भगत दा को पद्म भूषण,
पद्म भूषण से सम्मानित हुए भगत सिंह कोश्यारी
उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता भगत सिंह कोश्यारी को आज पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है. एक नजर कोश्यारी के सफर पर…
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया. (@rashtrapatibhvn)
देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में ‘भगत दा’ के नाम से पहचान रखने वाले वरिष्ठ नेता, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है. भगत दा के इतिहास पर नजर डालें तो उनका जीवन काफी चुनौतीपूर्ण रहा है. आज भगत दा के साथ-साथ उत्तराखंड की उन हस्तियों के बारे में भी आपको बताते हैं, जिन्होंने देवभूमि का नाम रोशन किया और पद्म भूषण जैसा सम्मान हासिल किया.
पहाड़ के साधारण परिवार में जन्मे भगत दा का सफर: भगत सिंह कोश्यारी ने पहाड़ के एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई. उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में भगत सिंह कोश्यारी का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने संगठन, विचारधारा और जनसंवाद के बल पर अपनी अलग छवि बनाई. भगत सिंह कोश्यारी का जीवन उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का एक बड़ा अध्याय माना जाता है.
आदरणीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी द्वारा राष्ट्र निर्माण, शिक्षा, जनसेवा और उत्तराखण्ड की अस्मिता को सशक्त स्वर देने वाले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल आदरणीय श्री @BSKoshyari जी को प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर… pic.twitter.com/LeJ0B1TI9G
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) May 25, 2026
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भगत दा: 17 जून 1942 को बागेश्वर जिले के सुदूर गांव पलानधुरा में जन्मे कोश्यारी ने सीमित संसाधनों के बीच अपनी शिक्षा पूरी की. 1964 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री पूरी की. छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता दिखाई देने लगी थी. अल्मोड़ा कॉलेज में छात्रसंघ महासचिव रहने के दौरान उन्होंने युवाओं के मुद्दों को मजबूती से उठाया. इसके बाद वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े और फिर जनसंघ तथा भाजपा की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे.
राजनीति में आने से पहले भगत दा ने शिक्षक और पत्रकार के रूप में भी काम किया. यही वजह रही कि उनका व्यक्तित्व केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और वैचारिक क्षेत्र में भी उन्होंने गहरी छाप छोड़ी.
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उत्तराखंड आंदोलन में निभाई अहम भूमिका: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान भगत सिंह कोश्यारी उन प्रमुख चेहरों में शामिल रहे, जिन्होंने अलग राज्य की मांग को मजबूती से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. पहाड़ की भौगोलिक कठिनाइयां, पलायन, बेरोजगारी और विकास की समस्याओं को उन्होंने लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाया.
आंदोलन के दिनों में वे गांव-गांव जाकर लोगों को जागरुक करते रहे. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मानें तो उत्तराखंड आंदोलन के वैचारिक आधार को मजबूत करने में भगत दा की महत्वपूर्ण भूमिका रही. राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड की राजनीति में उनकी पकड़ और मजबूत होती चली गई. वे संगठन के ऐसे नेता माने गए, जो कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद करते थे. भाजपा संगठन को पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाने में भी उनका बड़ा योगदान माना जाता है. यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है.
मुख्यमंत्री के रूप में सादगी और जनसंपर्क बना उदाहरण: महेंद्र भट्ट कहते हैं कि भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे. हालांकि, उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन अपनी प्रशासनिक सादगी और सरल कार्यशैली के कारण वे लगातार चर्चा में रहे.
कोश्यारी का पूरा जीवन राष्ट्र और समाज को समर्पित रहा है. उत्तर प्रदेश के समय से लेकर उत्तराखंड राज्य दोलन और उसके बाद नए राज्य के विकास में उनका योगदान अतुलनीय और अभूतपूर्व है. एक कुशल प्रशासक, संवेदनशील राजनेता और संगठन के शिल्पकार के रूप में उन्होंने हमेशा अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के कल्याण के लिए काम किया है. आज जब वह राजनीति से दूरी बनाते हुए सामाजिक कार्यों में जुटे हैं तो भी अंत्योदय कल्याण की उनकी यात्रा अभी भी जारी है. उनका यह सम्मान सिर्फ उनका या भाजपा का नहीं बल्कि हर उत्तराखंडी के लिए गौरव की बात है.
