गा‍यन्ति देवा: किल गीतकानि धन्‍यास्‍तु ते भारतभूमिभागे

धन्य – धन्य हे भारत भूमि !

भारत ! भरतखण्‍ड-जम्‍बूद्वीप ! यह वह देश है जहां गण के साथ-साथ राष्‍ट्र जैसे विचारों का उदय हुआ और धरती को मां कहने का भाव जागा। पूरी सप्‍तद्वीपा पृथ्‍वी पर इसको कर्मभूमि के रूप में जाना गया, अन्‍य सभी को भोग भूमि के रूप में संबोधित किया गया है।

यह विचार इतना उदात्‍त और सर्वतोभावेन था कि ऋषिमना रचनाकारों ने देवगणों के मुखारविंद से इस भूमि का यशोगान करवाया। गुप्‍तकाल पूर्व रचे गए विष्‍णुपुराण में इस मातृभूमि के यश के रूप में पराशर को स्‍वीकारना पड़ा-

गा‍यन्ति देवा: किल गीतकानि धन्‍यास्‍तु ते भारतभूमिभागे।
स्‍वर्गापवर्गास्‍पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्‍वात्।।
कर्माण्‍य संकल्पित तत्‍फलानि सन्‍यस्‍य विष्‍णौ परमात्‍मभूते।
अवाप्‍य तां कर्ममहीमनन्‍ते तस्मिंल्‍लयं ये त्‍वमला: प्रयान्ति।।

(विष्‍णु्. द्वितीयांश, 3, 24-25)

यही मान्‍यता मार्कण्‍डेय पुराणकार की है। आर्षरामायण, अध्‍यात्‍म रामायण में आई है। शिवपुराणकार ने भी इस मान्‍यता को यथारूप उद्धृत किया है। बहुत अर्थवान है भारतीय संस्‍कृति की यह स्‍वीकारोक्ति। संस्‍कृत में निबद्ध ये विचार कालजयी है, संस्‍कृत की तरह ही सार्वकालिक हैं, जैसा कि प्रोफेसर विल्‍सन ने भी स्‍वीकारा था –

यावद्भारतवर्षं स्‍याद्यावद्विन्‍ध्‍य हिमालयौ।
यावद्गंगा च गोदा च तावदेव हि संस्‍कृतम्।।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि जीवन में पांच जकार बहुत ही दुर्लभ हैं –

जननी जन्‍मदेशश्‍च जम्‍बूद्वीपो जनार्द्दन:।
जाह्नवीतीरं इत्‍येते जकारा: पंचदुर्लभा।। 1।।
मरणं जाह्नवीतीरे नृणां मुक्तिप्रदायकम्।
विकृतावपि सन्‍ध्‍यातो मुक्तिद: स्‍याज्‍जनार्द्दन:।। 2।।
जननी जन्‍मदेशाश्‍च मरणे मुक्तिदा: सदा।
तस्‍मात् स्‍वजन्‍मदेशश्‍च पापनाशकरो नृणाम्।। 3।। (चतुर्वर्ग्‍ग चिन्‍तामणि : हेमाद्रि, अनुवाद श्रीकृष्ण जुगनू, : भाग 4, पृष्‍ठ 483)

अर्थात् १. अपनी जन्मदात्री मां और २. अपनी जन्मभूमि, ३. उसमें भी जम्बूद्वीप भारतवर्ष तथा ४. जनार्दन के साथ साथ ५. जाह्नवी- गंगा जैसी नदी का तीर।

ये पांच दुर्लभ हैं क्‍योंकि दो मिल जाएंगे तो तीन नहीं मिलते, तीन मिल जाए तो चार नहीं और चार मिले तो पांचवां कठिन होता है। यदि से पांचों ही मिल जाए तो क्‍या कहना।

क्‍योंकि, प्राण निकले तो गंगा के किनारे, वह मुक्तिदायक माना गया है, जनार्दन भी यही फलदायी है। जननी व जन्‍मभूमि पर सांस निकले तो सदा ही मुक्तिदायी होती है, इसलिए कि अपना जन्‍मदेश लोगों का पाप नाश करने वाला होता है।

ये श्‍लोक उन महर्षि देवल के हैं जिन्‍होंने भारत की सीमा पर सिंधु के आसपास रहकर उन लोगों के लिए देशज-संस्‍कार का अभियान छेड़ा था जाे बाहर से आए अथवा स्‍वदेश की परंपराओं को तिलांजलि दे चुके थे।

अनेकानेक खोजें देने वाला, अनेकानेक मान्‍यताओं की नींव रखने वाला और सहिष्‍णुता जैसे मूल्‍य का पोषक यह राष्‍ट्र सच में अपने मूल्‍यों के लिए महनीय है….।

