सबरीमला:आस्थाहीन कैसे चुनौती दे सकते हैं परंपरा को? सुको का केंद्र से प्रश्न

‘जो भगवान अयप्पा के भक्त नहीं वो सबरीमला की परंपरा को कैसे दे सकते हैं चुनौती…’, SC का केंद्र से सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मंदिर विवाद पर नौ जजों की बेंच ने धर्म और कानून के बीच बहस जारी रखी. केंद्र सरकार से सवाल पूछे गए कि गैर-भक्त कैसे मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले में सुनवाई जारी है

नई दिल्ली,08 अप्रैल 2026। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला विवाद और धर्म बनाम कानून को लेकर बहस जारी है. बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन रहा, जहां नौ जजों की बड़ी बेंच इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही है. दिनभर चली इस बहस में पक्ष-विपक्ष से तमाम दलीलें पेश की गईं और तर्क रखे गए. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल किया कि जो लोग भगवान भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के सबरीमला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं?

बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन रहा
नौ जजों की इस पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.

कौन थे सबरीमला के मूल याचिका कर्ता
सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सात सवाल तय किए हैं. इनमें एक अहम सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर उस संप्रदाय की प्रथा को चुनौती दे सकता है. सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि सबरीमला मामले में मूल याचिकाकर्ता कौन थे? उन्होंने कहा, “आपकी दलील से यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं थे. किसी भी भक्त ने इस प्रथा को चुनौती नहीं दी. फिर ये याचिकाकर्ता कौन हैं?”इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन नामक वकीलों का संगठन है. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “वे भक्त नहीं हैं. स्पष्ट करें कि क्या भगवान अयप्पा का कोई भक्त इस मामले में रिट याचिका दाखिल कर सकता है? अगर कोई गैर-भक्त, जो इस मंदिर से जुड़ा नहीं है, चुनौती देता है, तो क्या अदालत ऐसी याचिका स्वीकार कर सकती है?”

उन्होंने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट में अगर किसी एसोसिएशन की ओर से मुकदमा दायर किया जाता है, तो सबसे पहले सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत यह देखा जाता है कि क्या उसमें कोई कारण (cause of action) है या नहीं. यदि कारण नहीं है, तो याचिका खारिज कर दी जाती है.

PIL स्वीकार करने में सतर्क हो गई हैं अदालतें
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे मामलों में उन्होंने अक्सर ‘ज्यूडिशरी सिस्टम के इनविजिबल विक्टिम’ टर्म का इस्तेमाल किया है. तुषार मेहता ने इसे ‘मौन बहुमत और मुखर अल्पसंख्यक के बीच की लड़ाई’ बताया. उन्होंने कहा कि जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत Bandhua Mukti Morcha v. Union of India जैसे मामलों में हुई थी, जब आम लोगों के पास अदालत तक पहुंच के साधन नहीं थे. अब ई-फाइलिंग जैसी सुविधाओं के कारण कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक पहुंच सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि आज कई PIL ‘मोटिवेटेड’ होती हैं और इनके पीछे अन्य लोग होते हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें खुद भी PIL स्वीकार करने में काफी सतर्क हो गई हैं. ‘हमने इसके लिए मानदंड तय किए हैं और हर दिन हम यह जांचते हैं कि याचिका में वास्तविक मुद्दा है या नहीं. उन्होंने जोड़ा कि 2006 से 2026 तक के दौरान स्थिति बदली है और अब अदालत ज्यादा सावधानी बरतती है,.

लैंगिक समानता,समलैंगिकता से व्यभिचार तक आये चर्चा में

सुप्रीम कोर्ट में धर्म और कानून के टकराव से जुड़े मामले की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जेंडर इक्वालिटी और संवैधानिक नैतिकता पर सवाल उठाए और कहा कि कई फैसलों में पश्चिमी दर्शन का प्रभाव है, जबकि भारतीय समाज की अपनी अलग सोच है.

सुप्रीम कोर्ट में धर्म और कानून के टकराव से जुड़े महत्वपूर्ण मामले पर सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जेंडर इक्वालिटी और संवैधानिक नैतिकता पर कई बड़े सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता से जुड़े कई फैसलों में “पश्चिमी दर्शन” का प्रभाव साफ दिखता है, जबकि भारतीय समाज और परंपराओं की अपनी अलग दृष्टि है.

सबरीमला मामले में सुनवाई का दूसरा दिन
असल में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच ‘सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश’ विषय को लेकर सुनवाई कर रही है. खास बात है कि यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई धार्मिक-सामाजिक विषय भी जुड़े हुए हैं. आज इस सुनवाई का दूसरा दिन था.

