भारतीय 7.8% GDP ग्रोथ आंकड़ों की बाजीगरी?, संजीव सान्याल बोले- पहले समझ तो लो

Sanjeev Sanyal Defends India 7.8 Per Cent Gdp Growth Reject Criticism Of Number Gimmick
India GDP: आलोचक बोले- 7.8% जीडीपी ग्रोथ आंकड़ों की बाजीगरी, संजीव सान्याल का जवाब- मुझे नहीं लगता
Sanjeev Sanyal on India GDP Growth: भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में जोरदार ग्रोथ की है। यह 7.8 प्रतिशत रही है। इस धमाकेदार ग्रोथ पर आलोचकों ने सवाल भी उठाए हैं। उन्‍होंने इसे आंकड़ों की बाजीगरी बताया। जाने-माने अर्थशास्‍त्री संजीव सान्‍याल ने इसका जवाब दिया है। वह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।

नई दिल्‍ली 02 सितंबर 2026 : प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने भारत की 7.8% GDP ग्रोथ का बचाव किया है। उन्होंने इस आलोचना को खारिज कर दिया कि यह ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ का नतीजा है।

उन्होंने कहा कि भारत की जीडीपी गणना का तरीका (मेथडोलॉजी) IMF और अन्य संस्थाओं की मांग के अनुसार अपडेट किया गया था। इंडिया टुडे टीवी से बात करते हुए सान्याल ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि कोई भी गंभीर अर्थशास्त्री इस डेटा को देखकर यह कहेगा कि यह भरोसेमंद नहीं है।’

भारत की अर्थव्यवस्था 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% बढ़ी। यह उम्मीदों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 7% के अनुमान से बेहतर थी। एक साल पहले इसी तिमाही में अंकित 6.9% दर से भी यह ग्रोथ रेट ज्‍यादा है।

क्‍यों बदला गया बेस ईयर?
सान्याल ने कहा कि भारत में मेथडोलॉजी की समस्या थी। बेस ईयर पहले अपडेट नहीं हुआ था। इस बदलाव में देरी इसलिए हुई क्योंकि दशक की शुरुआत का समय कोरोना के वर्षों से मेल खा रहा था। इसलिए सरकार ने 2024 तक इंतजार किया।

उन्होंने कहा, कि ‘पिछले साल तक हमें मेथडोलॉजी को लेकर समस्या थी। बेस ईयर अपडेट नहीं हुआ था। हर दशक में हम शुरुआत में बेस ईयर अपडेट करते हैं। हम इस दशक में ऐसा नहीं कर सके क्योंकि वे कोविड के साल थे। इसलिए दशक की शुरुआत के साल सामान्य साल नहीं थे। इसलिए हमें 2024 तक इंतजार करना पड़ा ताकि हमें एक सामान्य साल मिल सके जिसे हम बेस ईयर में इस्तेमाल कर सकें। अब जब हमें वह मिल गया तो हमने बेस ईयर अपडेट कर दिया।’

अर्थशास्त्री ने कहा कि इस बदलाव के असर के बारे में पहले ही बता दिया गया था। सान्याल ने कहा,कि ‘जब यह हुआ था तब मैंने सभी को चेतावनी दी थी- अब शिकायत न करें कि हमने बेस ईयर अपडेट कर दिया है – जिसकी आप शिकायत कर रहे थे – जिससे GDP ग्रोथ रेट अच्छी दिखेगी।’

टॉप अर्थशास्‍त्री ने समझाया कि जब आप बेस ईयर अपडेट करते हैं तो आप बास्केट से पुराने और खत्म हो रहे सेक्टर हटा देते हैं। उनकी जगह अपेक्षाकृत नए और तेजी से बढ़ने वाले सेक्टर शामिल करते हैं – ‘और ठीक यही हुआ है।’

सान्याल ने कहा कि यह अपडेट उसी के अनुरूप था जो अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारत से करने को कह रही थीं।

उन्‍होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि किसी को कोई शिकायत होनी चाहिए। हमने ठीक वही किया जो IMF और अन्य संस्थाएं हमसे करने को कह रही थीं। कोई भी गंभीर अर्थशास्त्री इस पर शिकायत नहीं करेगा। जीडीपी स्पष्टत: मजबूत दिख रही है। यह बात दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई दे रही है।’

