इतिहास:गोवा को ईसाई बनाने को चर्च ने क्या-क्या जुल्म किये?

जिन्हें मालूम है कि भारत 1947 मे आजाद हुआ, उन्हें बतायें कि गोवा इसके काफी बाद 1956 में स्वतंत्र हुआ | इस एक दशक  में सरकार ने गोवावासियों की मदद करने तक से इनकार कर दिया था |

साढ़े चार सौ साल शासन में पुर्तगाली कैथोलिक गोवा पर कैसे जुल्म करते रहे उनकी एक झलक इस चर्चा में मिल जाएगी |

हिंदी में हम जिसे रक्तपिपासु, या खून का प्यासा कहते हैं, उसके लिए अंग्रेजी में ड्रेकुला प्रचलित है। ड्रेकुला,  साहित्यकार ब्रेम स्टोकर (Bram Stoker) की परिकल्पना जिसे उसने एक सचमुच के राजा के राज्य और नाम के आधार पर तैयार किया था। फिल्मों में ड्रेकुला खासे प्रसिद्ध हैं, कई नामी गिरामी फिल्म निर्माताओं और कलाकारों ने इस पिशाच पर फ़िल्में बनाई । इस सारी प्रक्रिया में जो गायब हो गया, वो था असली काउंट व्लाद टेपेस (Vlad Tepes) जिसके राज्य ट्रांसिल्वेनिया पर ये कहानी लिखी गई थी।

ट्रांसिल्वानिया आज एक छोटा सा रोमानियाई इलाका है जहाँ सिघिसोअरा के किले में 1431 में एक लड़के का जन्म हुआ। ये ट्रांसिल्वानिया गवर्नर व्लाद डाकुल का बेटा था। काउंट डाकुल आर्डर ऑफ़ ट्यूटनिक नाइट्स के सदस्य थे।  ट्यूटनिक नाइट्स का गठन इसाई हितों और अरब हमलों से लगातार हारते रोमानिया के इसाई समुदाय की रक्षा को हुआ था। ऑट्टोमन साम्राज्य के खिलाफ जंगों में व्लाद डाकुल ने काफी बहादुरी दिखाई थी। सन 1437 की शुरुआत में वो प्रिंस बने तो उनके दो बेटों को अरबों ने बंधक रखा ताकि वो क्रूसेड में मुस्लिमों के खिलाफ ईसाईयों की मदद ना करें।

इस तरह 1442 में व्लाद टेपेस और उनके छोटे भाई राडू, सुल्तान मुराद (द्वित्तीय) के पास इस्तांबुल से अरब सैन्य अभियानों में काम करते रहे और उन्हें 1448 में जब छोड़ा गया तो साथ के साथ उन्हें ये भी बताया गया कि 1447 में उनके पिता और उनके भाई को मार डाला गया था। टार्गोविस्टी के बोयर लोगों ने काफी यातनाएं देकर उनके भाई को जिन्दा ही दफ़न कर दिया था। इस तरह सत्रह वर्षीय व्लाद टेपेस लौटे तो उनका पहला खुद का सैन्य अभियान भी शुरू हुआ। अरब सैन्य अभियानों में काम करने से उन्हें बेरहम हमलों का अब अच्छा अनुभव था। पाशा मुस्तफा हसन की दी छोटी सी टुकड़ी से उन्होंने पहला हमला शुरू किया।

बोयर लोगों को हारने और कैद कर उनके सारे बुजुर्गों को छोटों के सामने सूली पर टांगा गया। नहीं, वो ईसा वाला क्रॉस नहीं, एक पैनी ऊँची सी लकड़ी पर टांग कर बिठा दिया जाता था। पैना सिरा शिकार के वजन से उसके ही जिस्म में धीरे-धीरे घुसता। जितना व्लाद का दुश्मन छटपटाये उतना वो और घुसता जाएगा। लाश वैसे ही शहर बीच टंगी छोड़ी जाती। बचे हुए बोयर लोगों को लगातार पैदल चलवा पचास मील दूर जगह उनसे एक किला बनवाया गया। ज्यादातर बोयर और पुराने सामंत यही किला बनाते मरे और इस तरह व्लाद टेपेस या व्लाद द इम्पेलर (Vlad the Impaler) ने नयी सामंतशाही स्थापित की।

