विपक्ष की ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ ने भाजपा की कर दी आसानी
4 मई 2026 को घोषित पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 बाद यह विश्लेषण तेजी से उभरा है कि विपक्ष की ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की धारणा और अल्पसंख्यक वोट बैंक राजनीति ने भाजपा की चुनावी राह आसान बना दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की 206 सीटों की बड़ी जीत ने क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व को कड़ी चुनौती दी है।
भाजपा की राह आसान होने के प्रमुख कारण:
विपक्षी मतों का विभाजन:पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC),कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच मुस्लिम वोटों के बंटवारे ने भाजपा की जीत का रास्ता साफ किया। जहां मुस्लिम मतदाता बहुल सीटों पर TMC और अन्य विपक्षी दल आपस में उलझे रहे,वहीं भाजपा ने गैर-मुस्लिम वोट एकजुट करने में सफलता पाई।
हिंदू मतों का ध्रुवीकरण:भाजपा ने ‘हिंदू’ और विकास नैरेटिव पर ध्यान केंद्रित करते हुए,खासकर सीमावर्ती जिलों में,हिंदू वोट तेजी से समेकित किये। इस रणनीति से,मुस्लिम बहुसंख्यक सीटों पर भी भाजपा ने टीएमसी के किले में सेंधमारी की।
मुस्लिम तुष्टीकरण का नैरेटिव: भाजपा ने ममता बनर्जी सरकार पर कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के साथ-साथ ‘तुष्टीकरण’ के आरोप लगाए, जिसे मतदाताओं ने माना। चुनाव परिणाम बताते हैं कि केवल अल्पसंख्यक वोट बैंक के भरोसे चुनाव जीतना अब मुश्किल है।
असम में भी समान पैटर्न: असम में भी,कांग्रेस का मुस्लिम मतदाताओं पर अति-निर्भरता (18 में से 18 मुस्लिम विधायक) और टीएमसी के ‘कॉकटेल ऑफ हिंदुत्व एंड वेलफेयरिज्म’ के सामने न टिक पाना,भाजपा की तीसरी बार सरकार बनाने का मुख्य कारण बना।
बंगाल में 27% मुस्लिम वोट निर्णायक:राज्य में 27% मुस्लिम आबादी होने होने पर भी, भाजपा का अपनी आक्रामक हिंदुत्व नीति और जमीनी संगठन के दम पर, 2021 के 77 सीटों के आंकड़े से आगे बढ़कर 200+ सीटें पाना दर्शाता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति का लाभ भाजपा को मिला।
संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि 2026 में विपक्ष की मुस्लिम केंद्रित राजनीति भाजपा के लिए एक तरह से ‘बूस्टर’ का काम कर गई, जिससे भाजपा न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि असम में भी अपने विरोधी मतों को बांटकर अपनी सत्ता मजबूत करने में सफल रही।
क्या विपक्ष की ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ ने भाजपा का काम आसान कर दिया
विधानसभा चुनावों के नतीजों ने साबित किया कि अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि मजबूत ‘नैरेटिव’ ही चुनाव जिताता है, केरल से लेफ्ट की विदाई और बंगाल में भाजपा के प्रवेश के पीछे के असली चुनावी और सामाजिक कारण क्या हैं?
क्या अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति विपक्ष पर ही भारी पड़ गई
पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों से देश के सियासी गलियारों में हलचल है. आखिर भाजपा ने बंगाल का अभेद्य किला कैसे ढहाया और असम में अपनी जड़ें और मजबूत कैसे कीं.’पहचान की राजनीति’ से लेकर ‘संगठनात्मक कमजोरी’ तक,इस चुनाव के हर उस पहलू को समझने के लिए पढ़िए TVTN की मैनिजिंग एडिटर अंजना ओम कश्यप का विश्लेषण,जो बताता है कि क्यों बंगाल और असम की जमीन पर ‘तुष्टीकरण’ का मुद्दा विकास और क्षेत्रीय पहचान पर भारी पड़ गया.
असम और पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़त की एक अहम वजह लगातार चलाया गया अभियान भी था, जिसमें TMC और कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों को खुश करने का आरोप लगाया गया था.यह बात मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सही लगी और हर बार जब इन पार्टियों ने यह ज़ोर देकर कहा कि उनके लिए मुसलमानों के वोट मायने रखते हैं,तो असल में वे BJP के विस्तार के लिए जमीन तैयार कर रही थीं.
असम में,पहचान,प्रवासन और नागरिकता से जुड़ी पुरानी चिंताओं को राजनीतिक रूप से लामबंद किया गया, जिससे BJP को पारंपरिक जातिगत और क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर अपना समर्थन मजबूत करने का मौका मिला.
पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह का ध्रुवीकरण देखा गया, जहां ममता बनर्जी के खिलाफ ‘चुनिंदा कल्याणकारी योजनाओं’ और ‘मुस्लिम समुदायों के प्रति झुकाव’ के आरोपों को चुनावी अभियान का मुख्य बिंदू बनाया गया.
असम विधानसभा में विपक्षी खेमे के विधायकों पर नज़र डालें, तो उनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या काफी ज़्यादा है.यह दो कारण साफ दिखाता है। पहला यह कि कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी काफी घनी है,और दूसरी यह कि इस समुदाय ने एकमुश्त विपक्ष को वोट दिया है.
हालांकि, कांग्रेस और TMC की चुनावी असफलताओं को केवल तुष्टीकरण तक सीमित कर देना स्थिति को बहुत ज़्यादा सरल बना देता है. संगठनात्मक कमज़ोरी, नेतृत्व में कमी और BJP की मजबूत जमीनी रणनीति भी उतनी ही निर्णायक कारक थीं.
कुल मिलाकर, दोनों राज्यों के चुनाव इस बात को उजागर करते हैं कि धारणा, नैरेटिव-बिल्डिंग और पहचान की राजनीति किस तरह मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है. बंगाल में BJP की जीत इस बात को साबित करती है.
कांग्रेस के जीतने वाले ज्यादातर उम्मीदवार मुस्लिम, 5 राज्यों में दिखा एक जैसा ट्रेंड
हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के जीतने वाले उम्मीदवारों में मुस्लिम नेताओं की बड़ी हिस्सेदारी दिखी. असम में 19 में से 18 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते, जबकि केरल में 35 मुस्लिम विधायक चुने गए, जिनमें ज्यादातर यूडीएफ से हैं. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की दोनों सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीतीं और तमिलनाडु में भी एक मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहा. कुल मिलाकर, असम और केरल में मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत दर करीब 80 फीसदी रही.
हालिया विधानसभा चुनावों को लेकर सामने आए आंकड़ों में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिला है. असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम नेताओं की रही.
असम में 19 सीटों में 18 पर जीत
असम में कांग्रेस को मिली 19 सीटों में से 18 पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. पार्टी ने वहां 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 18 जीत गए, जबकि गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में सिर्फ एक ही जीत सका. कांग्रेस के सहयोगी राइजर दल को भी 2 सीटें मिलीं, जिनमें एक मुस्लिम उम्मीदवार और दूसरी सीट अखिल गोगोई ने जीती.
केरल में 35 मुस्लिम विधायक
केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में 35 मुस्लिम विधायक चुने गए, जिनमें से 30 कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन से हैं. इनमें 8 कांग्रेस और 22 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के विधायक शामिल हैं.
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दो सीटें मिलीं और दोनों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते.यहां कांग्रेस ने 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया,जो तृणमूल कांग्रेस के 47 उम्मीदवारों से ज्यादा है.तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से एक जीतने में सफल रहा.
मुस्लिम उम्मीदवारों का जीत प्रतिशत 80 रहा
सूत्रों का कहना है कि असम और केरल में कांग्रेस गठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत दर करीब 80 फीसदी रही. वहीं, पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल करते हुए 15 साल पुरानी टीएमसी सरकार को हटा दिया. असम में भी एनडीए तीसरी बार सरकार बनाने जा रहा है, जहां उसने 126 में से 102 सीटें जीतीं.
तमिलनाडु में अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि केरल में 10 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन फिर से सरकार बनाने जा रहा है.
केरल में भाजपा को तीन सीट
केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीन सीटें जीतकर राज्य में अपना सूखा खत्म किया, लेकिन कई सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही. मतगणना के बाद बीजेपी तिरुवल्ला, पालक्काड, मलमपुझा, अट्टिंगल, कासरगोड और मंजेश्वर सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. तिरुवल्ला में पार्टी के नेता अनूप एंटनी को 43,078 वोट मिले और वह करीब 10 हजार वोटों से हार गए, लेकिन यहां पार्टी का वोट शेयर पहले से बढ़ा है.
पालक्काड में वरिष्ठ नेता शोभा सुरेंद्रन को कड़े मुकाबले में यूडीएफ के रमेश पिशारोड़ी से करीब 13 हजार वोटों से हार मिली, हालांकि यहां भी बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा. अट्टिंगल में पी. सुधीर दूसरे स्थान पर रहे और उन्होंने भी पार्टी का वोट शेयर बढ़ाया.