सम्भवामि युगे युगे…
🙏 🇮🇳
महाभारत का रण निकट था, तब संजय ने धृतराष्ट्र से भारतवर्ष की महिमा में कहा, ” यह भारतभूमि दिव्य और पवित्र है, सबको इसके गर्व का दर्शन और अवबोध होना चाहिए। यदि भारत को समझ लिया तो यह स्वीकार हो जाएगा : यह देश परमात्मा से अलग नहीं! यह पिता है, भाई है और यही पुत्र भी है। आकाश में पुण्यलोक और स्वर्गलोक बताने वालों को समझ लेना चाहिए यह देश ही पुण्यलोक और देवलोक है ” :

पिता भ्राता च पुत्राश्च खं द्यौश्च नरपुङ्गव।
भूमिर्भवति भूतानां सम्यगच्छिद्रदर्शना।। ( भीष्मपर्व 9, 76)
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गा हे तव जय गाथा…
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आत्मीय मित्रों,स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं…

पुराणों में भारतवर्ष की महिमा –

ये पृथ्वी सप्तद्वीपा है । इनके नाम हैं – जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, तथा पुष्करद्वीप । सातों द्वीपों के मध्य जम्बूद्वीप है । जम्बूद्वीप के अधिपति महाराज आग्नीध्र के नौ पुत्र हुए – जिनके नाम थे – नाभि, किम्पुरूष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरू, भद्राश्व और केतुमाल । राजा आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के नौ खंड कर अपने प्रत्येक नौ पुत्रों को वहाँ का राजा बनाया । इन खंड़ो का विस्तार नौ नौ हजार योजन बताया गया है । इन्हीं पुत्रों के नाम से नौ वर्ष (अर्थात् खंड ) प्रसिद्ध हुये ।

राजा नाभि के नाम से ही एक वर्ष अर्थात् एक खंड का नाम अजनाभ वर्ष हुआ । राजा नाभि एवं उनकी पत्नी मेरूदेवी के एक पुत्र थे जिनका नाम था ऋषभदेव । ऋषभेदव जी के सबसे बड़े पुत्र का नाम था भरत ।

राजा भरत
वे अत्यंत प्रतापी तथा धर्मात्मा थे, अतः अजनाभ वर्ष का नाम हो गया भारतवर्ष ।

‘‘अजनाभं नामऐतद्भारात्वर्षं भारतमिति ।’’

क्या पृथ्वी का यही खंड जहाँ हम लोग रहते हैं , भारतवर्ष है ? इसका प्रमाण क्या है ?

शास्त्रों में बताते हैं कि भारतवर्ष में नर-नारायण हैं | इसी भारतवर्ष में भगवान श्रीहरि नर-नारायण रूप में है । केदारनाथ, बद्रीनाथ के रास्ते में दो पर्वत नर और नारायण हैं। मान्यता है कि देवर्षि नारद भगवान की आराधना नर-नारायण रूप में करते हैं ।
नर और नारायण पर्वत

विष्णु पुराण में भी भारतवर्ष की स्थिति के बारे में बताया गया है –
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम् ।
वर्शं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।।
ऐसा भूखण्ड जो समुद्र के उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण में स्थित है वही भारतवर्ष है और वहीं पर चक्रवर्ती भरत की संतति निवास करती है ।ञपुराणों के आधार पर इस भारतवर्ष का विस्तार 9000 योजन माना जाता है । एक योजन में 9 मील माना जाता है । अतः भारतवर्ष का विस्तार 81000 मील माना जा सकता है ।
भारतवर्ष अन्य वर्षों से श्रेष्ठ है क्यों कि यह कर्म भूमि है तथा अन्य वर्ष भोग भूमियाँ हैं –

‘यतो हि कर्मभूरेशा ह्यतो न्या भोगभूमयः(विष्णुपुराण)