सरकार से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा. बहस में ही यह विषय ‘संवैधानिक और सामाजिक नैतिकता’ की ओर मुड़ गया, जहां एक के बाद एक पुराने मामलों के उदाहरण रखे गए.

कानून पर पश्चिमी दर्शन का असर
एसजी तुषार मेहता ने इस पर अपना पक्ष रखा कि, अदालतों के कई फैसलों में ‘पश्चिमी दर्शन’ का प्रभाव दिखता रहा है. इन मामलों में कानून की निर्भरता वेस्ट के विचार हैं, जबकि ऐसे मामलों में भारतीय दृष्टि बिल्कुल अलग है. एसजी ने इस बीच व्यभिचार (Adultery) और धारा 377 से जुड़े फैसलों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि 5 जजों की ‘नैतिकता’ से सामाजिक बदलाव तय नहीं होने चाहिए.

सुनवाई में तुषार मेहता ने कहा कि जेंडर इक्वालिटी से जुड़े कई फैसलों में पश्चिमी सोच का असर दिखता है. उन्होंने उदाहरण दिया कि व्यभिचार को अपराध से मुक्त करने और धारा 377 निरस्त करने जैसे फैसले भारतीय दर्शन के बजाय विदेशी विचारों से प्रभावित लगते हैं.

एसजी ने अमेरिकी अदालत का एक उदाहरण दिया कि वहां भी यह सवाल उठा था- ‘क्या हम खुद को सामाजिक सुधारक समझते हैं?” उनका तर्क था कि न्यायपालिका को सीमित परिधि में रहकर काम करना चाहिए और बड़े सामाजिक बदलाव तय करना उसका काम नहीं होना चाहिए.

क्या बोले CJI?
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 9 जजों की यह संविधान पीठ प्रतिनिधित्व की दृष्टि से संतुलित है और इस पर ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी कहा कि इस पीठ को ‘गैर-प्रतिनिधिक’ नहीं कहा जा सकता.

सीजेआई ने कहा कि कई बार जब देश में उदाहरण नहीं मिलते, तो विदेशी अदालतों के फैसलों का सहारा लिया जाता है, लेकिन उनका महत्व केवल प्रेरणा लेने तक ही सीमित होता है. इस पर एसजी ने जवाब दिया कि हमें पश्चिमी विचारों को सम्मान के साथ देखना-सीखना चाहिए, लेकिन अपनी जड़ें नहीं भूलनी चाहिए. इस पर जस्टिस बागची ने भी टिप्पणी की कि अच्छी बातें दुनिया के किसी भी हिस्से से ली जा सकती हैं.

एसजी तुषार मेहता ने जोर दिया कि जब कोई व्यक्ति किसी प्रथा को अपनी धार्मिक आस्था बताता है, तो उसे गलत साबित करने की जिम्मेदारी विरोध करने वालों की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह तय करना कि कोई प्रथा वास्तव में धार्मिक है या नहीं, यह ‘तथ्य का प्रश्न’ है, जिसके लिए प्रमाण और शपथ-पत्र की जरूरत होती है. ऐसे मामलों का समाधान रिट याचिका से नहीं बल्कि सिविल मुकदमे से होना चाहिए.

उनके अनुसार, धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा सीमित होनी चाहिए, खासकर “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice) तय करने के सवाल पर.

बहस में उठा व्यभिचार पर फैसले का विषय
सुनवाई में जजों ने व्यभिचार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता विषय पर भी सवाल उठाए. जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि व्यभिचार अपराध नहीं है, तो क्या तलाक में इसे आधार मानना गलत होगा? जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि क्या ‘शारीरिक स्वायत्तता के आधार पर व्यभिचार’ पूरी तरह वैध माना जा सकता है?

इस पर एसजी ने कहा कि यही ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘सामाजिक नैतिकता’ के बीच का फर्क है. उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस स्कालिया का हवाला देते हुए अपना तर्क रखा.

बहस में यह भी सामने आया कि अदालतों में असहमति (Dissent) का भी बड़ा महत्व होता है. जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई बार असहमति वाले फैसले भविष्य को मार्गदर्शक बनते हैं. एसजी ने भी माना कि असहमति आने वाली पीढ़ियों को विचार का स्रोत होती है.

क्या है सबरीमला का विवाद
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था. इसके बाद 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3:2 के बहुमत से इस विषय को बड़े संविधान पीठ के पास भेज दिया. अदालत ने तब विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक सवाल तय किए थे, जिन्हें तथ्यों के आधार पर ही अंतिम रूप से तय किया जा सकता है.

 

 

 

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