वहीं मलमपुझा, कासरगोड और मंजेश्वर में बीजेपी उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन इन सीटों पर पार्टी अपने वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी नहीं कर पाई. कुल मिलाकर, बीजेपी ने सीटें भले कम जीती हों, लेकिन कई क्षेत्रों में अपने जनाधार को मजबूत करने के संकेत दिए हैं.
चुनाव नतीजों के अनुसार, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 140 में से 102 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की, जबकि सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ को 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा.
BJP-TMC छोड़ दो तो सिर्फ मुस्लिमों का दबदबा, बंगाल का यह समीकरण उलझा देगा दिमाग
बंगाल चुनाव 2026 में बीजेपी ने जीतकर ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर कर दिया है.जहां बीजेपी की जीत हिंदू वोटों के 64% ध्रुवीकरण पर टिकी है. आइए जानें कि इन दोनों को हटाकर किन मुस्लिमों ने बंगाल जीता.
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टीएमसी और बीजेपी के अलावा किन मुस्लिमों ने बंगाल चुनाव जीता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति के सबसे पुराने और मजबूत समीकरणों में से एक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है. 15 सालों से सत्ता के सिंहासन पर काबिज ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से बेदखल करते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया है. इस चुनाव ने न केवल सत्ता का हस्तांतरण किया, बल्कि बंगाल के सामाजिक और धार्मिक वोटिंग पैटर्न को भी एक नई दिशा दी है. जहां एक तरफ भाजपा ने हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पैठ को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया, वहीं दूसरी तरफ टीएमसी और भाजपा के द्वंद्व के बीच मुस्लिम मतदाताओं के बिखराव ने एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जो आने वाले समय में बंगाल की राजनीति को और अधिक जटिल बना देगी.
बीजेपी की जीत और हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण
इस बार चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि बंगाल में हिंदू मतदाताओं का झुकाव भाजपा की तरफ अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा. राज्य में 71 प्रतिशत हिंदू आबादी है, जिसमें से लगभग 63-64 प्रतिशत ने भाजपा को अपनी पसंद बनाया. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 57 प्रतिशत हिंदू वोट मिले थे, यानी इस बार करीब 7 प्रतिशत वृद्धि हुई है. इसी बढ़त ने भाजपा को 207 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचाया. पार्टी को राज्य में 46 प्रतिशत वोट शेयर मिला, जो ममता बनर्जी की पार्टी के 41 प्रतिशत से 5 प्रतिशत अधिक है. हिंदू वोटों के इस ध्रुवीकरण ने ममता बनर्जी का बंगाल की बेटी वाला कार्ड बेअसर कर दिया.
टीएमसी का गिरता ग्राफ और मुस्लिम वोट बैंक का सच
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस बार 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और मात्र 80 सीटों पर सिमट गई. टीएमसी ने इस चुनाव में 47 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जबकि भाजपा ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था. आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग 71 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी का साथ दिया. हालांकि, दिलचस्प तथ्य यह है कि 8 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने भाजपा को वोट दिया है,लेकिन अगर कुल मुस्लिम आबादी के अनुपात में देखें, तो यह मात्र 2 प्रतिशत के आसपास बैठता है. मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा ममता के पास रहने के बावजूद, हिंदू वोटों के भारी नुकसान ने उन्हें सत्ता से दूर कर दिया.
छोटे दलों की एंट्री और मुस्लिम वोटों में सेंधमारी
इस चुनाव में भाजपा और टीएमसी के अलावा मुस्लिम बहुल इलाकों में छोटे दलों ने जबरदस्त प्रभाव डाला है. कांग्रेस ने सबसे अधिक 70 मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारा था, और उसे जो दो सीटें मिलीं, वे दोनों ही मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीती हैं. वाम मोर्चे ने 29 और मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) ने 24 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. सबसे अधिक चौंकाने वाला प्रदर्शन हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) का रहा, जिसने 90 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. इन छोटे दलों और निर्दलीयों की मौजूदगी ने मुस्लिम वोटों को कई जगहों पर बांट दिया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ.
टीएमसी और भाजपा हटाकर बंगाल में मुस्लिमों का दबदबा
आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर इस चुनाव में एक बड़े फैक्टर बनकर उभरे. उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताया, बल्कि खुद दो अलग-अलग विधानसभा सीटों से जीत हासिल की. नोवदा सीट पर हुमायूं कबीर ने भाजपा के राणा मंडल को 27,943 वोटों से हराया. वहीं, रेजिनगर सीट पर उन्होंने और भी बड़ी जीत में भाजपा के बापन घोष को 58,876 वोटों से हराया. हुमायूं कबीर की इस जीत ने सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में अब मतदाता टीएमसी के अलावा अन्य विकल्पों को भी गंभीरता से देख रहे हैं.
