‘ये बजट सबसे निराशाजनक’, RSS के BKS और BMS को पसंद नहीं आया केंद्रीय बजट

Bms Sharp Attack On Budget 2026 Neglect Of Workers Serious Questions On Social Security
ये बजट सबसे निराशाजनक’, RSS के भारतीय किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ को आखिर क्यों पसंद नहीं आया बजट?

​आरएसएस (RSS) से जुड़े संगठनों भारतीय किसान संघ (BKS) और भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने केंद्रीय बजट पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। BKS ने कहा कि बजट ‘किसान सम्मान निधि’ बढ़ाने और मशीनरी पर उच्च जीएसटी (GST) घटाने  जैसे वादे पूरा करने में विफल रहा। वहीं, BMS ने मुख्य श्रम और सामाजिक सुरक्षा मांगों की अनदेखी की आलोचना की, जिसमें गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम वेतन भी शामिल है। दोनों ने संशोधनों का आग्रह किया है।  भारतीय मजदूर संघ ने 2026-27 के बजट को श्रमिकों की आजीविका, वेतन और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से निराशाजनक बताया है। बजट में श्रम संहिता अधिसूचना और सेवानिवृत्त श्रमिकों की उपेक्षा पर बीएमएस ने चिंता जताई है, साथ ही ईपीएफ और ईएसआई की वेतन सीमा में वृद्धि न करने को भी चिंताजनक बताया है।
​ दूसरी ओर भारतीय किसान संघ (BKS ) ने विपक्ष और सरकार से आग्रह किया है कि कृषि समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए बजट में संशोधन किया जाए और किसान-हितैषी मांगों को शामिल किया जाए।
​देहरादून/नई दिल्ली 01 फरवरी 2026  : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध भारतीय किसान संघ (BKS) ने कहा कि केंद्रीय बजट किसानों से किए गए कुछ वादों को पूरा करने में विफल रहा है। रविवार को जारी एक बयान में, BKS ने कहा कि बजट सरकार के किसान-हितैषी इरादों पर खरा नहीं उतरता।
​संस्था ने विपक्ष और सरकार दोनों से अपील की कि वे पूरे किसान समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए किसान-हितैषी मांगों को शामिल करने के लिए बजट में संशोधन करें। संगठन ने कहा, “बजट सरकार के वादों को प्रतिबिंबित नहीं करता है।”
​संगठन ने रेखांकित किया कि 2018 में शुरू की गई ‘किसान सम्मान निधि योजना’, जिसमें किसानों को 6,000 रुपये दिए जाते हैं, एक अच्छी पहल है, लेकिन इसे बढाने की मांग थी,लेकिन नहीं बढाई गयी।
BKS के अखिल भारतीय महासचिव मोहिनी मोहन मिश्रा ने कहा, “यह चिंता का विषय है। सरकार के इरादे अच्छे हो सकते हैं, लेकिन बजट में वह दिखाई नहीं देते।”
​उन्होंने कहा, “छोटे किसानों की समस्याएं, कृषि मशीनरी पर उच्च जीएसटी, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की कमी, केसीसी (KCC) सीमा को 5 लाख रुपये तक बढ़ाने की घोषणा को लागू करने में विफलता, और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के घोषित लक्ष्य के बावजूद अपना जैविक उर्वरक बनाने वाले किसानों को डीबीटी (DBT) के माध्यम से प्रोत्साहन न मिलना चिंताजनक हैं।”
​उन्होंने चिंता जताई कि अतीत में किसानों के कल्याण को लेकर दिए गए बयानों की झलक बजट में नहीं मिली। उन्होंने कहा, “प्राकृतिक खेती को समर्थन देने को देश भर की सभी फसलों में रासायनिक अवशेषों के स्तर की निगरानी और नियंत्रण को बजट प्रावधान नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार जो कहती है वह बजट में नहीं दिखता।”​मिश्रा ने कहा कि BKS का मानना है कि जहां कुछ पहलू किसान-हितैषी हैं, वहीं संघ मांग करता है कि बजट चर्चा के दौरान सरकार और विपक्ष पूरे कृषि समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक चर्चा करें और बजट में संशोधन करें। उन्होंने कहा, “भारतीय किसान संघ की यही अपेक्षा है।”
​BKS ने बजट के कुछ पहलुओं की सराहना भी की और 500 ‘अमृत सरोवर’ के प्रावधानों, तटीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन को मजबूत करने और पशुपालन क्षेत्र में उद्यमिता को समर्थन देने को सकारात्मक कदम बताया।​

