सऊदी अरब में सत्यार्थ प्रकाश रखने वाले राम कुमार भारद्वाज को हो गई थी जेल

*सऊदी अरब में सत्यार्थ प्रकाश रखने वाले को जेल*
#श्रेयांश_आर्य

भारत से सहस्रों मील दूर सऊदी अरब में श्री रामकुमार भारद्वाज को इसलिये जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसके पास सत्यार्थप्रकाश था। सऊदी अरब में इस्लाम के धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य किसी भी धर्म के ग्रन्थों का रखना निषिद्ध है।

श्री रामकुमार भारद्वाज ने जिस किसी प्रकार जेल से मई 1986 ई० को एक पत्र सार्वदेशिक सभा को भेजा तथा अपनी गिरफ्तारी का विवरण देते हुए अपनी रिहाई कराने की प्रार्थना की। श्री भारद्वाज हरियाणा-निवासी हैं तथा उनका परिवार आर्य-समाजी है। उन्हें एक भारतीय कम्पनी के माध्यम से सऊदी अरब में नौकरी के लिए भेजा गया था। वहाँ जाते समय वे अपने साथ कुछ पुस्तकें ले गये जिनमें सत्यार्थप्रकाश भी था। निषिद्ध साहित्य रखने के आरोप में उन्हें जेल में डाल दिया गया ।

सभा को श्री भारद्वाज का पत्र प्राप्त होने के बाद सभा के प्रधान श्री रामगोपाल शालवाले ने प्रधानमन्त्री तथा विदेश मन्त्रालय को पत्र लिखकर उनसे सम्पर्क स्थापित किया। दिल्ली-स्थित सऊदी अरब दूतावास को भी पत्र लिखा गया तथा रामकुमार भारद्वाज को तुरन्त रिहा करने की माँग की गई। विदेश मन्त्रालय के पत्र में यह लिखा गया कि बहुसंख्य हिन्दू राष्ट्र होने पर भी भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तथा यहाँ सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोगों को पूर्ण धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्वतन्त्रता एवं समता प्राप्त है। किन्तु भारत के ही मित्र समझे जाने वाले देश सऊदी अरब में भारतीय नागरिकों के साथ इस प्रकार का भेदभावपूर्ण कार्य एवं उसके साहित्य पर इस प्रकार का कड़ा प्रतिबन्ध अपमानजनक बात है। इस घटना से आर्यसमाजियों और सम्पूर्ण हिन्दू समाज में भारी उत्तेजना और असन्तोष पैदा हो गया है, अतः सरकार इस मामले में तुरन्त उच्च-स्तरीय कार्रवाई करे।

इसके उत्तर में विदेश मन्त्रालय ने बड़ा अजीबोगरीब उत्तर दिया। उसने सिर्फ इतना ही लिखा कि अरब के कानून के अनुसार सऊदी अरब में प्रतिबन्धित साहित्य रखना व पढ़ना अपराध है, इसलिये रामकुमार भारद्वाज को जेल की सजा दी गई है। इस पत्र के बाद विदेश मन्त्रालय का दूसरा भी एक संक्षिप्त पत्र मिला, जिसमें सभा-प्रधान को सूचना दी गई थी कि श्री भारद्वाज के मामले में सरकार उचित कार्यवाही कर रही है, तथा ज्यों ही वहाँ से कोई जानकारी मिलेगी आपको सूचित किया जायगा ।

सार्वदेशिक सभा ने विदेश मन्त्रालय को एक और कड़ा पत्र लिखा जिसमें जनता के आक्रोश के लिए सरकार की डिलमिल नीति को उत्तरदायी ठहराया गया था। इसके उत्तर में विदेश मन्त्रालय ने 10 नवम्बर 1986 ई० को एक पत्र लिखकर बताया कि सभा ने 30 अक्टूबर 1986 ई० को प्रधानमन्त्री को जो पत्र भेजा था उसके आधार पर सऊदी अरब के विदेश विभाग से रिवाद-स्थित हमारे दूतावास की उच्च-स्तरीय बातचीत हो रही है। आशा है कि बातचीत का सफल परिणाम निकल सकेगा ।

सार्वदेशिक सभा की अन्तरंग सभा ने अपनी 14 दिसम्बर 1986 ई० की बैठक में स्थिति पर पुनविचार किया तथा यह निर्णय किया कि यदि 11 जनवरी 1987 ई० तक श्री भारद्वाज को रिहा नहीं किया गया तो सारे भारत में सत्यार्थप्रकाश-रक्षा-दिवस मनाया जाय और 14 जनवरी को दिल्ली स्थित सऊदी अरब दूतावास पर प्रचण्ड प्रदर्शन किया जाय ।

भारत सरकार के प्रयास से रामकुमार को मास की जेल के बाद रिहा कर भारत भेज दिया गया। पर सरकार ने सभा को इसकी सूचना देने की शिष्टता नहीं दिखाई। सभा ने हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा के एक उपदेशक श्री सुखदेव शास्त्री को भारद्वाज के पिता श्री हरिसिंह के पास उसके बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए भेजा जो उनके गाँव शाहपुरा गये जहाँ यह शुभ सूचना मिली। श्री भारद्वाज दिसम्बर में रिहा होकर वहाँ आ गये।