व्लाद टेपेस बाद में अरबों पर भी हमला करने लगे, लेकिन उनकी फौजी ताकत अरबों के मुकाबले मुट्ठी भर थी। वो फिर भी जीत जाते थे क्योंकि उनके नाम का आतंक था। अपने शहर के बीचो बीच व्लाद टेपेस ने कुएँ पर एक सोने का प्याला रखवाया था। 1456 से छह साल तक, जब तक वहां व्लाद टेपेस का राज था तब तक किसी ने वो सोने का प्याला चुराने की हिम्मत नहीं की। चोरी से लेकर झूठ बोलने तक पर एक ही सजा थी। सीधा कांटे वाली सूली पर बिठा दो। उनके हमलों के आतंक से परेशान आखिर एक बड़ी सी अरब फ़ौज व्लाद टेपेस को ख़त्म करने  रवाना हुई। व्लाद का जो एक और छोटा भाई राडू अरब कैद में था, उसे उस इलाके का राजा बनाने की सुल्तान मुराद (द्वित्तीय) ने सोची।

विशाल सेना के आने की खबर व्लाद टेपेस ने सुनी तो वो जानते थे वो किसी तरह जीत नहीं सकते और पकड़े जाने पर मौत भी तय है। उन्होंने रास्ते के सारे जल स्रोतों में जहर डलवा दिया। जब अरब फ़ौज ट्रांसिल्वानिया पहुंची तो उनकी हिम्मत और पीछा करने लायक भी नहीं बची थी। पूरे रास्ते खम्भों पर अरबी कैदियों की लाशें टांग दी गई थी। इस घटना को और उस इलाके को फ़ॉरेस्ट ऑफ़ द इम्पेल्ड (Forest of the Impaled) कहा जाता है। अरब फ़ौज की मदद से राडू राजा बना और काफी बाद में व्लाद टेपेस की हत्या करवाई जा सकी। अपराध की भयानक सजा के अलावा उनके शासन काल को अपराध और भ्रष्टाचार मुक्त होने को भी जाना जाता है।

पुराने ज़माने की सजाओं में भारत में भी ऐसी ही सूली की सजा होती थी। शायद “सूली” शब्द “शूल” से बना हो। कई अपराधों में मेरा ख़याल है कि ऐसी ही ई.एम.आई. वाली मौत की सजा होनी चाहिए। आज सुबह जब अदालती फैसले ने एक कुकृत्य को असंवैधानिक घोषित किया और नए कानून बनाने की मांग की तो याद आया कि दिल्ली में निर्भया बलात्कार मामले में एक बलात्कारी को गुपचुप सिलाई मशीन और दस हजार रुपये देकर नया गुप्त जीवन जीने का अवसर देने को भी छोड़ा गया था। जबकि ऐसे बलात्कार तब तक बंद नहीं होंगें जब तक दोषियों  के अंग विशेष सर्जरी से हटा दिया जाए। बाकी बिहार में लोककथाओं में कहते हैं कि एक सजा “भकसी झुका के मारने” की भी होती थी। कभी – कभी हम ये भी सोचते हैं जैसा गोवा इन्क़ुइजीशन (Goa Inquisition) के समय हिन्दुओं से संत ज़ेवियर (St. Francis Xavier) किया करते थे, वैसी सजाएं लिखी जाएँ तो कितने ड्रेकुला निकलेंगे भारत में ?

किसी भी समाज का इतिहास जानना हो तो सबसे बढ़िया तरीका  वहां का लोक संगीत ,लोकोक्तियों मुहावरों कहानियां सुनना समझना है क्योंकि इतिहास तो विजेता लिखा करते हैं ।
जैसे बच्चों की फेमस पोएम रिंगा रिंगा रोसेज तो सबने सुनी होगी आज ये कविता एक हैप्पी पोएम लगती है पर जब आप इसका इतिहास पढ़ेंगे तो पायेंगे कि ये पोएम दरअसल यूरोप में फैले ब्लैक प्लेग के लक्षण बच्चो को समझाने को बनी थी।
इसी तरह आपने बॉबी फ़िल्म का गाना  घे घे घे साहिबा घे घे साहिबा प्यार में सौदा नही  तो जरूर सुना होगा । असल मे इस गाने का ओरिजनल गोवा के लोक गीत  घे घे घे रे सायेबा दामुला लग्न पोयता  था ।
इस लोक गीत का मतलब समझने की कोशिश करेंगें तो सेकुलरिज्म खतरे में आ सकता है क्योंकि इस लोकगीत में गायक हिन्दू विवाह समारोह में जाने के बहाने नाविक से नदी पार कराने को बोलता है पर नाविक आतंकित है वह मना करता है। नाविक को मनाने को गायक उसको अपना एक गहना देने का भी लालच देता है ।
आखिर नाविक आतंकित क्यों है वो बता रही हैं शेफाली वैद्य जी और अनुवाद किया है नंदिनी खरे जी ने

