गलत क्यों है केरल हाको की राय पादरी के मंदिर प्रवेश पर?

फैसला जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार की डिविज़न बैंच ने सुनाया। कोर्ट ने हिंदू त्योहार में मंदिर में पादरियों के प्रवेश को चुनौती देती रिट याचिका निरस्त कर दी।
कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा कि वह यह देखे कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप नियम, 1965 का नियम 3(ए) बनाए रखना चाहिए या धार्मिक हितधारकों से सलाह लेकर इसमें संशोधन होना चाहिए। इस पर हिंदुओं को सतर्क तो होना ही चाहिए।
मामला 7 सितंबर 2023 को अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर, पथानमथिट्टा जिले में श्रीकृष्ण जयंती के समारोह से उठा। मंदिर प्रशासन ने समारोह के हिस्से के रूप में आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में दो ईसाई पादरी आमंत्रित किये।सितंबर 2023 में ऑर्थोडॉक्स चर्च के पादरी डॉ. ज़ाचरियास मार अप्रेम का प्रवेश एक चर्चित
कार्यक्रम के बाद पादरियों को श्रीकोविल (अंदरूनी पूजा क्षेत्र) के पास ले जाकर भेंट दी गई। उनके पादरियों के वेश में होने से हिंदू भक्तों ने आपत्ति जताया कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (एथोराइजेशन ऑफ एंट्री) एक्ट, 1965 और उसके नियमानुसार गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
मंदिर के भक्त सनील नारायणन नंपूतिथि ने केरल हाई कोर्ट में मंदिर प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्होंने पादरियों को प्रवेश की अनुमति देकर कानून तोड़ा है। उन्होंने मंदिर सलाहकार समिति सदस्यों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और पद से हटाने की माँग की। साथ ही उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं के मंदिर परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने और परिसर की पवित्रता रक्षा को उपचारात्मक अनुष्ठानों के प्रदर्शन के निर्देश की भी माँग की।
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर स्पष्ट प्रतिबंध
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1965 के नियमों का नियम 3(ए) स्पष्टत: गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता है। उन्होंने कहा कि पादरियों का अपने वेश में प्रवेश कानून तोडना है। याचिकाकर्ता का कहना था कि चाहे तांत्री ने अनुमति दी हो या नहीं, मंदिर प्रशासन कानूनी प्रतिबंध दृष्टिविगत करने का अधिकारी नहीं है।
देवस्वोम बोर्ड और मंदिर अधिकारियों का रुख
प्रत्युत्तर शपथ-पत्र में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने माना कि मंदिर सलाहकार समिति ने श्री कृष्ण जयंती शोभा यात्रा का उद्घाटन करने पादरी बुलाया था।
कार्यक्रम के बाद पादरी और अन्य लोग मंदिर में प्रवेश चाहते थे, जिसको उन्होंने पुजारियों से अनुमति माँगी। मंदिर तांत्रिक ने उन्हें मंदिर प्रवेश की अनुमति दे दी।
बोर्ड ने कहा कि प्रवेश केवल औपचारिक और अनुमति से हुआ था, इसे किसी का अधिकार नहीं माना जा सकता। बोर्ड के अनुसार इससे मंदिर की परंपराओं, रीति-रिवाजों या धार्मिक नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
इसके अलावा, बोर्ड ने कहा कि नियमों का कोई उल्लंघन हुआ भी होता, तो अधिकतम कार्रवाई सिर्फ उस व्यक्ति को मंदिर परिसर से बाहर निकालने तक ही सीमित होती, न कि मंदिर अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कदम की।
मंदिर सलाहकार समिति सदस्यों ने भी बोर्ड का समर्थन किया और कहा कि प्रवेश तांत्रिक की अनुमति से ही हुआ । समिति ने यह भी बताया कि तब किसी भी श्रद्धालु ने इस पर आपत्ति नहीं जताई थी। समिति का आरोप है कि यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है और इसका उद्देश्य अकारण विवाद खड़ा करना है।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
