विपक्ष की ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ ने भाजपा की कर दी आसानी

4 मई 2026 को घोषित पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 बाद यह विश्लेषण आया है कि विपक्ष की ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’  और अल्पसंख्यक वोट बैंक राजनीति ने भाजपा की चुनावी राह आसान बना दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की 206 सीटों की बड़ी जीत ने क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व को कड़ी चुनौती दी है।
भाजपा की राह आसान होने के प्रमुख कारण:
विपक्षी मतों का विभाजन:पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC),कांग्रेस और वामपंथी दलों में मुस्लिम वोट बंटवारे ने भाजपा की जीत का रास्ता साफ किया। मुस्लिम मतदाता बहुल सीटों पर TMC और अन्य विपक्षी दल आपस में उलझे रहे, भाजपा ने गैर-मुस्लिम वोट एकजुट करने में सफलता पाई।
हिंदू मत ध्रुवीकरण:भाजपा ने ‘हिंदू’ और विकास नैरेटिव पर ध्यान केंद्रित कर खासकर सीमावर्ती जिलों में,हिंदू वोट तेजी से समेकित किये। इस रणनीति से,मुस्लिम बहुसंख्यक सीटों पर भी भाजपा ने टीएमसी का किला भेद दिया।
मुस्लिम तुष्टीकरण नैरेटिव: भाजपा ने ममता बनर्जी सरकार पर कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के साथ-साथ ‘तुष्टीकरण’ के आरोप लगाए, जिसे मतदाताओं ने माना। चुनाव परिणाम बताते हैं कि केवल अल्पसंख्यक वोट बैंक के भरोसे चुनाव जीतना अब मुश्किल है।
असम में भी समान पैटर्न: असम में भी,कांग्रेस का मुस्लिम मतदाताओं पर अति-निर्भरता (18 में से 18 मुस्लिम विधायक) और टीएमसी के ‘कॉकटेल ऑफ हिंदुत्व एंड वेलफेयरिज्म’ के सामने न टिक पाना,भाजपा की तीसरी बार सरकार बनाने का मुख्य कारण बना।
बंगाल में 27% मुस्लिम वोट निर्णायक:राज्य में 27% मुस्लिम आबादी होने पर भी, भाजपा का अपनी आक्रामक हिंदुत्व नीति और जमीनी संगठन के दम पर, 2021 के 77 सीटों के आंकड़े से आगे बढ़कर 200+ सीटें पाना दर्शाता है कि ध्रुवीकरण की राजनीति का लाभ भाजपा को मिला।
संक्षेप में, कह सकते है कि 2026 में विपक्ष की मुस्लिम केंद्रित राजनीति भाजपा को ‘बूस्टर’ का काम कर गई, जिससे भाजपा न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि असम में भी अपने विरोधी मत बांटकर अपनी सत्ता मजबूत कर गई।

विपक्ष की ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ ने भाजपा का काम आसान कर दिया
विधानसभा चुनाव परिणामों ने बताया कि सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि मजबूत ‘नैरेटिव’ चुनाव जिताता है, केरल से लेफ्ट की विदाई और बंगाल में भाजपा के प्रवेश के पीछे के असली चुनावी और सामाजिक कारण चिंतनीय हैं।

पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों से देश में हलचल है. आखिर भाजपा ने बंगाल का अभेद्य किला कैसे ढहाया और असम में अपनी जड़ें और मजबूत कैसे कीं.’पहचान की राजनीति’ से लेकर ‘संगठनात्मक कमजोरी’ तक विश्लेषण बताता है कि क्यों बंगाल और असम की जमीन पर ‘तुष्टीकरण’ का मुद्दा विकास और क्षेत्रीय पहचान पर भारी पड़ गया.