इकोनॉमिक ग्रोथ साफ तौर पर मजबूत
सान्याल ने कहा कि अर्थव्यवस्था की मजबूती सरकार के GDP आंकड़ों के अलावा दूसरे डेटा में भी दिखती है। उन्होंने कारों की बिक्री के आंकड़ों का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘वे (आंकड़े) सरकार के नहीं हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा भी ठीक-ठाक है। वे सरकारी आंकड़े नहीं हैं।’

उन्होंने कहा कि उन इंडिकेटर्स के बिना भी 7.8% की ग्रोथ एक मजबूत तिमाही परफॉर्मेंस  दिखाती है।

वह बोले, कि ‘इसलिए मौजूदा हालात में और किसी भी हालात में 7.8% जीडीपी ग्रोथ रेट बहुत मजबूत है। मुझे व्यक्तिगत रूप से उम्मीद है कि आगे कुछ तिमाहियों में इसमें थोड़ी कमी आएगी। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि पूरे साल को आपको जीडीपी ग्रोथ रेट का एक बहुत अच्छा आंकड़ा मिलेगा।’

आरबीआई को उम्मीद है कि 2026-27 के पूरे फाइनेंशियल ईयर में भारत की अर्थव्यवस्था 6.7%  दर से बढ़ेगी।

जीडीपी डेटा पर विपक्ष ने उठाए सवाल
जीडीपी के आंकड़े जारी होने के तुरंत बाद प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने ग्रोथ के आंकड़ों पर सवाल उठाए।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 7.8% के आंकड़े को बहुत ज्‍यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई तस्वीर बताया। उन्‍होंने कहा कि यह प्राइवेट इंवेस्‍टमेंट के कमजोर सेंटीमेंट को नहीं दिखाता है। उन्होंने कमजोर कंज्यूमर कॉन्फिडेंस, घर की जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी और चीन के साथ लगातार बने हुए ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटे) की ओर भी इशारा किया।

भारत की जीडीपी ग्रोथ में आई मज़बूती पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

निर्मला सीतारमण नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल से वित्त मंत्री हैं

इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर 7.8% रही. यह पिछले साल की पहली तिमाही में दर्ज 6.9% से ज़्यादा है.

हालांकि यह इस साल जनवरी-मार्च तिमाही में दर्ज वृद्धि दर 8.6% से कम है. ये आँकड़े इसी हफ़्ते सोमवार को सरकार ने जारी किए थे.

कहा जा रहा है कि इसमें मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज़ सेक्टर की अहम भूमिका रही. पहली तिमाही में वृद्धि दर ब्लूमबर्ग के सर्वे में 7.3% के औसत अनुमान और भारतीय रिज़र्व बैंक के 7% के पूर्वानुमान से भी ज़्यादा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वृद्धि को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया कि तेल की क़ीमतों में झटके, सप्लाई चेन में बाधाएं और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत ने यह प्रदर्शन किया है.

भारत ऑटोमोबाइल और मोबाइल फोन से लेकर फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स और स्टील तक सब कुछ बनाता है और अब सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को भी बड़े पैमाने पर विकसित करने की कोशिश में है. लेकिन अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 17% है, जो प्रधानमंत्री मोदी के 25% के लक्ष्य से अब भी कम है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”जून तिमाही का प्रदर्शन एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मार्च 2027 तक के 12 महीनों में 7% से ज़्यादा की वृद्धि दर हासिल करने की राह पर भी ले जाता है.”

”यह प्रदर्शन मज़बूत है, लेकिन 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा करने को भारत को इससे भी तेज़ गति से विस्तार करना होगा.”

जीडीपी में तेज़ वृद्धि के बीच भारत का चालू खाता घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बढ़कर 4.2 अरब डॉलर, यानी जीडीपी का 0.5% हो गया है. एक साल पहले इसी तिमाही में यह 3.4 अरब डॉलर, यानी जीडीपी का 0.4% था.

संदेह क्यों?

