क्या हो गई कांग्रेस और क्या होगी अभी?

जब राहुल गांधी लगभग एक वर्ष के थे, उस दौर में कांग्रेस पार्टी के पास देशभर में करीब 2194 विधायक थे।
आज, जब राहुल गांधी 55 वर्ष के हो चुके हैं, कांग्रेस के पास सिमटकर लगभग 640 विधायक रह गए हैं।
यह गिरावट किसी एक चुनाव की नहीं है,
यह दशकों की राजनीतिक दिशा, नेतृत्व और रणनीति की असफलता का परिणाम है।
यही कारण है कि आज यह कहा जा रहा है कि पार्टी अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है। सवाल यह नहीं कि कांग्रेस क्यों हार रही है
सवाल यह है कि राहुल गांधी किस तरह की राजनीति कर रहे हैं।
संसद का बहिष्कार या सोची-समझी रणनीति?
हाल के समय में कांग्रेस समर्थकों द्वारा यह प्रचार किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “महिला सांसदों से डरकर” सदन में नहीं आए।
यह आरोप सुनने में जितना सरल लगता है, उसके पीछे का राजनीतिक संदर्भ उतना ही गंभीर है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि उस दिन संसद के भीतर अराजकता को एक बड़े सामाजिक टकराव में बदलने की आशंका थी।
सूचना यह थी कि यदि स्थिति बिगड़ती, तो उसे ब्राह्मण बनाम दलित जैसे संवेदनशील नैरेटिव में बदलने की कोशिश हो सकती थी।
इसी आशंका के चलते मामला लोकसभा अध्यक्ष तक पहुँचा और संभावित टकराव को टालने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए।
सिख समुदाय से टकराव और बढ़ता आक्रोश
कुछ समय पहले राहुल गांधी द्वारा एक सिख सांसद पर की गई टिप्पणी ने भी बड़ा विवाद खड़ा किया था।
उस बयान को सिख समाज के एक बड़े वर्ग ने अपमानजनक और असंवेदनशील माना।
इस घटना के बाद यह साफ दिखा कि सिख समुदाय में नाराज़गी बढ़ रही थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही नाराज़गी राहुल गांधी के लिए एक नई चुनौती बन गई थी, और उसे संतुलित करने के लिए ध्यान भटकाने वाली राजनीति की राह अपनाई गई।
समाज को बाँटने की राजनीति का आरोप
आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व अब मुद्दों पर बहस करने के बजाय
समाज के भीतर जातीय और वर्गीय टकराव को हवा देने की रणनीति पर चल रहा है।
जब वास्तविक सवाल
आर्थिक नीतियाँ
संगठन की कमजोरी
नेतृत्व की विश्वसनीयता
इन पर जवाब नहीं होते,
तो बहस को हिंदू बनाम दलित, सामान्य बनाम आरक्षित, या एक जाति बनाम दूसरी जाति में मोड़ने की कोशिश की जाती है।
यह राजनीति न तो लोकतंत्र के लिए स्वस्थ है,
न ही देश की सामाजिक स्थिरता के लिए।
देश के भीतर “तीसरे मोर्चे” की चेतावनी
पूर्व CDS जनरल बिपिन रावत का वह कथन आज भी याद किया जाता है,
जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत को भविष्य में
तीन मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है—
पाकिस्तान
चीन
और तीसरा, देश के भीतर का आंतरिक संघर्ष
आज जब संसद से सड़क तक तनाव पैदा करने की कोशिशें दिखती हैं,
तो यह चेतावनी और भी प्रासंगिक लगने लगती है।

यह लेख किसी व्यक्ति से नफ़रत के लिए नहीं है,
बल्कि उस राजनीतिक दिशा पर सवाल है
जो देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने की ओर ले जाती दिख रही है।
आँकड़े बताते हैं कि कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ा है।
घटनाएँ बताती हैं कि हताशा बढ़ी है।
और बयानबाज़ी बताती है कि अब राजनीति आग से खेलने की दिशा में जा रही है।
लोकतंत्र में विरोध ज़रूरी है,
लेकिन अराजकता, समाज को बाँटना और संस्थाओं को कमज़ोर करना
यह किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
देश की राजनीति को मुद्दों पर लौटना होगा,
वरना इतिहास बहुत कठोर फ़ैसला सुनाता है।
🙏🏻
अभयंकर देशपांडे,,,,,

