इतिहास:इंद्रप्रस्थ को दिल्ली नही ढिल्लिकापुरी कहिये
अपने गौरवशाली नगर #इंद्रप्रस्थ को दिल्ली नही #ढिल्लिकापुरी कहिये ।
इंद्रप्रस्थ यहाँ के जर्रे जर्रे में है। इंद्रप्रस्थ के आँचल में ढिल्लिकापुरी पूरी आयी । इंद्रप्रस्थ पांडवो का नगर।
आज भी अगर आप महरौली के क्षेत्र में जाएंगे तो डीडीए
के जो राजस्व रेकॉर्ड है उनमें परगना जो है, वो इन्द्रप्रथ है। इन्द्रप्रथ उन पाँच गांवों में हैं, जिनमें तिलपथ है , पानीपथ है , सोनिपथ है , बागपथ है ,वरूपथ है। (इस्लामी पत नही सनातन पथ। )
जी हाँ वही पांच गांव जो पांडवों ने दुर्योधन से मांगा था।
तो इंद्रप्रस्थ आज भी विद्यमान है।। परंतु नाम आज हम देल्ही लिखते हैं। जब हम देल्ही लिखते हैं तो हमे लगता है कि कोई अंग्रेज आया होगा देल्हाई !कुछ ऐसा ही रहा होगा। या कोई इस्लामिक मुगलिया नाम !
दुर्भाग्य से हमे हमारी वामपंथी पाठ्यक्रम ने, व हमारी उसप्रकार की शिक्षा ने हमे कभी बताया ही नही की दिल्ली के संस्थापक थे
महाराजा अनंगपाल तोमर द्वितीय।
तो ये दिल्ली का वास्तविक नाम ढिल्लिकापुरी लेकिन कहाँ से आया?
यह जानने के लिए हमे पहुंचना होगा उस जगह जिसे आज दुर्भाग्य से कहा जाता कुतुब कॉम्प्लेक्स !
लेकिन वह विष्णुस्तम्भ कॉम्प्लेक्स है।
जहाँ लालकोट का किला बना ,जहाँ पर सत्ताईस विष्णु जैन मंदिर भव्यता से खड़े थे । और जिनका उल्लेख 11वी शताब्दी से लेकर 15वी शताब्दी के बीच दिल्ली के हर पत्थरों – शिलालेखों के ऊपर संस्कृत के अभिलेखों में मिलता है ,
कि -ढिल्लिकापुरी नगरस्य ..!
स्वर्ग जैसी अनुपम है जिसे सम्राट अनंगपाल तोमर ने बसाया था।
आश्चर्य की बात है कि हमे तो कभी किसी ने कहा ही नही की दिल्ली जो हैं वह किसी और ने बसाया होगा! हम तो जब देखते हैं तो बाबर देखते हैं , लोदी देखते हैं ,औरंगजेब देखते हैं , तुगलक देखते हैं, खिलजी देखते हैं. ;!
पुरातत्व विभाग के फार्मर एडिशनल डायरेक्टर जेनरल और नेशनल म्यूजियम के पूर्व महानिदेशक विश्व विख्यात पुरातत्व विशेषज्ञ श्री बी आर मणि ने पुरात्तव विभाग के ओर से 92 से 95 के बीच उत्खनन किया तो मिला अनंगताल…!
एक बेहद सुंदर झील।
उसका पूरा सर्वे कर उन्होंने जो नक्शा दिखाया वह मंत्रमुग्ध करने वाला था।
उसके अंर्तगत सम्राट अनंगपाल ने बनाया अनंगपुर डैम अनंगपुर गांव , और बसाया लालकोट। वे विष्णुस्तम्भ लेकर आएं जिसे लौहस्तंभ भी कहते हैं। उस स्तम्भ के शिखर पर अनंगपाल सम्राट की प्रशस्ति लिखी हुई है। उन्होंने अपने साम्राज्य की स्थिरता के लिए इस स्तम्भ को गाड़ा। कुछ संशय होने पर उन्होंने यह देखने के लिए कि यह कहाँ तक गया है उन्होंने पुनः उसे उखाड़ा तो देखा की यह शेषनाग के शिखर तक गया है..!
