विचार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण  फैसला सुनाया

यह फैसला न केवल विधिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हम इस विधिक विश्लेषण से सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों के दृष्टिगत इसकी समीक्षा करेंगे, जिससे इस फैसले की व्यवहारिकता और भी साफ होगी।

क्या था मामला: याचिकाओं की पृष्ठभूमि
हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दी गई थीं। इन याचिकाओं में मांग थी कि देश में बढ़ते घृणा भाषणों पर नियंत्रण को सख्त और स्पष्ट कानून बनाए जाएं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मौजूदा कानूनी ढांचा अस्पष्ट है और प्रभावी रूप से लागू नहीं हो रहा, जिससे समाज में विभाजन और हिंसा की संभावना बढ़ रही है। याचिकाओं में यह भी कहा गया कि राजनीतिक भाषणों, धार्मिक बयानबाजी और सोशल मीडिया पर फैल रही घृणा के खिलाफ एक समग्र कानून आवश्यक है, ताकि दोषियों को तुरंत और कड़ी सजा हो सके।

सुप्रीम कोर्ट : ‘विधायी शून्य’ नहीं
सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य संबंधित कानूनों में पहले से ही कई प्रावधान हैं, जो हेट स्पीच नियंत्रित करते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि इस क्षेत्र में कोई कानून नहीं है या कोई “विधायी शून्य” है। कोर्ट के अनुसार, BNS 2023 की धारा 196 (धर्म, जाति आदि के आधार पर वैमनस्य फैलाना), धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), और धारा 196(अफवाह या आपत्तिजनक बयान) आदि पहले से ही हेट स्पीच मामलों में लागू होती हैं। इसलिए, समस्या कानून की कमी नहीं बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है।

केंद्र सरकार कानून बनाने को स्वतंत्र 
यद्यपि कोर्ट ने  स्पष्ट किया कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं, लेकिन केंद्र सरकार को यह भी छूट है कि यदि वह आवश्यक समझे तो नए कानून बनाने या वर्तमान कानूनों में संशोधन पर विचार कर सकती है। इस टिप्पणी का महत्व इसलिए है क्योंकि यह विधायिका और न्यायपालिका में संतुलन दर्शाता है। कोर्ट ने कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ा और खुद को केवल यह जांचने तक सीमित रखा कि क्या वर्तमान कानून पर्याप्त हैं या नहीं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम हेट स्पीच
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हेट स्पीच में सीमा कहां तय की जाए। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) इसके उचित प्रतिबंध भी निर्धारित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संकेत दिया कि हेट स्पीच रोकने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनावश्यक हनन नहीं होना चाहिए। हर विवादास्पद या कठोर बयान हेट स्पीच नहीं माना जा सकता। कोर्ट का दृष्टिकोण संतुलित रहा—जहां एक ओर उसने घृणा फैलाने वाले भाषणों पर नियंत्रण की आवश्यकता स्वीकार की, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा पर भी जोर दिया।

कानून है, लेकिन लागू कैसे हो?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उसने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया कि असली समस्या कानून की कमी नहीं बल्कि उसके सही और समय पर उपयोग की है। देश में कई बार देखा गया है कि हेट स्पीच के मामलों में या तो FIR में देरी होती है, या फिर जांच निष्पक्ष नहीं होती। कई मामलों में राजनीतिक प्रभाव या सामाजिक दबाव भी कार्रवाई प्रभावित करते हैं। इस संदर्भ में कोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि प्रशासनिक तंत्र मजबूत करने और कानून के निष्पक्ष प्रवर्तन पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।

सोशल मीडिया और हेट स्पीच: नई चुनौती
आधुनिक दौर में हेट स्पीच का सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया बना है। फेसबुक, ट्विटर (अब X), यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म पर घृणास्पद संदेश तेजी से फैलते हैं और उनका प्रभाव भी व्यापक होता है। हालांकि IT एक्ट और इससे जुड़े दिशानिर्देश हैं, लेकिन इनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी चुनौती बना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस दिशा में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकार को संकेत देता है कि वह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए अधिक स्पष्ट नियम बना सकती है।

मामले से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले
हेट स्पीच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। इन फैसलों को समझना जरूरी है क्योंकि यही भारत में हेट स्पीच कानून की व्याख्या का आधार बनते हैं। ताजा निर्णय में जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच का “विधायी शून्य नहीं है” कथन इन्हीं पुराने निर्णयों की न्यायिक परंपरा आगे बढ़ाता है।