संगठन ने अंत में जोड़ा, “फसल विविधीकरण योजना में नारियल, काजू, कोको और चंदन जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा देना और ग्रामीण महिला समूहों को सशक्त बनाने को ई-मार्ट स्थापना भी अच्छी पहल है। आईसीएआर (ICAR) के माध्यम से किसानों को जानकारी प्रदान करने की विस्तार योजना को और अधिक परीक्षण की आवश्यकता है।”
​संघ के एक अन्य सहयोगी संगठन, भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने भी मुख्य श्रम और सामाजिक सुरक्षा मांगों की निरंतर उपेक्षा पर असंतोष और कड़ा रोष व्यक्त किया। एक बयान में कहा गया, “पीएफ (PF), ईएसआई (ESI) और बोनस की सीमा बढ़ाए बिना, श्रमिक सामाजिक सुरक्षा परिधि में नहीं आएंगे।”
​बयान में है कि , “आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील वर्कर्स जैसे स्कीम वर्कर्स के मानदेय में कोई वृद्धि न होना बेहद निराशाजनक है। उन्हें श्रमिक मान्यता देने और न्यूनतम वेतन एवं व्यापक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की लंबे समय से चली आ रही मांग को फिर नजरअंदाज कर दिया गया है, जो जमीनी स्तर पर महिला श्रमिकों के प्रति गंभीर उपेक्षा दर्शाता है।”
​मजदूर संघ ने इसे “सबसे निराशाजनक बजट” बताते हुए कहा, “BMS ने आज लोकसभा में पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 का आलोचनात्मक परीक्षण किया है। हालांकि यह बजट मौलिक तंत्र विस्तार, औद्योगिक विकास और बड़े पैमाने पर कौशल विकास से आर्थिक विकास को गति देने के सरकार के इरादे दर्शाता है, लेकिन यह श्रमिक वर्ग की सबसे जरूरी आजीविका और सामाजिक सुरक्षा चिंतायें दूर करने में विफल रहा है।”

भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने कहा है कि यूनियन बजट 2026-27 इस सरकार का अब तक का सबसे निराशाजनक बजट है। प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बीएमएस ने कहा है कि ये बजट इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, औद्योगिक विकास और कौशल निर्माण से आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है लेकिन श्रमिकों की आजीविका, वेतन और सामाजिक सुरक्षा के मौलिक विषयों की पूरी तरह उपेक्षा करता है।

बीएमएस ने कहा है कि बजट में टेक्सटाइल, मत्स्य पालन, एमएसएमई, पर्यटन, स्वास्थ्य, आयुष, पशुपालन और रचनात्मक (एवीजीसी) जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावना है लेकिन सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन बिना रोजगार को समावेशी विकास नहीं कहा जा सकता।

श्रम संहिताओं की अधिसूचना पर जताई चिंता
बीएमएस ने कहा कि श्रम संहिताओं की अधिसूचना और बैंकिंग क्षेत्र सुधार और “शिक्षा से रोजगार और उद्यम” पर उच्चस्तरीय समितियों का गठन भी चिंताजनक हैं क्योंकि श्रमिक-सुरक्षा के बिना सुधार अस्थिरता और असंगठितकरण को बढ़ावा देंगें।

भारतीय मजदूर संघ ने कहा कि बजट पूर्व बैठकों में बार-बार मूल श्रमिक सुधार के विषय उठाए गए लेकिन इसकी अनदेखी हुई। साथ ही कहा कि आंगनवाड़ी, आशा और मध्यान्ह भोजन कार्यकर्ताओं के मानदेय में किसी भी प्रकार की वृद्धि न होना भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और ये जमीनी स्तर पर कार्यरत महिला श्रमिकों के प्रति असंवेदनशीलता  है।

सेवानिवृत्त श्रमिकों की उपेक्षा का आरोप
भारतीय मजदूर संघ ने कहा कि बेहद कम पेंशन पर जीवन यापन कर रहे सेवानिवृत्त श्रमिकों की निरंतर उपेक्षा की गई है। साथ ही कहा कि ईपीएफ और ईएसआई के वेतन-सीमा (Wage Ceiling) में वृद्धि न होना अत्यंत चिंताजनक है। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक इन महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की परिधि से बाहर हो जाएंगें।

बीएमएस ने कहा है कि ई-श्रम जैसी पहल स्वीकार करते हुए भी, असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लगभग 90 प्रतिशत श्रमिकों के लिए समर्पित और पर्याप्त सुरक्षा कोष का अभाव इस बजट की एक गंभीर विफलता है। साथ ही आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन और एनपीएस में सार्थक सुधार पर बजट की चुप्पी से सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष है।

 

 

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