कांग्रेस की साख बचाने वाले दो मुस्लिम चेहरे
बंगाल की राजनीति में हाशिए पर जा चुकी कांग्रेस पार्टी को इस बार सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दोनों ही सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों से आई हैं और दोनों ही विजेता मुस्लिम उम्मीदवार हैं. रानीनगर सीट से कांग्रेस के जुल्फिकार अली ने टीएमसी के दिग्गज अब्दुल सौमिक को 2,701 वोटों के करीबी अंतर से हराया. वहीं, फरक्का सीट पर कांग्रेस के मोताब शेख ने भाजपा के सुनील चौधरी को 8,193 वोटों से मात देकर अपनी सीट बचाई. ये नतीजे बताते हैं कि मालदा और मुर्शिदाबाद के कुछ हिस्सों में कांग्रेस का वजूद अभी भी मुस्लिम पहचान से जुड़ा हुआ है.
लेफ्ट और आईएसएफ के मुस्लिम विधायकों की मौजूदगी
वामपंथ का कभी गढ़ रहा बंगाल अब सिमट चुका है, लेकिन इस बार के नतीजों में एक मुस्लिम चेहरा सीपीएम की लाज बचाने में कामयाब रहा. दोमकल विधानसभा सीट से सीपीएम के मोस्ताफिजुर रहमान ने टीएमसी के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर को 16,296 वोटों के अंतर से हराकर जीत दर्ज की.दूसरी ओर,भांगड़ सीट पर इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) के नौशाद सिद्दीकी ने अपनी ताकत दिखाई.उन्होंने टीएमसी के शौकत मोल्ला को 32,088 वोटों के भारी अंतर से पराजित किया.सीपीएम और आईएसएफ का यह एक-एक विधायक भी मुस्लिम समुदाय से ही आता है,जो यह दर्शाता है कि तीसरे मोर्चे का अस्तित्व अब मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों पर टिका है.
धार्मिक ध्रुवीकरण और सत्ता परिवर्तन का सार
अगर हम टीएमसी और बीजेपी को छोड़ दें, तो बंगाल के इस चुनावी दंगल में जो भी अन्य दल या चेहरे जीत कर आए हैं,उनमें मुस्लिमों का दबदबा साफ दिखाई देता है.भाजपा की जीत का आधार पूरी तरह से हिंदू वोटों का एकीकरण रहा,जबकि टीएमसी के हारने की बड़ी वजह हिंदू वोटों का उससे छिटकना और मुस्लिम वोटों का कई छोटे दलों में बंट जाना रहा.पश्चिम बंगाल का यह नया समीकरण भविष्य की राजनीति के लिए बेहद उलझाने वाला है,क्योंकि यहां अब केवल दो विचारधाराओं की लड़ाई नहीं,बल्कि पहचान और समुदायों के बीच वोटों के बंटवारे का खेल शुरू हो चुका है.
Hindus United And Voted For Bjp In West Bengal Muslim Votes For Nda Only Two Percent
Opinion: बंगाल के मुस्लिमों से BJP को सिर्फ 2% वोट,हिंदुओं का भर-भरकर NDA को मतदान, जानें क्या कहते हैं आंकड़े
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद अब सबकी नजर आंकड़ों पर है। लोग जानना चाहते हैं कि इस चुनाव में भाजपा को कहां से कितने वोट मिले हैं। आंकड़े बताते हैं कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम समुदाय से मात्र 2 प्रतिशत वोट ही मिले हैं। जबकि हिंदू वोट की बात करें तो भाजपा को पिछली बार के मुकाबले 7 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले हैं।
पश्चिम बंगाल में भाजपा को बंपर जीत मिली है(फोटो- IANS)
पश्चिम बंगाल में BJP को 207 सीटें मिलीं, जबकि ममता बनर्जी की TMC 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। यह बात भी स्पष्ट है कि यहां ध्रुवीकरण हुआ और हिंदू वोटरों का झुकाव BJP की तरफ रहा। उसे करीब 46% वोट मिले, जबकि TMC को 41%।
आंकड़ों का खेल
बंगाल में करीब 71% हिंदू आबादी है और 27% मुस्लिम। TMC ने 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे,जबकि BJP ने एक भी नहीं। चाणक्य टुडे के मुताबिक, 8% मुस्लिम वोटरों ने BJP को वोट दिया,जबकि 71% ने ममता को। अगर इस आंकड़े के हिसाब से देखें,तो इसका मतलब है कि मुस्लिम आबादी में से सिर्फ 2% ने BJP को चुना, जबकि हिंदू आबादी में से 63-64% ने। 2019 में BJP को 57% हिंदू वोटर्स का सपोर्ट मिला था यानी इस बार करीब 7% की वृद्धि और इसी ने जीत दिलाई।
सेकुलर बनाम सांप्रदायिक