– महेंद्र भट्ट, बीेजेपी प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद –
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों के विकास, सड़क, शिक्षा और ग्रामीण ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया. वे अक्सर बिना किसी बड़े काफिले और औपचारिकता के सीधे जनता के बीच पहुंच जाते थे. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भगत दा की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क रहा. वे भाषणों से ज्यादा संवाद की राजनीति में विश्वास रखते थे. यही वजह रही कि भाजपा संगठन के भीतर भी उन्हें एक सहज और जमीन से जुड़े नेता के रूप में देखा गया.
शिक्षक पत्रकार और वैचारिक लेखक की भी छवि: बहुत कम लोग जानते हैं कि भगत सिंह कोश्यारी केवल राजनेता ही नहीं बल्कि शिक्षक लेखक और पत्रकार भी रहे हैं. उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में कई संस्थानों से जुड़कर काम किया और पहाड़ में शैक्षणिक वातावरण मजबूत करने में योगदान दिया. साल 1964-1965 के दौरान राजा का रामपुर (एटा, उत्तर प्रदेश) में लेक्चरर से शिक्षा करियर शुरु किया.
कोश्यारी ने पिथौरागढ़ में विवेकानंद इंटर कॉलेज की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरस्वती विहार, नैनीताल से सक्रिय रूप से जुड़े रहे. वें वर्षों संघ के विभाग कार्यवाह रहे. वें उत्तरांचल उत्थान परिषद के सचिव भी बने.
वे लंबे समय तक पत्रकारिता से भी जुड़े रहे और पर्वत पीयूष के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक विषय उठाते रहे. उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन और क्षेत्रीय विकास से जुड़े विषयों पर पुस्तकें ‘उत्तरांचल प्रदेश क्यों’ और ‘उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान’ लिखी और प्रकाशित की. सामाजिक और वैचारिक लेखन में उनकी स्पष्ट सोच दिखती है. यही कारण है कि उन्हें केवल राजनीतिक नेता नहीं बल्कि वैचारिक व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता है.
महाराष्ट्र के राज्यपाल रहते राष्ट्रीय राजनीति की चर्चाओं रहे: भगत सिंह कोश्यारी महाराष्ट्र के राज्यपाल भी रहे हैं. 5 सितंबर 2019 को उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था. महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में उनकी नियुक्ति भाजपा नेतृत्व के भरोसे को दर्शाती थी. राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का गवाह बना. महाराष्ट्र की सत्ता को लेकर हुए घटनाक्रमों के दौरान उनके फैसलों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस भी हुई. हालांकि, कई मौकों पर विपक्ष ने उनके कुछ बयानों और फैसलों को लेकर आलोचना भी की. इसके अलावा अगस्त 2020 में कोश्यारी को गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था.
आपातकाल में हुए गिरफ्तार: देश में लगे राष्ट्रीय आपातकाल में कोश्यारी को आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) में गिरफ्तार किया गया था.
कोश्यारी ने उत्तराखंड में संभाली ये जिम्मेदारियां:
साल 1997 में भगत सिंह कोश्यारी को उत्तर प्रदेश विधान परिषद को नामित किया गया.
नवंबर 2000 में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) राज्य बना तो वह राज्य के पहले मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने.
2001 से 2002 तक उत्तरांचल के दूसरे मुख्यमंत्री का संक्षिप्त कार्यकाल.
उत्तराखंड विधानसभा में नेता विपक्ष भी रहे.
साल 2008 में कोश्यारी राज्य सभा को चुने गए.
2014 में वह नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए.
राज्य सभा और लोक सभा में याचिका समिति अध्यक्ष भी रहे.
उत्तराखंड में ऊर्जा मंत्री के रूप में उन्होंने लंबित टिहरी हाइड्रो परियोजना आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसमें टिहरी के ऐतिहासिक शहर और जिला मुख्यालय ट्रांसफर शामिल था.
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन, वन रैंक वन पेंशन, रेल कनेक्टिविटी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत सिफारिशें प्रस्तुत कीं.
सादगी भरा जीवन आज भी प्रेरक: राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने पर भी भगत सिंह कोश्यारी की पहचान हमेशा सादगी से जुड़ी रही, वे आज भी साधारण जीवनशैली और सरल व्यवहार को जाने जाते हैं. हाल ही में उन्होंने मृत्यु बाद अंगदान और देहदान का संकल्प लेकर एक बार फिर सामाजिक संदेश दिया.
भगत दा के निकटवर्ती बताते हैं कि वो हमेशा कार्यकर्ताओं और सामान्य जन को प्राथमिकता देते थे. बड़े पदों पर रहे लेकिन कभी खुद को सामान्यजन से दूर नहीं किया. यही कारण है कि पहाड़ की जनता आज भी उन्हें अपने बीच का नेता मानती है.