गोवन इंक्विजिशन

शेफाली वैद्य के उद्बोधन पर आधारित

आक्का प्रियोल्कर की पुस्तक गोवन इंक्विज़िशन में हिन्दुओं पर चर्च ने कैसे-कैसे अमानवीय अत्याचार किए थे, उसका वर्णन है।
गोआ का साल्सेट वह स्थान है जहां 66 गांवों में भगवान परशुराम ने कश्मीर से आए हिन्दुओं को बसाया था। गुलामी के कालखंड में पहले आदिल शाह और फिर पुर्तगालियों ने गोआ को गुलाम बनाया ।
वेल्ना गांव में पहले मूल महालसा मंदिर होता था। 1566 के आसपास पुर्तगालियों ने एक वर्ष में 280 मंदिर नष्ट कर दिए।
हिन्दू अपने विग्रह बचा कर नदी पार कर सामंत सऊंदेकर देसाई के राज में लेे गए। वहां 4-5 किलोमीटर क्षेत्र में सभी विग्रह पुनर्स्थापित कर मंदिरों का नवनिर्माण किया। मार्डोड, मंगेश, कवले ये सभी मंदिर नए बने। केवल एक सूर्ला महादेव का प्राचीन मंदिर जिसे स्टोन टेंपल कहा जाता था बचा क्योंकि वह पश्चिमी घाट के दुर्गम घने जंगल में छुपा था। कोंकोलिम् की ग्राम देवी शांता दुर्गा का मंदिर नष्ट किया तो वहां के निवासियों ने सशस्त्र विरोध किया। पुर्तगालियों ने उनका गांव जला दिया। वे जंगलों में छुप कर लड़ते रहे। इस संघर्ष को शांत करने को पुर्तगालियों ने 14 गांवों के नेताओं को किले में समझौते को बुलाया।
पर जैसा कि उनका स्वभाव है, धोखा दिया। सभी नेता मारे गए। केवल एक किसी तरह बच भागा और कर्नाटक पहुंचा। अगले 25-30 वर्षों में गोआ पर पुर्तगाली पूरी तरह स्थापित हो गए। फिर शुरू हुआ गोआ का ईसाईकरण।
हिन्दू बने रहना कठिन हो गया। ईसाई बनने पर हर प्रकार की सुविधा दी गई। हिन्दू विरोधी कानून से जीवन नर्क बना दिया। हिन्दुओं को अपनी ज़मीन जायदाद बेचने को महीनेभर समय दिया जाता जिसे ईसाई बन चुके हिन्दू खरीदते। जनेऊ पहनने पर रोक लगी। सरकारी नौकरी, कॉन्ट्रैक्ट कार्य केवल ईसाईयों को मिलते।
जिस गांव में ईसाई नहीं वहा भी ग्राम सभा में ईसाई शामिल करना अनिवार्य हो गया। पर जिस गांव में हिन्दू अल्पसंख्यक थे वहां ग्राम सभा में हिन्दू होते ही नहीं थे। हिन्दू ना ही विवाह कर सकते थे ना ही अंतिम संस्कार। विवाह करने वे नदी पार छुपकर करते और अंतिम संस्कार बेड़े पर करना पड़ता। अनाथ बच्चे चर्च लेे लेता। कई बार एक रिश्तेदार की मृत्यु होने पर भी बच्चा चर्च लेे लेता , उसकी शिखा काट डालता। बच्चे को ईसाई बनते देख मां भी मोह में ईसाई बनना स्वीकार कर लेती। ब्रेड और बीफ पानी के स्रोत में डाल दिया जाता। माता पिता को माय और पाय कहना अनिवार्य कर दिया गया।