ऐसा कहा जाता है कि मानव भगवान की सुन्दरतम रचना है और मानव को स्वतंत्रता है कर्मों को करने की । अच्छे कर्मों के द्वारा मानव अपना उद्धार कर सकता है । ऐसी स्वतंत्रता देवताओं को भी प्राप्त नहीं है क्योंकि वह भोगयोनि है । परंतु मनुष्यों में भी भारतवर्ष में जन्म लेने वाले को ही ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त है क्योंकि भारतवर्ष कर्मभूमि है तथा अन्य वर्ष भोगभूमि है । यही कारण है कि पृथ्वी पर भारतवर्ष के अतिरिक्त कहीं भी कर्म विधि नहीं है । उसका विधान हमारे वर्णाश्रम व्यवस्था में है । वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन धर्म का मूल है । सभी वर्णांे तथा आश्रमों में पूर्णतया प्रतिष्ठित मनुष्य जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी होता है । यहाँ पर पैदा होने वाले मनुष्य अपने-अपने कर्मों के आधार पर स्वर्ग तथा अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं । इसलिए संसार के किसी अन्य धर्मों में वर्णाश्रम व्यवस्था का विधान नहीं है । अन्य धर्म भोग को बढ़ावा देता है परंतु सनातन धर्म योग को बढावा देता है । अतः भारतवर्ष में पैदा होने वाले प्राणी अन्य जगहों पर पैदा होने वालों से अधिक प्रबुद्ध होता है । भारतवर्ष का कण-कण ऊर्जा से भरा हुआ तीर्थ है जिसने भी भारतवर्ष की पदयात्रा की है उन्हें नई ऊर्जा तथा दिषा मिली है । पाण्डवों ने भारतवर्ष की पदयात्रा की थी वनवास काल में तभी उन्हें नई ऊर्जा मिली और धर्मराज्य की स्थापना हुई । भगवान राम ने भी वनवास काल में भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वह रामराज्य स्थापित करने में सफल रहें । आदिशंकराचार्य ने भारतवर्ष की पदयात्रा कर दिग्विजय किया और भारतवर्ष के एकता के सूत्र को और भी मजबूत किया । वर्तमान काल में भी महात्मा गांधी ने पूरे भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वे ब्रिटिश साम्राज्य का नाश कर पाये ।

भारतवर्ष अपने आप में तीर्थ है जिस तरह तीर्थस्थानों की परिक्रमा से नई ऊर्जा मिलती है उसी तरह भारतवर्ष की परिक्रमा से भी नई ऊर्जा मिलती है । ये स्वयं प्रमाणित है । आप यहाँ पर किसी से भी भाग्य, भगवान, आत्मा, परमात्मा के बारे में बातें करके देख सकते हैं सभी के पास कुछ-न-कुछ अपने विचार होते हैं और वे विचार हमारे किसी-न-किसी शास्त्र में वर्णित होते हैं । हलाँकि वे उन शास्त्रों से हो सकता है अवगत नही हों । इसलिये यहाँ पर मनुष्य ही नहीं देवता भी जन्म लेकर यज्ञ यागादि अच्छे कर्मों के द्वारा पुण्य अर्जित कर अच्छे लोकों में जाना चाहते हैं । हमारे सनातन धर्म में ही भगवान के अवतार लेने की बात है । अन्य धर्मों मे नहीं क्योंकि सनातन धर्म भारतवर्ष में ही प्रचलित है और यह भारतवर्ष योगभूमि है । अतः यहाँ पर नये कर्म किये जा सकते है और अन्य खण्डों में नये कर्म नहीं हो सकते है – केवल पुरातन कर्मों का भोग ही हो सकता है । अतः देवगण भी यही गान करते हैं –
गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्ते तु भारतभूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।
(श्रीविष्णुपुराण 2/3/24)

अर्थात् जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के मार्गभूत भारतवर्ष में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं ।

हिंदू संसार में सबसे अधिक राष्ट्र प्रेमी और राष्ट्रभक्त लोग हैं।ऐसी उत्कृष्ट और गहरी और व्यापक राष्ट्रभक्ति संसार में लगभग कहीं भी नहीं है क्योंकि इतना प्राचीन और स्वाभाविक राष्ट्र विश्व में और कोई नहीं हैं ।
परंतु अंग्रेजों के भारतीय शिक्षा का सर्वनाश करके अपने चेलों को सत्ता सौंपी तो उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा का सर्वनाश किया । तब से हिन्दुओं के पास राजनीतिक चेतना अत्याल्प है और वे तोतों की तरह वही बातें करते रहते हैं जो हिंदूद्रोही सत्ताधीशों ने शोर मचाया है और जो उनके प्रायोजित विद्यालय विद्या संस्थानों में पढ़ाया जाता है जो कि झूठ है, भयंकर झूठ। पर हिन्दू अब वही दुहराते रहते हैं।
भारत को एक राष्ट्र मानकर अन्य लघु राष्ट्रों जैसा एक मानना घोर अज्ञान है।
यह यूरोप के 37 राष्ट्रों के बराबर आज है।पहले यह समस्त यूरोप से बड़ा था।
50 से अधिक मुस्लिम देशों के बराबर है अकेले भारत।
इसके विषय में सोचते और बोलते समय सदा यह ध्यान रखें, कृपया।
✍🏻रामेश्वर मिश्रा पंकज

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