इतिहास: अकबर महान कि महाराणा प्रताप?

हल्दी घाटी युद्ध
18जून 1576
महाराणा क्यों महान थे? अकबर की महानता का सत्य क्या है? इतिहास में बहुत कुछ विपरीत बताया जा रहा है। अकबर को महान व महाराणा प्रताप को सामान्य बताया जा रहा है। वामपंथी और जेहादी इतिहासकारों की मानसिकता से बाहर आए। उच्च कोटि के शोध ग्रन्थों से वास्तविक इतिहास जानिए।

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सभी मुग़ल शासकों में अकबर को सबसे न्यायप्रिय बताया जाता हैं, अगर सभी मुस्लिम शासकों का उदहारण देंगे तो एक पूरी पुस्तक बन जायेगी इसलिए केवल अकबर का ही वर्णन करते हैं।

1-

चौलागढ़, जिला नरसिंघपुर कि छोटी सी रियासत पर अकबर के सरदार आसफ खान ने हमला किया। वहाँ के राजा बीर नारायण ने वीरता से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गये। महल कि सभी स्त्रियों ने सामूहिक जौहर में भाग लिया और जब चार दिन पश्चात जौहर कक्ष को खोला गया तो उसमें से दो स्त्रियाँ जीवित निकली, सयोग से उनके ऊपर लकड़ी का एक तख़्त गिर गया था जिससे उनकी प्राण रक्षा हो गई। उनमें से एक रानी दुर्गावती कि बहन कमलावती थी और दूसरी राजा कि नववधु थी। दोनों को अकबर के हरम में भिजवा दिया गया।

(Ref -Page 72 Akbar the Great Mogul – Vincent Smith )

2. अकबर के हरम में 5,000 औरतें थी। (Ref -Page 359 Akbar the Great Mogul – Vincent Smith )

पाठक स्वयं सोच सकते हैं कि अकबर द्वारा ये 5000 औरतें किस प्रकार से जोर जबर्दस्ती द्वारा हिन्दू एवं गैर हिन्दू घरों से एकत्र कि गई थी। जहाँगीर ने अपने शासन काल में इनकी संख्या बड़ा कर 6000 कर दी थी।

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महाराणा प्रताप के मुगलों के संघर्ष के समय स्वयं राणा के पुत्र अमर सिंह ने विरोधी अब्दुर रहीम खानखाना के परिवार की औरतों को बंदी बना कर राणा के समक्ष पेश किया तो राणा ने क्रोध में आकर अपने बेटे को हुकुम दिया की तुरंत उन माताओं और बहनों को पूरे सम्मान के साथ अब्दुर रहीम खानखाना के शिविर में छोड़ कर आये एवं भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करे। खानखाना महाराणा प्रताप के चरित्र गुण से अत्यंत प्रभावित हुआ एवं उसने महाराणा कि प्रशंसा में ये शब्द कहे

धर्म रहसि रहसि धारा खास जारो खुरसन, अमर विशम्बर उपराओं राखो न जो रण

(Ref. Maharana Pratap – Dr Bhawan Singh Rana Page 85 ,86 )

ध्यान रहे महाराणा ने यह आदर्श उस काल में स्थापित किया था जब मुग़ल अबोध राजपूत राजकुमारियों के डोले के डोले से अपने हरम भरते जाते थे। बड़े बड़े राजपूत घरानों की बेटियाँ मुगलिया हरम के सात पर्दों के भीतर जीवन भर के लिए कैद कर दी जाती थी। महाराणा चाहते तो उनके साथ भी ऐसा ही कर सकते थे पर नहीं उनका आर्य स्वाभिमान ऐसी उनहें कभी नहीं करने देता था।

