प्रश्न संघ समझने को नही,विरोध को,तो क्यों दें जवाब?
संघ पर प्रश्न या संवाद? मोहन भागवत को लिखे प्रियांक खड़गे के पत्र पर छिड़ी नई बहस
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे के पत्र के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके स्वरूप और वैचारिक संवाद की परंपरा पर केंद्रित लेख।
राकेश सिन्हा
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को पत्र लिखकर कुछ प्रश्न पूछे हैं और इसके पंजीकृत नहीं होने का कारण जानना चाहा है। भारतीय विमर्श परंपरा में प्रश्नोत्तर का विशेष महत्त्व है। प्रश्न करने वाला स्वयं विषय को समझता है और उस पर अपनी आलोचनात्मक राय रखता है। प्रश्नों से वह विचार पर द्वंद्व और अज्ञानता को दूर करना चाहता है।
खड़गे न तो संघ को समझना चाहते हैं, न ही उनकी नीयत संघ के विचार पर गहन विमर्श करने की है। उन्हें इस बात का व्यावहारिक ज्ञान जरूर है कि संघ विरोध में सुर्खियां मिलेंगी। इसमें वे सफल रहे। आज वे अन्य राज्यों में अपने समकक्षों की तुलना में देश में सबसे अधिक परिचित नाम हैं।
राजनीतिज्ञों का एक वर्ग पिछले कई दशकों से इस तरह के सतही विवादों से राजनीति में अपनी तात्कालिक प्रासंगिकता बढ़ाता रहा है। वर्ष 1974-75 में स्वयं इंदिरा गांधी हर बात के लिए संघ पर अंगुली उठाती रहीं, तो वर्ष 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मधु लिमये, कृष्णकांत और राजनारायण जैसे नेता संघ से छद्म युद्ध करते रहे। इससे भी पूर्व 1960 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की समर्थक सुभद्रा जोशी ने सांप्रदायिकता के खिलाफ समिति बनाकर संघ विरोधी दर्जनों रचनाओं का प्रकाशन किया था। लिखने वाले सभी प्रियांक खड़गे जैसे ही लोग थे। लिहाजा राज्य-पोषित यह अभियान जमीन पर बेअसर रहा।
वर्ष 1936 की एक घटना इस संदर्भ में प्रासंगिक है। महात्मा गांधी के सहयोगी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जमनालाल बजाज ने संघ के संस्थापक हेडगेवार को संघ संबंधी प्रश्नों की सूची भेजी थी। इस पर उनका जवाब रोचक था। उन्होंने उत्तर में लिखा, ‘आप हेडमास्टर नहीं हैं कि मैं एक स्कूली छात्र के रूप में आपके प्रश्नों का जवाब दूं।’ बजाज वर्धा के रहने वाले थे, जहां नागपुर के बाद संघ की सबसे मजबूत स्थिति थी।
दो वर्ष पूर्व गांधी जमनालाल बजाज के साथ वर्धा में संघ शिविर देखने आए थे। उन्होंने स्वयंसेवकों के साथ संवाद कर संघ के व्यावहारिक पक्ष, विशेषकर जाति, अस्पृश्यता, आर्थिक बराबरी आदि को समझना चाहा। बाद में उन्होंने हेडगेवार से संवाद किया। तेरह साल बाद वे सितंबर 1947 में दिल्ली में संघ शिविर पुन: आए। वहां उनका स्वयंसेवकों के साथ लंबा प्रश्नोत्तर हुआ। संघ को समझने का यह ईमानदार प्रयास था।
उनके बाद जयप्रकाश नारायण ने इसी रास्ते को अख्तियार किया। वे आरंभ में संघ विरोधी थे, मगर वे इसे समझना चाहते थे। इसकी ललक उन्होंने वर्ष 1968 में सांप्रदायिकता विरोधी कमेटी के प्रथम सम्मेलन में दिखाई। एक के बाद दूसरे वक्ताओं के संघ विरोधी अलंकृत भाषणों के बीच जयप्रकाश नारायण (जो इसके उद्घाटनकर्ता और मुख्य अतिथि थे) ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘लगता है, यह सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि संघ विरोधी सम्मेलन है।’ बाद में वे संघ को समझने के लिए इसके निकट आए। उसी निकटता के क्रम में उनका वर्ष 1977 में पटना में संघ शिविर में जाना हुआ था।
