न वार,न हथियार… बस भू-राजनीति से ईरान से महाशक्ति अमेरिका लाचार

युद्ध छिड़ने से पहले होर्मुज से प्रतिदिन 135 जहाज आते-जाते थे. लेकिन ईरान की नाकाबंदी से 800 से ज्यादा जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हैं. लगभग 1000 जहाज आसपास के बंदरगाहों पर रास्ता खुलने की प्रतीक्षा में खड़े हैं.

  • मिडिल ईस्ट के युद्ध ने ईरान के हाथों ऐसा हथियार थमा दिया है, जो परमाणु बम से भी ज्यादा असरदार है
  • ईरान ने अपनी भू-राजनीतिक ताकत को न सिर्फ पहचाना बल्कि प्रभावी तरीके से इस्तेमाल भी किया
  • होर्मुज की चाबी ईरान के हाथों होने का ही नतीजा है कि ट्रंप को आखिर वार्ता की मेज पर लौटना पड़ा है

देहरादून 09 अप्रैल 2026 । न मिसाइलों के हमले, न आत्मघाती ड्रोन्स की बारिश और न ही कूटनीति, ईरान ने बस एक दुखती नस दबाई और दुनिया घुटनों पर आ गई. ईरान ने इसी का लाभ  उठा अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी दिखा दिया कि जब बात समंदर की हो तो हर बार सेना और हथियार ही काम नहीं आते. मिडिल ईस्ट की जंग ने ईरान के हाथों में होर्मुज ऐसा हथियार थमा दिया है, जो परमाणु बम से भी असरदार है. इसी हथियार का इस्तेमाल करके उसने दुनिया में ऊर्जा का सबसे बड़ा संकट पैदा कर अमेरिका को भी घुटनों पर ला दिया.

ईरान ने फुला दिया दुनिया का दम
40 दिनी इस जंग में ईरान का सबसे असरदार हथियार होर्मुज ही रहा. अमेरिका और इजरायल मिसाइलों, हवाई हमलों और ड्रोन्स की गिनती में उलझे रहे, वहीं ईरान ने ऐसी चाल चली जिसने आधुनिक युद्ध की परिभाषा ही बदल दी. ईरान ने इस जंग में पहली बार अपनी भू-राजनीतिक ताकत को न सिर्फ पहचाना बल्कि सफलतापूर्वक उसे सबसे प्रभावी हथियार बना प्रयोग भी किया. उसने होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी करके दुनिया का दम फुला दिया.

दुनिया की एनर्जी लाइफलाइन- होर्मुज
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है. ईरान और ओमान में मात्र 39 किलोमीटर चौड़े इस समुद्री रास्ते से दुनिया में तेल और गैस का 20 प्रतिशत व्यापार होता है. 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमले के तुरंत बाद ईरान ने इसे बंद कर दिया था. कई जहाजों ने कोशिश की तो ईरान ने हमले करके साफ संदेश दे दिया कि बिना उसकी इच्छा कोई होर्मुज पार नहीं कर सकता. अमेरिका भी पूरी कोशिश के बावजूद यह समुद्री रास्ता खुलवाने में विफल रहा.

800 से ज्यादा शिप समंदर में अटके
युद्ध छिड़ने से पहले होर्मुज के रास्ते रोज 135 जहाज तेल-गैस और अन्य सामान लेकर आते-जाते थे. लेकिन ईरान की नाकाबंदी ने शुरुआती दिनों में आवाजाही पूरी तरह ठप कर दी. इससे 800 से ज्यादा जहाज फारस की खाड़ी में फंस गए. केप्लर के आंकड़े बताते हैं कि होर्मुज में अभी भी 426 तेल टैंकर, एलपीजी से भरे 34 जहाज और नेचुरल गैस के 19 शिप अटके हैं. इसके अलावा 1000 से अधिक जहाज आसपास के बंदरगाहों पर रास्ता खुलने के इंतजार में खड़े हैं.

दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट
होर्मुज पर तालाबंदी ने दुनिया में तेल और गैस का भीषण संकट पैदा किया. न सिर्फ तेल-गैस बल्कि खाद, कृषि उत्पादों और अन्य खनिजों की सप्लाई भी चरमराई. दुनिया के तेल उत्पादन का 20 पर्सेंट और एलएनजी का 25 प्रतिशत उत्पादन ठप हो गया. तेल और गैस के दाम आसमान छूने लगे. कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट बताया है. IEA के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर फातिह बिरोल ने तो इस संकट को 1973, 1979 और 2022 के संयुक्त संकटों से भी अधिक घातक बताया.