अकबर के दरबार में अब्द अल कादीर बदायूनी था उसने हल्दीघाटी की युद्ध का आंखों देखा वर्णन जिसमें वह खुद शामिल था अपनी किताब मुंतखाब–उत–तवारीख में किया है। मूल किताब का 18वीं सदी में अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। दोनों तरफ की सेनाओं में 90% राजपूत लड़ रहे थे अकबर के तरफ से सेनापति मानसिंह और राजा लूणकरण थे तो दूसरी तरफ खुद महाराणा प्रताप और दूसरे राजपूत राजा थे। दोनों तरफ के राजपूतों ने केसरिया साफा पहन रखा था। इससे अकबर का एक सेना नायक अबुल फजल इब्न मुबारक कंफ्यूज हो गया कि कौन हमारे तरफ से लड़ रहे हैं और कौन दुश्मन के तरफ से हैं! फिर अबुल फजल इब्न मुबारक ने अब्द अल कादिर से पूछा दोनों तरफ के राजपूत केसरिया साफा पहने हैं मैं कैसे पहचान करूं कि कौन अपनी तरफ से है और कौन दुश्मन की तरफ से है? तब मैंने यानी अब्द अल कादिर बदायूनी ने कहा अबुल फजल बस तीर और फरसा चलाते रहो भाला फेंकते रहो मरने वाले तो काफिर ही होंगे ना चाहे हमारे तरफ के मरे या दुश्मन के तरफ से मरे .. किधर भी तीर चलाओ किसी को मारो जीत इस्लाम की ही होगी..अगर हम युद्ध जीत सके तो ठीक नहीं जीते तो कम से कम खुदा को यह तो कह देंगे कि हमने काफिरों को मारा।

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Maharana Pratap Unseen Truth: हल्‍दीघाटी, घास की रोटी और चेतक… महाराणा प्रताप का 450 साल पुराना वो सच, जो छुपाया गया

महाराणा प्रताप का नाम सुनते ही हल्दीघाटी का भीषण युद्ध, वफादार चेतक और ‘घास की रोटी’ के किस्से जेहन में उभर आते हैं. बचपन से शौर्य और संघर्ष की यही कहानियां हमने सुनी हैं. लेकिन क्या 450 साल पुराने इस इतिहास का कोई ऐसा पन्ना भी है, जिसे बड़ी चालाकी से छुपा लिया गया या आधा-अधूरा ही बताया गया? आज हम आपको हल्दीघाटी और घास की रोटी के उस असली और अनकहे सच से रूबरू कराएंगे.

महाराणा प्रताप की कहानी.
भारत के इतिहास में हल्दीघाटी का युद्ध ऐसी घटना है जिसके बारे में अलग-अलग तरह की बातें की जाती हैं. महाराणा प्रताप की वीरता और शौर्य का प्रतीक है हल्दीघाटी का युद्ध, हालांकि, कई लोगों का ये कहना भी है कि महाराणा हल्दीघाटी में मुगलों से हार गए थे. साल 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध को आज 450 साल पूरे हो गए हैं. और कल ही महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती थी.
हल्दीघाटी और महाराणा प्रताप के जीवन को लेकर कई तरह के वर्जन हैं. एक तरफ के लोग कहते हैं कि मुगलों के साथ संघर्ष में महाराणा प्रताप को कष्ट झेलना पड़ा था. दर दर भटकना पड़ा था. दूसरे पक्ष का कहना है कि महाराणा प्रताप ने मुगलों को बुरी तरह से मारा था. जिस के बाद मुगलों के अंदर महाराणा प्रताप का खौफ बैठ गया था. आज हल्दीघाटी के युद्ध के 450 साल पूरे होने पर आपको बताएंगे कि हल्दाघाटी में मुगलों ने क्यों कहा कि हमारी रूह कांप गई थी? मुगलों ने पिटने के बाद भी महाराणा की तारीफ क्यों की? क्या महाराणा प्रताप को घास की रोटी खानी पड़ी थी? महाराणा के हाथी ने अकबर के साथ क्या किया था? इसके अलावा आपको महाराणा प्रताप के जीवन की वो घटनाएं बताएंगे, जो शायद पहले नहीं सुनी होगी.
हल्‍दीघाटी की कहानी है क्‍या?