केरल हाई कोर्ट ने कहा कि केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों को मंदिरों में प्रवेश मिले और जातिगत भेदभाव खत्म किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि 1965 के नियमों का नियम 3(क) भले ही गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता हो, लेकिन मूल कानून (अधिनियम) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई साफ और स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अधीनस्थ कानून (नियम) ऐसे प्रतिबंध नहीं लगा सकता, जो मूल अधिनियम में मौजूद ही नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि प्रत्यायोजित कानून का काम मूल कानून को पूरा करना है, न कि उसे बदलना या उसकी जगह लेना।
कोर्ट के निष्कर्ष और निर्णय
अपने फैसले में कोर्ट ने यह साफ किया कि किसी के अधिकार के रूप में मंदिर में प्रवेश करने और तांत्रिक द्वारा अतिथि या आमंत्रित व्यक्ति के रूप में अनुमति देने में फर्क है। कोर्ट ने माना कि मंदिर की धार्मिक और आध्यात्मिक व्यवस्था में तांत्रिक की महत्वपूर्ण और आधिकारिक भूमिका होती है। इसलिए, तांत्रिक द्वारा दी गई अनुमति को कानूनी उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का मकसद समाज में सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना है। कोर्ट के अनुसार, कानूनों को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित होना चाहिए।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अधीनस्थ नियमों की सख्त और कठोर व्याख्या से धार्मिक तनाव या असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए। हालाँकि, कोर्ट ने नियम को रद्द करने से इनकार कर दिया और यह फैसला सरकार पर छोड़ दिया कि देवस्वोम बोर्ड, तांत्रिकों, धार्मिक विद्वानों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद नियम में बदलाव किया जाए या नहीं।
फैसला मौलिक रूपेण त्रुटिपूर्ण और हिंदुओं के लिए अन्यायपूर्ण क्यों ?
इस फैसले को संविधानिक सद्भाव की रक्षा के रूप में दिखाया जा रहा है, लेकिन यह एक पुरानी और गंभीर समस्या को उजागर करता है, यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू धार्मिक स्थलों में बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप।
भारत और दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के आधार पर पूजा स्थलों में प्रवेश की सीमाएँ सामान्य रूप से लागू हैं और इन्हें विवादास्पद नहीं माना जाता। उदाहरण के तौर पर, गैर-मुसलमानों को मक्का और मदीना में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
वेटिकन में भी धार्मिक नियमों के अनुसार सख्त प्रवेश व्यवस्था है। कई चर्च और सिनेगॉग भी बड़े धार्मिक कार्यक्रमों में केवल अपने अनुयायियों को ही प्रवेश देते हैं। इन नियमों को न तो असंवैधानिक कहा जाता है और न ही समाज को बाँटने वाला।
लेकिन जब बात हिंदू मंदिरों की आती है, तो वे अक्सर अदालती जाँच, नए अर्थों और नैतिक दबाव के दायरे में आ जाते हैं। केरल हाई कोर्ट का यह संकेत कि गैर-हिंदुओं पर प्रतिबंध असंवैधानिक हो सकता है, इस बात को नजरअंदाज करता है कि धार्मिक संस्थानों को अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार है। मंदिरों को पर्यटन स्थल नहीं बनाया जा सकता।
यह तर्क कि हिंदू धर्म सिर्फ एक जीवन शैली है और इसलिए सभी के लिए खुला होना चाहिए, बार-बार हिंदू धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
यह भूल जाता है कि हिंदू मंदिर सार्वजनिक पार्क या सांस्कृतिक भवन नहीं हैं, बल्कि पवित्र स्थल हैं, जो आगम, परंपरा और सदियों पुराने धार्मिक नियमों से संचालित होते हैं और भी चिंता की बात यह है कि कोर्ट ने उस नियम पर सवाल उठाया, जो हिंदू मंदिरों की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया था, जबकि यह अधिनियम खुद हिंदू धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप का नतीजा है।
हिंदू मंदिर पहले से ही देवस्वोम बोर्डों के जरिए सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिद और चर्च अधिक स्वतंत्र हैं। अब अगर हिंदुओं से यह भी छीन लिया जाए कि कौन उनके पवित्र स्थलों में प्रवेश कर सकता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता का असमान और पक्षपाती प्रयोग होगा।
धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि हिंदू हर चीज और हर किसी को बिना सवाल स्वीकार करें, खासकर जब अन्य धर्म अपनी विशिष्टता और सीमाओं को बिना किसी विवाद के लागू करते हैं। हिंदू अकेले धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नहीं हैं और उनके मंदिर सामाजिक प्रयोगों की प्रयोगशाला नहीं होने चाहिए।
(रिपोर्ट मुख्य रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। )
अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर केरल के पथानामथिट्टा जिले के अडूर में प्राचीन और प्रसिद्ध वैष्णव मंदिर है। यह भगवान विष्णु के अवतार, पार्थसारथी (अर्जुन के सारथी कृष्ण) को समर्पित है। मंदिर अपने दस दिवसीय वार्षिकोत्सव और फरवरी के पहले सप्ताह में अंतिम दिन भव्य ‘गजमेला’ (हाथी जुलूस) के लिए प्रसिद्ध है।
मुख्य विवरण:
देवता: भगवान श्री कृष्ण (पार्थसारथी)
प्रमुख आकर्षण: गजमेला (9 सजे-धजे हाथी), अष्टम रोहिणी उत्सव
अन्य देव: मंदिर परिसर में गणेश और शिव की भी पूजा होती है
महत्व:
मंदिर की केरल के सबसे पुराने और प्रमुख कृष्ण मंदिरों में मान्यता है, वार्षिकोत्सव में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। अंतिम दिन गजमेला में नौ सजे-धजे हाथी एक साथ मंदिर परिसर में आते हैं तो मनोरम दृश्य होता है।
Palani Temple: ‘मंदिर कोई पिकनिक स्पॉट नहीं’, तमिलनाडु के मंदिरों में एंट्री पर मद्रास HC ने कहा- ध्वजस्तंभ से आगे नहीं जा सकते गैर-हिंदू
तमिलनाडु के मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश करने पर मद्रास हाईकोर्ट ने निर्देश दिए। डी. सेथिंल की याचिका पर कोर्ट सुनवाई कर रही थी। कोर्ट की मदुरै पीठ की न्यायमूर्ति एस श्रीमति इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मंदिर में मौजूद बोर्ड में लिखा हो कि मंदिर में कोडिमारम (ध्वजस्तंभ) क्षेत्र से आगे जाने की इजाजत नहीं है।
तमिलनाडु के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने निर्देश दिए।
मंदिर में सिर्फ पूजा-अर्चना हो: मद्रास कोर्ट
कोर्ट ने कहा- मंदिर में हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करना जरूरी
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर निर्देश दिए। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के हिंदू धर्म और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) को सभी हिंदू मंदिरों में बोर्ड लगाने का आदेश दिया है।
गैर-हिंदुओं को ‘कोडिमारम’ से आगे अनुमति नहीं: कोर्ट
कोर्ट की मदुरै पीठ की न्यायमूर्ति एस श्रीमति ने डी. सेथिंल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, मंदिर में मौजूद बोर्ड में लिखा हो कि मंदिर में ‘कोडिमारम’ (ध्वजस्तंभ) क्षेत्र से आगे जाने की अनुमति नहीं है।
मंदिर में सिर्फ पूजा-अर्चना : मद्रास कोर्ट
अदालत ने आगे कहा, हिंदुओं को भी अपने धर्म पालन करने का अधिकार है। अन्य धर्मों के लोगों को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने का अधिकार है। लेकिन उनके संबंधित धर्म के रीति-रिवाजों और प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और कोई भी हस्तक्षेप कम किया जाना चाहिए। मंदिर को पिकनिक स्पॉट ना समझा जाए। मंदिर में सिर्फ पूजा-अर्चना हो।
सेंथिल कुमार ने कोर्ट में दायर की थी याचिका
बता दें कि याचिकाकर्ता सेंथिल कुमार ने प्रतिवादियों को अरुल्मिगु पलानी धनदायुतपानी स्वामी मंदिर और उसके उप मंदिरों में सिर्फ हिंदुओं को जाने की अनुमति का निर्देश देना का अनुरोध किया था।
कोर्ट ने कहा- मंदिर में हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करना जरूरी
अदालत ने उत्तरदाताओं को निर्देश दिया कि मंदिर में उन गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति न दें जो हिंदू धर्म विश्वासी नहीं हैं। कोई गैर-हिंदू मंदिर में विशेष भगवान के दर्शन का दावा करे तो उत्तरदाता उससे वचन लेंगें कि उसका दर्शन करने वाले भगवान में विश्वास है और वह हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों, मंदिर के रीति-रिवाजों और प्रथाओं का पालन करेगा, यह वचन लेने के बाद ही उस गैर-हिंदू को मंदिर में जाने की अनुमति दी जा सकती है।
वहीं, कोर्ट ने कहा कि जब भी ऐसे व्यक्ति को अनुमति दी जाए तो उसकी डिटेल मंदिर के रजिस्टर में अंकित हो।