ब्रिटिश यात्री रिचर्ड बर्तेल ने भी इस धर्म परिवर्तन का वर्णन किया है। हार्डकोर्ट  जज डॉक्टर एंटोनियो नरोना ने भी अपने निबंध में इसका वर्णन किया है।
कई लोग बच्चों के मोह में ,कई अपनी ज़मीन के मोह में , कुछ भय से और कुछ इनाम से धर्म परिवर्तन करते गए।
पर कोई ऐसा ना था जो ईसाईयत से प्रभावित हो कर ईसाई हुए।
इसीलिए सभी नव ईसाई अपने पुराने रीति रिवाज अपनाते थे।
इसलिए सेंट जेवियर ने राजा को कोर्ट ऑफ इंक्विज़िशन लाने की सिफारिश की।
1560 में 2 इंक्विजिटर नियुक्त हुए जो सीधे राजा को ही जवाबदेह थे।
यह कोर्ट नव ईसाईयों को अपने पुराने तरीके अपनाने को दंडित करता। साथ ही उन हिन्दुओं को भी जो धर्म परिवर्तन में अड़ंगे लगाते।
ऐसे दादाजी जो अपने पोते का धर्म बचाने दूर देश भेज देते उन्हें भी कारावास मिलता।ऐसे हिन्दुओं को प्रताड़ित किया जाता या गुलाम बना पुर्तगाल भेज दिया जाता।
कुल 56 अपराध घोषित किए गए जैसे पान के पत्ते देना, दूल्हा-दुल्हन को हल्दी और नारियल का दूध लगाना, पारंपरिक विवाह के गीत वोवियो गाना, तुलसी उगाना चाहे वो अपने आप उगे, बच्चे के जन्म पर छठी माता का जागरण, श्राद्ध कर्म, गोबर से ज़मीन लेपना, ग्रहण पर उपवास करना, पारंपरिक वस्त्र और भोजन , तिलक लगाना, हिन्दू संगीत उपकरण बजाना, शिग्मो जैसे फसल काटने के उत्सव मनाना, सब अपराध थे।
गवाह को इनाम मिलता। अपराधी की संपत्ति तुरन्त जब्त हो जाती। थोड़ी गवाह को बाकी राजा को जाती। अपराध मनवाने को भयंकर और अमानवीय तरीकों से प्रताड़ित किया जाता। वजन लटका कर रखना , बगल में मोमबत्ती जलाने, मुंह में पानी भरना जैसे अत्याचार किए गए।
गांव के बीच मे एक हिन्दू को खड़ा करा कर उसे आरा से चीरा जाता।
हिन्दू युवतियों सै ऐसे अत्याचार हुए जिनका उल्लेख उचित नहीं। उनकी दोनों टांगो में दो रस्सी बाँध दी जाती और दोनों रस्सियां दो घोड़ों से जोड़ दी जातीं। दोनों घोड़े दो ओर दौड़ाये जाते और पल भर में एक शरीर दो भाग में बंट जाता।
यह कार्य केवल पुर्तगाली सैनिक नहीं करते थे, उनके साथ एक पादरी रहता था जो बाइबल पढ़ कर अपनी देख-रेख में कार्य प्रारम्भ कराता था।
आउतो दा फे में गांव के बीच में लोगों को ज़िंदा आग में डाल दिया जाता।
मृत व्यक्ति पर भी संदेह हो तो उसे कब्र से निकालकर हड्डियों को दंड दिया जाता और उसकी संपत्ति जब्त होती। पुर्तगाली ईसाइयों को किसी गाँव मे यह खेल दो बार खेलने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि जिस गाँव मे एक बार यह आयोजन हो जाता, उस गाँव की सारी प्रजा उसी दिन ईसाई हो जाती थी।