(जैसा कि हम मानते हैं कि पृथ्वी को शेषनाग ने थामा है। वैज्ञानिक भाषा मे इसे भुचुम्बकत्व कहते हैं । अर्थात हजारों मैग्नेटिक वेब्स जिसकी वजह से टेक्टोनिक प्लेट हैं जिनसे भूपपर्टी का निर्माण हुआ । यही भुचुम्बकत्व की स्थिरता के बिगड़ने से भूकंप आता है। यही शेषनाग का हिलना है। )
तो सम्राटअनंगपाल ने डरते हुए उसे पुनः गाड़ा और वह संयोग से ढीला हो गया।
तो लोगो ने कहा कि राजा साहब यह तो ढीला रह गया.;!
तो नगर का नाम ढिल्लीकापूरी हो गया।
सभी पत्थरों ,किताबों ,संस्मरणों पर ढिल्लीकापूरी का नाम अंकित है। पुरातत्व विभाग के जनक माने जाने वाले तब के अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी इसकी पुष्टि की।
वायसराय पैलेस जिसे हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं उसके पास एक गांव था (शायद सरवन ) वहां पर जब खुदाई हुई तो जो शिलालेख निकले वह आज भी पुराने किले की म्यूजियम में रखे हैं उन पत्थरों पर स्पष्ट रूप से जो नाम उत्कीर्ण हैं वह है ढिल्लिकापुरी ।
पालम , नारायणा में जो खुदाई हुई वहाँ के शिलालेखों में भी ठीक वही तथ्य।
15वी शताब्दी में संस्कृत का प्रचलन था दिल्ली में।
किसी ने तालाब बनवाई , हवेली ,मंदिर बनवाई , किसी ने दान दिया , तो वहाँ पर शिलालेख लगा देते थे की कौन हैं , कहाँ से आये , किससे विवाह हुआ , कितने संतान हैं , क्या योगदान है किस नगर में हैं !
तो ढिल्लिकापुरी में है।
ढिल्लिकापुरी बाद में ढिल्ली होती गयी।
बाद में जैसे अंग्रेजों ने बेंगलुरू को बंगलोर कर दिया ,
तो ढिल्ली को देल्हाई कर दिया यानी delhi ।
तो हमे लगा कि ये तो बड़ा ब्रिटिश नेम है..!
तो सारे प्रमाण हैं!
बस जमी धूल किसी ने नही झाड़ी!!!
ये वही विडम्बना है कि किसी पुस्तक में यह नही पढ़ाया जाता कि आर्य कभी बाहर से नही आये , कभी भारत पर आक्रमण नही किया !
अब स्वयम देखिए रखीगार्ही (राखीगढ़ी) तो मिल गयी!
हरियाणा में जो मोहनजोदड़ो से इतनी बड़ी दोगुनी पुरात्विक स्थली है , वहाँ हड़प्पा कालीन अवशेष मिले हैं और वहाँ पर प्रोफेसर वसंत शिंदे तथा पुरात्तव विभाग के अधिकारियों ने यह सिद्ध किया।
उसके अंतर्गत उन्होंने डीएनए टेस्ट करवाया डीएनए में मिला कि आर्य तो यहीं के थे ! जो आज भी हरियाणा में व्यक्ति हैं , आज भी वहाँ की आकृतियां हैं , वह हूबहू वहीं हैं जो हड़प्पन आकृति है।
खैर , जब मूल भारतीय आर्यों की पूरी सच्चाई पुस्तकों में नही पढ़ाई गयी तो ढिल्लिकापुरी अगर नही पढ़ाई गयी तो आश्चर्य नही है।
आश्चर्य तो यह है कि आज भी इसका पता चल गया.!!!
और भारत की नरेंद्र मोदी सरकार इस विषय को लेकर आगे बढ़ रही है।
इतिहास पर जमी धूल हटनी चाहिए..!
वे लोग जिन्होंने इतिहास पर कब्जा करके पूर्वाग्रह से युक्त हो शासकों की दृष्टि से , आक्रमणकारियों की दृष्टि से इतिहास लिखा…!
औपनिवेशिक दास मानसिकता के प्रचार-प्रसार से इतिहास लिखा उनका एक ही उद्देश्य था कि हमारी स्मृतियों से हमारे पूर्वजों का गौरव सदा के लिए लुप्त हो जाये ! हम यह मानकर चले कि हमारे पूर्वज तो अनपढ़ थे , और जो भी वैज्ञानिक, सांस्कृतिक ,आर्थिक , आधारभूत विकास हुआ वह अंग्रेजों व मुगलों की देन है , जबकि है ठीक इसका उल्टा।