असम और पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़त की एक महत्वपूर्ण कारण लगातार चलाया गया अभियान भी था, जिसमें TMC और कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों को खुश करने का आरोप लगाया गया.यह बात मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सही लगी और हर बार जब इन पार्टियों ने यह ज़ोर देकर कहा कि उनके लिए मुसलमानों के वोट मायने रखते हैं,तो असल में वे BJP के विस्तार को जमीन तैयार कर रही थीं.
असम में,पहचान,प्रवासन और नागरिकता से जुड़ी पुरानी चिंतायें राजनीतिक रूप से लामबंद की गयी, जिससे BJP को पारंपरिक जातिगत और क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर अपना समर्थन मजबूत करने का मौका मिला.
पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह का ध्रुवीकरण दिखा, जहां ममता बनर्जी के खिलाफ ‘चुनिंदा कल्याणकारी योजनाओं’ और ‘मुस्लिम समुदायों के प्रति झुकाव’ के आरोपों को चुनावी अभियान का मुख्य बिंदू बनाया गया.
असम विधानसभा में विपक्षी खेमे के विधायकों पर नज़र डालें, तो उनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या काफी ज़्यादा है.यह दो कारण साफ दिखाता है। पहला यह कि कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी काफी घनी है,और दूसरी यह कि इस समुदाय ने एकमुश्त विपक्ष को वोट दिया.
हालांकि, कांग्रेस और TMC की चुनावी असफलताओं को केवल तुष्टीकरण तक सीमित कर देना स्थिति बहुत ज़्यादा सरल बना देता है. संगठनात्मक कमज़ोरी, नेतृत्व में कमी और BJP की मजबूत जमीनी रणनीति भी उतनी ही निर्णायक थीं.
कुल मिलाकर, दोनों राज्यों के चुनाव बताते हैं कि धारणा, नैरेटिव-बिल्डिंग और पहचान की राजनीति किस तरह मतदाताओं का व्यवहार प्रभावित कर सकती है. बंगाल में BJP की जीत इसे सिद्ध करती है.

कांग्रेस के जीतने वाले ज्यादातर उम्मीदवार मुस्लिम, 5 राज्यों में दिखा एक जैसा ट्रेंड
चुनावों में कांग्रेस के जीते उम्मीदवारों में मुस्लिम नेताओं की बड़ी हिस्सेदारी दिखी. असम में 19 में से 18 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते, जबकि केरल में 35 मुस्लिम विधायकों में ज्यादातर यूडीएफ से हैं. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की दोनों सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीतीं और तमिलनाडु में भी एक मुस्लिम उम्मीदवार जीता. असम और केरल में मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत दर 80 प्रतिशत रही।

असम में 19 सीटों में 18 पर जीत
असम में कांग्रेस ने 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 18 जीत गए, जबकि गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में  एक ही जीता. कांग्रेस के सहयोगी राइजर दल को भी 2 सीटें मिलीं, जिनमें एक मुस्लिम उम्मीदवार और दूसरी सीट अखिल गोगोई ने जीती.

केरल में 35 मुस्लिम विधायक
केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में 35 मुस्लिम विधायकों में से 30 कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन से हैं. इनमें 8 कांग्रेस और 22 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के विधायक शामिल हैं.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दोनों सीटें मुस्लिम उम्मीदवार जीते.यहां कांग्रेस ने 63 मुस्लिमों को टिकट दिया,जबकि तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम टिकट 47 थे .तमिलनाडु में कांग्रेस के दो मुस्लिम उम्मीदवारों में से एक जीत गया।

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत पा 15 साल पुरानी टीएमसी सरकार हटा दी. असम में भी एनडीए तीसरी बार सरकार बना रही है, जहां उसने 126 में से 102 सीटें जीतीं.

तमिलनाडु में अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि केरल में 10 साल बाद सत्ता बदली और कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन फिर सरकार बना रहा है.
केरल में भाजपा को तीन सीट
केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीन सीटें जीतकर राज्य में अपना सूखा खत्म किया। तिरुवल्ला, पालक्काड, मलमपुझा, अट्टिंगल, कासरगोड और मंजेश्वर सीटों पर भाजपा दूसरे नंबर पर रही. तिरुवल्ला में पार्टी के नेता अनूप एंटनी को 43,078 वोट मिले और वह 10 हजार वोटों से हारे, लेकिन यहां पार्टी का वोट शेयर पहले से बढ़ा है.
पालक्काड में वरिष्ठ नेता शोभा सुरेंद्रन कड़े मुकाबले में यूडीएफ के रमेश पिशारोड़ी से करीब 13 हजार वोटों से हारे, हालांकि यहां भी भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा. अट्टिंगल में पी. सुधीर दूसरे स्थान पर रहे । उन्होंने भी पार्टी का वोट शेयर बढ़ाया.
मलमपुझा, कासरगोड और मंजेश्वर में भाजपा दूसरे स्थान पर रही, लेकिन इन सीटों पर पार्टी अपना वोट प्रतिशत  नहीं बढा पाई. भाजपा ने सीटें भले कम जीती, लेकिन कई क्षेत्रों में उसका जनाधार मजबूत होने के संकेत हैं.
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 140 में से 102 सीटें जीतकर बड़ी सफलता पाई, जबकि सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ को 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा.