कई देशों की आर्थिक रीढ़ पर चोट
युनाइडेट नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) की एक ताजा रिपोर्ट में आकलन है कि होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी ने क्षेत्र के कई देशों की आर्थिक कमर तोड़ दी. उनकी संयुक्त जीडीपी में 3.7 से 6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है.120 से 194 अरब डॉलर का यह अनुमानित घाटा कितना बड़ा है,इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि साल 2025 में क्षेत्रीय देशों ने जो जीडीपी ग्रोथ पाई थी,वो चौपट हो सकती है.न सिर्फ खाड़ी के देश बल्कि दुनिया के तमाम देशों में आर्थिक सुस्ती का खतरा मंडराने लगा था.

याहोर्मुज  नाकाबंदी सिर्फ आर्थिक चोट ही नहीं दे रही थी, बल्कि उसने मानवीय संकट भी पैदा कर दिया था. इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि मार्च के आखिर तक 20 हजार से अधिक नौसैनिक बीच समंदर फंसे हुए थे. ऊर्जा संकट से क्षेत्रीय देशों में ही 36 लाख नौकरियां खतरे में आ गईं. 40 लाख लोगों पर गरीबी का खतरा मंडराने लगा. यूएनडीपी का कहना था कि इस महासंकट के कारण क्षेत्रीय देशों को अपनी आर्थिक, वित्तीय, सामाजिक और कूटनीतिक नीतियों में बड़ा फेरबदल करने की नौबत आ रही थी.

तालाबंदी से ईरान मालामाल
रॉयटर्स का एनालिसिस कहता है कि इस जंग ने अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी. होर्मुज बंद होने से इराक और कुवैत जैसे देशों की तेल से कमाई तीन-चौथाई तक घट गई, वहीं ईरान का रेवेन्यू 37 % और ओमान की कमाई 26 प्रतिशत तक बढ़ गई.तेल की बढ़ी कीमतों ने सऊदी अरब का राजस्व 4.3 प्रतिशत तक बढ़ा दिया.साफ है कि ईरान का ये हथियार बहुत प्रभावी सिद्ध हुआ.होर्मुज के ताले की चाबी ईरान के हाथों होने का ही परिणाम है कि अमेरिका जैसी महाशक्ति को फिर कूटनीति की मेज पर लौटना पड़ा.

दोनों ‘भाई’ मिलकर वसूलेंगे टोल… होर्मुज पर ट्रंप का नया बयान, क्या करेगा ईरान?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से टोल वसूलने को अमेरिका-ईरान संयुक्त उद्यम  सुझाया है। ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया से कहा कि यह इसे सुरक्षित करने का एक तरीका है कई अन्य लोगों से भी इसे सुरक्षित रखने की जरूरत है।

होर्मुज के टोल पर ट्रंप की नजर। (फाइल)

  • ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य से टोल वसूली का सुझाव दिया।
  • अमेरिका-ईरान संयुक्त उद्यम के रूप में प्रस्ताव रखा।
  • ट्रंप ने इसे सुरक्षा का “खूबसूरत तरीका” बताया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सीजफायर के बाद बड़ा बयान देते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य जलमार्ग से टोल वसूलने को अमेरिका-ईरान ज्वॉइंट वेंचर सुझाया है।

अमेरिकी मीडिया से बात में ट्रंप ने कहा कि ‘हम इसे एक संयुक्त उद्यम के रूप में करने के बारे में सोच रहे हैं। यह इसे सुरक्षित करने का एक तरीका है। साथ ही इसे अन्य कई लोगों से भी सुरक्षित करना है। यह एक खूबसूरत चीज है।’

टैरिफ व प्रतिबंधों में राहत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते के सीजफायर की घोषणा के बाद बड़ा बयान देते हुए कहा है कि अमेरिका और ईरान अब मिलकर काम करेंगें और दोनों देशों के बीच टैरिफ व प्रतिबंधों में राहत को लेकर बातचीत जारी है।

ईरान-अमेरिका सीजफायर
ट्रंप ने बताया कि अमेरिका के ईरान को दिए गए 15 प्रस्तावों में से कई बिंदुओं पर सहमति बनी है, हालांकि उन्होंने ये बिंदू बताये नहीं। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि हम ईरान के साथ टैरिफ और प्रतिबंधों में राहत पर बातचीत कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगें।

वैश्विक बाजारों में भी सकारात्मक असर
सीजफायर की खबर पर ईरान में राहत का वातावरण दिखा है, वहीं वैश्विक बाजारों में भी सकारात्मक असर पड़ा है। हालांकि, दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद अभी भी सुलझे नहीं हैं और शांति समझौते को लेकर मतभेद बने हुए हैं।