पर भारत तो भारत है न ! यहाँ के हिन्दू इतनी जल्दी कैसे हार मान लेते? ऊपर से सारा गोआ ईसाई हो गया था, पर अंदर ही अंदर फिर अधिकांश जन हिन्दू हो गए थे। घर में मिट्टी के नीचे दबा कर सनातन धर्मग्रंथ रखे जाने लगे। बच्चों को धर्म का ज्ञान दिया जाने लगा। रामायण-महाभारत, वेद-पुराण पढ़े-पढ़ाने जाने लगे। पर ईसाई भी तो ईसाई थे न ! वे भी इतनी शीघ्रता से कैसे पराजय स्वीकार कर लेते?

गोआ के बीचोबीच एक चिता तैयार की गई थी। लकड़ी की नहीं, हिन्दू धर्मग्रंथों की। छह महीने में हर हिन्दू के घर का कोना-, कोना छान कर,मिट्टी खोद कर धर्मग्रंथ निकाले गये थै। मराठी और संस्कृत भाषा में लिखे गए इन महत्वपूर्ण धर्मग्रन्थों की चिता, और उसके ऊपर हाथ – पैर बाँध कर डाले गए हिन्दू…

निकट खड़े पादरी ने अपनी पवित्र पुस्तक पढ़ी, और फिर सैनिक की ओर संकेत किया। सैनिक ने चिता में अग्नि प्रवाहित की और भारत धू-धू कर जल उठा। अग्नि की लपटें बढ़ीं, और उनके साथ ही बढ़ती गयीं दो प्रकार की ध्वनियां… एक जीवित जल रहे हिंदुओं के चीत्कार की ध्वनि, और दूसरी निकट खड़े ईसाइयों के अट्ठहास की ध्वनि…
सनातन जल रहा था, और अग्नि की लपटों के साथ ऊपर उठता जा रहा था चर्च! और वहाँ से हजारों कोस दूर रोम में बैठा सेंटा-क्लॉज मुस्कुरा उठा था।
यह भारत मे ईसाई धर्म के प्रारम्भ का सत्य था।
1812 में जब कोर्ट का काला अध्याय समाप्त किया गया तो शर्म के कारण स्वतः ही इसके रिकॉर्ड जला दिए। पर कई पुस्तकों में इसका वर्णन मिलता है।
16,713 लोगो को इस कोर्ट ने भयानक मौत दी। यह संख्या उस समय के छोटे से गोआ के क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी थी। पर आश्चर्य  कि आज भी गोआ के स्कूल में यह इतिहास नहीं पढ़ाया जाता।

पुरानी “बॉबी” फिल्म का मशहूर गाना “प्यार में सौदा नहीं” एक प्रचलित कोंकणी लोक-गीत पर आधारित है। गोवा इनक्वीजीशन के दौर में जादूगर (?) फ्रांसिस ज़ेवियर (जिसके नाम पर भारत में सैकड़ों स्कूल-कॉलेज हैं) ने हिन्दुओं के विवाह जैसे संस्कारों को “ब्लासफेमी” घोषित कर रखा था। नदी के पार जहाँ तक ईसाइयों का इलाका था वहां तक हिन्दू विवाह नहीं कर सकते थे। इसलिए असली कोंकणी गाने में नायिका किसी मल्लाह से निवेदन कर रही होती है कि वो उसे नदी पार करवा दे ताकि विवाह को उसे धर्म-परिवर्तन करके ईसाई न बनना पड़े।

घे घे घे घे रे, घे रे साहिबा” में नायिका का वही गिड़गिड़ाना सुनाई देता है, जिसे हिन्दी में सेक्युलराइज करके प्रेम-गीत बना दिया गया है। तुलनात्मक कर देखें तो कश्मीरी या अरबी वाक्यों को हिन्दी गानों में इस्तेमाल करते वक्त अर्थ से छेड़छाड़ नहीं करते। उन्हें जस का तस हिन्दी गाने में इस्तेमाल किया जाता है। हिमेश रेशमिया की तो अरबी के सही उच्चारण को जमकर तारीफ भी हुई थी (मुहब्बत के सफ़र में)। ऐसा शायद इसलिए भी है, क्योंकि हम अपनी परम्परायें छोड़ना/भूलना/छिपाना शान की बात समझते हैं।

मकर संक्रान्ति पर बिहार के कई इलाकों में माँ या दादी घर में सभी को चावल, गुड़ और तिल का मिश्रण (प्रसाद जैसा) देते हुए (स्थानीय भाषाओँ में) पूछती है, “तिल-तिल बहोगे न?” और बच्चे जवाब देते हैं “हाँ, तिल-तिल बहेंगे!”

ये परम्परा क्या है?