हेडगेवार दृढ़ता से मानते थे कि संघ राजनीति की तात्कालिक या दीर्घकालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए नहीं बना है। भागवत ने हेडगेवार द्वारा बजाज को लिखे गए पत्र के भाव को ही सुसंगत तरीके से रखा है कि संघ को निकट से देखकर ही इसके साथ रचनात्मक संवाद संभव है। संघ की शुरुआत संस्था के रूप में हुई ही नहीं। इसकी स्थापना के छह महीने बाद इसका नामकरण हुआ। पदाधिकारी तीन वर्षों बाद बने। कार्यालय बनने में एक दशक लग गया। स्थापना के पीछे एकमात्र लक्ष्य हिंदुओं में राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रवादी वृत्ति और सामाजिक बराबरी का भाव पैदा करना है। प्रेरणा लेने-देने के लिए पंजीकरण नहीं करना पड़ता है।
संघ से ही प्रेरित होकर स्वयंसेवक समाज के लिए उपयोगी काम विभिन्न पंजीकृत संगठनों, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, भारतीय मजदूर संघ, सहकार भारती इत्यादि के माध्यम से करते हैं। अत: संघ औपचारिक संगठनों का एक अनौपचारिक केंद्र है। ऐसा उदाहरण अमेरिका में भी है। मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) द्वारा सदर्न क्रिश्चियन लीडरशिप कॉन्फ्रेंस की स्थापना वर्ष 1957 में की गई थी। यह नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाओं का गैर-पंजीकृत अनौपचारिक केंद्र था। सार्वजनिक नैतिकता की कल्पना से जो संगठन जितना करीब होता है, उसका समाज में प्रभाव उतना अधिक होता है। यही कारण है कि जब संघ पचास और साठ के दशकों में छोटा संगठन था, तब भी यह राजसत्ता से लेकर समाज का ध्यान अपनी ओर खींचता रहा।
संघ के आलोचक संगठन के इस पहलू को भूल जाते हैं। इसलिए वर्ष 1950 से अब तक संघ-विरोधी उसके प्रति अज्ञानता का पिरामिड बनकर रह गए हैं। वर्ष 2025-26 संघ का शताब्दी वर्ष है। यह एक सुनहरा अवसर था, जब सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक पहलुओं पर गंभीर विमर्श होता, मगर इसकी शुरुआत तक नहीं हो पाई। यह एक अवसर खोने जैसा है। शास्त्रार्थ का देश नए युग में जी रहा है, जिसे ‘आरोप-प्रत्यारोपार्थ’ का युग कह सकते हैं।
ऐसा किसी भी समाज की सामूहिक बौद्धिकता के लिए आत्मघाती होता है। यह स्थिति चालीस के दशक में नहीं थी। इसका उदाहरण मार्क्सवाद से निकटता रखने वाले बालाजी हुद्दार थे, जिन्होंने 25 जून 1940 में संघ को भारत में ‘नव संस्कृति की स्थापना का आंदोलन’ कहा था। वैचारिक विमर्श में सामाजिकता और लचीलापन विचार के विकास के सूचकांक को हमेशा आगे बढ़ाता है।
कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने दो पन्नों के एक पत्र से मोहन भागवत से पूछा है कि कर्नाटक में आरएसएस की कानूनी स्थिति क्या है। क्या उसने अपना पंजीकरण कराया है या नहीं? उसकी फंडिंग के स्रोत क्या हैं? इसके अलावा जवाबदेही से जुड़े कई अन्य सवाल भी उठाए गए हैं।