ट्रंप की टैरिफ वॉरनिंग
ट्रंप ने चेतावनी दी कि जो भी देश ईरान को हथियार देगा, उसके अमेरिकी निर्यात पर 50% टैरिफ लगेगा। उन्होंने चीन और रूस पर इशारा करते हुए कहा कि इन देशों ने ईरान को मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य सैन्य तकनीक देकर उसकी क्षमता बढ़ाई है, हालांकि हाल के हमलों में उनका समर्थन सीमित रहा।

इस बीच, अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान का शीर्ष नेतृत्व साफ हो गया, जिनमें सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई भी शामिल हैं। तब उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता बनाया गया है।

ईरान ने अमेरिका को बना दिया पंगु! 40 दिनी युद्ध में अरब देशों में एक दर्जन बेस नष्ट 

ईरान के जवाबी हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. विशेषज्ञों का दावा है कि ये बेस अब सुरक्षा गारंटी की बजाय खतरा बन गए हैं. इस घटना ने अमेरिका की मध्य पूर्व रणनीति और खाड़ी देशों की सुरक्षा को पूरी तरह बदलकर रख दिया है.
ईरान ने मिडिल ईस्ट में कमोबेश एक दर्जन मिलिट्री साइट्स नष्ट कर दिए.

मध्य पूर्व में हाल के युद्ध ने शक्ति संतुलन का पूरा चित्र बदल दिया है. जहां कभी अमेरिका के सैन्य ठिकाने उसकी ताकत और प्रभाव का प्रतीक थे, अब वही बेस उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन रहे हैं. ईरान के जवाबी हमलों ने सऊदी अरब, UAE, कतर और बहरीन जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है.

विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कम से कम एक दर्जन सैन्य ठिकाने इतने बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि अब उनका उपयोग भी मुश्किल है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहले ही बताया था कि हमलों से अमेरिकी एयरबेस इस्तेमाल करने योग्य भी नहीं हैं. हालांकि ट्रंप प्रशासन ने अब तक नुकसान की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है.

मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट की मानें तो जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मिडिल ईस्ट पॉलिटिक्स प्रोजेक्ट के डायरेक्टर ने बताया कि, “यह अमेरिका की ताकत का पूरा ढांचा था, जिसे ईरान ने एक महीने में बेकार कर दिया.” उनका मानना है कि असली नुकसान की तस्वीर अभी भी सामने नहीं आई है.

सऊदी-UAE से कतर तक अमेरिका एयरबेस का बुरा हाल

अरब के जिन देशों में ये बेस मौजूद हैं, जैसे कि बहरीन, सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, कुवैत और कतर में इन ठिकानों तक पहुंच बेहद सीमित कर दी गई है. जंग के दौरान इन देशों ने अपने आसमान में मिसाइलों की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग पर भी रोक लगा दी थी, जिससे यह सवाल भी उठे कि क्या वे इन ठिकानों की असली हालत छिपाना चाहते थे.

ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट के हेडक्वार्टर को निशाना बनाया था, कभी अमेरिका की समुद्री ताकत का केंद्र माना जाता था, अब खुद खतरे में है. विशेषज्ञ कहते हैं, “ऐसा नहीं लगता कि हम कभी पहले की तरह वहां अपनी फिफ्थ फ्लीट को वापस रख पाएंगे. यह अब बहुत ज्यादा असुरक्षित हो चुका है.”

खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में मजबूत की पकड़

असल में, अमेरिका का यह सैन्य नेटवर्क 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद मजबूत हुआ था. तब से लेकर अब तक करीब 19 बड़े सैन्य ठिकाने इस क्षेत्र में बनाए गए, जहां लगभग 50,000 सैनिक तैनात रहते हैं. कहा जाता है कि इससे खाड़ी देशों को सुरक्षा मिलती थी और इसके बदले अमेरिका को तेल और मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने में मदद मिलती थी.

लेकिन अब यह समीकरण टूटता दिख रहा है. रिपोर्ट में एक एक्सपर्ट ने बताया, “जब इस तरह के समझौते में एक पक्ष को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होने लगे, तो वह रिश्ता कमजोर पड़ने लगता है.” जंग के दौरान खाड़ी देशों को अपनी एयर डिफेंस क्षमता पर भारी दबाव झेलना पड़ा, एयरपोर्ट और स्कूल बंद करने पड़े और यहां तक कि उनके ऊर्जा ढांचे पर भी हमले हुए.

एक विशेषज्ञ ने बताया कि अब ये सैन्य ठिकाने सुरक्षा देने के बजाय हमलों का निशाना बन गए हैं. उन्होंने कहा, “ये बेस ईरानी हमलों को रोकने के बजाय खुद उन्हें आकर्षित करने लगे हैं. इससे अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा टूटता दिख रहा है.” इस पूरी घटना का एक बड़ा असर यह हो सकता है कि खाड़ी देश अब अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाशें.

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