पुराणों के साथ- साथ उप-पुराण भी होते हैं, और ऐसा ही एक उप-पुराण, “कालिका-पुराण” है। इसके मुताबिक नरकासुर नाम का राक्षस मिथिला के क्षेत्र से आकर अंतिम किरात राजा घटकासुर ( दानव कुल ) को मारकर प्रागज्योतिषपुर स्थापित करता है। कामरूप के शासक तीन पुराने राजवंश उसके ही वंशज माने जाते है इसलिए कामरूप और असम के इतिहास में नरकासुर महत्वपूर्ण है। कुछ ग्रंथों के हिसाब से वो हिरण्याक्ष का पुत्र था, लेकिन उसके पिता के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं आती।

वो हमेशा से दुष्ट प्रवृति का भी नहीं था, वो बाणासुर की संगती में असुर हो गया था। उसकी माता का भूदेवी होना पक्का है। शायद ये समाज के मातृसत्तात्मकता को भी दर्शाता हो। या हो सकता है कि उस काल में सत्ता शोषण का साधन ना होती हो, इसलिए पुरुष की थी या स्त्री की, ये गौण होता हो। ये जरूर है कि नरकासुर की कहानियों में थोड़े ही समय बाद उसके लम्पट (कॉमरेड टाइप) होने का जरूर पता चल जाता है। कहते हैं, एक बार ये देवी कामख्या से ही विवाह करने के पीछे पड़ गया। देवी ने शर्त रखी कि अगर रात भर में नीलांचल पहाड़ी के नीचे से ऊपर मंदिर तक की सीढ़ियाँ बना डालो तो मैं तुमसे विवाह कर लूं।

नरकासुर फ़ौरन इस काम में जुट गया और जब देवी को लगा कि ये तो सचमुच सीढ़ी सुबह होने से पहले पूरी कर डालेगा तो उन्होंने एक मुर्गे को बांग देने का आदेश दिया। मुर्गा कुकडू कूँ कर उठा और नरकासुर ने सोचा शर्त के मुताबिक मुर्गे के बांग देने से पहले सीढ़ी पूरी करनी थी ! तो वो आधे में ही, सीढ़ी बनाना बंद कर चला गया। बाद में जब नरकासुर को पता चला तो उसने मुर्गे को खदेड़ के मार डाला। जिस जगह बेचारा मुर्गा मारा गया उसे दर्रांग जिले का कुक्कूड़काता माना जाता है। अधूरी सीढ़ी को अब मेखेलौजा पथ बुलाते हैं।

नरकासुर मथुरा के राजा कंस का मित्र भी था और विदर्भ (जहाँ की रुक्मिणी थी) की राजकुमारी माया से इसका विवाह हुआ था। महाभारत के काल में जो बाली-सुग्रीव के इलाके में वानर राज करते थे उनका राजा द्विविध भी इसका मित्र था। हयग्रीव और सुंद जैसे राक्षसों से मिलकर इसने इंद्र को हरा दिया था और वरुण का छाता (छत्र) और देवमाता अदिति के कुंडल भी छीन लाया था। बाणासुर की संगती में जब इसके अत्याचार बढ़ने लगे तो वशिष्ठ (जिनका आश्रम अब भी असम में गौहाटी के पास माना जाता है) ने उसे विष्णु के हाथों मारे जाने का शाप दे दिया था।

यहाँ कठिनाई बस इतनी थी कि नरकासुर की सेना से तभी जीता जा सकता था, जब आक्रमण करने वाली  उसकी माता हो। विष्णु अवतार श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है। जब उन्हें नरकासुर की करतूतों का पता चला (जिसमें अदिति के कुंडल छीनना और सोलह हजार एक सौ कन्याओं का अपहरण शामिल था) तो क्रुद्ध सत्यभामा ने नरकासुर पर आक्रमण कर दिया। माया से विवाह के समय, विष्णु ने ही नरकासुर को एक रथ भी दिया था, तो कृष्ण के रथ की सारथि भी सत्यभामा बनी। जहाँ से नरकासुर राज करता था वो नागों का क्षेत्र था, तो गरुड़ भी इस युद्ध में शामिल थे।

नरकासुर की ग्यारह अक्षौहणी सेना इस युद्ध में मारी गई। सेना का सेनापति मुर नाम का था, और उसी के वध से कृष्ण का एक नाम “मुरारी” भी होता है। नरकासुर से लड़ाई में कृष्ण एक प्रहार से  बेहोश हो जाते हैं तो सत्यभामा नरकासुर से लड़ने उतर पड़ती है और नरकासुर की छाती में तीर मार गिराती है। कृष्ण- सत्यभामा के संयुक्त प्रयासों से नरकासुर मारा जाता है और कृष्ण उसका सर सुदर्शन चक्र से काट कर उसकी जीभ खंडित कर देते हैं। अगर आपने मशहूर फिल्म “अवतार” देखी होगी, तो उसके अंतिम दृश्य का युद्ध इसी कहानी से प्रेरित है।