विपक्षी दलों ने 7.8% की जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों पर संदेह जताया है.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर कहा, “बेरोज़गारी 50 साल के उच्चतम स्तर पर है. 40% युवा ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं. जुलाई 2026 में 15 से 29 साल की उम्र के हर 6 में से 1 युवा भारतीय बेरोज़गार था. हर साल दो करोड़ नौकरियां देने का वादा बिखर चुका है.”

उन्होंने कहा कि खुदरा महंगाई 19 महीनों के उच्चतम स्तर पर है और चीनी, प्याज, टमाटर, दाल, खाद्य तेल, चावल, दूध और रसोई में इस्तेमाल होने वाली हर जरूरी चीज़ की क़ीमतें “आग” की तरह बढ़ रही हैं.

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वित्त सचिव रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने भी जीडीपी के आँकड़ों पर सवाल उठाया है.

एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में उन्होंने कहा कि 7.8 प्रतिशत पहली नज़र में प्रभावशाली लगता है, लेकिन हमें इसकी वास्तविकता में जाना चाहिए.

गर्ग ने कहा, ”पिछले साल पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि भी 7.8 प्रतिशत थी और इस साल  भी वही दावा हो रहा है. लेकिन पिछले साल की जीडीपी संशोधित करके 6.9 प्रतिशत कर दी गयी थी. संशोधित आँकड़ों के हिसाब से इस साल की पहली तिमाही की वृद्धि दर ऊपर दिखती है. लेकिन पूरी बात सिर्फ़ इतनी नहीं है.”

गर्ग ने कहा, ”7.8 प्रतिशत वाली जीडीपी में महंगाई का प्रभाव हटा दिया गया है. जीडीपी की गणना वास्तव में मौजूदा क़ीमतों पर होती है. वे क़ीमतें जो आप और हम चुकाते हैं और जो कॉरपोरेट कंपनियां वसूलती हैं. इसलिए मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी ही जीडीपी देखने का वास्तविक तरीक़ा है.”

”मैं एक संख्या की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा, जिसे मुझे लगता है कि अब तक हर कोई नज़रअंदाज़ कर रहा है. पिछले साल मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी. इसे अब संशोधित करके 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है.”गर्ग ने कहा, ”मैं कह रहा हूँ कि पिछले साल की जीडीपी को पूरे 6 ट्रिलियन रुपये तक नीचे संशोधित करने से इस साल पहली तिमाही की जीडीपी 10.3 प्रतिशत बढ़ी दिख रही है. अगर पिछले साल की जीडीपी को संशोधित नहीं किया गया होता, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत होती.”

गर्ग ने कहा, ”पिछले साल मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी, जिसे अब घटाकर 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है, ताकि इस साल जीडीपी बेहतर दिखे. अगर पिछले साल की संख्या संशोधित नहीं की गई होती, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि 2.6 प्रतिशत होती.”

गर्ग का आरोप है कि भारत की जीडीपी वृद्धि को पिछले वर्ष के नॉमिनल जीडीपी बेस में की गई बड़ी गिरावट से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है.

दावे के अनुसार, पिछले साल पहली तिमाही में मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपए से घटाकर 80 ट्रिलियन रुपए कर दी गयी. परिणामस्वरूप, मौजूदा वर्ष का 88 ट्रिलियन रुपए का उत्पादन 10.3% की वृद्धि दर्शाता दिखाई देता है, जबकि पुराने बेस के आधार पर वृद्धि 2.6% होती.

गर्ग को सरकार के आँकड़ों पर संदेह क्यों हैं?  उन्होंने कहा, ”पिछले साल का डेटा भी सरकार का ही था और इस साल का डेटा भी सरकार का ही है. पिछले साल इसी सरकार ने कहा था कि पहली तिमाही में मौजूदा क़ीमतों पर जीडीपी 86 ट्रिलियन रुपये थी. इस साल उसे संशोधित करके 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया है. इससे इस साल के 88 ट्रिलियन रुपये को 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दिखाया जा सकता है.

गर्ग ने कहा, कि ”अगर आप पिछले साल के सरकारी आंकड़ों से तुलना करें, तो केवल दो-तीन क्षेत्रों में वृद्धि हुई है- कृषि और खनन में. गत वर्ष मौजूदा क़ीमतों वाली जीडीपी के आँकड़ों से तुलना करें तो मैन्युफैक्चरिंग वास्तव में नकारात्मक है. मेरा मानना है कि हमें अधिक गहन विश्लेषण करना चाहिए कि सरकार ने मौजूदा क़ीमतों वाली जीडीपी को इतनी भारी मात्रा में नीचे संशोधित क्यों किया.”