हल्दीघाटी के युद्ध को लेकर कैसे अलग ही कहानी बताई गई है. वो आपको बताते हैं. हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड़ और मुगल सेना के बीच में लड़ा गया था. इस युद्ध में मुगल सेना के सेनापति मानसिंह थे. युद्ध की वजह अकबर की जिद थी.दरअसल, मेवाड़ के राजपूत मुगलों के अधीन नहीं आ रहे थे. अकबर ने जिद ठान ली थी कि मेवाड़ को जीतना है.
18 जून 1576 को हल्दीघाटी में भयंकर युद्ध हुआ. हल्दीघाटी का युद्ध 4 घंटे तक चला. राजपूत सेना में करीब 5 हजार सैनिक थे जबक‍ि मुगलों की सेना में 20 हजार सैनिक थे. राजपूतों के पास बंदूकें नहीं थी. मुगल सेना के पास बंदूकें भी थीं. महाराणा की सेना में करीब 100 हाथी थे. मुगल सेना में इस से तीन गुना ज्यादा हाथी थे. राजपूतों ने मुगलों को तगड़ा नुकसान पहुंचाया. लेकिन बीच युद्ध में राणा प्रताप घायल हो गए. रणनीति के तहत राणा प्रताप को बाहर भेजा गया.

इसके बाद भी राजपूतों ने मुगलों पर गोरिल्ला हमले जारी रखे. युद्ध से निकलकर महाराणा प्रताप ने फिर से प्लानिंग की और अपनी जमीन पर फिर से कब्जा किया. और मुगलों को लोहे के चने चबवा दिए. लेकिन राणा के घायल होकर चले जाने को मुगलों की जीत बताया गया. यानी युद्ध का नतीजा ये बताया गया कि राजपूतों को पीछे हटना पड़ा था.
हल्दीघाटी के युद्ध में किसकी जीत हुई थी
सालों तक यही बताया गया कि युद्ध में राजपूतों की हार हुई थी. जो सही नहीं था. हल्दीघाटी युद्ध में क्या हुआ था. कौन जीता था, किसे पीछे हटना पड़ा था. इसकी सच्चाई बताते हैं. हल्दीघाटी के युद्ध में राजपूतों की जीत हुई थी. मुगल सेना महाराणा प्रताप को पकड़ नहीं पाई. महाराणा ने बाद में गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया था. महाराणा ने अपने इलाकों को वापस जीत लिया. मुगल सेनापति मानसिंह से अकबर नाराज थे. अकबर ने मानसिंह को दरबार में बैन कर दिया

ऐत‍िहास‍िक प्रमाण क्‍या बताते हैं…
ऐसे ही कई ऐतिहासिक प्रमाण हैं, जिस से पता चलता है कि हल्दीघाटी में मुगलों की नहीं बल्कि महाराणा प्रताप की जीत हुई थी. उदयपुर में प्रोफेसर औऱ इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा ने अपनी किताब राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप में हल्दीओघाटी के बारे में डीटेल से बताया है. किताब में लिखा है कि युद्ध में अकबर जो चाहता था वो हासिल नहीं कर पाया. जबकि महाराणा प्रताप मातृभूमि की रक्षा में सफल रहे. उस समय जमीन देने का अधिकार राजा के पास था. तांबे की प्लेटों (ताम्र पत्र)पर जमीन का पट्टा दिया जाता था . महाराणा प्रताप ने युद्ध के एक साल बात तक जमीनें दीं. लोगों के पास महाराणा प्रताप के ताम्र पत्र मौजूद थे.
अगर मुगल युद्ध जीते होते तो ऐसा कभी नहीं होता. यानी युद्ध के बाद भी पूरे इलाके पर महाराणा का कंट्रोल था. जबकि सालों दशकों तक ये बताया जाता रहा कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी में हार गए थे. अकबर को महान बताया जाता रहा. सालों तक स्कूल की किताबों और शिलालेखों में हल्दीघाटी का विजेता मुगलों को ही बताया जाता रहा है. लेकिन अब इन गलतियों को सुधारा जा रहा है. लेकिन इसके लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी

क‍िताबों में पढ़ाया जा रहा था गलत,अब हो रहा सुधार
आप देखिए किस तरह से हल्दीघाटी को लेकर इन गलतियों को सुधारा गया. राजस्थान बोर्ड कक्षा दसवीं की किताब में AKBAR THE GREAT नाम से एक अध्याय था. इसमें हल्दीघाटी का विजेता मुगलों को बताया था. साल 2017 में किताब में सुधार किया गया. महाराणा प्रताप को युद्ध का विजेता लिखा गया. उस समय राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे थीं. इसी तरह से शिलालेखों का लंबा विरोध हुआ. राजपूत समाज ने 40 साल तक इसका विरोध किया. 2021 में राजस्थान सरकार ने केंद्र और ASI से मांग की . शिलालेखों में लिखी गलत जानकारी सही की जाए. उसके बाद 2021 में शिलालेख सही किए गए. अब इस पर लिखा है कि हल्दीघाटी के युद्ध में राजपूतों की बहादुरी से मुगलों को पीछे हटना पड़ा था.
मुगल इतिहासकारों ने क्‍या ल‍िखा… पढ़िए
हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की लीडरशिप में राजपूतों ने गजब की बहादुरी दिखाई थी. राजपूत सेना के शौर्य से मुगलों के अंदर डर बैठ गया था. और ये बातें खुद मुगल इतिहासकारों ने कही हैं. मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी किताब मुंतखब-उत-तवारीख में लिखा है कि जून की गर्मी में मुगल सेना भूखी प्यासी मर रही थी.पहाड़ों से महाराणा की सेना हमला कर रही थी. राजपूतों के डर से रात में मुगल सो भी नहीं पाते थे. मुगलों के सामने राजपूत लोहे की दीवार बन गए थे. मुगल सेना के हाथियों के सामने राजपूत कूद जाते थे. राजपूतों के शौर्य से मुगलों की रूह कांप गई थी. ये है हल्दीघाटी का इतिहास जो मुगल इतिहासकार ने लिखा है. महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूतों के सामने मुगल सेना टिक नहीं पाई थी.

दिवेर में महाराणा का पराक्रम
हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप से मार खाने के बाद भी मुगल नहीं सुधरे. हल्दीघाटी के युद्ध के 6 साल बाद 1582 में एक बार फिर से महाराणा प्रताप और मुगलों का आमना सामना हुआ था. इसे दिवेर का युद्ध कहते हैं. दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगलों को दौड़ा दौड़ा के मारा था.
अरावली की पहाड़ियों में दिवेर इलाका है. यहीं पर मुगलों अहम सैन्य ठिकाना था. मुगलों पर महाराणा ने अचानक हमला किया. हमले से मुगल सेना हड़बड़ा गई. मुगल सेना चौकियां छोड़कर भाग गई. महाराणा ने मुगल सेना को 18 KM तक दौड़ाया था. मुगलों के 36 ठिकानों पर राजपूतों ने कब्जा कर लिया.
इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इसे मेवाड़ का मैराथन कहा है. ये है महाराणा प्रताप और राजपूतों की बहादुरी की कहानी. अगर मुगल इतने ही शक्तिशाली थे तो दिवेर में अपनी चौकियां छोड़कर 18 किलोमीटर तक नहीं भगाए गए होते. दिवेर में मुगलों पर जीत के प्रतीक के तौर पर महाराणा प्रताप स्मारक भी बनाया गया है.
घास की रोटी खाने का सच
महाराणा प्रताप के शौर्य को अलग ही तरह से दिखाया गया. मुगलों को दौड़ा दौड़ा के मारने वाले महाराणा प्रताप के बारे में लिखा गया कि वो घास की रोटी खाते थे. बताया गया कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा जंगल में चले गए थे. इस दौरान महाराणा प्रताप को घास की रोटी तक खानी पड़ी. जबकि घास की रोटी खाना लोककथाओं से निकला है. राजस्थान में लोककथाओं में ये बताया जाता रहा कि महाराणा ने बहुत संघर्ष किए. यहां घास की रोटी को सांकेतिक तौर पर संघर्ष के लिए प्रयोग किया गया है.
राणा के घोड़े चेतक से भी कांपते थे मुगल
महाराणा प्रताप से तो मुगल कांपते ही थे. उनके घोड़े चेतक से भी मुगलों के होश उड़े रहते थे. चेतक के साथ महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद की वीरता और वफादारी का अलग इतिहास है. हल्दीघाटी के युद्ध में रामप्रसाद हाथी पर मुगलों ने कब्जा कर लिया था. उसे अकबर को गिफ्ट किया गया. अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा. लेकिन रामप्रसाद तो महाराणा का वफादार था. मुगल खेमे में रामप्रसाद ने खाना पीना छोड़ दिया था. अकबर की लाख कोशिशों के बाद भी रामप्रसाद ने कुछ नहीं खाया. इस वजह से कुछ समय बाद रामप्रसाद हाथी का निधन हो गया…

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