पद्मभूषण सम्मान से उत्तराखंड में गौरवभाव: भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण सम्मान की सूचना के बाद से उत्तराखंड में खुशी का वातावरण है. भाजपा कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और उनके समर्थकों ने इसे पूरे राज्य को गर्व का क्षण बताया है. कई नेताओं ने कहा कि यह सम्मान उत्तराखंड की उस संघर्षशील राजनीतिक परंपरा का सम्मान है, जिसमें जमीन से जुड़े नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भगत सिंह कोश्यारी का जीवन नई पीढ़ी को प्रेरणा है. सीमित संसाधनों से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति और संवैधानिक पदों तक पहुंचने की उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि संघर्ष, अनुशासन और समर्पण से बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं.
उत्तराखंड के कई व्यक्तित्वों को मिल चुका है पद्मभूषण: उत्तराखंड की धरती लंबे समय से कला, साहित्य, पर्यावरण, सेना, लोक संस्कृति और सामाजिक सेवा क्षेत्र में देश को बड़े नाम देती रही है. राज्य से जुड़े कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों को पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें- पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा को पर्यावरण संरक्षण और हिमालय बचाने के अभियान को साल 2009 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में शेखर पाठक को 2007 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था हालांकि अवॉर्ड वापसी प्रहसन में उन्होने भी पद्मश्री वापस करने का नाटक किया था।
इसके अलावा लोक गायिका माधुरी बर्थवाल को भारत सरकार ने 2022 में भारत के चौथे सबसे उल्लेखनीय नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया था.
भारतीय महिला हॉकी टीम की स्टार खिलाड़ी वंदना कटारिया को खेल के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2022 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.
पर्यावरण और समाजसेवा के उत्कृष्ट कार्यों के लिए बसंती देवी वर्ष 2022 में पद्म श्री से सम्मानित हुई.
इसके अलावा डॉक्टर भूपेंद्र कुमार सिंह को चिकित्सा क्षेत्र और प्रेमचंद शर्मा को कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था.
रोहित शर्मा पद्मश्री और धर्मेंद्र मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित
दिवंगत एक्टर धर्मेंद्र, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज केटी थॉमस, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन (मरणोपरांत) समेत पांच हस्तियों को पद्म विभूषण दिया गया.
Indian women’s cricket team captain Harmanpreet Kaur was awarded the Padma Shri by President Draupadi Murmu.
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पद्म श्री से सम्मानित किया
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन के गणतंत्र मंडप में 2026 के पहले पद्म अवॉर्ड्स दिए. सरकार ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले 25 जनवरी को 131 पद्म पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा की थी. इसी क्रम में पहले चरण में देश की 66 विभूतियों को सम्मानित किया गया. जबकि, शेष विजेताओं को दूसरे चरण में अवॉर्ड दिए जाएंगे.
राष्ट्रपति ने सोमवार के पहले चरण में 2 पद्म विभूषण, 6 पद्म भूषण और 58 पद्म श्री पुरस्कार दिये. सम्मानित जनों में अभिनेता आर माधवन, क्रिकेटर रोहित शर्मा, महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर और हॉकी प्लेयर सविता पूनिया के अलावा पैरा एथलीट प्रवीण कुमार हैं.
विशेष यह कि पद्म पुरस्कार विजेताओं में 19 महिलाएं भी शामिल हैं. इसके साथ ही 16 ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्हें मरणोपरांत पुरस्कार दिए गए हैं. दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज केटी थॉमस समेत 5 हस्तियों को पद्म विभूषण पुरस्कार दिए गए. जबकि मशहूर गायक अल्का याग्निक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन समेत 13 व्यक्तियों को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. इसके अलावा अभिनेता आर माधवन, इंडिया क्रिकेट टीम में खिलाड़ी रोहित शर्मा, हॉकी प्लेयर सविता पूनिया समेत 113 हस्तियों को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में अभिनेता धर्मेंद्र को मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया. उनकी पत्नी हेमा मालिनी ने यह पुरस्कार ग्रहण किया.
पुरस्कार के लिए चुने जाने पर बिहार के पद्मश्री पुरस्कार विजेता विश्व बंधु (मरणोपरांत) की पत्नी इंदु देवी ने कहा कि सरकार का हृदय से आभार कि उन्होंने इसे मान्यता दी और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. हम सभी बहुत गर्व महसूस कर रहे हैं. हम भावुक भी हैं, हमारी आंखों में खुशी के आंसू आ रहे हैं. पूरा परिवार बहुत खुश है, गर्व महसूस कर रहा है और हम सरकार के आभारी हैं.
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई बड़े नेता मौजूद रहे.
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