BJP-TMC छोड़ दो तो सिर्फ मुस्लिमों का दबदबा, बंगाल का यह समीकरण उलझा देगा दिमाग

बंगाल चुनाव 2026 में भाजपा की जीत हिंदू वोटों के 64% ध्रुवीकरण पर टिकी है.

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति के सबसे पुराने और मजबूत समीकरणों में से एक पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. 15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से हटा भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटों से प्रचंड बहुमत पाया है. चुनाव ने न केवल सत्ता का हस्तांतरण किया, बल्कि बंगाल के सामाजिक और धार्मिक वोटिंग पैटर्न को भी एक नई दिशा दी है. एक तरफ भाजपा ने हिंदू मतदाताओं में अपनी पैठ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचायी, वहीं दूसरी तरफ टीएमसी और भाजपा के द्वंद्व में मुस्लिम मतदाताओं के बिखराव ने ऐसी तस्वीर दिखाई है, जो आगे बंगाल की राजनीति और अधिक जटिल बनायेगी.

भाजपा की जीत और हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण

इस बार चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि बंगाल में हिंदू मतदाताओं का झुकाव भाजपा की तरफ अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा. राज्य में 71 प्रतिशत हिंदू आबादी है, जिसमें से लगभग 63-64 प्रतिशत ने भाजपा को वोट किया. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 57 प्रतिशत हिंदू वोट मिले थे, यानि इस चुनाव में 7 प्रतिशत वृद्धि हुई . इसी बढ़त ने भाजपा को 207 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचाया. पार्टी को राज्य में 46 प्रतिशत वोट शेयर मिला, जो ममता बनर्जी की पार्टी के 41 प्रतिशत से 5 प्रतिशत अधिक है. हिंदू वोटों के इस ध्रुवीकरण ने ममता बनर्जी का बंगाल की बेटी वाला कार्ड बेअसर कर दिया.

टीएमसी का गिरता ग्राफ और मुस्लिम वोट बैंक का सच

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस बार 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और मात्र 80 सीटों पर सिमट गई. टीएमसी ने इस चुनाव में 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जबकि भाजपा ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया. आंकड़ों के विश्लेषण बताते है कि 71 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी का साथ दिया. हालांकि, दिलचस्प तथ्य यह है कि 8 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने भाजपा को वोट दिया है, कुल मुस्लिम आबादी के अनुपात में देखें, तो यह मात्र 2 प्रतिशत है. मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा ममता के पास रहने के बावजूद, हिंदू वोटों के भारी नुकसान ने उन्हें सत्ता से दूर कर दिया.

छोटे दलों की एंट्री और मुस्लिम वोटों में सेंधमारी

इस चुनाव में भाजपा और टीएमसी के अलावा मुस्लिम बहुल इलाकों में छोटे दल जबरदस्त प्रभावी रहे. कांग्रेस ने सबसे अधिक 70 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे, और उसे मिली दोनों सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीती. वाम मोर्चे ने 29 और मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) ने 24 मुस्लिमों टिकट दिया था. हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) ने 90 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे. इन छोटे दलों और निर्दलीयों ने मुस्लिम वोट कई जगहों पर बांट दिया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ.