हर सरकारें जीडीपी वृद्धि दर अर्थव्यवस्था की मज़बूती से जोड़ती रही है
सरकार ने बदला था आधार वर्ष
पिछले साल फ़रवरी में सरकार ने नई जीडीपी सिरीज़ की घोषणा की थी. इसमें 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया था.

27 फ़रवरी 2026 को वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 को जीडीपी अनुमानों और इससे जुड़े अन्य आंकड़ों की नई सिरीज़ पर एक प्रेस नोट जारी किया गया था. इसमें सरकार ने 2011-12 के पुराने आधार वर्ष को बदल दिया था.

आधार वर्ष उन क़ीमतों, प्रोडक्शन स्ट्रक्चर और ख़र्च के पैटर्न को एक बेंचमार्क उपलब्ध कराता है, जिनका इस्तेमाल समय के साथ उत्पादन की तुलना करने को किया जाता है. आधार वर्ष अपडेट करना ज़रूरी भी माना जाता है क्योंकि अर्थव्यवस्था बदलती रहती है. भारत इससे पहले 2004–05 और 1999–2000 को आधार वर्ष के तौर पर इस्तेमाल कर चुका है. आजादी के बाद यह आठवां ऐसा संशोधन था.

ज़्यादा विकसित अर्थव्यवस्थाओं के उलट, भारत में आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में होता है. आधिकारिक टैक्स रिकॉर्ड उन छोटे कारोबारों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं देते जो परंपरागत रूप से टैक्स नहीं देते रहे हैं.

पिछले साल दिसंबर में अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने भी भारत की आधिकारिक जीडीपी वृद्धि दर की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे. उनका तर्क था कि आधिकारिक अनुमान औपचारिक क्षेत्र के संकेतकों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर हैं, जबकि देश की कहीं बड़ी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को पर्याप्त रूप से माप नहीं पाते.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ने कहा था, कि ”पिछले साल जुलाई–सितंबर तिमाही में 8.2% वास्तविक जीडीपी वृद्धि अंकित हुई, जो 18 महीनों में सबसे ज़्यादा थी. लेकिन दूसरे संकेतक कहीं कमज़ोर तस्वीर दिखा रहे थे. अक्तूबर में औद्योगिक वृद्धि सिर्फ़ 0.3% रही, बेरोज़गारी चिंता का विषय बनी रही, निवेश की कई परियोजनाएं अटक गईं या वापस ले ली गईं और नेट एफ़डीओ नकारात्मक हो गया.”

अरुण कुमार का तर्क था कि ऐसे विरोधाभासों को जीडीपी के आंकड़ों की जांच का कारण बनना चाहिए, न कि आधिकारिक वृद्धि दर को बिना सवाल के स्वीकार कर लेना चाहिए.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार की मुख्य आलोचना यह है कि भारत के क़रीब 94% कर्मचारी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि तिमाही उत्पादन का अनुमान लगाने को इस्तेमाल होने वाले कई नियमित संकेतक जैसे विमान यातायात, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री और माल ढुलाई मुख्यत: औपचारिक गतिविधियां दर्शाते हैं.

उनका तर्क है कि अगर औपचारिक क्षेत्र बढ़ रहा हो,जबकि छोटी कंपनियां,अनौपचारिक कारोबारी और स्वरोजगारी लोग आर्थिक दबाव में हों, तो औपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों के आधार पर अनौपचारिक क्षेत्र की वृद्धि का अनुमान लगाने से पूरी अर्थव्यवस्था के मज़बूत विस्तार की ग़लत तस्वीर सामने आ सकती है.