Pravasi Bhalai Sangathan v. Union of India, 2014 – मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने यही सवाल था कि क्या हेट स्पीच को लेकर नए कानून बनाए जाने चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त हैं और समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। कोर्ट ने विधायिका को नए कानून बनाने का सुझाव देने में संयम किया और कहा कि यह संसद का क्षेत्राधिकार है। यह रुख ताजा फैसले में भी दिखाई देता है, जहां कोर्ट ने कहा कि “विधायी शून्य” नहीं है।
Shreya Singhal v. Union of India, 2015 -फैसला डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आधार स्तंभ माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने IT एक्ट की धारा 66A असंवैधानिक बता निरस्त कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि केवल वही भाषण प्रतिबंधित किया जा सकता है जो “उकसावे” की श्रेणी में आता है। यानी हर आपत्तिजनक या आक्रामक बयान हेट स्पीच नहीं माना जा सकता। यह सिद्धांत हेट स्पीच के मामलों में आज भी लागू होता है।
Subramanian Swamy v. Union of India, 2016 – केस में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मानहानि संवैधानिक ठहरायी। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसमें दूसरों की प्रतिष्ठा की रक्षा भी शामिल है। यद्यपि यह केस सीधे हेट स्पीच पर नहीं था, लेकिन इसने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत गरिमा और सामाजिक संतुलन बनाए रखने को भाषण पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
Tehseen S. Poonawalla v. Union of India, 2018 – भीड़ हिंसा और नफरत भरे भाषण:  मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग और उससे जुड़े हेट स्पीच पर कठोर रुख अपनाया। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को निर्देश दिए कि वे घृणा फैलाने वाले भाषणों और अफवाहों पर तुरंत कार्रवाई करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल सजा देना ही नहीं, बल्कि रोकथाम और सुधार पर भी ध्यान जरूरी है।
Amish Devgan v. Union of India, 2020 – हेट स्पीच की परिभाषा को विस्तार देते हुए इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की अवधारणा समझायी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा भाषण जो किसी समुदाय के खिलाफ घृणा, अपमान या हिंसा प्रोत्साहित करे, वह हेट स्पीच की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने यह भी माना कि टीवी डिबेट और मीडिया में दिए बयान भी हेट स्पीच की परिधि में हैं, अगर वे सामाजिक वैमनस्य बढ़ाते हैं। यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हेट स्पीच की व्याख्या को अधिक स्पष्ट किया गया।
आगे की राह: कानूनी सुधार और सामाजिक जिम्मेदारी
सभी फैसले साथ देखने पर स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का रुख संतुलित रहा है। कोर्ट ने बार-बार दोहराया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। लेकिन यह पूर्ण नहीं है और उस पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं । हेट स्पीच रोकने को पर्याप्त कानून हैं, असली चुनौती उनका प्रभावी क्रियान्वयन है। ताजा फैसले में “विधायी शून्य नहीं” कहकर सुप्रीम कोर्ट ने यही स्थापित न्यायिक सिद्धांत दोहराया है। साथ ही, सरकार को कानून में सुधार की छूट देकर यह भी सुनिश्चित किया है कि बदलते समय के साथ कानूनी ढांचा भी विकसित होता रहे।
सबसे महत्वपूर्ण, समाज में जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि लोग घृणास्पद भाषणों से बचें और उनके खिलाफ आवाज उठाएं। हेट स्पीच केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक समस्या भी है। इसलिए इसके समाधान को सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक, सभी को मिलकर काम करना होगा। तभी एक समावेशी, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक समाज की परिकल्पना साकार हो सकेगी।

 

घृणास्पद भाषण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

राज्यों या निजी निगमों द्वारा सेंसरशिप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित करने की आवश्यकता का हवाला अक्सर घृणास्पद अभिव्यक्ति को विनियमित करने के प्रयासों का मुकाबला करने के लिए दिया जाता है, विशेष रूप से ऑनलाइन।

विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में मानवाधिकारों की आधारशिला और स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक समाजों के स्तंभ हैं। ये स्वतंत्रताएँ शांतिपूर्ण सभा, सार्वजनिक मामलों में भागीदारी और धर्म की स्वतंत्रता जैसे अन्य मौलिक अधिकारों का समर्थन करती हैं। यह निर्विवाद है कि सोशल मीडिया सहित डिजिटल मीडिया ने सूचना और विचारों को प्राप्त करने, साझा करने और प्रसारित करने के अधिकार को सशक्त बनाया है। इसलिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विनियमित करने के विधायी प्रयासों से स्वाभाविक रूप से यह चिंता उत्पन्न होती है कि घृणास्पद भाषण को रोकने के प्रयास असहमति और विरोध को दबा सकते हैं।

घृणास्पद भाषण का मुकाबला करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र सकारात्मक भाषण का समर्थन करता है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सम्मान को एक आदर्श मानता है। इसलिए, कोई भी प्रतिबंध अपवाद स्वरूप ही होना चाहिए और उसका उद्देश्य नुकसान को रोकना और सभी की समानता या सार्वजनिक भागीदारी सुनिश्चित करना होना चाहिए। प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून प्रावधानों के साथ-साथ, संयुक्त राष्ट्र रबात कार्य योजना राज्यों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और “उकसाने” (भेदभाव, शत्रुता और हिंसा के लिए) के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती है, जो आपराधिक कानून के तहत निषिद्ध है। यह निर्धारित करना कि कब नुकसान की संभावना भाषण पर प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त है, अभी भी एक विवादास्पद विषय है। लेकिन राज्य घृणास्पद अभिव्यक्ति के संपूर्ण दायरे से निपटने के लिए वैकल्पिक साधनों का भी उपयोग कर सकते हैं – जैसे कि शिक्षा और प्रति-संदेशों को बढ़ावा देना – चाहे वह ऑनलाइन हो या ऑफलाइन।

 

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