निशिकांत दुबे ने न केवल संसद में नकली गांधी परिवार पर खुलकर आरोप लगाए बल्कि मीडिया के सामने भी जमकर निशाना साधा

ये व्यक्ति सही है या गलत — इस पर मतभेद हो सकता है।
लेकिन इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि इन्होंने देश की राजनीति में एक दबाई हुई बहस को सामने लाने का काम किया है।

“गांधी” उपनाम की आड़ में वर्षों से चली आ रही एक राजनीतिक पवित्रता पर सवाल खड़े हुए हैं। सवाल उठाना अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है।

अगर निशिकांत दुबे जी द्वारा कही गई बातें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, तो कांग्रेस पार्टी को कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए।
मानहानि का मुकदमा करने से उन्हें किसने रोका है?
मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल जैसे बड़े वकील आज इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं?

यह तर्क दिया जाता है कि संसद में कही गई बातों पर मुकदमा नहीं हो सकता — यह सही है।
लेकिन वही बातें संसद के बाहर, मीडिया के सामने भी दोहराई गईं।
फिर भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई — यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

देश के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी आज पुनः विचार की माँग करता है।
क्या वास्तव में आज़ादी की पूरी कहानी एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई?
क्या उन क्रांतिकारियों का योगदान जानबूझकर पीछे धकेला गया, जिन्होंने फाँसी, गोलियाँ और काला पानी झेला?

यह भी एक चर्चित तथ्य है कि जवाहरलाल नेहरू के अंग्रेज़ अधिकारियों से निजी और पारिवारिक संबंधों की चर्चा ऐतिहासिक स्रोतों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री में मिलती है।
यदि ऐसा था, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यह कैसी आज़ादी की लड़ाई थी, जिसमें सत्ता के केंद्र अंग्रेज़ों के विश्वासपात्र बने रहे?

इतिहास यह भी बताता है कि कांग्रेस के किसी प्रमुख नेता को न तो फाँसी दी गई, न ही काले पानी की सज़ा हुई।
इसके विपरीत, जिन लोगों ने सशस्त्र और वैचारिक रूप से अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दी — वही सबसे कठोर दंड के पात्र बने।

वीर सावरकर को “माफ़ीवीर” कह देना आसान है,
लेकिन असली प्रश्न यह है कि अंग्रेज़ों ने उन्हें आजीवन काले पानी की अमानवीय सज़ा क्यों दी?
उन्होंने ऐसा क्या किया था जिससे ब्रिटिश सत्ता उन्हें सबसे बड़ा खतरा मानती थी?
और यदि वे इतने ही “निरर्थक” थे, तो नेहरू या अन्य कांग्रेसी नेताओं को ऐसी सज़ा क्यों नहीं मिली?

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के चयन में सरदार पटेल को व्यापक समर्थन प्राप्त था।
फिर भी शून्य समर्थन वाले नेहरू प्रधानमंत्री कैसे बने?
क्या अंग्रेज़ी सत्ता को पटेल के बजाय नेहरू अधिक स्वीकार्य थे?

भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान का वितरण भी कई सवाल छोड़ जाता है।
एक ही परिवार के लगभग सभी सदस्यों को यह सम्मान मिला,
लेकिन सरदार पटेल, डॉ. भीमराव अंबेडकर, चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं को दशकों तक इससे वंचित क्यों रखा गया?

सच यह है कि “गांधी परिवार” के नाम पर लोकतंत्र को धीरे-धीरे वंशवाद में बदल दिया गया।
सत्ता को सेवा नहीं, बल्कि जागीर समझा गया।
संविधान, कानून और संस्थाओं को अपने अधीन मानने की मानसिकता विकसित की गई।

लेकिन समय बदल रहा है।
अब इतिहास केवल पढ़ाया नहीं जा रहा — बल्कि पढ़ा और समझा भी जा रहा है।
सच्चाई धीरे-धीरे जनता के सामने आ रही है।

अंततः सही और गलत का निर्णय किसी पार्टी या परिवार को नहीं,
बल्कि देश की जनता को करना है — और जनता अपना निर्णय कर भी रही है।

✍️✍️ शशिकांत शर्मा

 

 

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