नरक निवारण चतुर्दशी पर्व की प्रतीकों भरी इस कहानी में गौर करने लायक और भी चीज़ें हैं। पौराणिक समाज में स्त्री का सम्मान और स्त्री के सैन्य आक्रमण के आदेशों की क्षमता जैसी चीज़ों की तरफ हम ध्यान नहीं दिला रहे। मेरा ध्यान इस तरफ गया कि गोमान्तक प्रान्त यानि आज का गोवा, कामरूप यानि असम के इलाके से बिलकुल दूसरे कोने में है। दोनों भारत के दो छोर हैं। जैसे बाकी भारत रावण दहन का उत्सव मनाता है, वैसे ही गोवा में नरकासुर दहन होता है। इसकी कई प्रतियोगिताएँ भी होती हैं, जिन्हें पर्यटक भी पसंद करते हैं।

हिन्दुओं और विशेषकर ब्राह्मणों की हजारों की संख्या में हत्या करवाने वाले कुख्यात सेंट ज़ेवियर के नाम से जाने जाने वाले इलाके में अब तक नरकासुर दहन की परंपरा  सुखद है। गोवा इनक्वीजीशन में हिन्दुओं के ईसाईयों के बर्बर दमन, लूट और बाद में नेहरु के 47 की आजादी के काल में गोवा की तरफ से आँख मूँद लेने के बाद भी आश्चर्यजनक रूप से हिन्दुओं की परम्पराएं वहां जीवित रह गई। मूर्तियाँ बनाने, मेले से जुड़े व्यापार आदि से अर्थव्यवस्था सुचारू रखने के तरीके समाप्त किए जा सकें शायद इसलिए इस्लामिक हमलावर ही डेढ़ मन जनेऊ नहीं जलाते थे, सेंट ज़ेवियर भी अंत समय तक ब्राह्मणों को क़त्ल करवाने, जिन्दा जलाने में प्रयासरत रहा।

यहाँ देखने लायक ये भी है कि हिन्दुओं को जो चीज़ें आसानी से समझ में आती हैं, उन सनातन परम्पराओं को समझने में विदेशियों को दिक्कत होती है। कई बार ऐसे सिद्धांत हिन्दुओं में आम हैं जिनका किसी और समाज ने सोचा ही नहीं ! जैसे “अहिंसा” का जो मतलब हमें समझ आता है, उसे अंग्रेजी में सिर्फ नॉन-वायलेंस कर देने से भी काम नहीं चलता। अरबी-फारसी में तो इसके आस पास का शब्द ढूंढना टेढ़ी खीर है ही, उर्दू में भी शायद “अहिंसा” नहीं होता। काफी कुछ वैसे ही जैसे हिन्दुओं में सनातन “सर्व धर्म समभाव” है, जबकि आजकल आयातित व्यवस्थाएं, “सहिष्णुता” सिखाने की कोशिश करती हैं।

आप किसी चीज़ के प्रति सहनशील, सहिष्णु, तब होते हैं, जब आपको वो चीज़ नापसंद हो, किसी वजह से बुरी लग रही हो। जैसे मौसम की सर्दी-गर्मी सहते हैं, बड़ों की डांट बुरी लगने पर भी सहन करते हैं। जिसे आप ओछा-नीचा मानते हैं उसे सहन या टोलरेट किया जाता है। ये बराबरी का दर्जा नहीं, नीचा दिखाना है। समानता के सिद्धांत “सर्व धर्म समभाव” से ये कहीं नीचे है। आंबेडकर जैसे कई नेता ऐसे ही समानता के अधिकार को लगातार संघर्ष करते रहे और कुछ मुट्ठी भर आयातित विचारधारा के लोग फिर से सभी धर्मों में “समानता” के बदले पहले ही दूसरों को ओछा मानकर, “सेकुलरिज्म” सहन करना सिखाना चाहते हैं।

ऐसे में सवाल ये भी है कि नरकासुर की तो जीभ काट कर जला आये, अपने अन्दर के इस “सेकुलरिज्म”  नरकासुर की जीभ काटकर उसे कब मारेंगे ? अपने अन्दर से धर्मनिरपेक्षता को भी मारिये, सभी पंथों को समान अधिकार दीजिये।
✍🏻आनन्द कुमार जी कि पोस्टों से संग्रहित

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