टीएमसी और भाजपा हटाकर बंगाल में मुस्लिमों का दबदबा

आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर इस चुनाव में एक बड़े फैक्टर बने. उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के उम्मीदवार जिताये, बल्कि खुद दो अलग-अलग विधानसभा सीटों से जीते. नोवदा सीट पर हुमायूं कबीर ने भाजपा के राणा मंडल को 27,943 वोटों से हराया. वहीं, रेजिनगर सीट पर उन्होंने और भी बड़ी जीत में भाजपा के बापन घोष को 58,876 वोटों से हराया. हुमायूं कबीर की इस जीत ने सिद्ध किया कि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में अब मतदाता टीएमसी के अलावा अन्य विकल्प  भी गंभीरता से देख रहे हैं.

कांग्रेस की साख बचाने वाले दो मुस्लिम चेहरे

बंगाल की राजनीति में किनारे हो चुकी कांग्रेस को इस बार दो सीटों पर संतोष करना पड़ा है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ये दोनों ही सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों से  और दोनों ही विजेता मुस्लिम हैं. रानीनगर सीट से कांग्रेस के जुल्फिकार अली ने टीएमसी के दिग्गज अब्दुल सौमिक को 2,701 वोटों से हराया. वहीं, फरक्का सीट पर कांग्रेस के मोताब शेख ने भाजपा के सुनील चौधरी को 8,193 वोटों से हरा सीट बचाई. नतीजे बताते हैं कि मालदा और मुर्शिदाबाद के कुछ हिस्सों में कांग्रेस  अभी भी मुस्लिम पहचान पर निर्भर है.

लेफ्ट और आईएसएफ के मुस्लिम विधायकों की मौजूदगी

वामपंथ का गढ़ रहा बंगाल बदल चुका है, लेकिन इस बार  एक मुस्लिम चेहरा सीपीएम की लाज बचा गया. दोमकल विधानसभा सीट पर सीपीएम के मोस्ताफिजुर रहमान ने टीएमसी के बडे नेता हुमायूं कबीर को 16,296 वोटों से हराया.भांगड़ सीट पर इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) के नौशाद सिद्दीकी ने अपनी ताकत दिखा टीएमसी के शौकत मोल्ला को 32,088 वोटों के भारी अंतर से हराया.सीपीएम और आईएसएफ का एक-एक विधायक भी मुस्लिम ही है,जो दर्शाता है कि तीसरे मोर्चे का अस्तित्व अब मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों पर टिका है.

धार्मिक ध्रुवीकरण और सत्ता परिवर्तन का सार

टीएमसी और भाजपा को छोड़ दें, तो बंगाल के इस चुनावी दंगल में जो भी अन्य दल या चेहरे जीत कर आए हैं,उनमें मुस्लिमों का दबदबा साफ दिखता है.भाजपा की जीत का आधार पूरी तरह हिंदू वोटों का एकीकरण रहा, जबकि टीएमसी के हारने का बड़ा कारण हिंदू वोटों का उससे छिटकना और मुस्लिम वोटों का कई छोटे दलों में बंटना रहा.पश्चिम बंगाल का यह नया समीकरण भविष्य की राजनीति उलझायेगा,क्योंकि यहां अब केवल दो विचारधाराओं की लड़ाई नहीं,बल्कि पहचान और समुदायों के बीच वोटों के बंटवारे का खेल शुरू हो चुका है.

Hindus United And Voted For Bjp In West Bengal Muslim Votes For Nda Only Two Percent 

पश्चिम बंगाल में भाजपा को बंपर जीत मिली है(फोटो- IANS)

पश्चिम बंगाल में BJP को 207 सीटें और 46% वोट मिले, जबकि TMC को 41% वोट और 80 सीटें ।

