9 जजी SC बैंच:सबरीमाला मंदिर महिला प्रवेश अनुमति पर फिर घमासान,केंद्र परंपरा साथ

सबरीमाला मंदिर में महिला प्रवेश की अनुमति का फ़ैसला ग़लत: 9-जजों की बेंच के सामने केंद्र सरकार

नई दिल्ली 07 अप्रैल 2026। सबरीमाला मामला सुनवाई में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सभी आयु की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर प्रवेश की अनुमति का 2018  का फैसला ग़लत था जिसे ग़लत क़ानून घोषित होना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए एडिशनल जनरल तुषार मेहता ने 9-जजों की बेंच के सामने तर्क दिया कि 2018 के फ़ैसले पर क़ानूनी आधार पर फिर से विचार करने और उसे पलटने की ज़रूरत है।

सबरीमाला मामले की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल ने कहा, कि “मेरा पक्ष यह है कि यह निर्णय त्रुटिपूर्ण था जिसे त्रुटिपूर्ण क़ानून घोषित होना चाहिए।”

सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि सबरीमाला फ़ैसले में व्यक्त यह विचार आपत्तिजनक है कि महिला प्रवेश पर रोक अस्पृश्यता है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन करता है। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक केवल आयु आधारित थी। अयप्पा मंदिरों में महिलाओं का पूर्ण बहिष्कार नहीं होता और सबरीमाला में यह रोक वहाँ विराजमान देवता की अनोखी प्रकृति के कारण है।

सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि पितृसत्ता और लैंगिक रूढ़ियों की पश्चिमी अवधारणाओं को भारतीय सभ्यतागत मूल्यों को समझे बिना भारत पर आंख मूंदकर लागू नहीं करना चाहिए। अनुच्छेद 25 में गारंटीकृत समान अधिकार के संबंध में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसे धर्मों के बीच समानता के अर्थ में समझा जाना चाहिए और अनुच्छेद 25 में लिंग का विषय नहीं उठता है। 2018 का फ़ैसला पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सुनाया जिसमें सभी आयु की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में यह मान प्रवेश की अनुमति दी थी कि भक्ति लिंग-भेदभाव के अधीन नहीं हो सकती।

अपने तर्कों में , सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि संविधान पीठ के समक्ष प्रस्तुत यह मामला संवैधानिक प्रश्नों के एक व्यापक समूह से संबंधित है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या और धार्मिक प्रथाओं के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की परिधि से जुड़े प्रश्न शामिल हैं। उन्होंने इस पर ज़ोर दिया कि केंद्र सरकार के तर्कों को केवल सबरीमाला मामले की दृष्टि से नहीं देखा जाए, जिसे उन्होंने एक ‘अद्वितीय’ (Sui Generis) मामला बताया। उनके अनुसार, कोर्ट अभी कानून और न्यायिक नीति के मौलिक प्रश्नों की जांच कर रहा है, जिनका असर किसी एक विवाद से कहीं ज़्यादा हो सकता है।

उन्होंने कहा, “मैं सबरीमाला वाले हिस्से को नहीं छू रहा, मैं उसे अलग तरीके से लूंगा। यह अपने आप में एक अनोखा मामला है। अभी, जज कानून के वे सवाल और न्यायिक नीति जांच रहे हैं, जिन्हें जज लागू करेंगे। इसलिए मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं किसी एक खास, अनोखे मामले से प्रभावित न होऊं। हालांकि,  मेरा यह मामला गलत तय हुआ जिसे एकाधिक कारणों से गलत कानून घोषित होना चाहिए।”

सुनवाई में बेंच ने कहा कि वह सबरीमाला निर्णय के गुण-दोष में न जाकर अपने सामने उपस्थित 7 संवैधानिक प्रश्नों  तक ही सीमित रहेगी। नवंबर, 2019 में सबरीमाला निर्णय के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई कर रही पांच जजों की बेंच ने कुछ विषय 9 जजों की बेंच के पास भेज दिए। बेंच ने माना कि शिरूर मठ मामले में 7 जजों की बेंच के फैसले और दरगाह कमेटी मामले में 5 जजों की बेंच के फैसले में कुछ विसंगतियां थीं। 9 जजों की बेंच ने बाद में 7 सवाल तय किए-

(i) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में धर्म की स्वतंत्रता अधिकार की परिधि और सीमा क्या है?

(ii) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 में धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या आपसी संबंध है?

(iii) क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 में किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा, भारत के संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन हैं?

(iv) भारती संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में ‘नैतिकता’ शब्द की परिधि और विस्तार क्या है, और क्या इसका अर्थ इसमें संवैधानिक नैतिकता सम्मिलित करना है?

(v) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में बताई गई किसी धार्मिक प्रथा के संबंध में न्यायिक पुनर्विचार की परिधि और विस्तार क्या है?

(vi) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (b) में आए वाक्यांश “हिंदुओं के वर्ग” का क्या अर्थ है?

(vii) क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, PIL दायर कर उस धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?