इस समाचार से आर्य जगत् में हर्ष और सन्तोष की लहर दौड़ गई। उन्हें 25 दिसम्बर 1986 ई० को श्रद्धानन्द बलिदान दिवस की शोभा-यात्रा में तथा इस अवसर पर लाल किले के मैदान में आयोजित जनसभा में आमन्त्रित किया गया। सभा ने श्री भारद्वाज का स्वागत किया। श्री भारद्वाज ने अपने भाषण में कहा-

*“मैं आर्यसमाज और सार्वदेशिक सभा का हृदय से कृतज्ञ हैं जिन्होंने मुझ जैसे सामान्य आर्यसमाजी के जीवन के गम्भीर संकट के समय एक अभेद्य दीवार की तरह खड़े होकर मेरी सहायता की। मैं इस प्रकार से अपने जीवन से निराश हो चुका था। सऊदी अरब जाते समय वहाँ धार्मिक ग्रन्थों पर पाबन्दी है मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं थी। जिस कम्पनी ने मुझे भेजा उसने भी इस बारे में मुझे कुछ नहीं बताया। मैं हरियाणा-निवासी हूँ। सऊदी अरब नौकरी पर जाते समय में अपने साथ सत्यार्थप्रकाश व कुछ अन्य वैदिक साहित्य और दो ओ३म्-ध्वज साथ ले गया।*
*मुझे इस बात का गहरा दुःख है कि मेरे ही एक साथी फैज मोहम्मद ने जो हैदराबाद का निवासी है, मुझे एकान्त में सत्यार्थप्रकाश पढ़ते हुए देखा। पढ़ना समाप्त होने पर उसने मुझे यह कहकर कि मैं भी उसे देखना चाहता हूँ वह पुस्तक मुझसे ले ली। उसने मेरे साथ विश्वासघात किया। उसने मेरी इस बात की रिपोर्ट सऊदी पुलिस में कर दी और पुस्तक को सेना मुख्यालय में जमा करा दिया। राष्ट्रीय नाता तोड़कर वह अपने मजहबी रूप में आ गया।* *सत्यार्थप्रकाश में स्वामी जी ने कुरान के बारे में जो लिखा है उसका अरबी अनुवाद कराया गया। मुझे इस अपराध में खूब मारा-पीटा गया। हाथ-पैर बाँधकर जेल में डाल दिया गया। जेल में भी यातनाएं दी गई।*
*मुझे बड़ा दुःख है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और यहाँ सबको हर प्रकार की आजादी है। किन्तु यहाँ से जब कोई हिन्दू मित्र-राष्ट्रों में जाता है तो उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है और उनका धार्मिक कानून हमारी धर्मनिरपेक्षता की जड़ें काटता है। मैंने धर्म का पालन किया है और वहाँ पर बड़े कष्ट सहे हैं। मैंने भयंकर यातनाओं से दुःखी होकर किसी तरह चोरी-छिपे अपनी मुक्ति व सहायता के लिए सार्वदेशिक सभा के प्रधान श्री स्वामी आनन्दबोध जी को पत्र लिखा था। श्री स्वामी जी ने इस सम्बन्ध में जो सक्षम कदम उठाया है, उसी के कारण मुझे इसी मास चुपचाप रात्रि 10 बजे जेल से रिहा करके भारत भेजा गया है। मैं इस कार्यवाही के लिए श्री स्वामी जी, सार्वदेशिक सभा और आर्यसमाज का आभारी हूँ। मेरे साथ वहाँ दो अन्य हिंदू युवक श्री ब्रह्मप्रकाश और धर्मवीर भी जेल में हैं, उनका क्या हुआ, मैं नहीं कह सकता।”*

सभा-प्रधानजी ने उपर्युक्त घटना पर कहा कि हमारे धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत पर यह एक तमाचा है। हमारे मित्र राष्ट्र के नागरिक जब भारत आते हैं, उन्हें सब प्रकार की आजादी व स्वतन्त्रता मिलती है, लेकिन भारत का कोई नागरिक अगर वहाँ जाय और उसके साथ इस प्रकार का दुर्व्यवहार किया जाये, यह गम्भीर स्थिति है। सार्वदेशिक सभा भारत सरकार से माँग करती है कि वह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर पुनर्विचार करे।

श्री भारद्वाज की रिहाई के बाद आर्यसमाज का 11 जनवरी और 14 जनवरी 1987 ई० का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया।

इस घटना के समय हैदराबाद के मुसलमानों की ओर से दिसम्बर 1986 ई० में ही इस्लामिक यूथ संस्था के जनरल सेक्रेटरी श्री अफसर फैजी ने एक बक्तव्य जारी कर भारत सरकार से सत्यार्थप्रकाश पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की। इससे स्पष्ट है कि सऊदी अरब की घटना की सूचना तथा भारद्वाज की रिहाई की बात मुसलमानों को पहले ही पता चल गई थी। अन्यथा फैजी की माँग के लिए कोई तात्कालिक कारण नहीं था।

श्री फैजी के इस वक्तव्य का तीव्र विरोध किया गया। इसके विरोध में आर्य-समाज की ओर से प्रचारित वक्तव्य हैदराबाद के पत्रों ने प्रकाशित नहीं किया। इस पर आर्य प्रतिनिधि सभा आन्ध्र प्रदेश की ओर से मुख्यमन्त्री एवं राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर उन्हें आगाह किया गया कि श्री फैजी बंगलौर की तरह हैदराबाद में भी साम्प्रदायिकता की आग को हवा दे रहे हैं। उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाई की जाय।

_*स्रोत–आर्य समाज का इतिहास डॉ सत्यकेतु विद्यालंकार भाग 7 पृष्ठ संख्या 263–265*_

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