विपक्षी पार्टियां BJP पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाती हैं। वहीं, BJP का आरोप है कि विपक्षी पार्टियां छद्म-धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करती हैं। विपक्ष मुस्लिम वोटर लुभाने को मुस्लिम उम्मीदवारों को वरीयता देता है, तो इसी तरह BJP का फोकस हिंदू उम्मीदवारों पर है। इसी कारण बंगाल में TMC के 31 मुस्लिम प्रत्याशी जीते हैं।
मुस्लिमों पर दांव
कांग्रेस ने 70 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी को जो दो सीटें मिलीं, दोनों मुस्लिम उम्मीदवारों ने दिलाईं। वाम मोर्चा ने 29 और मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट ने 24 मुस्लिमों को टिकट दिया था। हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) ने 90 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। दिलचस्प है कि हुमायूं की पार्टी से जीते दोनों उम्मीदवार, सीपीएम और इंडियन सेकुलर फ्रंट के एक-एक नवनिर्वाचित विधायक भी मुस्लिम ही हैं।
हिंदुत्व पर फोकस
राम मंदिर आंदोलन के दौरान से BJP का फोकस हिंदुत्व की राजनीति रहा है। पार्टी इसीलिए अमूमन मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव नहीं खेलती, क्योंकि उसे पता है कि तब भी वोट नहीं मिलेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त भी हिंदुत्व और विकास ही अजेंडा था, पर गठबंधन धर्म की वजह से उन पर काम नहीं हुआ। मोदी सरकार जब पूर्ण बहुमत से आई, तो राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे बाहर निकले।
मोदी का जवाब
नरेंद्र मोदी पर भी हिंदुत्व की राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। 2013 में एक इंटरव्यू में मोदी ने कहा था, ‘मैं देशभक्त हूं, राष्ट्रभक्त हूं। इस तरह से मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं।’ फिर वह कहते हैं, ‘मैं सेकुलर हूं, क्योंकि जाति और धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं करता।’ यह बात भी कल्याणकारी योजनाओं में भेदभाव नहीं करने से जुड़ी है।
वोटों का गणित
मुस्लिम आबादी में से सिर्फ 2% ने BJP को चुना
हिंदू वोटर्स का समर्थन पिछली बार से 7% ज्यादा
दूसरी पार्टियों के जीते ज्यादातर प्रत्याशी मुस्लिम
संघ का स्टैंड
हालांकि पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने रैली के दौरान कई बार कहा कि बंगाल में परिवर्तन नहीं हुआ तो सनातन धर्म खतरे में पड़ जाएगा। अक्सर कहा जाता है कि ध्रुवीकरण से BJP को फायदा होता है। यह नई बात नहीं है, पार्टी के पितृ संगठन RSS ने धर्म के नाम पर भारत के विभाजन का भी विरोध किया था।
कांग्रेस की हार
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक जमाने में बड़ी पार्टी होती थी और लेफ्ट के पहले लंबे वक्त तक उसका राज था। इस बार वह पार्टी सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई और दोनों जीते उम्मीदवार मुस्लिम हैं। वहीं, असम में कांग्रेस के 19 उम्मीदवारों की जीत हुई,जिसमें 18 मुस्लिम उम्मीदवार हैं। असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के दो कैंडिडेट जीते हैं और वो भी मुस्लिम हैं।
बाबरी का जिक्र
सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि चुनाव हिंदू-मुस्लिम हो गया। ममता बनर्जी पर पहले से मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे हैं। गौर करने की बात यह है कि अयोध्या में जिस विवादित बाबरी मस्जिद को लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर देश तक की राजनीति गरम हुई, उसी बाबरी मस्जिद को बंगाल में बनाने की चर्चा ने चुनाव के नैरेटिव को बदल दिया। ममता को क्या पता नहीं था कि इसका नुकसान होगा?
नुकसान का खतरा
ध्रुवीकरण की राजनीति से थोड़े समय को चुनावी लाभ मिल सकता है,लेकिन इससे समाज के विभिन्न वर्गों में दूरी बढ़ सकती है। यह चिंता की बात है। दीर्घकाल में देश की राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ेगी,जहां विकास, रोजगार और सुशासन जैसे मुद्दे निर्णायक होंगे और मतदाता नतीजों के आधार पर फैसले करेंगे। हालांकि सवाल है कि ऐसा कब होगा?