प्रोफ़ेसर कुमार मानते हैं कि भारत की जीडीपी शायद औपचारिक और कॉरपोरेट-केंद्रित अर्थव्यवस्था को रोज़गार पर निर्भर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की तुलना में ज़्यादा प्रभावी तरीके से माप रही है.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का कहना है कि जीडीपी के आंकड़ों को बेहतर बनाने को कई बदलाव ज़रूरी हैं. इनमें नया आधार वर्ष, जनगणना के आधार पर अपडेट किए गए सैंपल, अनौपचारिक क्षेत्र के बेहतर सर्वे और आंकड़े जुटाने के बेहतर तरीके शामिल हैं. साथ ही, क़ीमतें मापने की व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए और तिमाही व सालाना जीडीपी के आंकड़ों के बीच तालमेल भी ज्यादा पारदर्शी होना चाहिए.

सांख्यिकी मंत्रालय ने जारी किया बयान
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव डॉक्टर सौरभ गर्ग ने जीडीपी के आंकड़ों को स्पष्ट किया है और इसकी मैथडोलॉजी को लेकर स्पष्टीकरण दिया है.

उन्होंने कहा, “फ़रवरी 2026 में हमने नए आंकड़े नए बेस ईयर के हिसाब से निकाले थे. जो मैथडोलॉजी हमने फ़ॉलो की है उसे हमने अंतरराष्ट्रीय संगठनों और स्थानीय अर्थशास्त्रियों से चर्चा की थी. जो भी बदलाव हैं उसको हमने सार्वजनिक कर रखा है.”

“फ़रवरी 2026 में हमें पुराने सिस्टम में जो ख़ामियां लगी थीं, उसे ठीक किया था. तब जीडीपी का स्तर 369 लाख करोड़ से 361 साथ करोड़ किया था. इसकी तब सभी ने तारीफ़ की थी. उसी कड़ी में फ़रवरी 2026 में पिछले साल के क्वार्टर वन का जीडीपी 86 लाख करोड़ से 80.3 लाख करोड़ किया गया था.”

“जब भी हम दो अलग-अलग सालों की तुलना करते हैं तो सांकेतिक मूल्यों की जगह स्थिर मूल्यों पर करते हैं. और वो इसलिए करते हैं क्योंकि सांकेतिक मूल्यों या करंट प्राइसेज़ में महंगाई से उतार-चढ़ाव हो सकता है. जब भी तुलना करते हैं तब स्थिर मूल्यों पर करते हैं.”

“ये जो अब तुलना की जा रही है वो पिछले साल ख़त्म हो चुकी पुरानी सिरीज़ के हिसाब से हो रही है. फ़रवरी 2026 की हमने बैक सिरीज़ पूरी पारदर्शिता से निकाली है और उसमें कोई भी बदलाव नहीं किया है. पुराने डेटा को लेकर तुलना की जा रही है और करंट प्राइसेज़ पर तुलना की जा रही है जबकि अर्थशास्त्री स्थिर मूल्यों पर तुलना करते हैं. अगर ग़लत तरीक़े से तुलना की जा रही है तो ये उचित नहीं है.”

भारत की 7.8% GDP ग्रोथ पर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस की आलोचना को वर्ल्ड बैंक के ईडी नीलकंठ मिश्रा ने ‘अल्पज्ञान और सरासर गलत’ बताया. गर्ग के दावों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने सरकार पर अर्थव्यवस्था की तस्वीर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगाया है. वहीं नीलकंठ मिश्रा ने वाहन बिक्री, कर्ज, टैक्स कलेक्शन और निवेश के आंकड़ों के आधार पर अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा किया है.

 वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा. (File Photo: ITG)वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के GDP के आंकड़ों और इसकी गणना के तरीके पर सवाल उठाने पर वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने तीखी टिप्पणी की है.

नीलकंठ मिश्रा ने दावों को बताया ‘अल्पज्ञान’

इस पूरे विवाद के बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर GDP के आंकड़ों का बचाव किया. उन्होंने GDP की नई सीरीज पर सवाल उठाने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें ‘अल्पज्ञानी और बेहद गलत दावों’ को देखकर हैरानी होती है. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस पार्टी की ओर माना जा रहा है.

नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि GDP के आंकड़ों में हुए बदलाव को समझे बिना पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करना सही नहीं है. उनके अनुसार, नई सीरीज में आंकड़े जुटाने और अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियों को मापने का तरीका बेहतर किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि गलत जानकारी कई बार सही जानकारी से ज्यादा तेजी से फैलती है. इसलिए सही तथ्यों को बार-बार सामने रखना जरूरी है.