आंकड़ों का खेल
बंगाल में 71% हिंदू आबादी है और 27% मुस्लिम। TMC ने 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे,BJP ने एक भी नहीं। चाणक्य टुडे के अनुसार, 8% मुस्लिम वोटरों ने BJP को वोट दिया,जबकि 71% ने ममता को। इन आंकड़ों से देखें,तो मुस्लिमों में से सिर्फ 2% ने BJP चुनी, जबकि हिंदू आबादी में से 63-64% ने। 2019 में BJP को 57% हिंदू वोटर्स का सपोर्ट मिला यानी इस बार 7% वृद्धि और इसी ने जीत दिलाई।
सेकुलर बनाम सांप्रदायिक
विपक्षी पार्टियां BJP पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाती हैं। BJP विपक्षी पार्टियों पर छद्म-धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का आरोप लगाती हैं। विपक्ष मुस्लिम वोटर लुभाने को मुस्लिम उम्मीदवारों को वरीयता देता है, तो BJP का फोकस हिंदू उम्मीदवारों पर है। इसी कारण बंगाल में TMC के 31 मुस्लिम प्रत्याशी जीते हैं।
मुस्लिमों पर दांव
कांग्रेस के 70 मुस्लिम प्रत्याशी थे। पार्टी को मिली दो सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों ने दिलाईं। वाम मोर्चा ने 29 और मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट ने 24 मुस्लिमों को टिकट दिया था। हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) ने 90 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे । हुमायूं की पार्टी से जीते दोनों उम्मीदवार, सीपीएम और इंडियन सेकुलर फ्रंट के एक-एक नवनिर्वाचित विधायक भी मुस्लिम ही हैं।
हिंदुत्व पर फोकस
राम मंदिर आंदोलन से BJP का फोकस हिंदुत्व की राजनीति रहा है। पार्टी इसीलिए अमूमन मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव नहीं खेलती, क्योंकि उसे पता है कि तब भी वोट नहीं मिलेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त भी हिंदुत्व और विकास ही अजेंडा था, पर गठबंधन धर्म से उन पर काम नहीं हुआ। मोदी सरकार पूर्ण बहुमत से आई, तो राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विषय बाहर निकले।
मोदी का जवाब
नरेंद्र मोदी पर भी हिंदुत्व की राजनीति का आरोप लगता रहा है। 2013 के इंटरव्यू में मोदी ने कहा था, ‘मैं देशभक्त हूं, राष्ट्रभक्त हूं। इस तरह मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं।’ फिर कहा, ‘मैं सेकुलर हूं, क्योंकि जाति और धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं करता।’ यह बात भी कल्याणकारी योजनाओं में भेदभाव नहीं करने से जुड़ी है।
वोटों का गणित
मुस्लिम आबादी में से सिर्फ 2% ने BJP चुनी
हिंदू वोटर्स का समर्थन पिछली बार से 7% ज्यादा
दूसरी पार्टियों के जीते ज्यादातर प्रत्याशी मुस्लिम
संघ का स्टैंड
हालांकि पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने रैली में कई बार कहा कि बंगाल नहीं बदला तो सनातन खतरे में होगा। कहा जाता है कि ध्रुवीकरण से BJP को फायदा है। यह नई बात नहीं, पार्टी के पितृ संगठन RSS ने धर्म के नाम पर भारत के विभाजन का भी विरोध किया था।
कांग्रेस की हार
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कभी बड़ी पार्टी थी और लेफ्ट के पहले लंबे वक्त उसका राज था। वह सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई और दोनों जीते उम्मीदवार मुस्लिम हैं। असम में कांग्रेस के जीते 19 उम्मीदवारों में 18 मुस्लिम हैं। असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के दो मुस्लिम कैंडिडेट जीते ।
बाबरी का जिक्र
सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि चुनाव हिंदू-मुस्लिम हो गया। ममता बनर्जी पर पहले से मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे हैं। अयोध्या में जिस विवादित बाबरी मस्जिद को लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर देश तक की राजनीति गरम हुई, उसी बाबरी मस्जिद को बंगाल में बनाने से चुनावी नैरेटिव बदल गया। ममता को क्या पता नहीं था कि इसका नुकसान होगा?
नुकसान का खतरा
ध्रुवीकरण की राजनीति से थोड़े समय चुनावी लाभ मिल सकता है,लेकिन इससे समाज के विभिन्न वर्गों में दूरी बढ़ती है। यह चिंतनीय है। दीर्घकाल में देश की राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ेगी,जहां विकास, रोजगार और सुशासन निर्णायक होंगा और मतदाता नतीजों के आधार पर फैसले करेंगे।  सवाल है कि ऐसा कब होगा?

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