सोमवार को बहस शुरु करते हुए एसजी तुषार मेहता ने बेंच को अनुच्छेद 25 और 26 से संबंधित संविधान सभा की चर्चायें बताते हुए तर्क दिया कि न्यायिक रूप से विकसित ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ की कसौटी (Test) दोषपूर्ण थी, और  किसी भी धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता तय करना अदालतों का काम नही है।

केंद्र सरकार के विधि अधिकारी ने कहा कि संविधान के अनुसार, अनुच्छेद 25(2)(b) में किसी भी धर्म में सुधार को कानून बनाना विधायिका का काम था। इस संदर्भ (Reference) पर सुनवाई कर रही बैंच में हैं-

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची

2018 का फ़ैसला पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सुनाया जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में यह मान प्रवेश की अनुमति दी कि भक्ति लिंग-भेदभाव के अधीन नहीं की जा सकती।

अपनी दलीलों में, सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि संविधान पीठ के समक्ष प्रस्तुत यह मामला संवैधानिक प्रश्नों के एक व्यापक समूह से संबंधित है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या और धार्मिक प्रथाओं के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की परिधि से जुड़े प्रश्न शामिल हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्र सरकार के तर्कों को केवल सबरीमाला प्रकरण की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, जिसे उन्होंने एक ‘अद्वितीय’ (Sui Generis) मामला बताया। उनके अनुसार, कोर्ट अभी कानून और न्यायिक नीति के मौलिक प्रश्नों की जांच  कर रहा है, जिनका असर किसी एक विवाद से कहीं ज़्यादा हो सकता है।

उन्होंने कहा, “मैं सबरीमाला वाला हिस्सा नहीं छू रहा हूं, मैं उससे अलग तरीके से निपटूंगा। यह अपने आप में एक अनोखा मामला है। अभी, मेरे लॉर्ड्स कानून के उन सवालों और न्यायिक नीति की जांच कर रहे हैं, जिन्हें मेरे लॉर्ड्स लागू करेंगे। इसलिए मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं किसी एक खास, अनोखे मामले से प्रभावित न होऊं। हालांकि, यह मेरा ही मामला है, जिसे गलत तरीके से तय किया गया और जिसे एक से ज़्यादा कारणों से गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए।” सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि वह सबरीमाला फैसले के गुण-दोष में नहीं जाएगी और खुद को अपने सामने मौजूद 7 संवैधानिक सवालों तक ही सीमित रखेगी। नवंबर, 2019 में 5 जजों की एक बेंच ने – जो सबरीमाला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी – कुछ मुद्दों को 9 जजों की बेंच के पास भेज दिया। बेंच ने माना कि शिरूर मठ मामले में 7 जजों की बेंच के फैसले और दरगाह कमेटी मामले में 5 जजों की बेंच के फैसले के बीच कुछ विसंगतियां थीं।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 17 के लागू होने के सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला को महीने के तीन दिन “अछूत” मानना और चौथे दिन उसे अछूत न मानना तर्कसंगत नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 17 ऐतिहासिक रूप से छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई समाप्ति को बनाया गया था, इसलिए इसे सबरीमाला मामले में कैसे लागू किया जा सकता है, इस पर संदेह है। सॉलिसिटर जनरल का विरोध इस दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के सबरीमाला फैसले में दी गई उस टिप्पणी का विरोध किया, जिसमें महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को “अछूत प्रथा” से जोड़ा गया था। उन्होंने कहा: “सबरीमाला के एक फैसले में कहा गया कि महिलाओं को अछूत की तरह ट्रीट किया जा रहा है—मुझे इस पर कड़ा आपत्ति है।” उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत पश्चिमी समझ के अनुसार न तो पितृसत्तात्मक है और न ही जेंडर स्टीरियोटाइप वाला समाज। मासिक धर्म नहीं, आयु का आधार: SG तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध मासिक धर्म (menstruation) के आधार पर नहीं, बल्कि एक निश्चित आयु वर्ग (10-50 वर्ष) के आधार पर है। उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा के अन्य मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है और सबरीमाला एक “विशिष्ट” (sui generis) मंदिर है, जिसकी परंपराएं अलग हैं। धार्मिक प्रथाओं का सम्मान सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि धार्मिक संप्रदायों की परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मज़ार या गुरुद्वारा जाने पर सिर ढकना होता है, वैसे ही कुछ धार्मिक प्रथाएं होती हैं जिन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। संविधान पीठ में सुनवाई जारी 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले में व्यापक संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल 2018 के फैसले के गुण-दोष पर नहीं, बल्कि बड़े संवैधानिक मुद्दों पर विचार करेगा। सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 से जुड़े संविधान सभा के बहसों का भी हवाला देते हुए कहा कि “Essential Religious Practices” (आवश्यक धार्मिक प्रथाएं) तय करना अदालत का काम नहीं, बल्कि विधायिका का विषय है।

-9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले में व्यापक संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल 2018 के फैसले के गुण-दोष पर नहीं, बल्कि बड़े संवैधानिक मुद्दों पर विचार करेगा। सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 से जुड़े संविधान सभा के बहसों का भी हवाला देते हुए कहा कि “Essential Religious Practices” (आवश्यक धार्मिक प्रथाएं) तय करना अदालत का काम नहीं, बल्कि विधायिका का विषय है।

https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/sabarimala-case-justice-bv-nagarathna-article-17-untouchability-529383

Case Details: KANTARU RAJEEVARU Versus INDIAN YOUNG LAWYERS ASSOCIATION THR.ITS GENERAL SECRETARY MS. BHAKTI PASRIJA AND ORS., R.P.(C) No. 3358/2018 in W.P.(C) No. 373/2006

Tags Sabarimala Temple Centre Govt Supreme Court

 

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