सिर्फ GDP नहीं, ये आंकड़े भी सकारात्मक

नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति समझने को सिर्फ GDP का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने अगस्त के कई आंकड़ों का हवाला दिया. उनके अनुसार, कार और SUV की बिक्री में करीब 35% की बढ़ोतरी हुई है. दोपहिया वाहनों की बिक्री भी 20% से ज्यादा बढ़ी है. निर्यात में करीब 9% की बढ़ोतरी हुई है. कमर्शियल वाहनों की बिक्री में तो करीब 40% की तेजी देखने को मिली है. वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, यह कारोबार और निर्माण गतिविधियों में मजबूती का संकेत है.

कर्ज और निवेश में भी दिख रहा सुधार

नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि बैंक लेंडिंग की ग्रोथ भी उम्मीद से बेहतर रही है. उनके मुताबिक, पहले कर्ज की धीमी रफ्तार की एक बड़ी वजह बैंकों की तरफ से कर्ज देने में कमजोरी थी, लेकिन अब इसमें सुधार दिखाई दे रहा है. टैक्स कलेक्शन में सुधार और निर्माण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश में निवेश की गतिविधियां भी जारी हैं. निर्माण क्षेत्र के सभी संकेतक बेहद मजबूत हैं. उनका मानना है कि अब उन लोगों की संख्या बेहद कम हो जानी चाहिए जो लगातार निजी क्षेत्र के निवेश के कमजोर होने का रोना रोते हैं, क्योंकि देश में निवेश के स्पष्ट और पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं.

आम आदमी की कमाई अब भी चुनौती

हालांकि, नीलकंठ मिश्रा ने यह भी माना कि अर्थव्यवस्था में अभी कुछ ‘स्लैक’ यानी कमियां मौजूद हैं. इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था अभी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही है. उन्होंने वास्तविक वेतन यानी महंगाई को हटाने के बाद बचने वाली कमाई में धीमी बढ़ोतरी को इसका एक संकेत बताया. उनके अनुसार, इस स्थिति को पूरी तरह बदलने में कुछ तिमाहियां लग सकती हैं. उन्होंने कहा कि इन कमियों को पूरी तरह से दूर करने और लेबर मार्केट को मजबूत करने को देश को लगातार कई तिमाहियों तक औसत से अधिक की आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी, ताकि मार्केट पूरी तरह से चुस्त हो सके और भविष्य में महंगाई के दबावों को नियंत्रित रखा जा सके.

7.5% तक पहुंच सकती है भारत की ग्रोथ

भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने काफी सकारात्मक रुख दिखाया है. उनका कहना है कि देश पर बजट का दबाव अब कम हो रहा है और मौद्रिक नीतियां भी अर्थव्यवस्था को अनुकूल बन रही हैं. इसका असर GDP ग्रोथ पर भी दिख रहा है. उनके मुताबिक, आने वाले समय में भारत की औसत GDP ग्रोथ 7% से ऊपर रह सकती है. यहां तक कि अगर सरकार की बजट और मौद्रिक नीतियां सामान्य यानी तटस्थ भी रहती हैं, तब भी भारतीय अर्थ व्यवस्था करीब 7.5% की ग्रोथ हासिल कर सकती है. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर बढ़ सकता है.

विवाद की बड़ी वजह GDP की नई सीरीज है. फरवरी 2026 में सरकार ने GDP की नई सीरीज जारी की थी, जिसमें बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया. इसके साथ आंकड़े जुटाने और उनकी गणना के तरीके में भी बदलाव किया गया.

गर्ग ने विशेषत: जून 2025 की तिमाही के मौजूदा कीमतों वाले GDP आंकड़े में करीब 6 लाख करोड़ रुपये की कमी का म उठाया है. सुभाष चंद्र गर्ग का तर्क है कि अगर पुराने आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो जून 2026 की ग्रोथ का आंकड़ा काफी अलग दिखाई देगा और यह 2.6% के आसपास ठहरेगा. उनका यह दावा सरकार के 7.8% ग्रोथ के दावे के एकदम विपरीत है।

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